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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव
  2. Vidyasagar.Guru

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  1. *पूर्णायु, प्रतिभास्थली, दयोदय गौशाला जबलपुर* 💐💐💐💐💐 *कलश स्थापना समारोह 1 अगस्त रविवार* 🌈🌈🌈🌈🌈 *संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर महाराज का ससंघ* वर्षायोग चातुर्मास नर्मदा नदी के किनारे पूर्णायु आयुर्वेदिक अस्पताल, प्रतिभास्थली और दयोदय गौशाला जबलपुर में पांच मुनिराजो के ससंघ सानिध्य में चल रहा है आज 1 अगस्त को कलश स्थापना में 🌷🌷🌷🌷🌷 पहला कलश लेने का सौभाग्य *HDFC म्यूच्यूअल फंड के चेयरमैन श्री प्रशांत जैन*, दूसरा कलश श्री *पवन चौधरी जबलपुर*, तीसरा कलश *श्री कैलाश जैन सौरभ जैन नन्नू* जबलपुर चौथा कलश *श्री विनोद बड़जात्या जशपुर* रायपुर, छत्तीसगढ़, पांचवाँ कलश *श्री प्रभात जी मुंबई*, छठवां कलश *श्री राजा भैया सूरत,* सातवां कलश *संदेश जैन जबलपुर* आठवां कलश श्री *जयकुमार चक्रेश मोदी घंसौर जबलपुर* नवम कलश *संतोष जैन ठेकेदार (गिरवर सागर) जबलपुर, नागपुर,* दसवां कलश *छोटे लाल दिगम्बर दाल मिल जबलपुर,* ग्यारहवां कलश *डॉ चक्रेश जैन सुषमा दीदी प्रिंसिपल प्रतिभास्थली जबलपुर दीपक जैन शैलेंद्र जैन शालू विद्या आयल परिवार सागर* के परिवार प्राप्त हुआ बहुत-बहुत बधाई शुभकामनाएं और उनके पुण्य की अनुमोदना 🔥🔥🔥🔥🔥 *प्रथम कलश* श्री प्रशांत जी मुम्बई Hdfc म्युचुअल फंड के नेशनल डायरेक्टर *द्वितीय कलश* श्री पवन जी चौधरी जबलपुर *तृतीय कलश* श्री कैलाशचन्द जी ( जैन पंचायत सभा अध्यक्ष) सौरभ जैन हनुमानताल जबलपुर *चतुर्थ कलश* श्री हनुमान प्रसाद जी ,रत्नलाल जी दिलीप जी, विनोद जी जसपुर प्रवासी, रायपुर निवासी बड़जात्या परिवार *पंचम कलश* श्री चिंतामणि सवाई लाल जी प्रभात जी मुम्बई *छठवां कलश* श्री राजा भाई जी ऋषि जी सूरत *सातवां कलश* श्री सन्देश जी स्टार सिटी (नक्षत्र नगर) संयोजक बड़े बाबा नव मंदिर निर्माण कमेटी *आठवां कलश* श्री जयकुमार जी मोदी चक्रेश मोदी जी *नौवां कलश* श्री सन्तोष जी ठेकेदार नागपुर *दशवा कलश* श्री छोटेलाल जी सोनू जैन दिगम्बर दालमील जबलपुर *ग्यारह वां कलश* ब्रा सुषमा दीदी ( प्रिंसिपल प्रतिभास्थली) दीपक सालू जैन सागर ★ आपने कल सागर में भी एक कलश स्थापित किया *बारहवां कलश* डॉक्टर सुहास जी, मोनिका जी शाह *तेरहवाँ वां कलश* जैन पंचायत सभा जबलपुर *चौदहवाँ कलश* श्री मति देवी जैन आशीष जैन, लालू बस सर्विस *पंद्रहवाँ कलश* श्री इंदु जी अमेरिका (किरीट भाई दोषी) *सोलहवां कलश* पलक क्रिएशन परिवार जबलपुर ★ इस सौभाग्य के अलावा आज सुबह बेटी ने आहारदान किया तो एक बड़ी राशि पूर्णायु को दी थी *सत्रहवाँ कलश* अशोक जी जैन चावल वाला परिवार जबलपुर ★ इन्हें अगर तिलवारा की नींव के पत्थर भी कहें तो अतिश्योक्ति नही..! *अठारहवां कलश* राय सेठ नन्दन कुमार जी चन्द्र कुमार जी जबलपुर *उन्नीसवां कलश* श्री सुधीर जैन सिद्धार्थ जी जैन सागर ट्रेडर्स जबलपुर
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  2. गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आचार्य श्री को मेरा शत शत नमन
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  3. From the album: जबलपुर 2021

    आज दयोदय तीर्थ तिलवारा घाट गौशाला जबलपुर में विराजित राष्ट्रीय संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शनार्थ केंद्रीय मंत्री श्री पहलाद पटेल पधारे उन्होंने आचार्य श्री जी को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया एवं जन हितेषी विषयों पर आचार्य श्री जी से मार्गदर्शन प्राप्त किया
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  4. परम पूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के करकमलो द्वारा दिनांक - 30 जून, 1968 तिथि - आषाढ़ शुक्ल-पंचमी वि.सं.- 2025, अजमेर (राजस्थान) मे आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को दीक्षा प्रदान की गई थी| इस बार यह तिथि 14 जुलाई 2021 को है | 54 वें दीक्षा दिवस पर आचार्य श्री को शत शत नमन
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  6. (वसन्ततिलका छन्द) योगी करें स्तवन भावभरे स्वरों से, जो हैं सुसंस्तुत नरों, असुरों, सुरों से। वे वर्धमान गतमान मुझे बचायें, काटें कुकर्म मम मोक्ष विभो! दिलावें ॥१॥ जो चन्द्रगुप्त मुनि के गुरु हैं, बली हैं, वे भद्रबाहु समधी श्रुत-केवली हैं। वंदु उन्हें द्रुत भवोदधि पार जाऊँ, संसार में फिर कदापि न लौट आऊ ॥२॥ है ‘कुन्दकुन्द' मुनि! भव्य-सरोजबन्धु मैं बार-बार तव पाद-सरोज वंदें। सम्यक्त्व के सदन हो, समता सुधाम, है धर्म-चक्र शुभ धार लिया ललाम ॥३॥ जो ‘ज्ञानसागर' सुधी गुरु हैं हितैषी, शुद्धात्म में निरत नित्य हितोपदेशी। वे पाप- ग्रीष्म ऋतु में जल हैं सयाने, पूजें उन्हें सतत केवल-ज्ञान पाने ॥४॥ हे शारदे! अब कृपा कर दे जरा तो, तेरा उपासक खरा, भव से डरा जो! माता! विलम्ब करना मत, मैं पुजारी, आशीष दो, बन सकें बस निर्विकारी ॥५॥ रे। साधु का निहित है हित साधुता में, धारूँ उसे तज असार असाधुता मैं। भाई अतः श्रमण के हित मैं लिखेंगा, शुद्धात्म को सहज से फलतः लगा ॥६॥ विद्वान मान मन में मुनि जो न धारें, वे 'वीर' के वचन से मन को सुधारें। जाके रहे विपिन में मन मोद पाते, हैं स्नान आत्म-सर में करते सुहाते ॥७॥ जो कर्म को यति यदा करता नहीं है, आत्मा उसे वह तदा, दिखता सही है। ऐसा सदैव कहती जिनदेव वाणी, होते सुखी सुन जिसे सब भव्य प्राणी ॥८॥ तू छोड़ के विषमयी स वासना को, निश्चिन्त हो, कर निजीय उपासना को। निर्धान्त शिवरमा तुझको वरेगी, योगी कहे परम प्रेम सदा करेगी ॥९॥ हैं पुण्य-पाप पर, पुद्गल रूप जानें, सम्यक्त्व भाव इनसे किस भाँति मानँ। ना नीर के मथन से नवनीत पाना, अक्षुण्ण कार्य करके थक मात्र जाना ॥१०॥ नाना प्रकार तप से तन को तपाया, है छोड़ वस्त्र जिनने अघ को हटाया। पाया निजानुभव को निज को दिपाया, मैंने उन्हें विनय से उर बीच पाया ॥११॥ कम्पायमान मन को जिसने न रोका, आत्मा उसे न दिखता जड़ से अनोखा। आकाश में अरुण शोभित हो रहा है, क्या अन्धको नयनगोचर हो रहा है? ॥१२॥ जो जीतता सब क्षुधादिं परीषों को, संसार रागमय-भाव स्ववैरियों को। है वीतराग बनता वह शीघ्रता से, शुद्धात्म को निरखता बचता व्यथा से ॥१३॥ है वंद्य दिव्य निज आतम द्रव्य न्यारा, जो शुद्ध निश्चय नयाश्रित मात्र प्यारा। योगी गृही सम से न कभी निवारें, जो त्याग के पुनि परिग्रह-भार धारें ॥१४॥ सबोध रूप सर शोभित है विशाल, ना हैं जहाँ वह विकल्प तरंग-जाल। शोभे तथा परम धर्म पयोज प्यारे, तू छोड़ के मनमराल! से न जा रे ॥१५॥ जीतीं जिनेश जिसने निज इन्द्रियाँ हैं, माना गया यति वी, जग में यहाँ है। श्रद्धा-समेत उसको सिर मैं नमाता, शुद्धात्म को निरख, शीघ्र बर्ने प्रमाता ॥१६॥ सबोध से परम शोभित जो यहाँ है, पीयूष पी स्वपद में रमता रहा है। क्या संयमी विषय-पान कदापि चाहे? जो जीव को विष समान सदैव दाहे ॥१७॥ विज्ञान से स्वपद को जिसने पिछवाना, त्यागा सभी तरह से पर को सुजाना। वो दुःख रूप अस आस्रव को नशाता, स्वामी! सही सुखद संवर तत्त्व पाता ॥१८॥ मायादि शल्य-त्रय को मुनि नित्य त्यागें, ज्ञानादि रत्नत्रय धार सदैव जागें। वे शुद्ध तत्त्व फलतः पल में लखेंगे, संसार में परम सार उसे गहेंगे ॥१९॥ आदेय-हेय जिनने सहसा पिछाने, लाये स्वचिन्तनतया मन को ठिकाने। ज्ञानी वशी परम धीर मुमुक्षु ऐसे, स्वामी रखें कुपथ में निजपाद कैसे?॥२०॥ संसार से बहुत यद्यपि जो डरा है, जाना जिनागम सभी जिसने खरा है। आत्मा से न दिखता यदि है प्रमादी, ऐसा सदैव कहते गुरु सत्यवादी ॥२१॥ है ज्ञान जो सघन पावन पूर्णं प्यारा, सद्ज्ञान रूप जल की झरती सुधारा। शोभामयी अतुलनीय सुखैक डेरा, नाचे उसे निरख मानस-मौर मेरा ॥२२॥ होते घनिष्ठ जिसके दुग-बोध साथी, होता वहीं चरित आतम का सुखार्थी। देता निजीय सुख, तीरथ भी कहाता, तू धार मित्र! उसको दुख क्यों उठाता? ॥२३॥ पीता निजानुभव पावन पेय प्याला, डाले गले शिवरमा उसके सुमाला। जो लोक में अनुपमा शुचि-धारिणी है, ऐसा जिनेश कहते सुख-कारिणी है ॥२४॥ रागादि भाव जिसमें न, वही समाधि, पाके उसे मुदित से मुनि अप्रमादी। सेती नदी अमित सागर पा यथा है, किं वा दरिद्र खुश हो निधि पा अथाह ॥२५॥ है देह-नेह भव-कारण तो उसी से, मोक्षेच्छु मैं, बहुत दूर रहें खुशी से। मैं हो विलीन निज में, निज को भजुँगा स्वामी अनन्त सुखपा, भवको तनँगा ॥२६॥ जो भी निजानुभव को जब प्राप्त होते, वे रागद्वेष लव को न कदापि ढोते। तो कौन सा फिर पदार्थ रहाऽवशेष? प्राप्तव्य जो कि उनको न रह्म विशेष ॥२७॥ रागादि भाव पर हैं पर से न नाता, ज्ञानी-मुनीश रखता पर में न जाता। धिक्कार मूढ़ पर को करता, कराता, ना तत्त्व-बोधरखता, अति दुःख पाता ॥२८॥ सम्बन्ध होत विधि से विधि का सदा है, बोधकथाम 'जिन' ने जग को कहा है। ऐसा रहस्य फिर भी मुनि ने गहा है, जो आत्मभाव करता सहसा रहा है ॥२९॥ आत्मानुभूति वर चेतन-मूर्ति प्यारी, साक्षात् यदा उपजती शिवसौख्यकारी। माँगे तथापि मुनि क्या जग-सम्पदा को? देती सदा जनम जो बहु आपदा को ॥३०॥ संपूर्ण भोग मिलने पर भी कदापि, भोगी नहीं मुनि बने, बनते न पापी। पीते तभी सतत हैं समता सुधा को, गाली मिले, नफिर भी करते क्रुधा को ॥३१॥ मिथ्यात्व को हृदय में मत स्थान देना, है दुष्ट व्याल वह, क्यों दुख मोल लेना। छोड़ो उसे निकट भी उसके न जाओ, तो शीघ्र अतुल संपति-धाम पाओ ॥३२॥ जैसे कहे जलज जो जल से निराला, वैसे बना रह सदा जड़ से खुशाला।। क्यों तु प्रमत्त बनता बन भोग त्यागी, रागी नहीं बन कभी बन वीतरागी ॥३३॥ हैं देह से पृथक चेतन शक्ति वाला, स्वामी! सदैव मुझसे तन भी निराला। यों जान, मान तन का मद छेड़ता हूँ, मैं मात्र मोक्ष-पथ से मन जोड़ता हैं ॥३४॥ हो काम नष्ट अघ भी मिटता यदा है, योगी विहार करता निज में तदा है। आकाश में विहग क्या फिर भी उड़ेगा? जो जाल में फँस गया फिर क्या करेगा?॥३५॥ सौभाग्य से श्रमण जो कि बना हुआ है, सच्चा जिसे प्रशमभाव मिला हुआ है। छोड़े नहीं वह कभी उस निर्जरा को, जो नाशती जनम-मृत्यु तथा जरा को॥३६॥ संसार में धन न सार असार सारा, स्थायी नहीं, न उनसे सुख हो अपारा। है सार तो समय-सार अपार प्यारा, से प्राप्त शीघ्र जिससे वह मुक्तिदारा॥३७॥ निस्संग हो विचरते गिरि-गवरों में, वे साधु ज्यों पवन है वन कन्दरों में। कामाग्नि को स्वरस पी झट से बुझा के, विश्राम पूर्ण करते निज-धाम जाके॥३८॥ शोभे सरोज-दल से सर ठीक जैसा, सद्द रूप जल से मुनि-मीन वैसा। से कंज में मृदुपना न असंयमी में, ‘ना शब्द व्योम गुण हैं-कहते यमी हैं॥३९॥ ये आर्त्तरौद्र मुझको रुचते नहीं हैं, संसार के प्रमुख कारण पाप वे हैं। श्री रामचन्द्र फिर भी मृग-भ्रान्ति भूले? जो देख कांचन-मृगी इस भाँति फूले।४०॥ योगी निजानुभव से पर को भुलाता, है वीतरागपन को फलरूप पाता। वो क्या कभी मरण से मुनि से डरेगा? शुद्धोपयोग धन को फिर क्या तजेगा ॥४१॥ जो भानु है, दूग-सरोज विकासता है, योगी सुदूर रहता उससे यदा है। वो तो तदा नियम से पर भावनायें, हा! हा! करे, सहत है फिर यातनायें ॥४२॥ ये पंच पाप इनको बस शीघ्र छोड़ो, आरो मह्मव्रत सभी मन को मरोड़ो। औ! राग का तुम समादर ना करो रे! देवाधिदेव 'जिन' को उर में धरो रे! ॥४३॥ रे। 'वीर' ने जड़मयी तज के क्षमा को, है धार ली तदुपरान्त मा क्षमा को। जो चाहते जगत में बनना सुखी हैं, धारें इसे, परम मुक्ति-वधू सखी है ॥४४॥ आस्था घनिष्ठ निज में जिनकी रही है, विज्ञान से चपलता मन की रुकी है। लेता चरित्र उनका वर मोक्ष-दाता, ऐसा रहस्य यह छन्द हमें बताता ॥४५॥ आत्मा जिसे न रुचता वह तो मुधा है, मिथ्यात्व से रम रहा पर में वृथा है। ज्ञानी निजीय घर में रहते सदा ये, वन्दै उन्हें, द्रुत मिले निज संपदायें ॥४६॥ कैसे रहे अनल दाहकता बिना वो, तो अग्नि से पृथक दाहकता कहाँ से? आकाश के बिन कही रह तो सकेगा, पै ज्ञान आतम बिना न कहीं रहेगा ॥४७॥ जो मात्र शुद्धनय से न हि शोभता है, पै वीतरागमय भाव सुधारता है। लक्ष्मी उसे वरण है करती खुशी से, सागार को निरखती तक ना इसी से ॥४८॥ हैं पूर्व में मुनि सभी बनते अमानी, पश्चात् जिनेश बनते, यह 'वीर' वाणी। तू भी अभी इसलिए तज मान को रे, शुद्धात्मको निरख, ले सुख की हिलोरें ॥४९॥ संसार सागर किनार निहारना है, तो मार मार, दृग को द्रुत धारना है। औ! जातरूप 'जिन' को नित पूजना है, भाई! तुझे परम आतम जानना है ॥५०॥ सल्लीन हों स्वपद में सब सन्त साधु, शुद्धात्म के सुरस के बन जाये स्वादु। वे अन्त में सुख अनन्त नितान्त पावें, सानन्द जीवन शिवालय में बितावें ॥५१॥ ये रोष-रागमय भाव विकार सारे, मेरे स्वभाव नहिं हैं बुध यों विचारें। ये पाप पुण्य इनमें फिर मौन धारें, औ देह स्नेह तज के निज को निहारें ॥५२॥ संसार के जलधि से कब तैरना हो, ऐसी त्वदीय यदि हार्दिक भावना से। आस्वाद ले जिनप-पाद पयोज का तू, नानामले अब कभी उस काम का तू ॥५३॥ संसार-बीच बहिरातम वो कहाता, झूठा पदार्थ गहता, भव को बढ़ाता। बेकार मान करता निज को भुलाता, लक्ष्मी उसे न वरती, अति कष्ट पाता ॥५४॥ जो पाप से रहित चेतन मूर्ति प्यारी, से प्राप्त शीघ्र उनको भव-दुःखहारी। जो भी महाश्रमण हैं निज गीत गाते, सच्चे क्षमादि दश धर्म स्वचित्त लाते ॥५५॥ सम्यक्त्व-लाभ वह है किस काम आता, है कर्म का उदय ही यदि पाप लाता। तो हाय! मुक्ति-ललना किसको वरेगी, वो सम्पदा अतुलनीय किसे मिलेगी ॥५६॥ लेवें निजीय निधि का मुनि वे सहारा, संसार मूल जड़ वैभव को बिसारा। ना चाहते विबुध वे यश सम्पदा को, हाँ, चाहते जड़ उसे सहते व्यथा को ॥५७॥ संसार में सुख नही , दुख का न पार, ले आत्म में रुचि भला-सुख ले अपार। सिद्धान्त का मनन या कर चाव से तु, क्यों लोक में भटकता पर भाव सेतू? ॥५८॥ जो भी रहे समय में रत, मौन धारे, पाते अलौकिक सही सुख शीघ्र सारे। वो विज्ञ ना समय का, वह कष्ट पाता, पीड़ार्त ले, समय है जब बीत जाता ॥५९॥ आत्मा अनन्त-गुण-आम सदैव जानो, सम्यक्त्व प्राप्त करके निज को पिछानो। जाओ वहाँ इधर या तुम शीघ्र आओ, आदेश ईंदूश नहीं पर को सुनाओ ॥६०॥ भोगे हुए विषय को मन में न लाता, औ प्राप्त को पकड़ना न जिसे सुहाता। कांक्षा नहीं उस अनागत की करेगा, यो सत्य पाकर कभी अहि से डरेगा?॥६१॥ हे वीर देव! तुमको नमते मुमुक्षु, पीते तभी स्वरस को सब सन्त भिक्षु। क्यों बीच में मनुज तेज कचौड़ि खाते? पश्चात् अवश्य फलतः हलुवा उड़ाते॥६२॥ चारित्र का नित समादर जो करेंगे, वे ही जिनेन्द्र-पद की स्तुति को करेंगे! ऐसा सदैव कहती प्रभु भारती है, नौका-समान भव पार उतारती है ॥६३॥ आकार जो न करते समयानुसार, औ धारते न रतनत्रय-रूप हार। रागाग्नि से सतत वे जलते रहेंगे, संसार वारिधि मा फिर क्यों तिरेंगे ॥६४॥ देखो सखे! अमर लोग सुखी न सारे, वे भी दुखी सतत, खेचर जो विचारे। दुःखातं हि दिख रहे नर मेदिनी में, शुद्धात्म में रम अतः, मत रागिनी में ॥६५॥ कामाग्नि से परम तप्त हुआ सदा से, तू आत्म को कर सुतृप्त स्व की सुधा से। कोई प्रयोजन नहीं जड़ सम्पदा से, पा बोध से नर! सुखी अति शीघ्रता से ॥६६॥ सम्बन्ध द्रव्य श्रुत से नहिं मात्र रक्खो, रक्खो स्वभाव श्रुत से, निज स्वाद चखो। है मेदिनी तप गई रवि ताप से जो, क्यों शांत हो जल बिना जल नाम से वो ॥६७॥ पर्याय वो जनमती मिटती रही है, वैकालिकी यह पदार्थ, यही सही है।" श्री वीर दैव जिन की यह मान्यता है, पूजें उसे विनय से यह साधुता है ॥६८॥ संमोह राग मद है यदि भासमान, या विद्यमान मुनि के मन में भिमान। आनन्द ले न उस जीवन में कदापि, ह्य! हा! वी नरक कुण्डबना तिपापी ॥६९॥ श्रद्धाभिभूत जिसने मुनि लिंग धारा, कंदर्प को सहज से फिर मार द्वारा। अत्यन्त शान्त निज को उसने निहारा, औ अन्त में बल ज्वलन्त अनन्त धारा ॥७०॥ रे! पाप ही अहित है, रिपु है तुम्हारा, काला कराल अहि है, दुख दे अपारा। से दूर शीघ्र उससे, तब शान्ति धारा, ऐसा कहें जिनप जो जग का सारा ॥७१॥ ले रम्य दृश्य ऋतुराज वसन्त आता, ज्यों देख कोकिल उसे मन मोद पाता। हे वीर! त्यों तव सुशिष्य खुशी मनाता, शुद्धात्म को निरख औ दुख भूल जाता॥७२॥ हृता कुधी, वह सुखी दिवि में नहीं है, तू आत्म में रह, अतः सुख तो वही है। क्या नाक से, नरक से? इक सार माया, सम्यक्त्व के जिन सदा! दुख ही उठाया॥७३॥ ज्योत्स्ना लिए तपन यद्यपि है प्रतापी, छ जाय बादल, तिरोहित से तथापि। आत्मा अनन्त युति लेकर जी रहा है, झे कर्म से अवश कुन्दित हो रहा है ॥७४॥ कैसे मिले? नहिं मिले सुख माँगने से, कैसे उगे अरुण पश्चिम की दिशा से? तो भी सुदूर वह मूढ़ निजी दशा से, ता अशान्त अति पीड़ित हो तृषा से ॥७५॥ लिप्सा कभी विषय की मन में न लाओ, चारित्र धारण करो, पर में न जाओ। चिन्ता कदापि न अनागत की करोगे, विश्राम स्वीय घर में चिरकाल लोगे॥७६॥ संसार सागर असार अपार खारा, है दुःख हो, सुख जहाँ न मिले लगा। तो आत्म में रत रहो, सुख चाहते जो, है सौख्य तो सहज में, नहिं जानते हो?॥७७॥ "कैवल्य-साधन न केवल नग्न-भेष, "त्रैलोक्य वन्य इस भाँति कहें जिनेश । इत्थम् न ले, पशु दिगम्बर क्या न होते ? होते सुखी ? दुखित क्यों दिन रात रोते?॥७८॥ “संसार की सतत वृद्धि विभाव से है, तो मोक्ष सम्भव स्वतन्त्र स्वभाव से है। झे जा अतः अभय, हे विभु में विलीन, "हैं केवली-वचनये“बनजा प्रवीण ॥७९॥ सम्यक्त्व नीलम गया जिसमें जड़ाया, चारित्र का मुकुट ना सिर पे चढ़ाया। तूने तभी परम आतम को न पाया, पाया अनन्त दुख ही, सुख को न पाया॥८०॥ जो काय से वचन से मन से सुचारे, पा बोध, राग मल धोकर शीघ्र हारे। याता निरन्तर निरंजन जैन को है, पाता वीं नियम से सुख चैन को है॥८१॥ दुस्संग से प्रथम जीवन शीघ्र मोझे, तो संग को समझ पाप तथैव छोड़ो। विश्वास भी कुपथ में न कदापि लाओ, शुद्धात्म को विनय से तुम शीघ्र पाओ॥८२॥ पत्ता पका गिर गया तरु से यथा है, योगी निरीह तन से रहता तथा है। औ ब्रह्म को हृदय में उसने बिठाया, तू क्यों उसे विनय स्मृति में न लाया ?॥८३॥ वाणी, शरीर, मन को जिसने सुधारा, सानन्द सेवन करे समता-सुधारा। धर्माभिभूत मुनि है वह भव्य जीव, शुद्धात्म में निरत हैं रहता सदीव ॥८४॥ जो साधु जीत इन इन्द्रिय-हाथियों को, आत्मार्थ जा, वन बसें तज अन्थियों को। पूजें उन्हें सतत वे मुझको जिलावें, पानी सदा द्रगमयी कृषि को पिलायें ॥८५॥ मैं उत्तमाङ्ग उसके पद में नमाता, जो है क्षमा-रमणि से रमता-रमाता। देती क्षमा अमित उत्तम सम्पदा को, भाई ! अतः तज सभी जड़-संपदा को ॥८६॥ ना वन्द्य है, न नय निश्चय मोक्ष-दाता, ना है शुभाशुभ, नहीं दुख को मिटाता। मैं तो नमूँ इसलिए मम ब्रह्म को ही, सद्यः टले दुख मिले सुख और बोधि ॥८७॥ सत् चेतना हृदय में जब देख पाता, आत्मा मदीय भगवान समान भाता। तू भी उसे भज जरा, तज चाह-दाह, क्यों व्यर्थ हो नित व्यथा सहता अथाहा ॥८८॥ “गम्भीर-धीर यति जो मद ना धरेंगे, औ भाव-पूर्ण स्तुति भी निज की करेंगे। वे शीघ्र मुक्ति ललना वर के रहेंगे, "ऐसा जिनेश कहते-‘सुख को गहेंगे॥८९॥ आत्मावलोकन कदापि न नेत्र से ले, पूरा भरा परम पावन बोधि से जो। आदर्श-रूप अरहन्त हमें बताते, कोई कभी दूग बिना सुख को न पाते॥९०॥ जो 'वीर' के चरण में नमता रहा है, चारित्र का वहन भी करता रहा है। औ गोत्र का, दृग बिना, मद ये रहा है, विज्ञान को न गहता, जड़ सो रहा है ॥२९॥ धिक्कार! मोक्ष-पथ से च्युत हो रहा है, तू अंग-संग ममता रखता अहा है। भाई! अतः सह रहा नित दुःख को ही, ले ले विराम अघ से, तज मोह मोही ॥९२॥ जो सन्त हैं समय-सार सरोज का वे, आस्वाद ले भ्रमर-से पर में न जावें। सम्यक्त्व हो न पर से, निज आत्म से है, भाई सुधा-रस झरेशशि-बिम्ब से ही॥९३॥ आया हुआ उदय में यह पुण्य पिण्ड, औ पाप, भिन्न मुझको जड़ का करण्ड। ब्रह्मा न किन्तु पर है, वर-बोध भानु, मैं सर्व-गर्व तज के इस भाँति जानें ॥९४॥ साधू सुधार समता, ममता निवार, जो है सदैव शिव में करता विहार। तो अन्य साधु तक भी उसके पदों में, लेते सुलीनअलि-से, फिर क्या पदों में?॥९५॥ प्रायः सभी कुतप से सुर भी हुए हैं, लाखों दफा असुर हो, मर भी चुके हैं। देदीप्यमान नहिं 'केवलज्ञान' पाया, है वीर देव! हमने दुख ही उठाया ॥९६॥ सानन्द यद्यपि सदा जिन नाम लेते, योगी तथापि न निजातम देख लेते। तो वो उन्हें शिवरमा मिलती नहीं है, तेरा जिनेश! मत ईदृश क्या नहीं है?॥९७॥ अत्यन्त मोह-तम में कुछ ना दिखेगा, तू आत्म मैं रहू, प्रकाश वहाँ मिलेगा। स्वादिष्ट मोक्ष-फल यो फलतः फलेगा, व्दीप्त दीपक सदैव अहो! जलेगा ॥९८॥ तू चाहता विषय में मन ना भुलाना, तो सात तत्त्व-अनुचिन्तन में लगा ना! ऐसा न ले, कुपथ से सुख क्यों मिलेगा ? आत्मानुभूति झरना फिर क्यों झरेगा? ॥ ९९॥ हूँ बाल, मन्द-मति हूँ लघु हैं यमी हूँ, मैं राग की कर रहा कम से कमी हूँ। है चेतने! सुखद-शान्ति-सुधा पिला दे, माता! मुझे कर कृपा मुझमें मिला दे ॥१००॥ चाहूँ कभी न दिवि को अयि वीर स्वामी! पीऊँ सुधा रस निजीय बनें न कामी। पा 'ज्ञानसागर' सुमन्थन से सुविद्या, ‘विद्यादिसागर' बनू, तज दें अविद्या ॥१०१॥
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  7. सीमातीत-शून्य में नीलिमा बिछाई, और...इधर....निचे... निरी नीरवता छाई है, निशा का अवसान हो रहा है उषा का अब आन हो रहा है। भानु की निद्रा टूट तो गई है परन्तु अभी वह लेटा है माँ की मार्दव-गोद में, मुख पर अंचल लेकर करवटें ले रहा है। प्राची के अधरों पर मन्द-मधुरिम मुस्कान है सर पर पल्ला नहीं है और सिन्दूरी धूल उड़ती-सी रंगीन-राग की आभा- भाई है, भाई.! In the boundless space A bedding of bluishness, And... hither...underneath Prevails absolute silence, The night is touching its termination The dawn is now attaining its arrival The Sun is slumbering no more indeed Yet he is Still reclining Into the gentle lap of the mother, Is changing sides While drawing the garment over his face. On the lips of the Eastern horizon There lurks a light graceful Smile No hem on the head is there And Like the scattered Scarlet dust The splendour of the colourful tint- Appears agreeable, dear brother.
