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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 2. बलवानों का बल

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    लड़खड़ाती लकड़ी की जिह्वा, रुकती-रुकती पुनः कुछ कहती है - निर्बलों को सताने, कष्ट देने से बलवानों का बल सफल नहीं होता, अपितु जो बलहीन हैं उन्हें सहारा दे ऊपर उठाने में ही बल की सदुपयोगिता है। लकड़ी की बात सुनकर मीठे-सरल शब्दों में शिल्पी कहता है -

     

    "नीचे से निर्बल को ऊपर उठाते समय

    उसके हाथ में पीड़ा हो सकती है,

    उसमें उठाने वाले का दोष नहीं,

    उठने की शक्ति नहीं होना ही दोष है।" (पृ. 272)

    ऊपर उठने की भावना रखने वाले के हाथों में कमजोरी होने पर, उठाते समय यदि उसे कोई कष्ट हो तो उसमें उठाने वाले का कोई दोष नहीं, क्योंकि उठाने वाला तो अपना कर्त्तव्य ही कर रहा है। और वर्तमान प्रसंग में भी यही बात है कुम्भ के जीवन को ऊपर उठाना, उन्नत बनाना है और इस कार्य में तुम्हें ही सहयोगी बनना होगा और कोई बन भी नहीं सकता।

     

    शिल्पी की बात सुन कुछ सकुचाती हुई, मन में स्वीकृति प्रदान करती हुई पुरुष के समक्ष स्त्री के समान, थोड़ी सी गर्दन हिलाती हुई लकड़ी कहती है- आपकी बात कुछ समझ में आई कुछ नहीं भी, किन्तु आपकी उदारता देख बात टालने की हिम्मत नहीं होती और लकड़ी की ओर से प्रासंगिक कार्य हेतु अनुमति मिलती है।

     

    अवा के मुख पर दबा-दबाकर रबादार (दानेदार) राख और माटी इस तरह बिछाई गई की बाहरी हवा ही नहीं, हवा की आवाज भी भीतर ना जा सके। अवा के उत्तर दिशा की ओर नीचे के भाग में एक छोटा-सा द्वार है, जिस द्वार पर पहुँचकर कुम्भकार सिद्ध प्रभु को स्मरण कर नौ बार णमोकारमंत्र का उच्चारण करता है और एक छोटी सी लकड़ी से अवा में अग्नि लगाता है, किन्तु जलती अग्नि कुछ ही पलों में बुझ जाती है।

     

    अग्नि फिर से पुनः जलाई जाती है किन्तु वह भी जल्दी से बुझ जाती है। इस जलने-बुझने की क्रिया को, कई बार होती देख कुम्भकार पुनः लकड़ी से कहता है-लगता है इस शुभ कार्य में सहयोग की पूरी स्वीकृति अभी नहीं मिली अन्यथा बार-बार आग बुझ क्यों रही है? इस पर लकड़ी कहती है-नहीं-नहीं यह बाधा मेरी ओर से नहीं है-

     

    "स्वीकार तो ............स्वीकार..........

    समर्पण तो............समर्पण.........

    बाहर...सो भीतर, भीतर... सो बाहर ।" (पृ. 274)

    मैंने तो मन, वचन, काय से आपकी बात स्वीकार की है, आपके कर्तव्य के प्रति समर्पण किया है। बाहर और भीतर एक रूप ही व्यवहार और एक ही परिणति, उपयोग की धारा यहाँ चल रही है।


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