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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 18. महिमा : अज्ञान की

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    शिल्पी ने देखा की तन का पक्ष मजबूत बना, विपक्ष के रूप में खड़ा है। माटी की रौंदन क्रिया पूर्ण करनी ही है, अत: दूसरे पक्ष चेतन को जागृत किया, यह कहकर कि-

     

    "तन, मन, वचन ये

    बार-बार बहु बार मिले हैं,

    और

    प्राप्त स्थिति पूरी कर

    तरलदार हो पिघले हैं,

    मोह-मूढ़तावश

    इन्हें हम गले लगायें

    परन्तु खेद है,

    पुरुष के साथ रह कर भी

    पुरुष का साथ नहीं देते ये।" (पृ. 122)

     

    अनादिकाल' से आज तक पौद्गलिक मन-वचन-काय अनेक बार मिले हैं और अपनी-अपनी स्थिति पूर्ण कर नष्ट हुए हैं। अज्ञानता के कारण ही हमने इन्हें स्वीकार किया, अपनाया किन्तु दु:ख की बात है कि आत्मा के साथ रहकर भी इन्होंने कभी आत्मा का साथ नहीं दिया। यदि कुछ दिया भी है तो सारभूत नहीं निस्सार (क्षणिक सुख, सुखाभास) ही दिया, मात्र धोखा दिया।

     

    इतने पर भी यह पागल संसारी आत्मा बार-बार धोखा खाता, रोता और आँखों से निकलने वाले आँसुओं से अपने मुख को धी, पुनः धोखा ही खाता आ रहा है प्रकृति यानी पौद्गलिक पर पदार्थों से, अन्य सम्बन्धियों से। इतना सब होने के बाद आज भी यह मौका देखता है कि जड़ पदार्थों, मन-वचन-काय एवं अन्य सम्बन्धियों से कुछ अभूतपूर्व सुख /आनन्द मिलने का। क्या करें! अज्ञान की महिमा है। इसी बीच चेतन शिल्पी को अपना कुछ आशय बताता है-

     

    "वेतन वाले वतन की ओर

    कम ध्यान दे पाते हैं

    और

    चेतन वाले तन की ओर

    कब ध्यान दे पाते हैं?" (पृ. 123)

     

    सीमित धन लेकर देश की सेवा करने वाले प्राय: देश की ओर कम ही ध्यान दे पाते हैं और राजा जिसे राज्य से वेतन नहीं मिलता किन्तु देश के प्रति समर्पण के कारण ही वह रणभूमि में लड़ते हुए अपने प्राण भी त्याग कर देता है। इसी प्रकार चेतन को जिसने पहचान लिया, चेतन को पाने की जिसके अन्त:करण में प्यास जगी है, ऐसे महामानव शरीर की ओर कब ध्यान देते हैं। इसलिए तो श्रमणों का मरण वन में हुआ करता है आत्मधर्म की रक्षा करते हुए गजकुमार मुनि, सुकौशल मुनि आदि के समान। जिस आत्मधर्म / वीतरागधर्म की छत्रछाया में सारी धरती सानन्द, सुखमय जीवन व्यतीत करती आ रही है।

     

    अनादिकाल = जिसका कोई प्रारम्भ न हो, ऐसा काल।


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