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  1. Vidyasagar.Guru

    Vidyasagar.Guru

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  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

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    सिद्धों को मानना, उनकी कामना में मन के उपयोग को स्थिर कर कर्म के क्षय की विधि में समा जाना ही उस निराकार, अशरीरी परमात्मा की आत्मा को ध्यान का विषय बनाना अपने हाथ की हथेलियों को मिलाकर हाथ की रेखाओं में सिद्धशिला की मान्यता को स्थापित करना और अंगुलियों को सिद्धों की कायोत्सर्ग मुद्रा की परिकल्पना से अनंत सिद्धों का दर्शन बचपन से अभी तक करते चले आ रहे हैं। संघ में भी मुनियों के बीच में बैठकर आँख बंद करके ऐसा ही अनुभव करते हैं। मैं अनंत सिद्धों के बीच में बैठा हूँ। आत्मा का स्वरूप सिद्धों जैसा ही है। आत्मा अनंत निराकारमय शरीर रहितोऽहं की भावना से जब भी ध्यान सामायिक करते हैं तब यही भाव रहता है-मैं तो आत्मा हूँ शरीर नहीं। आत्मा शरीर से भिन्न है। सिद्धों के गुणों की स्तुति चलती ही रहती है। वे क्षायिक सम्यक्त्व, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरुलघुत्व, अव्याबाधत्वरूप सुख ये आठ गुण सिद्धों की आत्मा में समाहित होते हैं। इन्हीं गुणों की प्राप्ति के लिये ही सारी चर्या और साधना निरंतर चल रही है। जो तप से सिद्ध हुए हैं उनके तप का ध्यान करते हुए तप सिद्धों की आराधना करना। जो नय से सिद्ध हुए हैं उनके नय का चिंतन करना यह नय सिद्धों की आराधना है। जो संयम से सिद्ध हुए हैं उनके विशुद्ध संयम भाव का चिंतन करना, इस प्रकार संयम सिद्धों की आराधना करते हुए जो चारित्र से सिद्ध हुए हैं, उनके विशुद्ध चारित्र को अपने ध्यान का विषय बनाना, यह चारित्र सिद्धों की आराधना है। जो ज्ञान से सिद्ध हुए हैं, उनके ज्ञान को नमन करना यह ज्ञान सिद्धों की स्तुति है। जो दर्शन से सिद्ध हुए हैं, उनके दर्शन का स्मरण करना इस प्रकार दर्शन सिद्धों की आराधना हुई। इस प्रकार ५० वर्षों से गुरुदेव भूतकाल, भविष्यकाल एवं वर्तमानकाल तीनों कालों के सिद्धों की आराधना करते हुए सिद्धों की श्रेणी में खड़े हुए नजर आ रहे हैं।
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    आपकी बाल्यावस्था अत्यंत रोचक एवं आश्चर्यकारी घटनाओं से भरी है। आप बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धारी हैं। आपकी मातृभाषा कन्नड़ है। आपने कक्षा नवमी तक मराठी माध्यम से अध्ययन किया। इसके उपरांत आपका लौकिक बढ़ाई से मन उचट गया और आप अलौकिक आत्म तत्व की खोज में लग गये।चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी के प्रवचन सुनकर 9 वर्ष की बाल उम्र में आपके हृदय पर वैराग्य का बीज अंकुरित हो गया। 12 वर्ष की उम्र में आचार्य श्री देशभूषण जी के सान्निध्य में आपका मूंजी बंधन संस्कार हुआ। अपनी मित्र मंडली के साथ खेल-खेलते समय आपको मुनि श्री महाबल जी के दर्शन हुए। आपकी तीक्ष्ण प्रज्ञा से प्रभावित होकर उन्होंने आपको बाल्यावस्था में ही तत्वार्थ सूत्र और सहस्रनाम कण्ठस्थ करने की प्रेरणा दी। आपके पिता ने भी आपको घर में धार्मिक शिक्षण प्रदान किया। यौवन की दहलीज पर पग रखते ही (20 वर्ष की अवस्था में) जुलाई 1966 आपने सदा-सदा के लिए सदलगा त्याग दिया और राजस्थान प्रांत अंतर्गत जयपुर पहुंचकर आचार्य श्री देशमुख जी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार कर लिया। 