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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • मूकमाटी पृष्ठ 89

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    लो, अब शिल्पी

    कुंकुम-सम मृदु माटी में

    मात्रानुकूल मिलाता है।

    छना निर्मल जल।

    नूतन प्राण फूँक रहा है

    माटी के जीवन में

    करुणामय कण-कण में,

     

    अलगाव से लगाव की ओर

    एकीकरण का आविर्भाव

    और

    फूल रही है माटी।

    जलतत्त्व का स्वभाव था-

    वह बहाव

    इस समय अनुभव कर रहा है।

    ठहराव का।

    माटी के प्राणों में जा

    पानी ने वहाँ

    नव-प्राण पाये हैं,

    ज्ञानी के पदों में जा

    अज्ञानी ने जहाँ

    नव-ज्ञान पाया है।

    अस्थिर को स्थिरता मिली

    अचिर को चिरता मिली

    नव-नूतन परिवर्तन...!

     

    Lo, now the Artisan

    Mingles in due quantity

    The filtered pure water

    Into the saffron-like soil.

    He is blowing new breath

    Into the life of the Soil

    Through every gracious particle,

     

    From separation towards close relationship

    The unfolding of unification

    And

    The Soil is swelling up.

    That flow

    Was the nature of the water-element -

    It's experiencing

    Pause at this time.

    On entering into the breath of the Soil,

    The water

    Has attained a new vitality there,

    Whereas, the ignorant one

    Has acquired new wisdom

    At the feet,” of the wise.

    The unsteady achieved steadiness

    The undurable found durability

    A new fresh transformation...!

    Edited by संयम स्वर्ण महोत्सव



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