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  8. 💖💕💞श्रमदान 💞💕💖 संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर की प्रेरणा से श्रम के माध्यम से समाज के सभी वर्गों के लिए रोजगार का सुंदर, सुलभ, व उत्तम साधन...अब भोपाल में भी उपलब्ध @ हबीबगंज जैन मंदिर, एम.पी. नगर भोपाल (म.प्र.) अहिंसक खादी वस्त्रों को, अपनालें मन से आज हथकरघा से ही भारत का, होगा पूर्ण-विकास।। सृजन, कला, और शिल्प का अद्धभुत देखा संगम आचार्य भगवन की प्रेरणा से 'श्रमदान' का शुभारंभ।। देश की धड़कन में वसा, मध्यप्रदेश स्थित प्यारा भोपाल आचार्य श्री जी की प्रेरणा से, अहिंसा से होगा यहाँ कमाल।। -अभिषेक जैन 'अबोध' 💖💕💞🌻🌷🌹🌸💐🌳🌴🌾🌿☘🌱🍀💞💕💖
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  9. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी, रवीन्द्र जैन
    नंदीश्वर भक्ति भक्ति पाठ : पूज्यपाद भक्तियाँ (संस्कृत) का आचार्य श्री द्वारा पद्यानुवाद गायन : रवीन्द्र जैन
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  10. विद्या गुरु का क्या कहना, तुम हो जैन धर्म का गहना, दीक्षा दिवस है आप का आज, धन्य है अपने आप में यह बात, धन्य है गुरु ज्ञान सागर जी महाराज, और धन्य है आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज, आगम की वाणी को हम तक पहुंचाया है, तुमको पाकर मेरा रोम रोम हर्षाया है, आप को आती इतनी भाषाएं कि क्या कहना, लेकिन आप ने बना रखा है मातृभाषा हिंदी को अपना गहना, इंडिया नहीं भारत बोलो, संसार समुद्र में फंसे हो अब तो तुम मोक्ष मार्ग का ताला खोलो, गुरुवर की करुणा का नहीं कोई पार, आपने खुलवादी घोशालाएं अपार, जनकल्याण, हथकरघा, पूर्ण आयु आयुर्वेद संस्थान, आपके आशीर्वाद से हुआ ना जाने कितने मंदिरों का निर्माण, आप गुरुवर कर रहे हो जैन धर्म की इतने अच्छे से प्रभावना, चल सकूं आपके कदमों पर यही भाती हूं आज के दिन मैं भावना, आपसे दीक्षित है ना जाने कितने शिष्य शिष्याऐ, आपकी तो चर्या ही ऐसी है कि अपने आप लोग खिंचे चले आएं, आपको भला कौन कर सकता है शब्दों में बयान, भक्त तो बस भावना ही भा सकते हैं यहाँ | भक्त तो बस भावना ही भा सकते हैं यहाँ | मेरे, मेरे परिवार और समस्त जीवों की तरफ से नमोऽस्तु, नमोऽस्तु, नमोऽस्तु मेरे आराध्य गुरुवर, सन्त शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज 🙏🙏🙏 आचार्य श्री दीर्घायु हो 🙏🙏🙏 दीक्षा दिवस जयवन्त हो 🙏🙏🙏ं
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  11. *🙏जय जिनेंद्र🙏*,, *🇮🇳भारत को भारत बोलिए🇮🇳* *जैनम् जयतु शासनम्* *वंदे विघा सागरम्* *नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु* परम पूज्य आचार्य श्री के चरणों में कोटि कोटि नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु *आचार्य विद्यासागर सेवक मंडल भेल भोपाल*
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  12. इस पावन प्रकल्प पर हम सब मिलकर करे गुरुवर को नमन नमोस्तु आचार्य श्री जी, नमोस्तु आचार्य श्री जी, नमोस्तु आचार्य श्री जी !!!
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  13. आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज का ५४ वां दीक्षा दिवस
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  14. *संयम महोत्सव प्रतियोगिता श्रंखला* आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज के ५४ वें दीक्षा दिवस का पवन प्रकल्प आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज के साहित्य को जानने एवं स्वाध्याय करने का सुनहरा अवसर जून 30, 2021 से 14 जुलाई 2021 प्रतिदिन पूछे जायेंगे प्रश्न और आप बन सकते हैं आकर्षक उपहार के दावेदार प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए *आज ही निम्न लिंक पर पंजीकरण कराये* 👇👇👇👇 https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSeN92B_st12lkQiNVZT5F3XmGfUA2gKH9BRUca9OpjCWdfY0Q/viewform?usp=sf_link फॉर्म भरने के बाद आपको whatsapp एवं instagram लिंक प्राप्त होगा | आचार्य श्री विद्यासागर मोबाइल एप्प पर आपको मिलेंगे प्रतियोगिता की पल पल की जानकारी https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.vidyasagar ५४ वां दीक्षा दिवस आषाढ़ शुक्ल-पंचमी : 14 जुलाई २०२१ आपको यह प्रतियोगिता कैसी लग रही हैं - कमेंट में जरूर बताएं
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  15. यह कृति आचार्य ज्ञानसागरजी ने उस समय सन् १९५६ में लिखी जब वे क्षुल्लक अवस्था में थे। यह कृति महत्त्वपूर्ण इसलिए नहीं कि इसके लेखक, वर्तमान के आचार्य विद्यासागरजी महाराज के गुरु हैं बल्कि यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वर्तमान में भारत जहाँ जा रहा है, यदि इस पुस्तक के अनुसार चला होता तो स्वतंत्रता के बाद यह देश अपने इतिहास की स्वर्णिम अवस्था को पुनः प्राप्त कर चुका होता। अब भी अवसर है यदि देशवासी इन नीतियों का अनुकरण करें, तो वह दिन दूर नहीं जब यह देश सोने की चिड़िया की ख्याति को पुनः प्राप्त कर पायेगा। आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि यह कृति इसी वर्ष पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज व संघ के देखने, पढ़ने में आयी जबकि इसमें उल्लेखित विषयों को, आचार्य श्री विगत २५ वर्षों से प्रमुखता से प्रवचन में दे रहे हैं। भूमिका पूज्य क्षुल्लक श्री १०५ ज्ञानभूषणजी महाराज ने ‘पवित्र मानव जीवन’ काव्य लिखकर समाज का भारी कल्याण किया है। हम सुखी किस प्रकार हों, सामाजिक नाते से हमारा व्यवहार एक दूसरे से कैसे हो, हमारा आहार व्यवहार क्या हो ? हम किस प्रकार स्वस्थ रहें ? सामाजिक आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जा सके? श्रमजीवी तथा पूँजीवादी व्यवस्था का समाज पर क्या प्रभाव होता है और समाज का किस प्रकार शोषण किया जाता है, इस ग्रन्थ में विस्तार पूर्वक किया गया है। गृहस्थधर्म के बारे में विवेचन करते हुए श्री क्षुल्लकजी लिखते हैं - ‘‘प्रशस्यता सम्पादक नर हो, मुदिर और नारी शम्पा। जहाँ विश्व के लिये स्फुरित होती हो दिल में अनुकम्पा॥” जो व्यक्ति आज भी महिलाओं को समान अधिकार देने के विरुद्ध हैं, उनकी ओर संकेत करते हुए लिखते हैं- महिलाओं को आज भले ही व्यर्थ बताकर हम कोशे। नहीं किसी भी बात में रही वे हैं पीछे मरदों से॥ जहाँ कुमारिल बातचीत में हार गया था शंकर से। तो उसकी औरत ने आकर पुनः निरुत्तर किया उसे॥ इसके अतिरिक्त माता-पिता का बच्चों के प्रति कर्तव्य, पुरातनकालीन तथा वर्तमान शिक्षाप्रणाली का तुलनात्मक विवेचन तथा गृहस्थाश्रम की मर्यादाओं पर बड़े सुन्दर और अनोखे ढंग से प्रकाश डाला गया है। यदि हम यों कहें कि भारतीय संस्कृति तथा आम्नाय के महान् ग्रन्थों के सार को सरल और सुबोध काव्य में रचकर समाज का मार्गदर्शन किया है तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी। हम आशा करते हैं कि इस ग्रन्थ का अध्ययन करके पाठक जहाँ अपना जीवन सफल करेंगे, वहाँ समाज को सुखी बनाने के लिये इसका अधिक से अधिक प्रचार करेंगे। देवकुमार जैन सम्पादक - ‘मातृभूमि’ हिसार प्रथम संस्करण से साभार सन् १९५६ (वि. सं. २०१३)
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  16. गुरु की डॉट ही शिष्य के लिए शिक्षा का घर है। अर्थात् गुरु की डाँट से शिक्षा/विद्या जल्दी प्राप्त हो जाती है। आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज कहा करते थे कि अज्ञानियों से वर्षों प्रशंसा मिलने की अपेक्षा, ज्ञानी के द्वारा डाँट मिलना भी श्रेष्ठ है। क्योंकि ज्ञानी की डाँट के द्वारा दिशाबोध प्राप्त हो जाता है और यही डाँट व्यक्ति की दशा परिवर्तन करा देती है एवं दुर्दशा होने से बचा लेती है। वे कहा करते थे कि शिष्य का कर्तव्य है कि गुरु की आज्ञा को बिना कान फड़फड़ाये स्वीकार कर लेना चाहिए अर्थात् गुरु आज्ञा को निर्विकल्प शिरोधार्य कर लेना चाहिए। इससे गुरु के प्रति उसका विनय एवं समर्पण प्रकट होता है। ज्ञानार्णव वाचना, ०६.१०.१९९६, अतिशय क्षेत्र महुवाजी, चातुर्मास एवं द्रव्य संग्रह वाचना के समय, १७.०७.१९९५, कुण्डलपुर
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  17. अपने उपयोग को स्थिर रखने के लिए एवं मन को शांत बनाये रखने के लिए साधक साधना करता है। चिन्तन, मनन, लेखन भी करता है। पर प्रकाशन से हमेशा दूर रहता है क्योंकि प्रकाशन शब्द स्वयं कहता है प्रकाश-न। इसलिए आचार्य ज्ञानसागरजी कहा करते थे कि आज के लेखकों को प्रकाशन की अधिक चिन्ता है। साधक को चिन्ता नहीं बल्कि चिन्तन करना चाहिए। वे कहते थे कि "मैं तो साधक हूँ प्रकाशक नहीं।" लेखन कार्य दोषपूर्ण है अति आवश्यक होने पर किसी और से लिखवा लें तो अच्छा रहेगा। आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज जी ने समयसार की टीका को छोड़कर बाकी सभी ग्रन्थ निर्ग्रन्थ होने से पूर्व अर्थात् पं. भूरामल एवं क्षु. ज्ञानभूषण की अवस्था में लिखे हैं, मुनि अवस्था में नहीं। उनके द्वारा रचित ग्रन्थ या तो ग्रन्थालयों में या मंदिरों में या उनके भक्त श्रावकों के यहाँ से प्राप्त हुए और अधिकतर ग्रन्थों का प्रकाशन उनकी समाधि के बाद ही हुआ। अपने द्वारा रचित ग्रन्थों के प्रकाशन से दूर रहने वाले वे एक महान् साधक थे आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज। आचार्य श्री के मुखारबिन्द से धवला (६) वाचना के अवसर पर ०४.०६.१९९८, भाग्योदय तीर्थ, सागर
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  18. *‼आहारचर्या*‼️ *होलीपुरा* _दिनाँक :२९/०६/२०२१_ *आगम की पर्याय,महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* के आहारचर्या कराने का सौभाग्य *ब्रह्मचारी डब्बू भैया विपिन भैया श्रीमान कौशल जी जैन सिलवानी वाले गुड वाला परिवार*_🟤 वालो को एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ है। इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* 🌹🌹🌹🌹 *_सूचना प्रदाता-:ब्र.विवेक भैया जी बंडा एवं अक्षय जैन खातेगांव_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा
