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  • पाठ्यक्रम 1ब - जैन श्रावक का प्रथम कर्तव्य - देवदर्शन

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    देव - दर्शन का स्वरूप -

    जिनेन्द्र देव का दर्शन श्रावकों का प्रथम एवं प्रमुख कर्तव्य कहा गया है। साक्षात् जिनेन्द्र देव का अभाव होने पर उनकी वीतराग प्रतिमा या जिनबिम्ब में उनके गुणों का आरोपण करके श्रद्धा पूर्वक अरिहन्त, सिद्ध या जिनदेव मानकर, निर्मल परिणामों से उनके जैसे गुणों की प्राप्ति की भावना से नमस्कार करना देव-दर्शन कहलाता है।

     

    देव - दर्शन का फल -

    देव-दर्शन से पूर्व जन्म में संचित पाप-समूह नष्ट हो जाता हैं, जन्म-जरा-मृत्यु रूपी रोग मिट जाता है एवं स्वर्ग सुख तथा सहज मोक्षसुख की भी उपलब्धि देव-दर्शन से सहज हो जाती है।

     

    देव – प्रतिमा का रूप - जिनेन्द्र देव की प्रतिमा समचतुरस्त्र संस्थान वाली खड्गासन अथवा पद्मासन में होती है। प्रतिमा के लटकते हुए दोनों हाथ अथवा हाथ पर हाथ धरी हुई मुद्रा कृतकृत्यता का प्रतीक है। अर्थात् सभी करने योग्य कार्य वे कर चुके, अब कुछ भी करना शेष नहीं रहा। अर्धान्मीलित नेत्र अन्तर्दूष्टि का प्रतीक है अर्थात् जिन्होंने पर पदार्थों की ओर से दृष्टि को हटाकर अपने आत्म तत्व की ओर कर दी है। उनकी वीतराग मुख मुद्रा समत्व परिणति का प्रतीक है अर्थात् वे कभी प्रसन्न अथवा उदास नहीं होते हैं।

     

    देव प्रतिमा

    देव प्रतिमा का प्रभाव -

    जिनेन्द्र प्रतिमा जहाँ विराजित होती है, उसे जिनालय, जिनमंदिर अथवा चैत्यालय कहते हैं। जिनेन्द्र प्रतिमा एक आदर्श (दर्पण) के समान है, जिसे देखकर हमें अपने मूल स्वरूप का ज्ञान होता है। जैसे दर्पण में अपना चेहरा (मुख) देखने पर, चेहरे पर लगे दाग-धब्बे हम देख पाते हैं, उसी प्रकार वीतराग भगवान का दर्शन हमें अपने भीतर के राग-द्वेष, विषय-कषाय, अज्ञान रुपी धब्बों के देखने में निमित्त बनता है।

     

    जिस प्रकार किसी पहलवान को देखने से पहलवान बनने के, डॉक्टर को देखने से डॉक्टर बनने के भाव मन में उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार वीतरागता से सहित, सौम्य मुद्राधारी जिनेन्द्र भगवान के बिम्ब के दर्शन से हमारे भाव भी वीतरागी बनने के होते हैं/ होना चाहिए।

     

    देव प्रतिमा की महिमा -

    जिनबिम्ब के दर्शन से मनुष्य एवं तिर्यज्यों को सम्यग्दर्शन तक प्राप्त हो जाता है, पूर्व में बाँधे हुए निधति, निकाचित कर्म भी क्षय को प्राप्त हो जाते हैं।

     

    जिन प्रतिमा मंदिर की आवश्यकता -

    जिन्होने घर गृहस्थी सम्बन्धी सभी कार्य, पाँच पाप छोड़ दिये हैं ऐसे साधक तो अपने मन में ही परमात्मा की वंदना, पूजन कर सकते हैं। किन्तु गृहस्थ श्रावक के लिए सर्वत्र राग-द्वेष मय वातावरण ही मिलता है वह पाँच पापों में लिप्त रहता है।

