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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 19. पापी कौन : प्रकृति या पुरुष ?

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    शिल्पी से अपनी निरुपयोगिता, कटु आलोचना सुन प्रकृति क्रोधित हो उठी, उसके नेत्र लाल-लाल हो गए, शरीर कुरूप-सा बना उसके ललाट तट पर लिखी हुई थी कुछ पंक्तियाँ –

     

    "प्रकृति नहीं, पाप-पुञ्ज पुरुष है,

    प्रकृति की संस्कृति-परम्परा

    पर से पराभूत नहीं हुई,

    अपितु

    अपनेपन में तत्परा है।" (पृ. 124)

     

    पुद्गल ने नहीं आत्मा ने ही अपने स्वभाव को छोड़, पर को ग्रहण किया है इसलिए पाप का सागर पुरुषात्मा है, प्रकृति नहीं। पुद्गल ने कभी भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ा, ना ही किसी के वशीभूत हो हार स्वीकार किया।

     

    पुन: प्रकृति पुरुष को कुछ उपदेश देती है सही-सही पुरुषार्थ के रूप में - कि हे चेतन ! जो अपने से भिन्न, पर है; उसे कभी भी स्वीकार नहीं करो, हाँ इतना जरूर है कि पर को जानी देखी अवश्य, उस पर विचार भी करो उसमें जो अपना हो, हितकारी हो निर्णय कर स्वीकार करो।

     

    पर को छोड़ दो, मन में विषय-वासनाओं, मोह को मत रखो। क्योंकि जानना-देखना तो चेतन का स्वभाव है, वह समाप्त भी नहीं हो सकता, किन्तु जिसे जाना है देखा है उन सबको स्वीकार किया ही जाए जरूरी नहीं है, वह तो मोह का परिणाम है। फिर सूक्ष्म से सूक्ष्म दोष/अपराध की पकड़ की जावे तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि-

     

    "ज्ञान का पदार्थ की ओर

    डूलक जाना ही

    परम-आर्त पीड़ा है,

    और

    ज्ञान में पदार्थों का

    झलक आना ही

    परमार्थ क्रीड़ा है।" (पृ. 124)

     

    ज्ञान जब पदार्थों की ओर प्रवृत होता है, पदार्थों को जानने का प्रयास करता है तो अत्यन्त दुख का कारण बनता है, ज्ञाता पीड़ित होता है और जब ज्ञान में पदार्थ स्वयमेव झलक आता / प्रतिबिम्बित होता है तब परम आनंद उत्पन्न होता है, परमार्थ यानी श्रेष्ठ प्रयोजन केवलज्ञान का आमोद-प्रमोद है वह।

     

    उदाहरण से समझे तो आँखें दिन भर खुली रहती हैं, सब दिखता रहता है लगातार एक विषय पर टिक जाती हैं (पुस्तक पढ़ने, टी.वी. देखने आदि कार्यों में) तो पीड़ा-थकान का अनुभव होने लगता है।

     

    अत: ज्ञानी आत्मा का जड़ की ओर जाना, निज वैभव को छोड़ दरिद्रता को धारण करना, अपनी हार से लज्जित होना है | जबकि आत्मा में पदार्थों का झलक आना, स्वाधीनता के साथ प्रयोजनभूत तत्व (केवलज्ञान, अव्याबाध सुख आदि) से श्रृंगारित होना है।

     

    गुणी से ऊपर चोट पड़ने पर गुण भी उसकी चपेट में आता ही है क्योंकि गुण कभी गुणी से पृथक् नहीं रहते और यहाँ भी यही हुआ है - प्रकृति ने पुरुष को उपदेश दिया, सत्य का बोध कराया और चेतन ने भी उसे स्वीकार किया। ठीक ही है जड़ में जल देने पर पूरा पेड़ फलता-फूलता है और मूल को ही काट देने पर पूरा पेड़ सूख जाता है। मूल अर्थात् चेतन को बात समझ में आ गई, वह जागृत हुआ स्व-पर के कर्तव्य पर प्रकाश डालता है/स्पष्ट करता है -

     

    आमोद-प्रमोद = सुख-चैन, भोग-विलास।


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