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  19. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी
    2000 वर्ष पूर्व स्वामी समन्तभद्र महाराज जी द्वारा रचित स्वयंभू स्तोत्र जो कि चौबीस तीर्थंकर भगवान की स्तुति है जो अनंत पापों का क्षय करने वाली है इस पवित्र स्तोत्र का पाठ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज प्रतिदिन 3 बार करते हैं
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  21. दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज इन दिनों (Japanese Haiku, 俳句 ) जापानी हायकू (कविता) की रचना करते हैं | हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी पंक्ति में ७ अक्षर, तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। महाकवी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने लगभग ६०० हायकू लिखे हैं, वह इस प्रकार हैं :- १‍ - जुड़ो ना जोड़ो, जोड़ा छोड़ो जोड़ो तो, बेजोड़ जोड़ो। २ - संदेह होगा, देह है तो, देहाती ! विदेह हो जा | ३ - ज्ञान प्राण है, संयत हो त्राण है, अन्यथा श्वान| ४ - छोटी दुनिया, काया में सुख दुःख, मोक्ष नरक | ५ - द्वेष से बचो, लवण दूर् रहे, दूध न फटे | ६ - किसी वेग में, अपढ़ हो या पढ़े, सब एक हैं | ७ - तेरी दो आँखें, तेरी ओर हज़ार, सतर्क हो जा | ८ - चाँद को देखूँ, परिवार से घिरा, सूर्य सन्त है | ९ - मैं निर्दोषी हूँ, प्रभु ने देखा वैसा, किया करता। १‍० - आज्ञा का देना, आज्ञा पालन से है, कठिनतम। १‍१‍ - तीर्थंकर क्यों, आदेश नहीं देते, सो ज्ञात हुआ। १‍२ - साधु वृक्ष है, छाया फल प्रदाता, जो धूप खाता। १‍३ - गुणालय में, एकाध दोष कभी, तिल सा लगे। १‍४ - पक्ष व्यामोह, लौह पुरुष के भी, लहू चूसता। १‍५ - पूर्ण पथ लो, पाप को पीठ दे दो, वृत्ति सुखी हो। १‍६ - भूख मिटी है, बहुत भूख लगी, पर्याप्त रहें। १‍७ - टिमटिमाते, दीपक को भी देख, रात भा जाती। १‍८ - परिचित भी, अपरिचित लगे, स्वस्थ्य ध्यान में (बस हो गया)। १‍९ - प्रभु ने मुझे, जाना माना परन्तु, अपनाया ना। २० - कलि न खिली, अंगुली से समझो, योग्यता क्या है ? २१‍ - आँखें लाल है, मन अन्दर कौन, दोनों में दोषी ? २२ - इष्ट-सिद्धि में, अनिष्ट से बचना, दुष्टता नहीं। २३ - सामायिक में, कुछ न करने की, स्थिति होती है। २४ - मद का तेल, जल चुका सो बुझा, विस्मय दीप। २५ - ध्वजा वायु से, लहराता पै वायु, आगे न आती। २६ - ज्ञेय चिपके, ज्ञान चिपकाता सो, स्मृति हो आती। २७ - तैराक बना, बनूँ गोताखोर सो, अपूर्व दिखे। २८ - वर्षा के बाद, कड़ी मिट्टी सी माँ हो, दोषी पुत्र पे। २९ - कछुवे सम, इन्द्रिय संयम से, आत्म रक्षा हो। ३० - डूबना ध्यान, तैरना स्वाध्याय है, अब तो डूबो। ३१‍ - गुरु मार्ग में, पीछे की वायु सम, हमें चलाते। ३२ - संघर्ष में भी, चंदन सम सदा, सुगन्धि बाटूँ। ३३ - प्रदर्शन तो, उथला है दर्शन, गहराता है। ३४ - योग साधन, है उपयोग शुद्धि, साध्य सिद्ध हो। ३५ - योग प्रयोग, साधन है साध्य तो, सदुपयोग। ३६- धर्म का फल, बाद में न अभी है, पाप का क्षय। ३७ - पर पीड़ा से, अपनी करुणा सो, सक्रिय होती। ३८ - सीना तो तानो, पसीना तो बहा दो, सही दिशा में। ३९ - प्रश्नों से परे, अनुत्तर है उन्हें , मेरा नमन। ४० - फूल खिला पै, गंध न आ रही सो, काग़ज़ का है | ४१‍ - सरोवर का, अन्तरंग छुपा है ? तरंग वश। ४२ - मान शत्रु है, कछुवाबनूँ बचूँ, खरगोश से। ४३ - हायकू कृति, तिपाई सी अर्थ को, ऊँचा उठाती। ४४ - अधूरा पूरा, सत्य हो सकता है, बहुत नहीं। ४५ - भूख लगी है, स्वाद लेना छोड़ दें, भर लें पेट। ४६ - ज्ञानी कहता, जब बोलूँ अपना, स्वाद छूटता। ४७ - गुरु ने मुझे, प्रकट कर दिया, दीया दे दिया। ४८ - नीर नहीं तो, समीर सही प्यास, कुछ तो बुझे। ४९ - निजी प्रकाश, किसी प्रकाशन में, कभी दिखा है ? ५० - जितना चाहो, जो चाहो जब चाहो, क्यों कभी मिला। ५१‍ - वैधानिक तो, पहले बनो फिर, धनिक बनो। ५२ - टिमटिमाते, दीप को भी पीठ दे, भागती रात । ५३ - रोगी की नहीं, रोग की चिकित्सा हो, अन्यथा भोगो। ५४ - देखा ध्यान में, कोलाहल मन का, नींद ले रहा। ५५ - मिट्टी तो खोदो, पानी को खोजो नहीं, पानी फूटेगा। ५६ - सुनना हो तो, नगाड़े के साथ में, बाँसुरी सुनो। ५७ - मलाई कहाँ, अशान्त दूध में सो, प्रशान्त बनो। ५८ - कब पता न, मरण निश्चित है, फिर डर क्यों ? ५९ - भरा घट भी, खाली सा जल में सो, हवा से बचो। ६० - नौ मास उल्टा, लटका आज तप (रहा पेट में) कष्टकर क्यों? ६१‍ - मोक्षमार्ग तो, भीतर अधिक है, बाहर कम। ६२ - गूँगा गुड़ का, स्वाद क्या नहीं लेता ? वक्ता क्यों बनो? ६३ - कमल खिले, दिन के ग्रहण में, करबद्ध हों। ६४ - पैर उठते, सीधे मोही के भी पै, उल्टे पड़ते। ६५ - भूत सपना, वर्तमान अपना, भावी कल्पना। ६६ - काले मेघ भी, नीचे तपी धरा को, देख रो पड़े। ६७ - घी दूध पुन:, बने तो मुक्त पुन:, हम से रागी। ६८ - उससे डरो, जो तुम्हारे क्रोध को, पीते ही जाते। ६९ - शून्य को देखूँ, वैराग्य बढ़े-बढ़े, नेत्र की ज्योति। ७० - पौधे न रोपे, छाया और चाहते, निकम्मे से हो। (पौरुष्य नहीं) ७१‍ - उनसे मत, डरो जिन्हें देख के, पारा न चढ़े। ७२ - क्या सोच रहे, क्या सोचूँ जो कुछ है, कर्म के धर्म। ७३ - तुम्बी तैरती, औरों को भी तारती, छेद वाली क्या ? ७४ - आलोचन से, लोचन खुलते हैं, सो स्वागत है। ७५ - दुग्ध पात्र में, नीलम सा जीव है, तनु प्रमाण । ७६ - स्वानुभव की, समीक्षा पर करें, तो आँखें सुने। ७७ - स्वानुभव की, प्रतिक्षा स्व करे तो, कान देखता। ७८ - मूल बोध में, बड़ की जटायें सी, व्याख्यायें न हो। ७९ - मन अपना, अपने विषय में, क्यों न सोचता ? ८० - स्थान समय, दिशा आसन इन्हें , भूलते ध्यानी। ८१‍ - चिन्तन न हो, तो चिन्ता मत करो, चित्त्स्वरुपी हो। ८२ - एक आँख भी, काम में आती पर, एक पंख क्या ? ८३ - नय-नय है, विनय पुरोधा (प्रमुख) है, मोक्षमार्ग में। ८४ - सम्मुख जा के, दर्पण देखता तो (दर्पण में देखा पै) मैं नहीं दिखा। ८५ - पाषाण भीगे, वर्षा में हमारी भी, यही दशा है। ८६ - आपे में न हो (नहीं), तभी तो अस्वस्थ हो, अब तो आओ। ८७ - दीप अनेक, प्रकाश में प्रकाश, एक मेक सा। ८८ - होगा चाँद में, दाग चाँदनी में ना, ताप मिटा लो । ८९ - प्रतिशोध में, ज्ञानी भी अन्धा होता, शोध तो दूर। ९० - निद्रा वासना, दो बहनें हैं जिन्हें, लज्जा न छूती। ९१‍ - जिस बोध में, लोकालोक तैरते,उसे नमन। ९२ - उजाले में हैं, उजाला करते हैं, गुरु को वंदू । ९३ - उन्हें जिनके, तन-मन नग्न हैं, मेंरे नमन। ९४ - शिव पथ के, कथक वचन भी, शिरोधार्य हो। ९५ - व्यंग का संग, सकलांग से नहीं, विकलांग से। ९६ - कुछ न चाहूँ, आप से आप करें, बस ! सद्ध्यान। ९७ - बड़ तूफाँ में, शीर्षासन लगाता, बेंत झुकता। ९८ - आशा जीतना, श्रेष्ठ निराशा से तो, सदाशा भली। ९९ - समानान्तर, दो रेखाओं में मैत्री, पल सकती। १‍०० - प्राय: अपढ़, दीन हो,पढ़े मानी, ज्ञानी विरले। १‍०१‍ - कच्चा घड़ा है, काम में न लो, बिना, अग्नि परीक्षा। १‍०२ - पक्षी कभी भी, दूसरों के नीड़ों में, घुसते नहीं। १‍०३ - तरंग देखूँ, भंगुरता दिखती, ज्यों का त्यों ‘तोय’। १‍०४ - बिना प्रमाद, श्वसन क्रिया सम, पथ पे चलूँ। १‍०५ - दृढ़-ध्यान में, ज्ञेय का स्पन्दन भी, बाधक नहीं। १‍०६ - शब्द पंगु हैं, जवाब न देना भी, लाजवाब है। १‍०७ - पराश्रय से, मान बोना हो कभी, दैन्य-लाभ भी। १‍०८ - वक़्ता व श्रोता, बने बिना, गूँगा सा, निजी-स्वाद ले। १‍०९ - नियन्त्रण हो, निज पे, दीप बुझे, निजी श्वांस से। १‍१‍० - अपना ज्ञान, शुध्द-ज्ञान न, जैसे, वाष्प, पानी न। १‍१‍१‍ - औरों को नहीं, प्रभु को देखूँ तभी, मुस्कान बाटूँ। १‍१‍२ - अपमान को, सहता आ रहा है, मान के लिए। १‍१‍३ - मान चाहूँ ना, पै अपमान अभी, सहा न जाता। १‍१‍४ - यशोगन्ध की, प्यासी नासा स्वयं तू, निर्गन्धा है री ! १‍१‍५ - दमन, चर्म-, चक्षु का हो, नमन, ज्ञान चक्षु को। १‍१‍६ - गाय बताती, तप्त-लोह पिण्ड को, मुख में ले ‘सत्’। १‍१‍७ - कुछ स्मृतियाँ, आग उगलती, तो, कुछ सुधा सी। १‍१‍८ - मरघट में, घूँघट का क्या काम?, घट कहाँ है ? १‍१‍९ - पुण्य-फूला है, पापों का पतझड़, फल अनंत । (अमाप) १‍२० - गन्ध सुहाती, निम्ब -पुष्पों की, स्वाद।, उल्टी कराता। १‍२१‍ - युवा कपोल, कपोल-कल्पित है, वृद्ध-बोध में। १‍२२ – लोहा सोना हो, पारस से परन्तु, जंग लगा क्या ? १‍२३ - गुणी का पक्ष,लेना ही विपक्ष पे, वज्रपात है। १‍२४ - बिना डाँट के, शिष्य और शीशी का, भविष्य ही क्या ? १‍२५ - प्रकाश में ना…, प्रकाश को पढ़ो तो, भूल ज्ञात हो। १‍२६ - देख सामने, प्रभु के दर्शन हैं, भूत को भूल… १‍२७ - दीन बना है, व्यर्थ में बाहर जा, अर्थ है स्वयं। १‍२८ - काल की दूरी, क्षेत्र दूरी से और, अनिवार्य है। १‍२९ - दर्प को छोड़, दर्पण देखता तो, अच्छा लगता। १‍३० - घनी निशा में, माथा भयभीत हो, आस्था, आस्था है। १‍३१‍ – बिन्दु जा मिला, सभी मित्रों से, जहाँ, सिन्धु वही है। १‍३२ - आगे बनूँगा, अभी प्रभु-पदों में, बैठ तो जाऊँ। १‍३३ - रस-रक्षक-, छिलका, सन्तरे का, अस्तित्व ही क्या ? १‍३४ - छोटा भले हो, दर्पण मिले साफ़, खुद को देखूँ। १‍३५ - पराग-पीता-, भ्रमर, फूला फूल, आतिथ्य- प्रेमी। १‍३६ - बोधा-काश में, आकाश तारा सम, प्रकाशित हो। १‍३७ - पराकर्षण, स्वभाव सा लगता, अज्ञानवश। १‍३८ - भ्रमर से हो,फूल सुखी, हो दाता, पात्र-योग से। १‍३९ - तारा दिखती, उस आभा में कभी, कुछ दिखी क्या ? १‍४० - सुधाकर की, लवणाकर से क्यों ?, मैत्री, क्या राज ? १‍४१‍ - बाहर नहीं, वसन्त बहार तो, सन्त ! अन्दर… १‍४२ - तार न टूटी, लगातार चिर से, चैतन्य-धारा। १‍४३ - सुई निश्चय, कैंची व्यवहार है, दर्ज़ी-प्रमाण। १‍४४ - चलो बढ़ोऔ, कूदो, उछलो यही, धुआँधार है। १‍४५ - बिना चर्वण, रस का रसना का, मूल्य ही क्या है ? १‍४६ - ख़ाली बन जा, घट डूबता भरा…, ख़ाली तैरता। १‍४७ - साष्टांग सम्यक्, शान चढ़ा हीरा सा।, कहाँ दिखता ? १‍४८ - निजी पराये, वत्सों को, दुग्ध-पान, कराती गौ-माँ। १‍४९ – छोटा सा हूँ मैं, छोर छूती सी तृष्णा, छेड़ती मुझे। १‍५० - रसों का भान, जहाँ न, रहे वहाँ, शान्त-रस है। १‍५१‍ - जिससे तुम्हें, घृणा न हो उससे, अनुराग क्यों ? १‍५२ - मोक्षमार्ग में, समिति समतल।