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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 41. असीम भोगाभिलाषा : स्फटिक की

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    झारी की प्रतिक्रिया देख कुम्भ कहता है-यदि मेरे साथ बोलना भी पाप है तो मत बोलो, यदि देखने में ताप होता है तो मत देखो। परन्तु तुमने पाप के विषय में जो निर्णय लिया है, वह गलत है बस! यही बताना चाहता हूँ, कम से कम सुन तो लो फिर तौलो और कुम्भ अपनी बात सुनाता है-

     

    " ‘स्व' को स्व के रूप में

    ‘पर' को पर के रूप में

    जानना ही सही ज्ञान है

    और

    ‘स्व' में रमण करना

    सही ज्ञान का 'फल'।" (पृ. 375)

     

    मैं, मैं ही हूँ जानना-देखना मेरा स्वभाव है, इस प्रकार स्वयं को स्वयं के रूप में जानना तथा मुझसे भिन्न शरीर आदि जड़ स्वभावी, सर्वथा पृथक् एवं अन्य है। इस प्रकार पर को 'पर' के रूप में जानना ही सही-सही ज्ञान है, और निज आत्म तत्त्व में लीन होना ही सम्यग्ज्ञान का उचित परिणाम है।

     

    विषयों को चाहने वाला, भोगों का दास, तन-मन-इन्द्रियों का गुलाम ही पर पदार्थों का स्वामी बनना चाहता है, यही पाप है, सब पापों का बाप। अरे झारी ! जरा तू अपनी वृत्ति और प्रवृत्ति की ओर भी देख कैसी है वह-वासना से भरी, पल-पल में हाव-भाव रंग बदलने वाली अप्सरा-सी तेरी पारदर्शिता, दूध भरने पर धवला-सफेद, घी भरने पर पीली, इक्षु-रस भरने पर हरी हो पलट जाती है इतना ही नहीं पास में पड़े काले, पीले, हरे या लाल गुलाब के भी गुण धर्मों को आत्मसात कर लेती है तू। यह तेरी असीम भोगाभिलाषा ही तो है, हाय! जात-पात को तो तूने लात ही मार दी, लाज-लिहाज वाली कोई वस्तु तेरे पास नहीं रही। इसे तू समता नहीं कह सकती न ही अपनी असीम क्षमता, कारण कि -

     

    "दूसरों से प्रभावित होना

    और

    दूसरों को प्रभावित करना,

    इन दोनों के ऊपर

    समता की छाया तक नहीं पड़ती।" (पृ. 377)

     

    पर निमित्त से झट से प्रभावित होना और दूसरों को प्रभावित करना, इन दोनों दशाओं में समता का अभाव ही माना जायेगा। भले ही तू स्फटिक मणी की बनी उजली-सरली-सी दिखती है पर तेरे रग-रग में राग भरा है, मायाचारी छुपी है, तेरी इस प्रवृत्ति को बगुले ने भी सीख ली है। अरी झारी तू इस रहस्य को कब तक छुपा सकेगी जहाँ तक मेरी प्रकृति की बात है सो जैसी है सबके सामने प्रकट है। घट के ऊपर कोई आवरण नहीं है, आच्छादन के नाम पर मात्र इस पर आकाश भर तना है। इसी से मेरी रक्षा है, यदि पाप पास हो तो छुपाऊँ, छुपाने का साधन जुटाऊँ।

     

    मैं किसी की स्वतन्त्रता छीनता नहीं, किसी रंग-रोगन का मुझ पर प्रभाव पड़ता नहीं, सदा एक-सी ही दशा है मेरी। इसी का नाम समता है, इसी समता की सिद्धि के लिए ऋषि-मुनि माटी की शरण लेते हैं यानि भू-शयन मूलगुण अंगीकार करते हैं। इसीलिए समता की सहेली मुक्ति इन्हीं पृथ्वी में विचरण करने वाले ऋषियों को ही वरती है। समझी पाप की पुतली झारी, तू माटी को पागल समझ बैठी इतना कहकर कुम्भ चुप हो जाता है।


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