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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 69. गले उतरी बात

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    जैसे-तैसे आतंकवाद को यथार्थता समझ में आई किन्तु वह तुरंत कार्य रूप परिणत कैसे होती? क्योंकि अभी पर्याप्त काल भी अपेक्षित है, गले उतरी बात पचने के लिए। देखते ही देखते दृष्टिकोण बदल सकता है पर चाल-ढाल नहीं, कषाय के वेग को संयत होने में समय तो लगता ही है पर अब ज्यादा समय कहाँ रहा-कुछ ही समय में सब कुछ समाप्त होने को है। नाव करधनी तक डूब गई है। जहाँ पर लिखा था आतंकवाद की जय हो, समाजवाद का लय हो भेदभाव का अन्त हो, वेद-भाव जयवन्त हो।”

     

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    डूबती नाव के दृश्य को देख, दल के आत्मविश्वास को एकाएक आघात पहुँचा मानो वज्रपात ही हुआ हो, देवता दल की बात सत्य निकली और पश्चाताप से घुटता हुआ व्याकुल, शोकाकुल हो, अवरुद्ध कण्ठ से आतंकवाद कहने लगा-कुम्भ और परिवार से कि तुम्हारे बिना कोई शरण और पार उतारने वाला तरणि (नाव) नहीं है। हे क्षमा के अवतार! हमें क्षमा करो बड़ी भूल हुई

    हमसे, अब पुनरावृत्ति नहीं होगी हम पर विश्वास करो।

     

    संकटों से घिरे हैं चाहो तो बचा लो, काँटों से छिदे हुए हैं, चाहो तो फूल बिछाओ। हम तो अपराधी हैं, हमेशा जघन्य बुद्धि ही रही, सही पदार्थों का ज्ञान हो ऐसी बुद्धि चाहते हैं, अब अधिक समय न बिताओ, किन्तु सच्चा मार्ग हमें बताओ। स्वभाव से शैतानी करने वाली सन्तान पर भी तो माँ की कृपा होती ही है और फिर अपनी सन्तान हो या दूसरों की कष्ट देना, सताना माँ की सत्ता को कब स्वीकार था हमें बताओ? इतना कहते-कहते दल का मुख बन्द हो गया।

     

    "पर्त से केन्द्र की ओर

    जब मति होने लगती है

    अनर्थ से अर्थ की ओर

    तब गति होने लगती है।" (पृ. 475)

     

    बुद्धि जब पर्याय से हटकर द्रव्य की ओर, असत्य से सत्य की ओर होने लगती है, तब अनिष्ट से इष्ट की ओर यात्रा होने लगती है, ऐसा सोचता हुआ सेठ कहता है कि - अधिक दीन-हीन मत बनो भाई जो फूल-फलों के समूह से लदा, हरा-भरा वृक्ष है, उससे थोड़ी-सी छाया माँगना क्या हँसी का कारण नहीं है? वह तो स्वयं पथिक की प्रतीक्षा में खड़ा ही है। षट्स मिश्रित भोजन बनाकर जिसने जिसे विनय-आग्रह कर आमंत्रित किया है, क्या वह उसे जल नहीं पिला सकता भला तुम ही बताओ?


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