, गुप्ति सीढ़ियाँ। १‍५३ - धूप-छाँव सी, वस्तुत: वस्तुओं की, क्या पकड़ है ? १‍५४ - धूम्र से बोध, अग्नि का हो गुरु से, सो आत्म बोध। १‍५५ - कब लौं सोचो।, कब करो, ना सोचे, करो क्या पाओ ? १‍५६ - कस न, ढील, अनति हो, सो वीणा, स्वर लहरी। १‍५७ - पुण्य-पथ लौ, पाप मिटे पुण्य से, पुण्य पथ है। १‍५८ - पथ को कभी, मिटाना नहीं होता, पथ पे चलो। १‍५९ - नाविक तीर, ले जाता हमें, तभी, नाव की पूजा। १‍६० - हद कर दी, बेहद छूने उठें, क़द तो देखो। १‍६१‍ - भारी वर्षा हो, दल-दल धुलता, अन्यथा मचे। १‍६२ - माँगते हो तो, कुछ दो, उसी में से, कुछ देऊँगा। १‍६३ - अनेक यानी, बहुत नहीं किन्तु, एक नहीं है। १‍६४ - मन की कृति, लिखूँ पढ़ूँ सुनूँ पै, कैसे सुनाऊँ ? १‍६५ - कैसे, देखते, संत्रस्त संसार को ?, दया मूर्ति हो। १‍६६ - मोह टपरी, ज्ञान की आँधी में यूँ, उड़ी जा रही १‍६७ - पाँच भूतों के, पार, अपार पूत, अध्यात्म बसा। १‍६८ - क़ैदी हूँ देह-, जेल में, जेलर ना…, तो भी भागा ना १‍६९ - तेरा सो एक, सो सुख, अनेक में, दु:ख ही दु:ख। १‍७० - सहजता में, प्रतिकार का भाव, दिखता नहीं। १‍७१‍ - साधना छोड़, काय-रत होना ही, कायरता है। १‍७२ - भेद-वती है, कला, स्वानुभूति तो, अद्वैत की माँ… १‍७३ - विज्ञान नहीं, सत्य की कसौटी है, ‘दर्शन’ यहाँ। १‍७४ - आम बना लो, ना कहो, काट खाओ, क्रूरता तजो। १‍७५ - नौका पार में, सेतु-हेतु मार्ग में, गुरु-साथ दें। १‍७६ - मुनि स्व में तो, सीधे प्रवेश करें, सर्प बिल में। १‍७७ - चिन्तन कभी, समयानुबन्ध को, क्या स्वीकारता ? १‍७८ - बिना रस भी, पेट भरता, छोड़ो, मन के लड्डू। १‍७९ - भोक्ता के पीछे, वासना, भोक्ता ढूँढे, उपासना को। १‍८० - दो जीभ न हो, जीवन में सत्य ही, सब कुछ है। १‍८१‍ - सिर में चाँद, अच्छा निकल आया, सूर्य न उगा। १‍८२ - जैसे दूध में, बूरा पूरा पूरता, वैसा घी क्यों ना…? १‍८३ - स्वोन्नति से भी, पर का पराभव, उसे सुहाता… ! १‍८४ - शिरोधार्य हो, गुरु-पद-रज, सो, नीरज बनूँ। १‍८५ - परवश ना, भीड़ में होकर भी, मौनी बने हो। १‍८६ - दुर्भाव टले, प्रशम-भाव से सो, स्वभाव मिले। १‍८७ - खाओ पीयो भी, थाली में छेद करो, कहाँ जाओगे ? १‍८८ - समझ न थी, अनर्थ किया आज, समझ, रोता। १‍८९ - गुब्बारा फूटा, क्यों, मत पूछो, पूछो, फुलाया क्यों था? १‍९० - बदलाव है, पै स्वरुप में न, सो, ‘था’ है ‘रहेगा’। १‍९१‍ - अर्ध शोधित-, पारा औषध नहीं, पूरा विष है। १‍९२ - तटस्थ व्यक्ति, नहीं डूबता हो, तो, पार भी न हो। १‍९३ - दृष्टि पल्टा दो, तामस समता हो, और कुछ ना… १‍९४ - देवों की छाया, ना सही पै हवा तो, लग सकती। १‍९५ - तेरा सत्य है, भविष्य के गर्भ में, असत्य धो ले। १‍९६ - परिचित को, पीठ दिखा दे फिर !, सब ठीक है। १‍९७ - मधुर बनो, दाँत तोड़ गन्ना भी, लोकप्रिय है। १‍९८ - किस ओर तू…!, दिशा मोड़ दे, युग-, लौट रहा है। १‍९९ - दृश्य से दृष्टा, ज्ञेय से ज्ञाता महा, सो अध्यात्म है। २०० - बिना ज्ञान के, आस्था को भीति कभी, छू न सकती। २०१‍ - उर सिर से, महा वैसा ज्ञान से, दर्शन होता। २०२ - व्याकुल व्यक्ति, सम्मुख हो कैसे दूँ, उसे मुस्कान…! २०३ - अधम-पत्ते, तोड़े, कोंपलें बढ़े, पौधा प्रसन्न ! २०४ - पूर्णा-पूर्ण तो, सत्य हो सकता पै, बहुत नहीं। २०५ - गर्व गला लो, गले लगा लो जो हैं, अहिंसा प्रेमी २०६ - काश न देता, आकाश, अवकाश, तू कहाँ होता ? २०७ - सहयोगिनी, परस्पर में आँखें, मंगल झरी। २०८ - हमारे दोष, जिनसे गले धुले, वे शत्रु कैसे ? २०९ - हमारे दोष, जिनसे फले फूले, वे बन्धु कैसे ? २१‍० - भरोसा ही क्या ?, काले बाल वालों का, बिना संयम। २१‍१‍ - वैराग्य, न हो, बाढ़ तूफ़ान सम, हो ऊर्ध्व-गामी। २१‍२ - छाया का भार, नहीं सही परन्तु, प्रभाव तो है। २१‍३ - फूलों की रक्षा, काँटों से हो शील की, सादगी से हो। २१‍४ - बहुत मीठे, बोल रहे हो अब !, मात्रा सुधारो। २१‍५ - तुमसे मेरे, कर्म कटे, मुझसे, तुम्हें क्या मिला ? २१‍६ - राजा प्रजा का, वैसा पोषण करे, मूल वृक्ष का। २१‍७ - कोई देखे तो, लज्जा आती मर्यादा, टूटने से ना…! २१‍८ - आती छाती पे, जाती कमर पे सो, दौलत होती। २१‍९ - सिद्ध घृत से, महके, बिना गन्ध, दुग्ध से हम। २२० - कपूर सम, बिना राख बिखरा, सिद्धों का तन। २२१ - खुली सीप में, स्वाति की बूँद मुक्ता, बने, और न…! २२२ - दिन में शशि, विदुर सा लगता, सुधा-विहीन। २२३ - कब, पता न, मृत्यु एक सत्य है, फिर डर क्यों ? २२४ - काल घूमता, काल पै आरोप सो, क्रिया शून्य है। २२५ - बिना नयन, उप नयन किस, काम में आता ? २२६ - अन जान था, तभी मजबूरी में, मज़दूर था। २२७ - बिन देवियाँ, देव रहे, देवियाँ, बिन-देव ना…! २२८ - काला या धोला, दाग, दाग है फिर, काला तिल भी… २२९ - हीरा, हीरा है, काँच, काँच है किन्तु, ज्ञानी के लिए… २३० - पापों से बचे, आपस में भिड़े क्या, धर्म यही है ? २३१ - डाल पे पका, गिरा आम मीठा हो, गिराया खट्टा… २३२ - भार हीन हो, चारु-भाल की माँग, क्या मान करो ? २३३ - पक्षाघात तो, आधे में हो, पूरे में, सो पक्षपात… २३४ - प्रति-निधि हूँ, सन्निधि पा के तेरी, निधि माँगू क्या ? २३५ - आस्था व बोध, संयम की कृपा से, मंज़िल पाते। २३६ - स्मृति मिटाती, अब को, अब की हो, स्वाद शून्य है। २३७ - शब्द की यात्रा, प्रत्यक्ष से अन्यत्र, हमें ले जाती। २३८ - चिन्तन में तो, परालम्बन होता, योग में नहीं। २३९ - सत्य, सत्य है, असत्य, असत्य तो, किसे क्यों ढाँकू…? २४० - किसको तजूँ, किसे भजूँ सबका, साक्षी हो जाऊँ। २४१ - न पुंसक हो, मन ने पुरुष को, पछाड़ दिया… २४२ - साधना क्या है ?, पीड़ा तो पी के देखो, हल्ला न करो। २४३ - खाल मिली थी, यहीं मिट्टी में मिली, ख़ाली जाता हूँ। २४४ - जिस भाषा में, पूछा उसी में तुम, उत्तर दे दो। २४५ - कभी न हँसो, किसी पे, स्वार्थवश, कभी न रोओ। २४६ - दर्पण कभी, न रोया न हँसा, हो, ऐसा सन्यास। २४७ - ब्रह्म रन्ध्र से-, बाद, पहले श्वास, नाक से तो लो। २४८ - सामायिक में, तन कब हिलता, और क्यों देखो…? २४९ - कम से कम, स्वाध्याय (श्रवण) का वर्ग हो प्रयोग-काल। २५० - एक हूँ ठीक, गोता-खोर तुम्बी क्या, कभी चाहेगा ? २५१ - बिना विवाह, प्रवाहित हुआ क्या, धर्म-प्रवाह। २५२ - दूध पे घी है, घी से दूध न दबा, घी लघु बना। २५३ - ऊपर जाता, किसी को न दबाता, घी गुरु बना। २५४ - नाड़ हिलती, लार गिरती किन्तु, तृष्णा युवती। २५५ - तीर न छोड़ो, मत चूको अर्जुन !, तीर पाओगे। २५६ - बाँध भले ही, बाँधो, नदी बहेगी, अधो या ऊर्ध्व। २५७ - अनागत का, अर्थ, भविष्य न, पै, आगत नहीं। २५८ - तुलनीय भी, सन्तुलित तुला में, तुलता मिला। २५९ - अर्पित यानी, मुख्य, समर्पित सो, अहंका त्याग। २६० - गन्ध जिह्वा का, खाद्य न, फिर क्यों तू, सौगंध खाता ? २६१ - स्व-स्व कार्यों में, सब लग गये पै, मन न लगा । २६२ - तपस्वी बना, पर्वत सूखे पेड़, हड्डी से लगे। २६३ - अन्धकार में, अन्धा न, आँख वाला, डर सकता। २६४ - जल कण भी, अर्क तूल को, देखा !, धूल खिलाता। २६५ - जल में तैरे, स्थूल-काष्ठ भी लघु-, कंकर डूबे। २६६ - छाया सी लक्ष्मी, अनुचरा हो, यदि, उसे न देखो। २६७ - गुरु औ शिष्य, आगे-पीछे, दोनों में, अन्तर कहाँ ? २६८ - सत्य न पिटे, कोई न मिटे ऐसा, न्याय कहाँ है ? २६९ - ऊहापोह के, चक्रव्यूह में-धर्म, दुरुह हुआ। २७० - नेता की दृष्टि, निजी दोषों पे हो, या, पर गुणों पे। २७१ - गिनती नहीं, आम में मोर आयी, फल कितने ? २७२ - दु:खी जग को, तज, कैसे तो जाऊँ, मोक्ष ? सोचता। २७३ - दीप काजल, जल काई उगले, प्रसंग वश। २७४ - बोलो ! माटी के, दीप-तले अंधेरा, या रतनों के ? २७५ - बिना राग भी, जी सकते हो जैसे, निर्धूम अग्नि। २७६ - दायित्व भार, कन्धों पे आते, शक्ति, सो न सकती। २७७ - सुलझे भी हो, और औरों को क्यों तो ?, उलझा देते ? २७८ - कब बोलते ?, क्यों बोलते ? क्या बिना, बोले न रहो ? २७९ - तपो वर्धिनी, मही में ही मही है, स्वर्ग में नहीं। २८० - और तो और, गीले दुपट्टे को भी, न फटकारो। २८१ - ख़ूब बिगड़ा, तेरा उपयोग है, योगा कर ले ! २८२ - ज्ञान ज्ञेय से, बड़ा, आकाश आया, छोटी आँखों में। २८३ - पचपन में, बचपन क्यों ? पढ़ो, अपनापन। २८४ - भोगों की याद, सड़ी-गली धूप सी, जान खा जाती २८५ - सहगामी हो, सहभागी बने सो, नियम नहीं। २८६ - पद चिह्नों पै, प्रश्न चिह्न लगा सो, उत्तर क्या दूँ ( किधर जाना ?) २८७ - निश्चिन्तता में, भोगी सो जाता वहीं, योगी खो जाता। २८८ - शत्रु मित्र में, समता रखें, न कि, भक्ष्या भक्ष्य में। २८९ - आस्था झेलती, जब आपत्ति आती, ज्ञान चिल्लाता? २९० - आत्मा ग़लती, रागाग्नि से, लोनी सी, कटती नहीं। २९१ - नदी कभी भी, लौटती नहीं फिर !, तू क्यों लौटता ? २९२ - समर्पण पे, कर्त्तव्य की कमी से, सन्देह न हो। २९३ - कुण्डली मार, कंकर पत्थर पे, क्या मान बैठे ? २९४ - खुद बँधता, जो औरों को बाँधता, निस्संग हो जा। २९५ - सदुपयोग-, ज्ञान का दुर्लभ है, मद-सुलभ। २९६ - ज्ञानी हो क्यों कि, अज्ञान की पीड़ा में, प्रसन्न-जीते। २९७ - ज्ञान की प्यास, सो कहीं अज्ञान से, घृणा तो नहीं। २९८ - प्रभु-पद में, वाणी, काया के साथ मन ही भक्ति। २९९ - मूर्च्छा को कहा, परिग्रह, दाता भी, मूर्च्छित न हो। ३०० - जीवनोद्देश, जिना देश-पालन, अनुपदेश। ३०१ - द्वेष से राग, विषैला होता जैसा, शूल से फूल। ३०२ - विषय छूटे, ग्लानि मिटे, सेवा से, वात्सल्य बढ़े। ३०३ - अग्नि पिटती, लोह की संगति से, अब तो चेतो। ३०४ - सर्प ने छोड़ी, काँचली, वस्त्र छोड़े !, विष तो छोड़ो…! ३०५ - असमर्थन, विरोध सा लगता, विरोध नहीं। ३०६ - हम वस्तुत:, दो हैं, तो एक कैसे, हो सकते हैं ? ३०७ - मैं के स्थान में, हम का प्रयोग क्यों, किया जाता है ? ३०८ - मैं हट जाऊँ, किन्तु हवा मत दो, और न जले…! ३०९ - बड़ी बूँदों की, वर्षा सी बड़ी राशि, कम पचती। ३१० - जिज्ञासा यानी, प्राप्त में असन्तुष्टि, धैर्य की हार…! ३११ - बिना अति के, प्रशस्त नति करो, सो विनती है। ३१२ - सुनो तो सही, पहले सोचो नहीं, पछताओगे। ३१३ - केन्द्र को छूती, नपी, सीधी रेखाएँ, वृत्त बनाती। ३१४ - शक्ति की व्यक्ति, और व्यक्ति की मुक्ति होती रहती। ३१५ - जो है ‘सो’ थामें, बदलता, होगा ‘सो’ है में ढलता। ३१६ - चिन्तन-मुद्रा, प्रभु की नहीं क्यों कि वह दोष है। ३१७ - पथ में क्यों तो, रुको, नदी को देखो चलते चलो। ३१८ - ज्ञानी ज्ञान को, कब जानता जब, आपे में होता। ३१९ - बँटा समाज, पंथ-जाति-वाद में, धर्म बाद में ३२० - घर की बात, घर तक ही रहे।