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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 3. सार्थक हुआ नाम : जलधी

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    इस निन्दनीय कार्य को करते हुए समुद्र ने अपनी अज्ञानता बुद्धिहीनता का दुनिया को परिचय दिया है और जलधी' यानी ‘जड़धी' अपने नाम को सार्थक किया है। अपने साथ इतना बुरा व्यवहार होने के बाद भी धरती ने बदला नहीं लेने का संकल्प लिया है। इसलिए धरती का नाम ‘सर्वसहा'(सब-कुछ सहन करने वाला) भी पड़ा है सर्वस्वाहा (सबको नष्ट करने वाला) नहीं, सन्तों का शान्त पथ भी सदा यही कहता है-

     

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    "सर्व-सहा होना ही

    सर्वस्व को पाना है जीवन में

    सन्तों का पथ यही गाता है।" (पृ. 190)

    सब कुछ कष्टों को सहने की आदत वाला व्यक्ति ही जीवन में सब सुख-सम्पत्ति को प्राप्त करता है। सहनशीलता महान् व्यक्तियों का एक विशिष्ट गुण माना जाता है। इसके अभाव में जीवन कभी भी श्रेष्ठ/महान् नहीं बन सकता है।

     

    माँ धरती सब अन्याय को समता से सहन कर रही है किन्तु न्याय पथ पर चलने वाले सूर्य से यह अन्याय देखा नहीं गया। उसने किसी से इसकी चर्चा भी नहीं की, किन्तु वह निरन्तर यह प्रयास करता रहा कि अन्याय का पक्ष नष्ट हो और न्याय पक्ष की जीत हो। इसलिए उसने अपनी तेज किरणों द्वारा समुद्र के जल को सुखा दिया और उसके भीतर छुपे अपार धन-वैभव को देवों और इन्द्रों को दिखा दिया। इस पर भी जल का स्वभाव तो देखो, जला हुआ जल बादल में बदला और पुनः बरस जाता है बार-बार अपने दोष और चोरी के धन को छुपाता रहता है वह।


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