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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 34. एक ही कामना : रहे काम – ना

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    अब वह समय निकट आ ही गया जब मछली को ऊपर की ओर यात्रा प्रारम्भ करनी है, बाल्टी विमान के समान ऊपर उठने को है कि मछली के मुख से निकल पड़ती है मंगल-भावना हे भगवान्! मेरी एक ही कामना है कि अनन्तकालीन भविष्य में कभी भी मेरे मन में काम यानी विषय-वासना का आवास ना हो। मेरी इस शुभ यात्रा का एक ही लक्ष्य है कि सदा समता रूप परिणाम ही मेरा भोजन हो। मेरे मन की भावनाओं में समीचीन उत्साह बना रहे। कभी भी दानव समान क्रूर वृत्ति का मानव मन पर असर ना हो। आकाश में, धरातल में और पाताल में अर्थात् तीनों लोक में सदा चेतन धर्म और दया धर्म की प्रभावना होती रहे बस!

     

    जल से भरी हुई बाल्टी कूप से ऊध्र्वगमन वाली होती है, पतन पाताल से उत्थान उताल की ओर। संकल्पिता मछली बाल्टी में से ऊपर की ओर देख रही है। ना जल का और ना ही बल का अभाव है किन्तु तैर नहीं रही मछली वह, लगता है बुद्धि की चंचलता से दूर शान्त मति वाली मछली वह तैरना भूल-सी गई है। सच है -

     

    "स्वभाव का दर्शन हुआ, कि

    क्रिया का अभाव हुआ-सा

    लगता है अब.!" (पृ. 78 )

     

    ज्यों-ज्यों वस्तु स्वरूप का ज्ञान होता जाता है, त्यों-त्यों तन-मन की चंचलता/सक्रियता कम होती जाती है। यहाँ भी ऐसा ही लग रहा है। बुद्धि की श्रेष्ठता को प्राप्त हुई-सी लग रही है मछली वह।

     

    बिना किसी बाधा के बाल्टी ऊपर आ चुकी है, मछली के लिए कूप का बन्धन दूर हो चुका है। मछली ने किया सुख को झराती (बिखेरती) प्रांगण में फैली सुनहरी धूप का दर्शन-वंदन, रूपवती धूप की आभा को निरखती मछली सुख से भर जाती है। धूप से मिश्रित धूल का समूह ही मछली के मुख का सिंदूर सा बना और मछली की आँखें सीधे उपाश्रम की ओर देखती हैं, ऐसा लग रहा है कि सूर्य ने अपनी पत्नी किरणों को दिन-भर उपाश्रम की सेवा करने ही भेजा हो।

     

    वह धूप आश्रम के अंग-अंग और आंगन का मानी आत्मीय आलिंगन ही कर रही हो। वह धूप स्थूल है अर्थात् आँखों से तो दिखती है पर पकड़ में नहीं आती, अत्यन्त सुन्दर, रूपवती है मात्र सूर्य ही उसे पकड़ सकता है। सिद्ध प्रभु के समान सूक्ष्म स्पर्श से भी रहित है वह, लगता है यह उपाश्रम की छाँव का ही परिणाम है। इस वातावरण को देखते ही मछली का दुख नष्ट हुआ और वह अपनी पुरानी बातों को भूल-सी गई।


    विशेष : मछली प्रतीक है, उस भव्यात्मा का जिसके मन में संसार, शरीर, भोगों के प्रति उदासीनता आ चुकी है और वह मोक्षमार्ग की ओर अपने कदम बढ़ाना चाहता है। मोही परिवार जन अनेक प्रकार से समझाते हुए उसे संसार मार्ग में ही रोक रखना चाहते हैं। परन्तु दृढ़ संकल्पी वह भव्यात्मा संसार के सत्य को जानता हुआ गुरु सान्निध्य में पहुँच ही जाता है।


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