, बे-घर न हो। ३२१ - अकेला न हूँ, गुरुदेव साथ हैं, हैं आत्मसात् वे। ३२२ - निर्भय बनो, पै निर्भीक होने का, गर्व न पालो। ३२३ - अति मात्रा में, पथ्य भी कुपथ्य हो, मात्रा माँ सी हो। ३२४ - संकट से भी, धर्म-संकट और, विकट होता। ३२५ - अँधेरे में हो, किंकर्त्तव्य मूढ़ सो, कर्त्तव्य जीवी। ३२६ - धन आता दो, कूप साफ़ कर दो, नया पानी लो। ३२७ - हम से कोई, दु:खी नहीं हो, बस !, यही सेवा है। ३२८ - चालक नहीं, गाड़ी दिखती, मैं न, साड़ी दिखती। ३२९ - एक दिशा में, सूर्य उगे कि दशों-, दिशाएँ ख़ुश। ३३० - जीत सको तो, किसी का दिल जीतो, सो, वैर न हो। ३३१ - सिंह से वन, सिंह, वन से बचा, पूरक बनो। ३३२ - तैरना हो तो, तैरो हवा में, छोड़ो !, पहले मोह। ३३३ - गुरु कृपा से, बाँसुरी बना, मैं तो, ठेठ बाँस था। ३३४ - पर्याय क्या है ?, तरंग जल की सो !, नयी-नयी है। ३३५ - पुण्य का त्याग, अभी न, बुझे आग, पानी का त्याग। ३३६ - प्रेरणा तो दूँ, निर्दोष होने, रुचि, आप की होगी। ३३७ - वे चल बसे, यानी यहाँ से वहाँ, जा कर बसे। ३३८ - कहो न, सहो, सही परीक्षा यही, आपे में रहो। ३३९ - पाँचों की रक्षा, मुट्ठि में, मुट्ठि बँधी, लाखों की मानी। ३४० - केन्द्र की ओर, तरंगें लौटती सी, ज्ञान की यात्रा। ३४१ - बँधो न बाँधो, काल से व काल को, कालजयी हो। ३४२ - गुरु नम्र हो, झंझा में बड़ गिरे, बेंत ज्यों की त्यों। ३४३ - तैरो नहीं तो, डूबो कैसे, ऐसे में, निधि पाओगे ? ३४४ - मध्य रात्रि में, विभीषण आ मिला, राम, राम थे। ३४५ - व्यापक कौन ?, गुरु या गुरु वाणी, किस से पूछें ?. ३४६ - योग का क्षेत्र, अंतर्राष्ट्रीय, नहीं, अंतर्जगत् है। ३४७ - मत दिलाओ, विश्वास लौट आता, व्यवहार से।(आचरण से) ३४८ - सार्थक बोलो, व्यर्थ नहीं साधना, सो छोटी नहीं। ३४९ - मैं खड़ा नहीं, देह को खड़ा कर, देख रहा हूँ। ३५० - आँखें ना मूँदों, नाही आँख दिखाओ, सही क्या देखो? ३५१ - हाथ ना मलो, ना ही हाथ दिखाओ, हाथ मिलाओ। ३५२ - जाने केवली, इतना जानता हूँ, जानन हारा। ३५३ - ठण्डे बस्ते में, मन को रखना ही, मोक्षमार्ग है। ३५४ - आँखें देखती, हैं मन सोचता है, इसमें मैं हूँ। ३५५ - उड़ान भूली, चिड़िया सोने की तू, उठ उड़ जा। ३५६ - झूठ भी यदि, सफ़ेद हो तो सत्य, कटु क्यों न हो ? ३५७ - परिधि में ना, परिधि में हूँ हाँ हूँ, परिधि सृष्टा। ३५८ - बचो-बचाओ, पाप से पापी से ना, पुण्य कमाओ। ३५९ - हँसो-हँसाओ, हँसी किसी की नहीं, इतिहास हो। ३६० - अति संधान, अनुसंधान नहीं, संधान साधो। ३६१ - है का होना ही, द्रव्य का स्वभाव है, सो सनातन। ३६२ - सुना था सुनो, ”अर्थ की ओर न जा” डूबो आपे में। ३६३ - अपनी नहीं, आहुति अहं की दो, झाँको आपे में। ३६४ - पीछे भी देखो, पिछलग्गू न बनो, पीछे रहोगे। ३६५ - द्वेष पचाओ, इतिहास रचाओ, नेता बने हो। ३६६ - काम चलाऊ, नहीं काम का बनूँ, काम हंता भी। ३६७ - आँखों से आँखें, न मिले तो भीतरी, आँखें खुलेगी। ३६८ - ऊधमी तो है, उद्यमी आदमी सो, मिलते कहाँ ? ३६९ - तुम तो करो, हड़ताल मैं सुनूँ हर ताल को। ३७० - संग्रह कहाँ, वस्तु विनिमय में, मूर्च्छा मिटती। ३७१ - सगा हो दगा, अर्थ विनिमय में, मूर्च्छा बढ़ती। ३७२ - धुन के पक्के, सिद्धांत के पक्के हो, न हो उचक्के ।(बनो मुनक्के) ३७३ - नये सिरे से, सिर से उर से हो, वर्षादया की। ३७४ - ज़रा ना चाहूँ, अजरामर बनूँ, नज़र चाहूँ। ३७५ ‍- बिना खिलौना, कैसे किससे खेलूँ, बनूँ खिलौना। ३७६ - चिराग़ नहीं, आग जलाऊँ, ताकि, कर्म दग्ध हों। ३७७ - खेती-बाड़ी है, भारत की मर्यादा, शिक्षा साड़ी है। ३७८ - शरण लेना, शरण देना दोनों, पथ में होते। ३७९ - दादा हो रहो, दादागिरी न करो, दायित्व पालो। ३८० - हाथ तो डालो, वामी में विष को भी, सुधा दो हो तो। ३८१ - श्वेत पत्र पे, श्वेत स्याही से कुछ, लिखा सो पढ़ो। ३८२ - राज़ी ना होना, नाराज़ सा लगता, नाराज़ नहीं। ३८३ - भार तो उठा, चल न सकता तो, पैर उठेंगे। ३८४ - मन का काम, मत करो मन से, काम लो मोक्ष। ३८५ ‍- छात्र तो न हो, शोधार्थी शिक्षक व, प्रयोगधर्मी। ३८६ - दिन में शशि, शर्मिंदा हैं तारायें, घूँघट में है। ३८७ - दीक्षा ली जाती, पद दिया जाता है, सो यथायोग्य । ३८८ - उन्हें न भूलो, जिनसे बचना है, वक़्त-वक्त पे। ३८९ - सूत्र कभी भी, वासा नहीं होता सो, भाव बदलो।(भाव सु-धारो) ३९० - ध्यान काल में, ज्ञान का श्रम कहाँ, पूरा विश्राम। ३९१ - खान-पान हो, संस्कारित शिक्षा से, खान-दान हो। ३९२ - ऐसा संकेत, शब्दों से भी अधिक, हो तलस्पर्शी। ३९३ - हम अधिक, पढ़े-लिखे हैं कम, समझदार ३९४ - मेरी दो आँखें मेरी ओर हजार सतर्क होऊँ। ३९५ - मुक़द्दर है, उतनी ही चद्दर, पैर फैलाओ। ३९६ - घुटने टेक, और घुटने दो न, घोंटते जाओ। ३९७ - अशुद्धि मिटे ,बुद्धि की वृद्धि न हो,विशुद्धि बढ़े। ३९८ - गोबर डालो, मिट्टी में सोना पालो, यूरिया राख। ३९९ - हमसे उन्हें, पाप बंध नहीं हो, यही सेवा है। ४०० - प्राणायाम से, श्वास का मात्र न हो, प्राण दस है। ४०१ - देख रहा हूँ, देख न पा रही है, वे आँखें मुझे। ४०२ - दुस्संगति से, बचो सत् संगति में, रहो न रहो। ४०३ - दुर्ध्यान से तो, दूर रहो सध्यान, करो न करो। ४०४ - कर्रा हो भले, टर्रा न हो तो पक्का, पक सकोगे। ४०५ - अंधाधुँध यूँ, महाबंध न करो, अंधों में अंधों। ४०६ - कमी निकालो, हम भी हम होंगे, कहाँ न कमी। ४०७ - लज्जा आती है, पलकों को बना ले, घूँघट में जा। ४०८ - कड़वी दवा, उसे रुचति जिसे, आरोग्य पाना। ४०९ - स्व आश्रित हूँ , शासन प्रशासन, स्वशासित हैं। ४१० - सागर शांत, मछली अशांत क्यों ? स्वाश्रित हो जा। ४११ - कोठिया नहीं, छप्पर फाड़ देती, पक्की आस्था हो। ४१२ - धनी से नहीं, निर्धनी निर्धनी से, मिले सुखी हो। ४१३ - दण्डशास्त्र क्यों ? जैसा प्रभू ने देखा, जो होना हुआ। ४१४ - ईर्ष्या क्यों करो. ईर्ष्या तो बड़ों से हो, छोटे क्यों बनो ? ४१५ - टूट चुका है, बिखरा भर नहीं, कभी जुड़ा था। ४१६ - तपस्या नहीं, पैरों की पूजा देख, आँखें रो रही। ४१७ - भिन्न क्या जुड़ा ? अभिन्न कभी टूटा, कभी सोचा भी ? ४१८ - कौन किससे ? कम है मत कहो, मैं क्या कम हूँ ? ४१९ - त्याग का त्याग, अभी न बुझे आग, पानी का त्याग। ४२० - प्रेरणा तो दूँ , निर्दोष होने बचो, दोष से आप। ४२१ - यात्रा वृत्तांत, ‘‍’लिख रहा हूँ वो भी”, बिन लेखनी। ४२२ - मन की बात ”सुनना नहीं होता” मोक्षमार्ग में। ४२३ - ठंडे बस्ते में ”मन को रखो फिर” आत्मा में डूबो।(आत्मा से बोलो) ४२४ - खाली हाथ ले ”आया था जाना भी है” खाली हाथ ले। ४२५ - आँखें देखती ”मन याद करता” दोनों में मैं हूँ। ४२६ - दिख रहा जो ‘दृष्टा नहीं दृष्टा सो” दिखता नहीं। ४२७ - आग से बचा ‘धूंवा से जला (व्रती) सा, तू” मद से घिरा। ४२८ - चूल को देखूँ ‘मूलको बंदू भूल” आमूल चूल। ४२९ - अंधी दौड़ में ”आँख वाले हो क्यों तो” भाग लो सोचो। ४३० - महाकाव्य भी ”स्वर्णाभरण सम” निर्दोष न हो। ४३१ - पैरों में काँटे ”गड़े आँखों में फूल” आँखें क्यों चली। ४३२ - चक्री भी लौटा ”समवशरण से ” कारण मोह। ४३३ - दर्शन से ना ”ज्ञान से आज आस्था” भय भीत है। ४३४ - एकता में ही ”अनेकांत फले सो” एकांत टले। ४३५ - पीठ से मैत्री ”पेट ने की तब से” जीभ दुखी है। ४३६ - सूर्य उगा सो ”सब को दिखता क्यों” आँखे तो खोलो। ४३७ - अंधे बहरे ”मूक क्या बिना शब्द” शिक्षा ना पाते। ४३८ - पद यात्री हो ”पद की इच्छा बिन” पथ पे चलूँ। ४३९ - सही चिंतक ”अशोक जड़ सम” सखोल जाता। ४४० - बिन्दु की रक्षा, सिन्धु में नहीं बिन्दु, बिन्दु से मिले। ४४१ - भोग के पीछे, भोग चल रहा है, योगी है मौन। ४४२ - श्वेत पे काला, या काले पे श्वेत हो, मंगल कौन? ४४३ - थोपी योजना, पूर्ण होने से पूर्व, खण्डहर सी। ४४४ - हिन्दुस्थान में, सफल फिसल के, फसल होते। ४४५ - शब्दों में अर्थ, यदि भरा किससे, कब क्यों बोलो। ४४६ - व्यंजन छोडूँ, गूंग है पढूँ है सो, स्वर में सुनूँ। ४४७ - कटु प्रयोग, उसे रूचता जिसे, आरोग्य पाना। ४४८ - एक से नहीं, एकता से काम लो, काम कम हो। ४४९ - बड़ों छोटो पे, वात्सल्य विनय से, एकता पाये। ४५० - शब्दों में अर्थ, है या आत्मा में इसे, कौन जानता। ४५१ - असत्य बचे, बाधा न सत्य कभी, पिटे न बस। ४५२ - किसे मैं कहूँ, मुझे मैं नहीं मिला, तुम्हें क्या (मैं) मिला। ४५३ - मण्डूक बनो, कूप मण्डूक नहीं, नहीं डूबोगे। ४५४ - किस मूढ़ में, मोड़ पे खड़ा सही, मोड़ा मुड़ जा। ४५५ - बहुत सोचो, कब करो ना सोचे, करो लुटोगे। ४५६ - मरघट पे जमघट है शव, कहता लौटूँ। ४५७ - ज्ञानी बने हो, जब बोलो अपना, स्वाद छूटता। ४५८ - कोहरा को ना, को रहा कोहरे में, ढली मोह है। ४५९ - जल में नाव, कोई चलाता किंतु, रेत में मित्रों। ४६० - रोते को देख, रोते तो कभी और, रोना होता है। ४६१ - तुम्बी तैरती, तारती औरों को भी, गीली क्या सूखी? ४६२ - भली नासिका, तू क्यों कर फूलती, मान हानि में। ४६३ - कैदी हूँ, देह, जेल में जेलर ना, तो भी वहीं हूँ। ४६४ - हाथ कंगन, बिना बोले रहे, दो, बर्तन क्यों ना? ४६५ - बंदर कूंदे, अचूक और उसे, अस्थिर कहो। ४६६ - सहजता औ, प्रतिकार का भाव, बेमेल रहे। ४६७ - पर की पीड़ा, अपनी करुणा की, परीक्षा लेती। ४६८ - परिचित भी, अपरिचित लगे, स्वस्थ ज्ञान को। ४६९ - पक्की नींव है, घर कच्चा है छांव, घनी है बस। ४७० - कर्त्तव्य मान, ऋण रणांगन को, पीठ नहीं दो। ४७१ - पगडंडी में, डंडे पड़ते तो क्या, राजमार्ग में? ४७२ - प्रतिशोध में, बोध अंधा हो जाता, शोध तो दूर। ४७३ - मैं क्या जानता, क्या क्या न जानता सो, गुरु जी जाने। ४७४ - धनिक बनो, अधिक वैधानिक, पहले बनो। ४७५ - दर्पण कभी, न रोया श्रद्धा कम, क्यों रोओ हँसो। ४७६ - है का होना ही, द्रव्य का प्रवास है, सो सनातन। ४७७ - सन्निधिता क्यों, प्रतिनिधि हूँ फिर, क्या निधि माँगू। ४७८ - सब अपने, कार्यों में लग गये, मन न लगा। ४७९ - बाहर आते, टेढ़ी चाल सर्प की, बिल में सीधी | ४८० - मनोनुकूल , आज्ञा दे दूँ कैसे दूँ, बँधा