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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 35. माँ माटी के चरणों में

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    यहाँ उपाश्रम के प्रांगण में एक दृश्य दिखाई दे रहा है, एक बहुत बड़ा बर्तन है, जिसके मुख पर साफ सुथरा दोहरा किया हुआ खादी का कपड़ा (छन्ना) बंधा हुआ है। शिल्पी बाल्टी लेकर उसी ओर बढ़ रहा है। पात्र के पास पहुँचकर धार-बाँधकर बड़ी सावधानी से धीरे-धीरे वह जल छान रहा है, जल छन रहा है। इतने में शिल्पी की दृष्टि थोड़ी-सी अन्यत्र चली जाती है कि उछलने को मचल रही मछली, शीघ्र ही बाल्टी में से उछलकर माटी के पवित्र चरणों में जा गिरती है। वस्तु स्वरूप-जो वस्तु जैसी है, उसे वैसा ही जानना। जैसे आत्मा शाश्वत है शरीर नश्वर। संसार दु:ख रूप ही है सच्चा सुख मुक्ति/मोक्ष मिलने पर ही है इत्यादि। और फिर माँ माटी को पाकर फूट-फूट कर रोने लगती है।

     

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    उसकी आँखें संवेदना से भर जाती हैं और पुन: वेदना की स्मृति होने लगती है। वे आँखें अपूर्वता की प्यासी, प्रभु की दासी के समान श्रेष्ठ बनी है। जिन आँखों से गिरती हुई उज्वल आँसुओं की बूंदे माटी के चरणों को प्रक्षालित कर रहीं हैं। इन बूंदों की निर्मलता ने क्षीरसागर की पवित्रता का भी हरण किया है अर्थात् अत्यन्त निर्मल है तथा दुख के समुद्र का खारापन इनमें से पूर्णत: झर रहा है।

     

    मछली की इस दशा को देख यह लेखनी इस युग से पूछती है- इस समय मानव के भीतर से मानवता पूर्णत: मर चुकी है क्या ? यहाँ सबके मन में दानवता (क्रूरता) उत्पन्न हुई है। लगता है मानवता से दान देने का परिणाम (परोपकार का भाव) कहीं दूर चला गया है और फिर जहाँ दानवता हो वहाँ दानवत्ता रह भी कैसे सकती है?

     

    आज “वसुधैव कुटुम्बकम्” यानी सारी धरती एक परिवार है। इस विचारधारा का दर्शन, स्वाद, अनुभव इन आँखों को सहज नहीं रहा। यदि कहीं सुलभ है तो भारतदेश में नहीं, किन्तु महाभारत पुराण में ही यह सूक्ति मिल सकती है क्योंकि भारत में तो पग-पग पर स्वार्थ ही स्वार्थ देखा जा रहा है।

     

    “वसुधैव कुटुम्बकम्” इसका आधुनिकरण अवश्य हुआ है आज वसु यानी धन ही सबका परिवार और सिर का मुकुट, आदरणीय बन गया है इस जीवन में। लेखनी की बात सुनकर मछली, माँ माटी से कहती है-कुछ तुम भी कहो और इस विषय को स्पष्ट करो माँ! मछली की प्रार्थना सुन, सार रूप में कुछ कहती है माटी -

     

    "सुनो बेटा!

    यही

    कलियुग की सही पहचान है

    जिसे

    'खरा' भी अखरा है सदा

    और

    सत् – युग तू उसे मान

    बुरा भी

    'बूरा'-सा लगा है सदा।" (पृ. 82)

     

    सुनो बेटा! कलियुग और सतयुग का सम्बन्ध मात्र काल से नहीं किन्तु व्यक्ति की विचारधारा से भी हुआ करता है। जिस व्यक्ति को खरा यानी अच्छा भी अखरने यानी बुरा लगने लगे तो समझना उसके भीतर ही कलियुग है और जिसे बुरा अर्थात् गुरुओं की डॉट-फटकार, कष्ट से घिरा जीवन भी ‘बूरा' यानी मीठी शक्कर के समान लगे तो समझो सतयुग उसी के भीतर रहता है।


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