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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 4. पथिक : न्याय पथ का

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    समुद्र ने कई बार सूर्य को घूस (रिश्वत) देने का प्रयास किया, पर सूर्य अपने न्याय मार्ग से विचलित नहीं हुआ। (लगता है इसी निरीह वृत्ति, सत्य निष्ठा के कारण ही सूर्य लौकिकता में नारायण यानी भगवत् पद को प्राप्त हो पूजा जाता है) किन्तु चन्द्रमा लक्ष्य से विचलित हुआ और उसने जल तत्त्व यानी समुद्र का पक्ष लिया। समुद्र से भरपूर घूस लेने के कारण ही थोड़ी-सी, चन्द सम्पदा का स्वामी चन्द्रमा ‘सुधाकर' बन गया है। धरती की सारी सुधा एकत्र कर वह चन्द्रमा को दे देता है और इधर समुद्र स्वयं खारा ही रहता है, लगता है उसके भाग्य में खारापन, क्षार ही है।

     

    इधर रिश्वत लेने के कारण चन्द्रमा को लज्जा आ रही है। वह सोच रहा है कि-उच्च स्थान पर रहने वाले मैंने, अपने पद के अनुकूल कार्य नहीं किया, मेरे लिए यह उचित नहीं था। इसलिए उसका माथा कलंकित हुआ लगता है, अतः वह शंका सहित अपना मुख छुपाते-छुपाते रात में ही उदित होता है दिन में नहीं और वह चन्द्रमा धरती से बहुत दूर (८८० योजन) रहता है जबकि सूर्य धरती के पास (८०० योजन) ही घूमता रहता है।


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