विधि से | ४८१ - उत्साह बढ़े, उत्सुकता भगे तो, अगाध धैर्य |(गाम्भीर्य बढ़े) ४८२ - दोनों ना चाहो, एक दूसरे को या, दोनों में एक |(कोई भी एक) ४८३ - पुरुष भोक्ता, नारी भोक्त्र ना मुक्ति, दोनों से परे | ४८४ - कचरा डालो, अधकचरा नहीं, खाद तो डालो | ४८५ - कचरा बनूँ, अधकचरा नहीं, खाद तो बनूँ | ४८६ - बाहर टेढ़ा, बिल में सीधा होता, भीतर जाओ | ४८७ - वैधानिक तो, तनिक बनो फिर, अधिक धनी | ४८८ - ऊधम नहीं, उद्यम करो बनो, दमी आदमी | ४८९ - आज सहारा, हाय को है हायकू कवि के लिये | ४९० - ध्वनि न देओ, गति / मति धीमी हो, निजी, और औरों की | ४९१ - तिल की ओट ,पहाड़ छुपा ज्ञान , ज्ञेय से बड़ा | ४९२ - एकजुट हो, एक से नहीं जुड़ो, बेजोड़ जोड़ो | ४९३ - डूबना ध्यान, तैरना सामायिक, डूबो तो जानो | ४९४ - सामायिक में, करना कुछ नहीं, शांत बैठना | ४९५ - दायित्व भार, कंधो पर आते ही, शक्ति आ जाती | ४९६ - दवा तो दवा, कटु या मीठी जब, आरोग्य पान | ४९७ - ज्ञान सदृश, आस्था भी भीती से सो, कँपती नहीं | ४९८ - कब और क्यों, जहाँ से निकला सो, स्मृति में लाओ | ४९९ - ममता से भी, समता की क्षमता, अमिता मानी | ५०० - लज्जा न बेचो "शील का पालन सो" ढीला ढीला न | ५०१ - तरण नहीं "वितरण बिना हो" चिरमरण | (भूयोमरण) ५०२ - योग में देखा, कोलाहल मन का, नींद ले रहा | ५०३ - मैं तो आत्मा हूँ, औरों से आत्मीयता, मेरी श्वास है। ५०४ - दो - दो पंख हो, राष्ट्रीय पक्षी बनो, पक्षपात धिक् | ५०५ - जिनसे मेरे, कर्म धुले, टले वो, शत्रु ही कैसे | ५०६ - जिनसे मेरे, कर्म बंधे, फले वो, मित्र ही कैसे | ५०७ - जो जवान था, बूढ़ा होकर वह, पूरा हो गया | ५०८ - दर्प देखने, दर्पण देखना क्या, बुद्धिमानी है ? ५०९ - उपयोग का, सही उपयोग हो, सही बात है | ५१० - विष का पान, समता सहित भी, अमृत बने | ५११ - उनके तीर, न तो डूबो अर्जुन, पाओ न तीर | ५१२ - मुझे सँभाला, उन्हें दवा दुआ दूँ, ऋण चुकाऊँ | ५१३ - मोह से घिरे, आचरण से गिरे, पर से जले | ५१४ - निमित्त मिले, पित्त उछले भले, चित्त शांत हो (मस्त हो / स्वस्थ हो ) | ५१५ - आप या हम, कर्त्तव्य निष्ठ बने, हम ही बने। ५१६ - मुझे जिताया, वे जीते रहें और, मैं सेवा करूँ। ५१७ - व्यंग का अर्थ, सकलांग नहीं पै, विकलांग हो ५१८ - क्यों कि आप में, सब नहीं आते तो,हम में सब। ५१९ - जीना तो चाहूँ, जीना चढ़ने हेतू, यूँ ही जीना क्या ? ५२० - खुली तो रखो, आँखें परन्तु बचो, लेन देन से। ५२१ - ध्यान में यत्न, योग सहज होता, मैं उपयोगी। ५२२ - बिना प्रमाद, रसन क्रिया सम, पथ पे चलूँ। ५२३-रोटी न मांगो ,रोटी बनाना सीखो ,खिलाके खाओ | ५२४ - बीज वही है, बोयें फले अनंत, अन्यथा विष ५२५ - भावुक नहीं, अभिभावक भाषा, भारती बोलें ५२६ - प्रश्न तो मांजो ,उत्तर कैसे देदूं , गहरे में हूँ | ५२७ - प्रश्न न सहे , सो विद्यादानी कैसे , संयम रखो | ५२८ - अच्छा लगता , तुम कुछ भी कहो , पागलपन | ५२९ - भले दूर हूँ , निकट भेज पाता , अपनापन | ५३०- प्रश्न चिह्न था, चरण चिह्न मिले, वतन वहाँ। ५३१ - मन तो रोको , चल फिर न सको, बोलो न बको ५३२ - किसी कोने में, कचरा नहीं रहे, मन में देखो (झाकों) ५३३ - सिर पे पल्ला, मर्यादा नहीं टूटे, पनघट पे ५३४ - सतर्क रहो , उछलकूद रहे (नहीं) जमघट में ५३५ - पानी तो भरो, दलदल नहीं हो, पनघट पे ५३६ - ताना ना बनो -बाना तो बनो सुनो /सनो-सबके बनो ५३७ - भविष्य जानो /आगे का जानो -इतिहास पढ़ो तो- अब में जियो ५३८ - चाँद पे नहीं, ऊँचाई पे पहुँचो, लौट न आना ५३९ - अधिक नहीं, वैधानिक तो बनो, फिर धनिक । ५४०- आज्ञा देने से, आज्ञा का पालना सो, बहुत सीधा | ५४१- कैदी कभी भी, भाग सकता पर, क्या जेलर भी । ५४२- गंध खाने में, न आती फिर क्यों तू, सौगन्ध खाता | ५४३- जिससे तुम्हें. घृणा होती उससे, अनुराग क्यों । ५४४- नाड हिलती, लार गिर रही पै, ओरी तृष्णा तू | ५४५- पक्षपात तो, पूरे पे हो आधे में, पक्षाघात हो । ५४६- परिग्रह को, मूर्छा कहा दाता भी, मूर्च्छित न हो । ५४७- दुसंगति से, बच सत्संगति में, आ या नहीं आ | ५४८- - भक्ष्या भक्ष्य में, नहीं समता रखो, शत्रु मित्र में | ५४९- पर्वत बना , तपस्वी सूखे पेड़, हड्डी से लगे । ५५०- मन का काम , नहीं मन से काम, लो बेड़ा पार | ५५१- मेरा क्या दोष, प्रभु ने जैसा देखा, वैसा करता । ५५२- लोह के वश , अग्नि की पिटाई हो, अब तो चेतो। ५५३-शब्दों में अर्थ , भरा या आत्मा में सो, सोचता कौन । ५५४- सुनो तो सही, पहले यही गुनो, सोचो बाद में । ५५५- सुनो तो सही. सोचना गौण करो, बाद में गुनो। ५५६ . गुणी बनना, सौ गुणी बनाना है, मैं को मना लो। ५५७ . शिक्षा से जुड़ो, नई नीति से नहीं , राष्ट्रीय बनों ५५८ स्वयं को छोड़, तुम्हें क्यों देखूँ तुमऔरों में डूबे।। ५५९ जब पूर्व हूँ , और औरो की कोर, क्यों कर चाहूँ। ५६० . भुजिया नहीं, डुबकरियाँ चाहूँ, गरमी मिटें ५६१ . संवेदना हो, पर के प्रति पर, सहूँ वेदना ५६२ दवा तो दवा, दुआ भी नहीं चाहूँ, हे स्वयंभुवा। ५६३ गोद ले लो या, गोद में ले लो कैसे, निगोद जाऊँ। ५६४ मतदान तो, शत प्रतिशत हो, हाँ में या ना में। ५६५ . निर्बल बना, चिंतन का जीवन, मंत्र योग से। ५६६. गुरु अंक में, अंक मिले धुलेंगे, शेष कलंक ५६७ - मेरा यहाँ क्या, आशीष फल रहा, शीर्ष जा बैठूँ | ५६८ - आना पुराणा, क्यों बॅंधा नहीं बना , बंदा न बना। ५६९ · ऐच्छिक प्रश्न, अंक बढ़ाते मुख्य, अंक दिलाते ५७० · मौन से अच्छा, सार्थक बोलो/बोलो, कटु हितैषी | ५७१ · पक्ष ने कहा, विपक्ष से पंख लो, हम तो उड़े | ५७२ · विपक्ष बोला, विशेष पक्ष तो हो, सामान्य बनो | ५७३ · आपस में तो, आप सम में देखो, पाप ताप क्यों? ५७४ · मूक साधना, बहरे बनकर, करते चलो | ५७५ · पथ कितना? कर्तव्य की परिधि, व्यास जितना | ५७६ गुरु अंक ने, अंक दिए धुलेंगे, सारे कलंक । ५७७ - क्षायिक यानि,जो हुआ सो अमिट ,(पूरा) पूर्ण न भी हो। ५७८ - वर दे सीते, देवर को वह भी, बराबर हो। ५७९ - मोक्ष मार्ग सो, जटिल तो है किन्तु, कुटिल नहीं। ५८० - यही है हित, अहित न हो कभी,परापर का। ५८१ - मूलगुण तो, इन्र्दियजय न कि,मनोविजय! ५८२ - मौन में डूबो, बहरे बनकर, साधना साधो ५८३ - विदेशी शिक्षा, ढो रहें है तभी तो , हम ढोर है ५८४ - देखुं न दिखुं, दीखता न देखता , कैसा रहस्य ५८५ - आगे तो बढो, इतिहास तो पढो, जीना तो चढ़ो ५८६ - ज्ञानी बने वे, अज्ञान की पीड़ा में, प्रसन्नचित्त ५८७ - उन्मार्ग छोड़ो, बीच में आओ मत , भद्रता भजो ५८८ - अति की शंसा, नहीं गुणानुशंसा, गुरु से सीखी ५८९.- विष का पान/ समता सहित हो/ पियूष पीओ। ५९०. - शत्रु मित्र में/ समता हो संयम/ भक्षाभक्ष में। ५९१. - कैंचली छोड़ी/ सर्प ने वस्त्र छोड़े/ छोड़े न विष। ५९२. - हमसे उन्हें/ थोड़ा भी कष्ट न हो/ यही सेवा है। ५९३. - घटबढ़ में/ विघटन नहीं हो/ घट- घट हो। ५९४. - दूर भले हूँ/ निकट भेज देता/ अपनापन। ५९५. - इसी में हित/ अहित मत करो/ परापर का। ५९६ . - संग्रह नहीं, वितरण हो वही, लोकतंत्र है । ५९७ -क्या देख रहे, आगे पीछे शून्य हैं, हम न तुम
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  22. अब ग्रन्थकार मोक्ष का उपाय बतलाते हैं: सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥१॥ https://vidyasagar.guru/musicbox/play/462-audio/ अर्थ - सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिले हुए मोक्ष का मार्ग हैं। English - Right faith, right knowledge & right conduct (together) constitute the path to liberation. विशेषार्थ - इस सूत्र का पहला शब्द 'सम्यक् का अर्थ है - प्रशंसा। यह शब्द प्रत्येक के साथ लगाना चाहिए। यानि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र। किन्तु ये तीनों अलग-अलग मोक्ष के मार्ग नहीं हैं, बल्कि तीनों का मेल ही मोक्ष का मार्ग है। इसी से सूत्र में एकवाची ‘मार्गः' शब्द रखा है। पदार्थों के सच्चे स्वरूप के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं; पदार्थों के सच्चे स्वरूप के जानने को सम्यग्ज्ञान कहते हैं और जिन कामों के करने से कर्मबन्ध होता है, उन कामों के न करने को सम्यक्चारित्र कहते हैं। शंका - सूत्र में ज्ञान को पहले रखना चाहिए, क्योंकि ज्ञान-पूर्वक ही पदार्थों का श्रद्धान होता है। तथा दर्शन की अपेक्षा ज्ञान में थोड़े अक्षर हैं। इसलिए भी अल्प अक्षर वाले ज्ञान को दर्शन से पहले कहना चाहिए? समाधान - जैसे मेघ-पटल के हटते ही सूर्य का प्रताप और प्रकाश दोनों एक साथ प्रकट होते हैं, वैसे ही दर्शनमोहनीय कर्म के उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षय से जिस समय आत्मा में सम्यग्दर्शन प्रकट होता है, उसी समय आत्मा के कुमति और कुश्रुत ज्ञान मिटकर मतिज्ञान और श्रुतज्ञान रूप होते हैं। अतः सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान में काल भेद नहीं है, दोनों एक साथ होते हैं। यद्यपि ‘ज्ञान' अल्प अक्षर वाला है, किन्तु अल्प अक्षर वाले से जो पूज्य होता है, वही प्रधान होता है। दर्शन और ज्ञान में दर्शन ही पूज्य है; क्योंकि सम्यग्दर्शन के होने पर ही मिथ्याज्ञान सम्यग्ज्ञान हो जाता है। अतः पूज्य होने से सम्यग्दर्शन को पहले कहा है, उसके बाद ज्ञान को रखा है। तथा सम्यग्ज्ञानपूर्वक ही सम्यक्चारित्र होता है। इसी से चारित्र को अन्त में रखा है।
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  23. शिक्षा से बढ़कर कोई वरदान नही है विद्या से बढ़कर कोई दान नही है, सिर्फ गुरुवर का आशीर्वाद होना चाहिए, क्यूकी उससे बढ़कर और कोई सम्मान।।
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  24. गुरु ने अहम को त्यागना बताया, हमने भी अब संतोष को है अपनाया, जबसे गुरुवर आपका सानिध्य है पाया, जीवन की पाठशाला में हर बार प्रथम आया।।
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  25. मेरे गुरु ने मुझे समझाया हर बार है की जो मुश्किलों का अम्बार है, यही तो होसलों का मीनार है, ऐसे गुरु को बारम्बार नमस्कार है।।
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  26. जिंदगी की हर आरज़ू, गुरु के आशीष से ही पूरी हो, जब साथ मिले मेरे गुरु का, तो न कोई खुशी अधूरी हो.
