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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 50. स्वीकारो : कटु सत्य को

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    चार अक्षरों की एक कविता और लिखी है कुम्भ पर, वह है “मैं दो गला' इससे पहला भाव यह निकलता है कि मैं दो गले वाला अर्थात् द्विभाषी हूँ। भीतर से कुछ बोलता हूँ यानी मन में कुछ सोचता हूँ, कुछ भाव रखता हूँ और बाहर से कुछ अन्य ही बोलता हूँ। बाहर से भले ही मीठा-मीठा बोलता हूँ किन्तु भीतर तो दूध में जहर घोलने के ही परिणाम रहते हैं। बगुला समान मेरी प्रवृत्ति चलती है जैसे बाहर से देखने पर बगुला ऐसा ध्यान लगा कर बैठा हो मानो किन्तु भीतर मछली पकड़ने का भाव रहता है।

     

    अब इसका दूसरा भाव प्रकट होता है-मैं दोगला अर्थात् मैं छली-कपटी, ठगी और मायाचारी हूँ किन्तु मान के कारण, अज्ञान के कारण सदा अपनी बुराई, दोषों को छुपाता आ रहा हूँ। सबके सामने अपने को दूध का धुला, साफ-सुथरा, सीधा-सादा, पवित्र मन वाला ही प्रस्तुत करता आया हूँ। इसी कारण से आज तक मेरी आत्मा पवित्र नहीं हो पाई, अतः यदि तुम सब अपना हित चाहते हों तो इस कटु सत्य को स्वीकार करो कि मैं पापी दुरात्मा, मायावी, लोभी हूँ । देखो पाँच पापों के पूर्ण त्यागी, महाव्रती श्रमण भी दिन में तीन बार अपने आपको पापी, लोभी आदि कहते हुए अपनी निन्दा, आलोचना करते हैं। फिर तुम भी सोचो अपना हित किसमें है। 

     

    और इस कविता में तीसरा भाव यह है कि विभावों एवं विकारों की  जड़ - मैं यानी अहंकार, गर्व, घमंड, अभिमान को गला दो, नष्ट कर दो। 

     

    “मैं'' यानी अहं को

    दो-गला-समाप्त कर दो

    मैं... दो-गला.... मैं...दोगला!

    मैं दो...गला!!! (पृ. १७५- १७६)

    देखो मैं-मैं आवाज करता हुआ बकरा अपना गला कटा देता है जबकि मैना पंछी आकाश में तू-तू आवाज करती हुई स्वतंत्र आकाश में विचरती हुई आनंद लेती है। इसलिए अहंकार, मैं-पन को नष्ट कर दो।


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