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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 45. वैद्य : एक से बढ़कर एक

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    रात्रि व्यतीत हुई और दिन का मन्दगति से आगमन हो रहा है| ठीक ही है, इंतजार की घड़ियाँ बहुत लम्बी हुआ करती हैं और वह भी दुख की बेला हो तब कहना ही क्या? वैसे सुख का सागरोपम काल भी शीघ्रता से कैसे व्यतीत हो जाता है, पता भी नहीं चल पाता। प्रभात काल होते ही एक से एक अनुभवी चिकित्सक विद्या विशारद, विश्वविख्यात वैद्य भी सेठजी की चिकित्सा हेतु आए। जिनमें ऐसे भी मेधावी हैं, जो रोगी के मुख-दर्शन मात्र से रोग का सही निदान कर लेते हैं, कुछ तो रोगी की जिह्वा का रंग-रूप देखकर ही, कुछ नाड़ी की फड़कन देख और नाखून तथा आँखों की लालिमा की तरतमता से रोग की पहचान कर लेते हैं।

     

    एक वैद्य ऐसा भी आया जिसने पूर्व पुण्य के फल से और वर्तमान की दीर्घकालीन साधना के बल पर अति दुर्लभ स्वर-बोध (स्वर-विज्ञान) में सफलता हासिल की है और वह मन्त्र-तन्त्र का ज्ञाता एवं शुभाशुभ निमित्तों के माध्यम से भविष्य को बताने वाले निमित्त शास्त्र अर्थात् अरिष्ट शास्त्र का भी श्रेष्ठ जानकार है।

     

    सभी ने अपने-अपनी विधियों से सेठ का निरीक्षण किया। शरीर निद्रा से घिरा, रुक-रुक कर मूर्छित-सी दशा को प्राप्त हो रहा था। पर वचन की चेष्टा नहीं के बराबर थी। क्रमशः सबने अपने-अपने निर्णय दिये और सबका एक मत बना की दाह का रोग है। पीड़ा की अनुभूति हो रही है, इसका कारण किसी एक वस्तु की निरन्तर चाह बनी हुई है।

     

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    चिकित्सकों ने कहा-इन्हें केवल चेतन-चेतन की रट, उसी की चिन्ता, चिन्तन-मनन ज्यादा नहीं करना चाहिए। थोड़ी-बहुत शरीर की भी चिन्ता करनी चाहिए, तन के अनुरूप खान-पान देना चाहिए और मन के अनुरूप विश्राम भी। मात्र इन्द्रिय दमन की प्रक्रिया से कोई भी कार्य सफल नहीं होने वाला है और वैद्यों ने एक सूक्ति कह सुनाई-

     

    "प्रकृति से विपरीत चलना

    साधना की रीत नहीं है।

    बिना प्रीति, विरति का पलना

    साधना की जीत नहीं,

    "भीति बिना प्रीति नहीं है"

    इस सूक्ति में

    एक कड़ी और जुड़ जाय,

    तो बहुत अच्छा होगा, कि

    "प्रीति बिना रीति नहीं

    और रीति बिना गीत नहीं"

    अपनी जीत का-

    साधित शाश्वत सत्य का।" (पृ. 391)

     

    प्रकृति यानि शरीर के स्वभाव से बिल्कुल विपरीत चलना, साधना की सही-सही पद्धति नहीं है। बिना आत्म-तत्त्व की प्रीति जगे, सम्यग्दर्शन बिना वैराग्य का धारण करना, तप-साधना करना भी पारमार्थिक-संघर्ष की जीत का कारण नहीं है।

     

    संसार के दुखों से, चतुर्गति भ्रमण से भयभीत हुए बिना निज आत्म तत्त्व से, मोक्षमार्ग से प्रीति भी नहीं हो सकती। इस सूक्ति में एक कड़ी और जुड़ जाय तो अति उत्तम होगा कि-समीचीन आस्था, रुचि बिना ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं होता और सम्यग्ज्ञान के बिना-सही रीति बिना सम्यक् चारित्र रूपी गीत का गाना अर्थात् धारण करना सम्भव नहीं हो पाता फिर ऐसी दशा में चेतन की जीत, शुद्धात्म तत्त्व की उपलब्धि द्वारा सिद्धत्व का सही आनन्द नहीं आ सकता


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