     

    उसके लिए ऐसा कोई स्थान चाहिए जहाँ वह कुछ समय पापों से दूर रहकर परमात्मा का दर्शन, पूजन, ध्यान कर सके, जीवन संसार के सत्य को जान सके, जहाँ का वातावरण राग-द्वेष, विषय कषायों से दूर हो अत: ऐसा स्थान मंदिर ही हो सकता है। इसलिए अकृत्रिम जिनालयों के अनुरूप बड़े - बड़े राजाओं ने, सेठों ने एवं सुधी श्रावकों ने भव्य जिन मंदिरों का निर्माण कराया, उनमें जिनबिम्ब प्रतिष्ठित कराया और आवश्यकतानुसार आज भी कर रहे हैं। अत: गृहस्थ के लिए जिनालय की नितांत आवश्यकता है।

     

    जिन मंदिर/देव दर्शन की विधी -

    देव दर्शन हेतु प्रात:काल स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर शुद्ध धुले हुए साफ वस्त्र (धोती दुपट्टा अथवा कुर्ता पायजामा) पहनकर तथा हाथ में धुली हुई स्वच्छ अष्टद्रव्य लेकर मन में प्रभु दर्शन की तीव्र भावना से युक्त, नङ्ग पैर नीचे देखकर जीवों को बचाते हुए घर से निकलकर मंदिर की ओर जाना चाहिए। रास्ते में अन्य किसी कार्य का विकल्प नहीं करना चाहिए। दूर से ही मंदिर जी का शिखर दिखने पर सिर झुकाकर जिन मंदिर को नमस्कार करना चाहिए, फिर मन्दिर के द्वार पर पहुँचकर शुद्ध छने जल से दोनों पैर धोना चाहिए।

     

    अर्ध चढ़ाते समय की भावना -

    मंदिर के दरवाजे में प्रवेश करते ही ऊँजय जय जय, निस्सही निस्सही निस्सही नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु बोलना चाहिए फिर मंदिर जी में लगे घण्टे को बजाना चाहिए।

    इसके पश्चात् भगवान के सामने जाते ही हाथ जोड़कर सिर झुकावें, णमोकार मंत्र पढ़कर कोई स्तुति स्तोत्र पाठ पढ़कर 'भगवान की मूर्ति को एक टक होकर देखें भावना करें जैसी आपकी छवि हैं वैसी ही वीतरागता मुझे प्राप्त होवे जैसे आप सिंहासन आदि अष्ट प्रातिहार्यों से निलिप्त हैं वैसे ही मैं भी संसार में निर्लिप्त रहूं" साथ में लाए पुंज बंधी मुट्ठी से अँगूठा भीतर करके अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु ऐसे पाँच पुंज चढ़ावे।

    फिर जमीन पर गवासन से बैठकर, जुड़े हुए हाथों को तथा मस्तक को जमीन से लगावें तीन बार धोंक देवे तत्पश्चात् हाथ जोड़कर खड़े हो जावे और मधुर स्वर में स्पष्ट उच्चारण के साथ स्तुति आदि पढ़ते हुए अपनी बाँयी ओर से चलकर वेदी की तीन परिक्रमा करें। तदनन्तर स्तोत्र पूरा होने पर फिर बैठकर नमस्कार करें।

    परिक्रमा देते समय ख्याल रखे कोई धोक दे रहा हो तो उसके आगे से न निकलकर, पीछे की ओर से निकले। दर्शन करने इस तरह खड़े हो तथा पाठ करे जिससे अन्य किसी को बाधा न हो।

     

    गन्धोदक लेने की विधी -

    दर्शन कर लेने के बाद अपने दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को गन्धोदक के पास रखे अन्य जल में डुबोकर शुद्ध कर लेने पर अंगुलियों से गन्धोदक लेकर उत्तमांग पर लगायें फिर गंधोदक वाली अंगुलियों को पास में रखे जल में धो लेवें। गन्धोदक लेते समय निम्न पंक्तियाँ बोलें -

