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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 30. इन्द्र नहीं : इन्द्रधनुष

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    माँ का आशीर्वाद पाते ही दृढ़मना मुनियों के समान कार्य करने में संकल्पित हो, भरपूर उत्साह के साथ अनगिन कण आकाश की ओर उड़ते हैं। युद्ध के बिगुल को सुनते ही, रणांगन में कूदते देश-प्रेमी योद्धाओं के समान अथवा तपाये हुए लोहे के पिण्ड पर पड़ते घन प्रहार से उठती हुई चिनगारियों के समान लाल-लाल धरती के कण, बरसने की आकांक्षा लिए आकाश में डोल रहे जल-कणों को सोखते जा रहे हैं, वे जल-कण भूकणों की राशि को हटाकर नीचे धरती पर नहीं आ पा रहे हैं। नीचे गिरते जलकणों से ऊपर उड़ते भू-कण जोर से टकराते हैं परिणाम स्वरूप एक-एक जल-कण कई कणों में विभाजित हो बिखर जाते हैं।

     

    सौरमण्डल में चारों ओर जोरदार आवाज गूंजने लगती है एवं धुआँ-धुआँ सब ओर फैल गया है। ऐसा लग रहा है कि बादलों के ऊपर विघ्न-संकट आ गया है। भू-कण सघन होकर भी पाप से रहित हैं, जबकि जल-कण पाप से भरे,  भयभीत हो भाग रहे हैं। जल-कणों के पीछे भू कण भाग रहे हैं लगता है उन्हें नष्ट करके ही विश्राम लेगें। इस अवसर पर देवों का स्वामी इन्द्र भी स्वर्ग छोड़कर आया है, किन्तु वह किसी को दिखाई नहीं दे रहा है, केवल उसका धनुष ही कार्य  करता हुआ दिख रहा है इन्द्र धनुष । इसका कारण -

     

    "महापुरुष प्रकाश में नहीं आते

    आना भी नहीं चाहते,

    प्रकाश-प्रदान में ही

    उन्हें रस आता है।

    यह बात निराली है, कि

    प्रकाश सबको प्रकाशित करेगा ही

    स्व हो या पर, ‘प्रकाश्य' भर को .......!" (पृ. 245 )

    महान् व्यक्ति कभी भी सबके सामने प्रमुख बन आगे आते नहीं और आना भी नहीं चाहते। दुनिया को सुखी बनाने, सन्मार्ग दिखाने में ही उन्हें आनंद आता है। यह बात अलग है कि प्रकाश सबको प्रकाशित करता ही है स्वयं हो या अन्य, प्रकाशित होने की योग्यता हो बस उसमें । फिर संसार में सभी वस्तुएँ सत्ता को लिए हैं ही, जिनमें प्रकाश्य होने की योग्यता है वे सभी प्रकाशित होंगे ही आज नहीं तो कल। और यह भी संभव कहाँ कि सत्ता हो और प्रकाशित ना हो अर्थात् जो व्यक्ति परोपकार, दया, दान, सेवा आदि सत्कार्य करता है उसकी महानता इसी में है कि वह अपने कर्तव्यों के बदले ख्याति, पूजा, लाभ की चाह न रखे। यदि रखता है तो वह सही पुण्य-फल को प्राप्त नहीं कर पाता।

     

    विशेष- आचार्य जयसेन ने समयसार की टीका में लिखा है-जो व्यक्ति ख्याति, पूजा की चाह लेकर दान, पूजा, तप आदि करता है वह धागे के लिए हीरों का हार तोड़ता, तक्र (छाछ) के बदले में रत्न देता, कोदों धान की रक्षा के लिए चंदन की बाड़ी लगाता तथा बर्तन मांजने की भस्म प्राप्ति के लिए मोतियों को भस्म करता हुआ मनुष्य के समान मूर्ख माना जाता है अथवा दान को व्यर्थ गॅवाता है।


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