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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 40. प्रार्थना - कुम्भ की : चिढ़ती झारी

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     एक आँख वाली इस लेखनी ने मेरी प्रशंसा के बहाने स्वर्ण कलश का अपमान किया। इस निन्द्य कार्य में मुझे निमित्त बनाया गया, इसीलिए इसमें मेरा भी अपराध सिद्ध होता है। यूँ स्वयं को धिक्कारता हुआ माटी के कुम्भ ने दीर्घ स्वांस ली और फिर प्रभु से प्रार्थना प्रारम्भ करता है-हम जैसे पुण्यहीन भव्य जीवों को भव-भव में पराभव यानि अपमान का ही अनुभव हुआ है। परा भव यानि श्रेष्ठ भव, मोक्ष का लाभ कब होगा? निकट भविष्य में संभव है या नहीं, शीघ्र ज्ञात हो भगवन्! जब तक प्रभुता प्राप्त नहीं होती, तब तक एक की प्रशंसा-एक की निन्दा, एक को उठाना तो एक को गिराना, एक धनी-एक निर्धन, एक गुणवान-एक निर्गुण, एक सुन्दर-एक बन्दर यह सब विषमता देख बड़ी पीड़ा होती है प्रभु इसे, यह सब देखा नहीं जाता, इसी कारण आँखों को बंद रखना पड़ता है। यदि सबमें साम्यता समानता हो सके तो बड़ी कृपा होगी स्वामिन् ! कुम्भ की प्रार्थना सुन स्फटिक की झारी और चिढ़ने लगी और चिढ़ती हुई कुम्भ से कहती है कि- अरे पापी!

     

    "पाप-भरी प्रार्थना से

    प्रभु प्रसन्न नहीं होते,

    पावन की प्रसन्नता वह

    पाप के त्याग पर आधारित है।" (पृ. 373)

     

    मन में पाप धारण कर भगवान् से कितनी भी प्रार्थना करो, वे प्रसन्न होने वाले नहीं हैं, पावन प्रभु तो पापों के त्याग और व्रतों के अंगीकार करने से ही प्रसन्न होते हैं। मैंने अग्नि परीक्षा दी है, ऐसा बार-बार कहकर जो तुम अपने आप को निष्पाप सिद्ध करना चाहते हो, सो यह पाप ही नहीं महापाप है।

     

    तुममें इतना पाप भरा है कि युगों-युगों तक जलाने से जल नहीं सकता, धुलाने से धुल नहीं सकता। प्रलयकाल में जल की ही नहीं अग्नि की भी वर्षा मिट्टी (धरा) पर कई बार हुई किन्तु तुम्हारी कालिमा में कोई अन्तर नहीं आया। श्रावण मास में काले-काले बादलों से घिरी अमावश्या की रात्रि के समान काली बबूल की लकड़ी भी तो अग्नि परीक्षा देती है और बार-बार नहीं एक बार में ही अपने जीवन को पाप रहित कर चाँदी जैसे उज्वल छवि वाली राख बनती है।

     

    इस बात को सुन कुम्भ बीच में ही बोल पड़ा-अग्नि परीक्षा के बाद भी सब कोयलों में बबूल के कोयले काले भी तो होते हैं, बताओ क्यों? इस प्रश्न को सुन उत्तर देती है, झारी-अरे मति मन्द सुन, इतना भी नहीं जानता कि कोयला बनने में कारण अग्नि का पर्याप्त ताप न होना होता है अथवा लकड़ी में रहा शेष जलांश होता है, अन्यथा वह राख में ढलती/परिवर्तित होती है। इसमें लकड़ी का थोड़ा-सा भी दोष नहीं है, जा-जा कहीं भी, तेरे साथ अधिक बोलना भी दोषों का सम्मान करना है और कुम्भ की ओर से झारी अपना मुख मोड़ लेती है।


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