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  27. लक्ष्य निर्धारित कर सकें आपने हमें इस योग्य बनाया, जब भी फंसे थे मुश्किल में, आपका दिया ज्ञान ही काम आया।।
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  28. गुरु की चमक सूर्य -सी, ज्ञान अम्बर-सा विस्तार, गुरुवर का सान्निध्य ही, हम सबका है उपहार।
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  29. नन्ही सी कलियों को, आपने फूलों सा महका दिया, आपके विश्वास ने गुरुवर, हमे चाँद सा चमका दिया।।
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  30. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी, रवीन्द्र जैन
    सिद्ध भक्ति भक्ति पाठ : पूज्यपाद भक्तियाँ (संस्कृत) का आचार्य श्री द्वारा पद्यानुवाद गायन : रवीन्द्र जैन
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  31. लेखनी लिखती है कि गुरु को कागजों पर नहीं हृदय की दीवार पर अंकित करना है, गुरु की स्तुति अधरों से नहीं अंदर से करना है; क्योंकि गुरु जो कर सकते सारी दुनिया मिलकर भी कर सकती नहीं, गुरु जो दे सकते सारी दुनिया मिलकर भी दे सकती नहीं, गुरु देते हैं अद्रश्य जो जन जन को दिखाई देता नहीं। धन की सुरक्षा करना जानते हैं सब परिवार की सुरक्षा करना जानते हैं सब शरीर की सुरक्षा करना जानते हैं सब चल संपत्ति को अचल संपत्ति बनाना जानते हैं सब, किंतु मन को स्थिर कैसे करना चेतन को कर्मों से सुरक्षित कैसे करना नहीं जानते अज्ञ प्राणी। तब गुरु ही स्वात्म सुरक्षा का उद्घाटित करते हैं रहस्य, लक्ष्य विहीन को दिखलाते हैं जीवन का परम लक्ष्य। पहले मंजिल की महिमा समझाते हैं उसे पाने का उपाय बतलाते हैं फिर मार्ग में सहायक बनकर उसे मंजिल तक ले जाते हैं। बिना कुछ लिये सब कुछ दे दें बिना कुछ कहे सब कुछ कह दें क्या है कोई ऐसा नि:स्वार्थी जगत् में ? क्या है कोई ऐसा परमार्थी जगत् में ? शिष्य का हृदय बोलता है - हाँ, श्रीविद्यासागरजी गुरुदेव हैं जगत् में जो रहते हैं अपने में पर विराजते हैं जन-जन के मन में। आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी
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  32. द्रव्य कर्म, भाव कर्म एवं नौकर्म ये तीन प्रकार के कर्म होते है। जीव के राग-द्वेष आदि परिणाम भाव कर्म कहलाते हैं। ज्ञानावरण आदि पुद्गल कर्म, द्रव्य कर्म कहलाते है एवं शरीरादि नौकर्म कहलाते है। नौकर्म के बिना कर्म कभी फल नहीं दे सकते। जीव के परिणाम और कर्म इन दोंनो के बीच की स्थिति है नौकर्म की। इसलिए नौकर्म पर हर्ष-विषाद नहीं करना चाहिए। नौकर्म पर हर्ष-विषाद वही करते है जो कर्म सिद्धांत को नहीं जानते। इसी बात को समझाते हुए आचार्य श्री जी ने कहा कि- नौ कर्म तो पोस्टमेन के समान है, जैसे किसी ने खत में बहुत बुरा एवं झूठा समाचार लिखकर भेजा पोस्टमेन ने वह खत हमारे घर आकर दिया, समाचार विदित होते ही क्या आप पोस्टमेन पर गुस्सा करते हैं या उस पर चिल्लाते हैं कि तूने इस प्रकार का झूठा समाचार लाकर क्यों दिया। तो आप कहेंगे नहीं मुझे पोस्टमेन पर गुस्सा नहीं आता क्योंकि पोस्टमेन तो मात्र निमित्त है बल्कि उस पर गुस्सा आता है। जिसने खत लिखा है उसी प्रकार से हमें अपने किए कर्मों पर क्रोध आना चाहिए नौकर्म तो पोस्टमेन के समान बीच की स्थिति वाला है। उस पर हर्ष-विषाद करना व्यर्थ है।
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  33. आपने ही मेरे सोये भाग्य को जगाया, पर से दृष्टि हटाकर आत्मा में दृष्टि को लगाया, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? जितना- जितना विशुद्ध भाव बढ़ता जा रहा है, उतना-उतना कर्मों का सैलाब उदय में आता जा रहा है। जब से दृष्टि निज में जागी, कर्म भी जाग गये हैं। अब तो आप ही कर्म को सदा के लिए सुला सकते हो, और मुझे अपने साथ सिद्धालय में ले जा सकते हो। हे भावी सिद्धालयवासी! हे मेरे हृदयालयवासी! "जिसकी सौम्यछवि दर्शन कर, आतम दर्शन होता हैं। सदियों से जो भाग्य सो रहा, तत्क्षण जागृत होता है।। पशु भी परमेश्वर पथ पाता, मानव की क्या बात कहे। भाव सहित जो गुरु को वंदे, सिद्धदशा तक साथ रहे।।” आर्यिका पूर्णमती माताजी
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  34. जब घड़ी आयी दीक्षा की, प्रकृति सारी हर्षायी। हर्षित हो नभ से मंद सुगंधित वर्षा की। वह दिन तीन के पीछे शून्य, अर्थात् तीस जून था। त्रय रत्न के सिवा, आपका कोई लक्ष्य न था। पाकर रत्नत्रय का महल, हो गया जीवन के प्रश्नों का हल। सदा स्वात्म समाधि में स्थित, जयवंतों धरा पर... मेरे गुरू विद्यासागर ! “तीस जून उन्नीस सौ अड़सठ, गुरुवर से दीक्षा पाई। ज्यों ही वस्त्र तजे गुरुवर ने, नभ से जलधारा आई।। दीक्षा उत्सव देव मनाये, सारी प्रकृति मुस्कायी। सदा रहो जयवंत धरा पर, विद्यासागर मुनिरायी ।।'' आर्यिका पूर्णमती माताजी
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  35. पर की पीड़ा, अपनी करुणा की, परीक्षा लेती। हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
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  36. संस्तुति 2 - भक्ति/स्तुति विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार इधर-उधर की पंचायत में मत रमो किन्तु पंच परमेष्ठी की भक्ति में लीन हो जाओ, वह भक्ति तुम्हारी मुक्ति का कारण बनेगी। स्तुति करने का प्रयोजन मात्र रागात्मक क्षणों की प्राप्ति नहीं है बल्कि चित्त में शांति-वैराग्य और संयम में वृद्धि भी होनी चाहिए। भक्ति या गुणानुवाद आन्तरिक भावों के साथ होना चाहिए-वह मात्र दिखावा या प्रदर्शन नहीं हो । हे रसना! तूने आज तक राग भरे गीत-संगीत में ही रस लिया है अब उसमें रस ना ले। अध्यात्म भरी भक्ति वीतराग विज्ञान में रस ले। भक्ति, मुक्ति के लिये कारण है और भुक्ति संसार के लिये। पहले दासोऽहं फिर उदासोऽहं बाद में सोऽहं और अन्त में अहं, भक्त से भगवान् बनने का क्रम यही है। भक्ति कभी भी हेय बुद्धि से नहीं होती बल्कि उसे तो उपादेय बुद्धि से गद्गद् होकर करनी चाहिए। भक्ति तो ठीक है किन्तु अन्धभक्ति ठीक नहीं। बंधुओ! भक्ति को विवेक की डोर से बाँधे रखना। सच्चे दिगम्बर गुरुओं की हमें मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करनी चाहिए, साथ ही इस जिह्वा को यह शिक्षा देनी चाहिए कि हे! रसना जब तक तुझमें शक्ति है तब तक गुरु की महिमा गाती रह, तेरे लिये ये सौभाग्य के क्षण हैं। हम सभी महान् सौभाग्यशाली हैं जो दिगम्बर गुरुओं के दर्शन मिल रहे हैं, तरस गये वह बनारसीदास, भूधरदास, द्यानतराय जैसे विद्वान जिन्हें अपने जीवन काल में दर्शन नहीं मिल पाये। उनके हृदय की पीड़ा भजनों की पंक्तियों में झलकती है, कई जगह लिखा मिलता है - "कब मिल हैं वे गुरुवर उपकारी." कितनी आस्था-भक्ति थी गुरुओं के प्रति। पंच परमेष्ठी की भक्ति एवं ध्यान से विशुद्धि बढ़ेगी, संक्लेश घटेगा, वात्सल्य बढ़ेगा। हम भाग्यवान् हैं कि जिनवाणी आज उपलब्ध है, उस मातेश्वरी के माध्यम से हम कम से कम स्व-पर को समझकर पंच परमेष्ठी की स्तुति भक्ति तो कर सकते हैं। जिनवाणी की स्तुति करने से जिनदेव की भी स्तुति हो जाती है क्योंकि भगवान् तीर्थकर द्वारा ही प्रतिपादित सारा तत्व जिनवाणी में है। भक्ति जब पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है तब वाणी मूक हो जाती है कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है, ऐसी स्थिति भक्ति भावना के प्रवाह में ही होती है। इतिहास के प्रसंग और प्रथमानुयोग में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे स्पष्ट है कि अंतत: धर्मात्मा की ही विजय होती है। जिसने भी पवित्र मन से भगवान् की पूजा भक्ति की है उसकी रक्षा देवताओं ने भी की है। महान् दार्शनिक होते हुए भी आचार्य समन्तभद्र महाराज स्तुति के क्षेत्र में पीछे नहीं रहे। चौबीस तीर्थकरों की स्तुति ‘स्वयंभूस्तोत्र' लिखने के बाद भी उन्होंने स्तुति के रूप में ‘स्तुति विद्या' लिखी। धन्य था उनका जीवन और अद्भुत थी उनकी भगवद्भक्ति। जैसे हो पृष्ठों के बीच गोंद लगाने पर दोनों पृष्ठ एक हो जाते हैं ठीक उसी प्रकार भक्त और भगवान् के बीच भक्तिरूपी गोंद लगाने से दोनों एकमेक हो जाते हैं। आचार्यों ने उपदेश दिया है कि हे! संसारी प्राणी तू क्यों यहाँ वहाँ की बातों में उलझ रहा है। पंच परमेष्ठी की भक्ति कर, भगवान् का गुणगान कर। भक्ति करने से चित्त को शान्ति मिलेगी, अहंकार घटेगा, नर पर्याय सार्थक होगी। भगवद्भक्त बीहड़ घनघोर जंगल में भी रास्ता पा लेता है और भगवान् को भूल जाने वाला साफ सुथरे रास्ते पर भी भटक जाता है। स्तुत्य प्रत्यक्ष हो या न हो स्तुति करने वाला तो गुणों का स्मरण कर पवित्र हो जाता है। प्रभु बनकर नहीं किन्तु लघु बनकर ही प्रभु की भक्ति की जा सकती है। जिस प्रकार सीपी के योग से तुच्छ जल कण भी महान् मुताफल बन जाते हैं ठीक उसी प्रकार भगवान् के प्रति किया गया अल्प स्तवन भी महत् फल प्रदान करता है। नाल से जुड़े कमल का जिस प्रकार सूर्य की तेज किरणें भी कुछ बिगाड़ नहीं कर पाती ठीक उसी प्रकार भगवद्भक्ति से जुड़े रहने पर भक्त का संसार में कुछ भी बिगाड़ नहीं होता।
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