     

    निर्मलं निर्मलीकरण, पवित्र पाप नाशनम्।

    जिन गन्धोदकं वंदे, अष्ट कर्म विनाशकम्॥

    इसके पश्चात् नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए कायोत्सर्ग करें। फिर जिनवाणी के समक्ष 'प्रथमं करण चरण द्रव्यं नम:' ऐसा बोलते हुए क्रम से चार पुंज लाइन से चढ़ावें तथा गुरु के समक्ष 'सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्रेभ्यो नम:।' ऐसा बोलकर क्रम से तीन पुंज लाइन से चढ़ावे। कायोत्सर्ग करें, फिर भगवान को पीठ न पड़े ऐसा विनय पूर्वक दरवाजे से बाहर अस्सहि, अस्सहि, अस्सहि बोलते हुए निकलें।

     

    दर्शन करते समय चढ़ाने योग्य सामग्री -

    मदिर जाते समय प्रभु चरणों में चढ़ाने हेतु अपनी सामथ्र्य के अनुसार उत्कृष्ट, जीव जन्तु रहित, स्वच्छ सामग्री ले जाना चाहिए। स्वर्ग के देव दिव्य पुष्प, दिव्य फलादि सामग्री ले जाते हैं। चक्रवर्ती आदि राजा महाराजा हीरे मोती जवाहारात आदि भगवान के चरणों में चढ़ाने के लिए ले जाते हैं। मनोवती कन्या का दृष्टान्त आगम में आता है उसने गज मोती चढ़ाकर ही भगवान के दर्शन करने के पश्चात् ही भोजन करने का नियम लिया था।

     

    सामान्य श्रावक श्रीफल, अक्षत, बादाम आदि फल लेकर भगवान के चरणों में जाता है। अत: भगवान के पास क्या लेकर जाएँ इसका कोई विशेष नियम नहीं है, सामान्य रूप से सभी अखंड चावल लेकर देव दर्शन हेतु जाते हैं पर अपनी सामथ्र्य के अनुसार अन्य बहुमूल्य श्रेष्ठ वस्तु भी चढ़ा सकते हैं। वह सामग्री हमारे राग भाव की कमी, त्याग का प्रतीक है। अनेक क्षेत्रों में जहाँ जैसी सामग्री उपलब्ध हो अखरोट, बादाम, काजू, किसमिस, नारियल आदि भी ले जा सकते हैं।

     

    द्रव्य ले जाने का कारण -

    चावल आदि सामग्री ले जाने के कारण हमें रास्ते में ध्यान रहता है कि हम कहाँ जा रहे हैं ? मंदिर जा रहे हैं। बाजार से गुजरते हुए भी मन बाजार में नहीं भटकता। दूसरा कारण जब लौकिक व्यवहार में साधारण से सम्राट आदि से मिलने जाते समय, रिश्तेदारों के यहाँ जाते समय कुछ न कुछ भेंट लेकर अवश्य जाते हैं खाली हाथ नहीं जाते। तब तीन लोक के नाथ अकारण बन्धु जहाँ विराजमान है ऐसे मंदिर में खाली हाथ कैसे जा सकते हैं अत: भगवान के पास नियम से कुछ न कुछ लेकर अवश्य जाना चाहिए।



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    Jayant Kale (Jain)

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       5 of 5 members found this review helpful 5 / 5 members

    जय जिनेंद्र

    देव दर्शन की सही विधी तथा महत्व बडे ही सरल शब्दोव्दारा बताकर हमे लाभान्वीत किया.

    आपके इस सराहनीय कार्य के लिये शुभ कामनाये...

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    Meenajain

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       1 of 1 member found this review helpful 1 / 1 member

    I like  very much 

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    रतन लाल

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    जैन श्रावक धर्म

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