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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 45. मूल्य : स्वतन्त्रता का

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    कुम्भ पर शेर और श्वान यानी कुत्ते का भी चित्रण किया गया है, जो बिना बोले ही संदेश दे रहा है, दोनों की जीवन-लीला विपरीत है। शेर पीछे से, बिना दहाड़े किसी पर प्रहार नहीं करता और ना ही बिना मतलब दहाड़ता है, यानी सदा छल-कपट से दूर रहता है, जबकि कुत्ता पीछे से ही चुपचाप काटता है, बिना मतलब दिन-रात भौंकता है।

     

    जीवन चलाने हेतु आवश्यक सामग्री के लिए दीन-हीन नहीं बनता शेर, जबकि कुत्ता एक टुकड़े के लिए मालिक के पीछे पूँछ हिलाता घूमता रहता है। शेर के गले में कभी पट्टा नहीं बंधता, भले ही किसी कारणवश वह पिंजड़े में बंद हो, फिर भी पूँछ ऊपर उठाकर स्वतन्त्रता और स्वाभिमान के साथ घूमता रहता है। किन्तु कुत्ता स्वतन्त्रता का महत्त्व नहीं जानता, पराधीनता उसे बुरी नहीं लगती, उसके गले में पड़ी लोहे की चैन अथवा कपड़े का पट्टा भी उसे आभूषण जैसा लगता है। और विशेष बात यह है-

     

    "श्वान को पत्थर मारने से

    पत्थर को ही पकड़कर काटता है

    मारक को नहीं!

    परन्तु

    सिंह विवेक से काम लेता है

    सही कारण की ओर.... ही....

    सदा दृष्टि जाती है सिंह की,

    मारक' पर मार करता है वह।" ( पृ. १७० )

     

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    श्वान को यदि कोई पत्थर मारे तो वह पत्थर को ही पकड़ कर काटता है मारक को नहीं पकड़ता, परन्तु सिंह मारक यानी सही कारण को पकड़ता है साधन को नहीं, यह विवेक उसे रहता है।

     

    सही सम्यग्दृष्टि, सम्यग्ज्ञानी किसी भी कार्य की सम्पन्नता में निमित्त को ही नहीं पकड़ता, ना ही उस पर टूट पड़ता है अपितु मूल कारण पर विचार करता है, उस मूल कारण को नष्ट करने अथवा संभालने का प्रयास करता है। जैसे सीताजी को गर्भवती दशा में जब राजमहल से निकाला गया तब उन्होंने राम को  दोष नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि मैंने ही पूर्व में कुछ ऐसा कार्य किया होगा, जिसके कर्म-फल स्वरूप मुझे यह भोगना पड़ रहा है। राम तो मुझे प्राणों से भी  ज्यादा चाहते थे, रावण से युद्ध कर मुझे लेकर आए फिर ऐसा क्यों करते? तभी तो  अग्नि परीक्षा में सफल होने के बाद भी उन्होंने राजमहल के सुख नहीं भोगे अपितु दुःखों का मूल कारण अशुभ कर्मों के क्षय करने हेतु आर्यिका व्रतों को धारण कर घोर तप किया।

     

    श्वान संस्कृति की निंदा का एक प्रमुख कारण यह भी है कि वह अपनी जाति वालों को देखकर पैरों से जमीन खोदता हुआ भौंकता है। जबकि शेर अपनी जाति में सबसे मिलकर रहता है राजा की प्रवृत्ति ऐसी ही होती है होनी भी चाहिए। कोई-कोई कुत्ते पागल भी होते हैं और वे जिसे काटते हैं वह भी कुछ दिनों में कुत्ते के समान भौंकने लग जाता है और मर जाता है, किन्तु शेर कभी पागल हुआ हो सुनने में नहीं आया । श्वान जाति का एक और अति निंदनीय कार्य  है; वह यह कि भूख लगने पर यदि योग्य खाद्य सामग्री न मिले तो वह मल ही खाने लगता है और जब वह भी न मिले तो अपने से उत्पन्न हुई सन्तान को ही खा जाता है किन्तु शेर ऐसा निंदनीय कार्य कभी भी नहीं करता।


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