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नव आचार्य श्री समय सागर जी को करें भावंजली अर्पित ×
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 32. बहती नाक - श्रृंगार की

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    श्रृंगार के बहाव में बहने वाली प्रकृति ने शिल्पी के मुख से स्वर की नश्वरता और निस्सारता को सुना तो उसकी नाक और बहने लगी। जिसमें से घिनावना मल निकला, ऐसा जिसे देखते ही ग्लानि पैदा होने लगी। उस पर राग को पैदा करने वाली, विषय भोग में रस लेने वाली मक्खियाँ भिनभिनाने लगीं। ऐसा लगा बीभत्स रस ने भी श्रृंगार को स्वीकार नहीं किया, तभी तो सभी की नाकों से ड, ण, न, म इत्यादि अनुनासिक नकारात्मक वर्ण ही निकलता है।

     

    नाक से निकला मल ऊपरी होंठों पर चिपकता हुआ नीचे के होंठ पर भी उतर आया। श्रृंगार की जीभ ने बड़ी ही रुचि से उसका स्वाद लिया। श्रृंगार की अज्ञानता को देख सब रसों को जन्म देने वाली, मूल स्रोत प्रकृति माँ क्रोधित हो उठी और उसने श्रृंगार के गालों पर दो-चार चाँटे लगाए, जिससे उसके गाल प्रवाल पुष्प के समान लाल–लाल हो गए।

     

    "सुत को प्रसूत कर

    विश्व के सम्मुख प्रस्तुत करने मात्र से

    माँ का सतीत्व वह

    विश्रुत-सार्थक नहीं होता

    प्रत्युत,

    सुत–सन्तान की सुसुप्त शक्ति को

    सचेत और

    शत-प्रतिशत सशक्त

    साकार करना होता है, सत्-संस्कारों से।"(पृ. 148)

     

    संतान को जन्म देकर दुनिया के सामने रखने मात्र से माँ का सतीपना प्रसिद्ध और सफल नहीं होता, किन्तु सन्तान में छुपी हुई योग्यता को जागृत कर, उसे सत् संस्कारों के माध्यम से पूर्णतः मजबूत बनाना होता है।

     

    सन्तों के मुख से यह बात सुनी है कि सन्तान का जीवन यदि पाप / पतन की ओर जाता है तो माँ उसे डॉट-फटकार लगाती, ताड़ित करती है जिससे वह पाप से बच जाए। और यदि सन्तान अपने जीवन को श्रेष्ठ, अच्छा उन्नत बनाती है तो उस पर प्रेम, कृपा बरसाती हुई माँ गौरव से अपना माथा उठाती है।


    एक माँ सौ शिक्षकों से भी श्रेष्ठ मानी गई है, संस्कार देने का समय गर्भ में सन्तान के आते ही प्रारम्भ हो जाता है। माँ मदालसा के सत् संस्कारों से उसके आठों बेटे मुनि बनकर मोक्षमार्ग पर लग गए। नीति है “लाड़येत बहव: दोषा: ताड़येत् बहव: गुणा:" ज्यादा लाड़-प्यार से सन्तान बिगड़ जाती है जबकि समय-समय पर डॉट फटकार लगाने, प्रताड़ना देने से सन्तान में गुणों का ही विकास होता है। अत: माता-पिता को चाहिए की सन्तान को जन्म देने के बाद उसे संस्कारवान् बनाने के लिए अपना समय निकालें, सन्तान की अच्छी-बुरी संगति पर/आदतों पर ध्यान दें। बच्चों को अपना प्यार दें तो समय पर डॉट-डपट भी।

     

    अनेकान्त धर्म - एक वस्तु में अनेक गुण-धर्म का होना। जैसे- पेन लम्बा है, सफेद है आदि



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