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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 32. उद्घाटन : अपार भण्डार का

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    इस अवसर पर इन्द्र भी धरती के स्वाभिमान की रक्षा करने हेतु तीखे नुकीले बाणों को बादलों के शरीर पर छोड़ रहा है। जिससे बादल दल का रूप छिन्न-भिन्न हो बिगड़ता जा रहा है, उनकी अशोभनीय, दीन हीन स्थिति बन पड़ी है इस दयनीय-सी दुर्दशा को देख रोना आता है। सम्पूर्ण आकाश में जहाँ देखो वहाँ भू-कण ही भू-कण दिखाई दे रहे हैं। जल-कण नाम मात्र के शेष बचे हैं। यही कारण है कि सागर ने पुनः अग्रिम कार्य की जानकारी दे जल से भरे और बादलों को आकाश में भेजा।

     

    सागर के निर्देशानुसार बादलों ने बिजली पैदा की, क्रोध से भरी बिजली भी चमकने लगी। बिजली की चमक से सबकी आँखें बन्द हो गई, स्वभाव से अनिमेष इन्द्र की भी पलकें झपकने लगी तभी इन्द्र ने अमोघ अस्त्र वज्र निकाल कर बादलों पर फेंका। वज्र की मार खा बादलों के मुख से पीड़ा सूचक 'आह' ध्वनि निकली जिसे सुनते ही सौरमण्डल भी बहरा हो गया।

     

    रावण की भाँति मेघों का रोना, चीखना सागर के लिए अपशकुन सिद्ध हुआ और इधर धूल के कण चमकती बिजली की आँखों में घुसकर उसे दुख देने लगे। ऐसी विपरीत परिस्थिति में बिजली भी कांपने लगी शायद इसी कारण से वह चंचल क्षणिक आयु वाली बनी है। सागर ने पुनः आदेश दिया बादलों को कि- इन्द्र ने अमोघ अस्त्र चलाया तो तुम रामबाण चलाओ, किन्तु पीछे हटने का नाम नहीं लेना, ईंट का जवाब पत्थर से दो और शीघ्र ही पत्थरों के समान बड़े- बड़े ओलों की वर्षा करो।

     

    सागर की बात सुनते ही बादलों में नई चेतना आई, स्वाभिमान जागृत हुआ और ओलों का उत्पादन सो ऐसा लगा कहीं भरे हुए अपार भण्डार का उद्घाटन ही हुआ हो। हल्के-भारी, छोटे-बड़े, त्रिकोण, चतुष्कोण, पञ्च पहलुदार अनेक आकार, अनेक भार वाले गोल-सुडौल ओलों से सारा आकाश भर गया।


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