Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 31. मेरा साथी : संगीत

       (0 reviews)

    श्रृंगार का एक-एक अंग तलवार की धार के समान जीवन को नष्ट करने वाला, संसार को धोखा देने वाला है। इसके प्रत्येक रंग में वासना की आग ही आग है। इसी आग में संसार जलता आ रहा है। इस वेदना को दूर करने के लिए एक अदभुत औषध मिली है आज, जिसे पीते ही पल भर में तन की थकान नष्ट होती है और मन की गंदगी भी साफ हो जाती है। ऐसा मेरा साथी संगीतसमता रस से भरा, रंग रहित शान्त स्वभाव वाला है।

     

    सभी बन्धनों से रहित, श्रमणों की अनुभूति का विषय मेरा साथी वह संगीत है जो किसी सीमा में बंधकर रह नहीं सकता, किसी तरह शब्दों से कहा नहीं जा सकता। समुद्र की विशालता की ओर देखने पर बहुत गंभीर, करोड़ों वर्षों की अवधि के प्रमाण वाला विस्तृत दिखता है वह और लहर की ओर दृष्टि जाने पर क्षणभंगुर, पल भर की आयु वाला दिखता है वही समुद्र। द्रव्य की ओर दृष्टि जाने से जीव का कोई आदि अन्त नहीं, पर्याय की ओर दृष्टि जाने पर पलपल जीवन नष्ट हो रहा है, ऐसे ही अनेक भंगों से सहित, अनेक गुणों में दिखता छिपता सप्त भंग (स्याद् अस्ति एव, स्याद् नास्ति एव, स्याद् अस्ति नास्ति, स्याद् अवक्तव्य एव, स्याद् अस्ति अवक्तव्य, स्याद् नास्ति अवक्तव्य, स्याद् अस्ति नास्ति अवक्तव्य) की परम्परा वाला अनेकान्त धर्म ही मेरा सही साथी संगीत है।

     

    सुख की बिन्दु से भी दूर, दुख सागर में डूबा था मैं। कभी फूलमाल से सम्मान हुआ तो कभी पराजय से अपमान हुआ। कभी कुछ मिलने का लोभ मिला तो कभी कुछ मिटने पर घबराहट, आकुलता मिली। कोई अपना मिला तो कोई धोखेबाज। यह अभागा आज तक संसार में यूँ ही भटकता रहा किन्तु सब विपरीतताएँ आज मिट-सी गई, जबसे मुझे मिला मेरा साथी संगीत कि तुम भी संसार को पराजित कर परमात्मा बन सकते हो, यह आत्मविश्वास (Selfconfidance)|


     Share


    User Feedback

    Create an account or sign in to leave a review

    You need to be a member in order to leave a review

    Create an account

    Sign up for a new account in our community. It's easy!

    Register a new account

    Sign in

    Already have an account? Sign in here.

    Sign In Now

    There are no reviews to display.


×
×
  • Create New...