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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 6. अनुभूतियाँ : माटी की

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    बहुत देर तक मौन पूर्वक माँ धरती की देशना (उपदेश) को सुनने के बाद अब माटी उपदेशामृत से भीगे भावों को व्यक्त करती है। आपकी अमृतमयी वाणी को सुन यह जीवन सम्यग्ज्ञान को प्राप्त हो प्रभावित हुआ। अतीत (बीता हुआ काल) का दुख कुछ कम हुआ, सुख की झलक-सी मिली, कुछ नई अनुभूति हुई माँ।

     

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    अतीत में कभी सुनने को नहीं मिला, ऐसा आपका यह सम्बोधन बाहरी उपयोग (विचारधारा) और बाहरी जगत् से बहुत दूर अन्तर आत्मा को छूता-सा लगा। हृदय को छूने वाला यह कथन है माँ!

     

    पौद्गलिक कर्म और चेतन आत्मा के मिलने, मन-वचन-काय रूप विकृत योग एवं क्रोधादि कषाय रूप कलुषता के संयोग से शरीर के भीतर ही भीतर तीसरी वस्तु यानि सुख-दुख में कारणभूत शुभाशुभ कर्मों की रचना होती है, वह किसी दूरदर्शक यन्त्र (Telescope) अथवा सूक्ष्मदर्शी यन्त्र (Microscope)से पकड़ में नहीं आ पाती अपितु सम्यग्दृष्टि यानि आस्थावान जीव की दूर दृष्टि में ही कार्मिक रचना पकड़ में आ सकती है। यह कर्म सम्बन्धी व्यथा है माँ!

     

    कर्मों का आत्मा से जुड़ना और फिर स्व अर्थात् उपादान कारण, पर अर्थात् निमित्त कारण के वश से पृथक् होना। ये दोनों कार्य आत्मा की ममता अर्थात् मेरे पन का भाव और समता अर्थात् सुख-दुःख, जीवन–मरण, लाभ-हानि इत्यादि प्रत्येक दशा में हर्ष-विषाद से रहित साम्य परिणति पर ही आधारित है। आपने सुनाया, मैंने सुना। अब धार्मिक चिन्तन का विषय है माँ!

     

    आज कौन ऐसा व्यक्ति है जिसे आत्मा की सृजनात्मक शक्ति (मैं भी परमात्मा बन सकता हूँ) का आभास हो। चेतन पहले था, अभी है और आगे भी रहेगा इस त्रैकालिक अस्तित्व का ज्ञान किसे है? आत्म तत्व की चर्चा भी कौन करता है रुचि से, कौन सुनता है मन लगाकर? इस आत्म तत्व की उपासना, आत्मतत्व की उपलब्धि हेतु पुरुषार्थ करने के लिए किसके पास समय है? भौतिकता में लीन, जड़ पदार्थों में सुख खोजने वाला, आत्म तत्व की श्रद्धा से रहित यह जीवन केवल चमड़े का बना हुआ आधारभूत शरीर मात्र है माँ!

     

    माटी के मुख से ग्रहण किये गये भावों को धरती माँ ने सुना और सहज ही बोल उठी वाह! धन्यवाद बेटा! मेरा उद्देश्य तुम्हें समझ में आ गया, तुम्हारे अन्तरंग को छू गया, अब मुझे कोई चिन्ता नहीं तुम्हारा जीवन अवश्य ही उन्नत बनेगा। कल प्रभात की बेला (वत्त) से तुम्हें अपनी जीवन-विकास यात्रा का शुभारम्भ करना है। अब तुम्हें क्या करना होगा सो बताती हूँ –

     

    "प्रभात में कुम्भकार आएगा

    पतित से पावन बनने,

    समर्पणा-भाव-समेत

    उसके सुखद चरणों में

    प्रणिपात करना है तुम्हें,

    अपनी यात्रा का

    सूत्रपात करना है तुम्हें!" (पृ. 16 )

     

    कल सुबह कुम्भकार आयेगा, तुम्हारे पतित जीवन को उन्नति के शिखर तक पहुँचाने के लिए। श्रद्धा-समर्पण भावों से सहित उसके सुखदायी पावन चरणों में नमस्कार कर अपनी यात्रा का शुभारम्भ करना है तुम्हें। क्योंकि उसी के सान्निध्य में तुम्हारा जीवन स्वर्ण के समान बहुमूल्य बन प्रकाशित होगा। तुम्हें कुछ मेहनत नहीं करनी है, तुम्हें तो मात्र उसके उपाश्रम में रहकर शिल्पी की शिल्पकला को निश्चल होकर, मन लगाकर देखना होगा। पुरुषार्थ तो स्वयं शिल्पी करेगा।


    तुम्हें जानना होगा कि तुम्हारे भीतर वह कौन-कौन-सी शक्तियाँ थीं/हैं, जो निज कारण से ही मृत जैसी पड़ी थीं और हैं। अब उन शक्तियों की क्रम-क्रम से लहरों के समान होने वाले प्रकटीकरण को दिन-रात जानना होगा, समझना होगा बस !


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