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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • मूकमाटी पृष्ठ 17

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    समर्पण-भाव-समेत

    उसके सुखद चरणों में

    प्रणिपात करना है तुम्हें,

    अपनी यात्रा का

    सूत्र-पात करना है तुम्हें !

     

    उसी के तत्वावधान में

    तुम्हारा अग्रिम जीवन

    स्वर्णिम बन दमकेगा।

    परिश्रम नहीं करना है तुम्हें

    परिश्रम वह करेगा;

    उसके उपाश्रम में

    उसकी सेवा-शिल्प-कला पर

    अविचल-चितवन—

    दृष्टि-पात करना है तुम्हें

    अपनी यात्रा का

    सूत्र-पात करना है तुम्हें !

     

    अपने-अपने कारणों से

    सुसुप्त-शक्तियाँ

    लहरों-सी व्यक्तियाँ,

    दिन-रात, बस

    ज्ञात करना है तुम्हें,

    अपनी यात्रा का

    सूत्र-पात करना है तुम्हें!"

     

    चिन्तन-चर्चा से

    दिन का समय

    किसी भाँति कट गया

    परन्तु

     

    With a sense of dedication

    You have to prostrate

    At his blissful feet,

    You have to make

    A start for your journey !

     

    Under his auspices, indeed,

    Your advancing life

    Would glitter like gold.

    You need not take pains

    He would exert himself;

    In his hermitage

    You have to keep up

    A firm-eyed look

    On his service-craftsmanship,

    You have to initiate

    Your journey onwards !

     

    Due to their own inherent reasons

    The dormant powers

    The Wave-like manifestations

    You have only to find out

    Day-in and day-out,

    On your journey

    You have to make a beginning !”

     

    The day-time

    Somehow passed over

    In thinking and discussing

    But !



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