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    पाठ्यक्रम 11ब - जीवों की भावात्मक परिणति - छह लेश्या

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    जो कर्मों से आत्मा को लिप्त करती हैं। उसकों लेश्या कहते है।

    लेश्या के छह भेद हैं- १. कृष्ण, २. नील, ३. कापोत, ४, पीत, ५. पद्म, और ६ शुक्ल

     

    1. कृष्ण लेश्या - सदा बुरे विचार करना, बात-बात में क्रोध करना, दूसरों से घृणा करना, दया धर्म से रहित होना, वैर भाव रखना, सदा शोक संतप्त रहना, शत्रुता को न छोड़ना,लड़ना आदि जिसका स्वभाव हो आदि कृष्ण लेश्या वालों के लक्षण है।
    2. नील लेश्या - आलसी, बुद्धिहीन, कामी, भोगी, डरपोक, ठग, परवंचना में दक्ष, आहारादि संज्ञाओं में आसक्त, अतिलोभी, सदा मान-सम्मान पाने के भाव आदि नील लेश्या वालों के लक्षण हैं।
    3. कापोत लेश्या - परनिन्दा,आत्म-प्रशंसा, बात-बात में नाराज होना, शोकाकुल होना आदि कापोत लेश्या वालों के लक्षण है।
    4. पीत लेश्या - दयालु, विवेकी, संतोषी, तीव्र बुद्धिमान होना, सबसे प्रेम करना आदि पीत लेश्या वालों के लक्षण है।
    5. पदमलेश्या - सदा प्रसन्न रहना, सदा परोपकार करना, देवपूजा - दानादि करना, त्याग के भाव रखना आदि पद्म लेश्या वालों के लक्षण है।
    6. शुक्ल लेश्या - राग-द्वेष से रहित होना, प्राणी मात्र के प्रति स्नेह भाव रखना, शोक-निंदा आदि से रहित होना आदि शुक्ल लेश्या वालों के लक्षण है।

     

    लेश्याओं का उदाहरण - छह मित्र एक बगीचे में गये। वहाँ उन्होनें आम से लदा हुआ वृक्ष देखा,

    पहला मित्र बोला — चलो इस वृक्ष को उखाड़ डालें और पेट भर आम खायें।

    दूसरे मित्र ने कहा - वृक्षों को उखाड़ने से क्या प्रयोजन, केवल बड़ी-बड़ी शाखाओं को काटने से ही हमारा काम हो जायेगा।

    तीसरे ने कहा -  यह भी उचित नहीं है, हमारा काम तो छोटी-छोटी टहनियों के काटने से ही हो जायेगा।

    चौथे मित्र ने कहा - टहनियों को तोड़ने से क्या लाभ, केवल गुच्छों को तोडना ही पर्याप्त है।

    पाँचवा मित्र बोला — हमें गुच्छों से क्या प्रयोजन, केवल पके फल तोड़ लेना ही अच्छा है। तब अन्त में छठा मित्र गम्भीर होकर बोला- आप सब क्या सोच रहे हैं। हमें जितने फल चाहिए उतने तो नीचे ही पड़े हैं, फिर व्यर्थ में फल तोड़ने से क्या लाभ ।

     

    इस दृष्टान्त से लेश्याओं का स्वरूप समझ में आ जाता है। पहले मित्र के परिणाम कृष्ण एवं छठे मित्र के परिणाम शुक्ल लेश्या के प्रतीक हैं। यह उदाहरण केवल परिणामों की तारतम्यता का सूचक है।

     

    तीन लोक का वर्णन करने वाला महान ग्रन्थ - 'तिलोयपण्णत्ती'

    ईसा की द्वितीय शताब्दी (सन् १७६) के आसपास के यशस्वी आगम ज्ञाता विद्वान आचार्य यतिवृषभ द्वारा तिलोयपण्णत्ती ग्रन्थ की रचना की गई। तिलोयपण्णत्ती में तीन लोक के स्वरूप, प्रकार, विस्तार, क्षेत्रफल और युगपरिवर्तन आदि विषयों का निरूपण किया गया है। प्रसंगवश जैन सिद्धांत, पुराण और भारतीय इतिहास विषयक सामग्री भी निरुपित है। यह ग्रन्थ ९ महाधिकारों में विभक्त है।

    १– सामान्य जगत्स्वरूप, २– नारकलोक, ३– भवनवासलोक, ४– मनुष्यलोक, ५– तिर्यक्लोक, ६– व्यन्तरलोक, ७- ज्योतिलॉक ८– सुरलोक ९— सिद्धलोक।

     

    इन नौ महाधिकारों के अतिरिक्त अवान्तर अधिकारों की संख्या १८० है।

     

    प्रथम महाधिकार में २८३ गाथायें हैं और तीन गद्य - भाग है। दृष्टिवाद- सूत्र के आधार पर त्रिलोक की मोटाई, चौड़ाई और ऊँचाई का निरूपण किया है।

    दूसरे महाधिकार में ३६७ गाथाये है, जिनमे नरकलोक के सवरूप का वर्णन है |

    तीसरे महाधिकार में २४३ गाथायें हैं। इनमें भवनवासी देवों के प्रासादों में जन्म शाला, औषधशाला, लतागृह आदि का वर्णन है।

    चतुर्थ महाधिकार में २९६१ गाथायें हैं। इसमें मनुष्य लोक का वर्णन करते हुए आठ मंगलद्रव्य, कल्पवृक्ष, तीर्थकरों की जन्मभूमि, नक्षत्र, समवशरण आदि का विस्तृत वर्णन है।

    पाँचवें महाधिकार में ३२१ गाथायें हैं। जम्बूद्धीप, आदि का विस्तार सहित वर्णन है।

    छठे महाधिकार में १०३ गाथायें हैं। इनमें व्यन्तरों के निवास क्षेत्र, उनके अधिकार क्षेत्र, उनके भेद, चिन्ह, उत्सेध, अवधिज्ञान आदि का वर्णन है।

    सातवें महाधिकार में ६१९ गाथायें हैं, जिनमें ज्योतिषी देवों का वर्णन है।

    आठवें महाधिकार में ७०३गाथायें हैं। जिनमें वैमानिक देवों के निवास स्थान, आयु परिवार, शरीर, सुखभोग आदि का विवेचन है।

    नवम महाधिकार में सिद्धों के क्षेत्र, उनकी संख्या, अवगाहना और सुख का प्ररूपण किया गया है। मध्य में सूक्तिगाथायें भी प्राप्त होती हैं।

     

    यथा-अन्धा व्यक्ति कूप में गिर सकता है, बधिर उपदेश नहीं सुनता है, तो इसमें आश्यर्च की बात नहीं। आश्चर्य इस बात का है, कि जीव देखता और सुनता हुआ नरक में जा पड़ता है।

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