1967 में श्रवणबेलगोला में श्री बाहुबली भगवान के महामस्ताकाभिषेक के समय आप आचार्य संघ के साथ पदयात्रा करते हुए वहाँ पहुंचे और वहीं आपने आचार्य श्री देशभूषण जी से सप्तम प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये।आपकी ज्ञान पिपासा ने आपको मुनि श्री ज्ञानसागर जी के पास पहुंचा दिया। आपको सुपात्र जानकर गुरूवर श्री ज्ञानसागर जी ने यह कहकर आपकी परीक्षा ली-विद्याधर जब नाम है तो विद्याधरों की तरह विद्या लेकर उड़ जाओगे, फिर मैं श्रम क्यों करूँ ? गुरू के यह वचन सुनकर आपने आजीवन वाहन का त्याग करके अपनी गुरूभक्ति एवं समर्पण का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया। जिस तरह एक शिल्पी किसी अनगढ़ पत्थर से व्यर्थ को हटाकर उसमें भगवान को तराशता है, उसी तरह आपके गुरू ने अत्यंत लगन एवं तत्परता से आपको तराशा। जब उन्हें प्रतीत हुआ कि यह प्रस्तर पूर्ण रूप से तराशा जा चुका है, तो उन्होंने इस प्रतिमा को जग के सम्मुख प्रस्तुत करने का विचार किया। आषाढ़ शुक्ल पंचमी 30 जून 1968 को अजमेर की पुण्यभूमि पर आचार्य गुरूवर श्री ज्ञानसागर जी ने आपको दिगम्बरी दीक्षा प्रदान की। आपकी उत्तम पात्रता एवं प्रखर प्रतिभा से प्रभावित होकर आपके गुरू ने आपको अपना गुरू बनाया। हाँ, 22 नवम्बर 1972 को नसीराबाद की पुण्यधारा पर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपना आचार्य पद आपको सौंपकर आपका शिष्यत्व स्वीकार कर, आपके चरणों में अपनी सल्लेखना की भावना व्यक्त की। यह उनकी मृदुता और ऋजुता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण था। ऐसा गुरूत्व और ऐसा शिष्यत्व इतिहास में दुर्लभ है। आपके दीक्षित होते ही आपके माता-पिता एवं भाई-बहिनों ने भी आपके मार्ग का अनुसरण किया। यह इस सदी की प्रथम घटना है। जहाँ एक ही परिवार के आठ सदस्यों में सात सदस्य, सात तत्वों का चिंतन करते हुए मोक्ष मार्ग पर आरूढ़ हो गए। माँ श्रीमंती ने आर्यिका व्रत ग्रहण कर आर्यिका श्री समयमति नाम पाया, तो पिता श्री मल्लप्पा जी मुनिव्रत अंगीकार कर 108 मुनि श्री मल्लिसागर नाम पाया। दोनों अनुज भ्राता मुनि श्री समयसागर जी एवं मुनि श्री योगसागर जी के नाम से वर्तमान में आचार्य संघ की शोभा बढ़ा रहे हैं। दोनों बहनें शांता एवं सुवर्णा आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत से अलंकृत होकर धर्म साधना मंे रत हैं। मात्र अनुज भ्राता महावीर अष्टगे ही उदासीन भाव से अपने गृहस्थ धर्म का पालन कर रहे हैं। आपके पवित्र कर कमलों से अभी तक 120 मुनि दीक्षा, 172 आर्यिका दीक्षा, 56 ऐलक दीक्षा, 64 क्षुल्लक दीक्षा एवं 3 क्षुल्लिका दीक्षा सम्पन्न हो चुकी है। वर्तमान में विराट संघ है। आपकी निर्दोष चर्या से प्रभावित होकर 1000 से अधिक युवा-युवतियाँ आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करने वाले ये सभी भाई-बहिन उच्च शिक्षित एवं समृद्ध परिवार से हैं। तीर्थंकर प्रकृति के बंध के कारणभूत लोक कल्याण की भावना से अनुप्राणित होकर आपने अपने लोकोपकारी कार्यों हेतु अपनी प्रेरणा व आशीर्वाद प्रदान किया।जैसे जीवदया के क्षेत्र में सम्पूर्ण भारत वर्ष में संचालित गौ शालाएँ, चिकित्सा क्षेत्र में भाग्योदल चिकित्सा सागर, शिक्षा क्षेत्र में-प्रतिभा स्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ जबलपुर (म.प्र.) डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) एवं रामटेक (महाराष्ट्र), शांतिधारा दुग्ध योजना बीना बारहा, पूरी मैत्री, हथकरघा आदि लोक कल्याणकारी संस्थाएँ आपके आशीर्वाद का ही सुफल है।
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