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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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  1. ‼आहारचर्या*‼️ *पूर्णांयु जबलपुर* _दिनाँक :०१/१०/२०२१_ *आगम की पर्याय,महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* के आहारचर्या कराने का सौभाग्य _*श्रीमती चम्मी देवी जी जैन, श्री नीरज जी जैन (ट्रस्टी संरक्षणी सभा)-श्रीमती मोनी जी जैन, श्री सुजीत जी जैन "भाऊ"-श्रीमती सीमा जी जैन, श्री सतेन्द्र जी जैन " भाऊ" (पलक क्रियेशन) जबलपुर (म.प्र.)*_ एवं वालो को एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ है। इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* 🌹🌹🌹🌹 *_सूचना प्रदाता-:ब्र.विवेक भैया जी बंडा_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा
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  2. बहुत ही अच्छा कृत प्रशंशनीय और अनुकरणीय
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  3. अहिंसा की आवश्यकता जैसे पापों में सबसे मुख्य हिंसा है वैसे ही धर्माचरणों में सबसे पहला नम्बर अहिंसा का है। जिस किसी के दिल में हिंसा से परहेज या अहिंसा भाव नहीं है तो समझ लेना चाहिये कि वहां सदाचार का नामोनिशान भी नहीं है। अहिंसा का सीधा सा अर्थ है, किसी भी प्राणी का वध नहीं करना। जीना सबको प्रिय है, मरना कोई नहीं चाहता। अतः अहिंसा कम से कम अपने आपके लिये सबको अभीष्ट है। जो खुद अहिंसा को पसन्द करे परन्तु औरों के लिये हिंसामय प्रयोग करे उसे प्रकृति मंजूर नहीं करती, रूष्ट ही रहती है। जिससे कि विप्लव मचाता है जैसा कि प्रायः आजकल देखने में आ रहा है। आज का अधिकांश मानव स्वार्थ के वश होकर दूसरों को बरबाद करने की ही सोचता रहता है। किसी ने तो टेलीफोन का उद्घाटन करके हलकारे की रोजी पर कुठाराघात किया है तो कोई खरादि के पुतलों द्वारा लिखा पढ़ी का काम लेना बताकर क्लर्क लोगों की आजीविका का मूलोच्छेद करने जा रहा है। किसी ने कूकर चूल्हा खड़ा करके अपने आप खाना बनाना बताकर पूंजीवादियों की पीठ ठोकते हुये बिचारे खाना बनाने वाले रसोईदारों का बेकार बनाने पर कमर कसली है। इसी प्रकार रोज एक से एक नई तजबीज खड़ी की जा रही है। जिनसे गरीबों के धन्धे छिनते जा रहे है और धनवान लोग फैशनबाज आराम-तलब एवं लापरवाह होते जा रहे हैं। बन्धुओं ! जरा आप ही सोचकर कहिये कि उपर्युक्त बातों का और फिर हाल ही क्या होता है? किस लिए ऐसा किया जाता है या होता है? क्या काम करने वाले लोगों की कमी है? किन्तु नहीं। क्योंकि किसी प्रकार के काम करने वाले की बाबत आप आवश्यकता निकाल कर देखिये कि आपके पास एक नहीं बल्कि पचासों प्रार्थना-पत्र आ पहुंचेंगे कि आपके यहां अमुक कार्य करने मैं आ रहा हूं, सिर्फ आपकी आज्ञा आ जानी चाहिये इत्यादि। हां, यह जरूर कहा जा, सकता है कि नये-नये आविष्कारों को जन्म दिये बिना विज्ञान की तरक्की नहीं हो सकती, परन्तु वह विज्ञान भी किस काम का जो समाज को भूखों मारने का कारण बन कर घातक सिद्ध हो रहा हो। वह जंगली जीवन भी अच्छा जहां कि कम से कम और कुछ भी नहीं तो फल फूल तो खाने को मिल जावें तथा वृक्षों के पत्ते तन ढांकने को मिल जावें। वह महलों का निवास किस काम का जहां पर चकाचौंध में डालने वाले अनेक प्रकार के दृश्य होकर भी भूखे के लिये पानी नदारत हो, बल्कि जहां अपना खाना ले जाकर भी खाया जाता हो तो महल मैला हो जाने के भय से छीन कर फेंक दिया जावे। मेरी समझ में आज का विज्ञान भी ऐसा ही है जो हमें अनेक प्रकार की आश्चर्यकारी चीजें तो अवश्य देता है, परन्तु इसने आम जनता की रोटियां छीन ली हैं ओर छीनता ही जा रहा है। कहीं राकेट बनाकर उड़ाने में समय खोया जा रहा है तो कहीं अणुबम के परीक्षण में जनता के धन और जीवन को बरबाद किया जा रहा है। सुना है कि एक अणुबम को तैयार करने में सत्रह अरब रुपया खर्च होता है। जिसका कि निर्माण जन-संहार के लिये होता है। द्वितीय महायुद्ध के समय अमेरिका ने जापान पर अणुबम का प्रयोग किया था। जिसकी सताई हुई जनता आज तक भी नहीं पनप पाई है। अभी-अभी परीक्षण के हेतु एक बम समुद्र में डाला गया जिससे ऋतु वैपरीत्य होकर कितनी बरबादी हो रही है, यह पाठकों के समक्ष में है। मतलब यह है कि विज्ञान के साथ-साथ अगर अहिंसा की भावना भी बढ़ती रहे तब तो विज्ञान गुणकारी हो किन्तु आज तो परस्पर विद्वेषभाव अहंकार आदि की बढ़वारी होती जा रही है। अत: विज्ञान तरक्की पर होकर भी घातक होता जा रहा है।
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  4. 1. What is Universe (Loka) ? That beginningless and genuine/natural middle part of the infinite space in which six substances (living being/organism ,etc.) are found (exist), is called 'Loka' (universe). 2. What is the structure of the universe ? (1) Take three glasses, put one upside down, i.e. back to front, put second glass straight on it, again put the third glass on the second upside down, the shape thus made, is the structure of the universe. (2) The structure of this universe is some-what resembling a man standing with arms akimbo and legs apart, the shape thus made, is the structure of the universe. (3) The shape of the universe is somewhat similar to that 'Mahastoopa' built in the church of Egypt. (J. S. Kosh 3/438). 3. What is the dimension of the universe ? The dimension of the universe everywhere in south-north direction is 7 'Raju' thick, the dimension in east-west is 7 'Raju' in lower side, decreasing gradually towards upperside up to middle universe is one 'Raju', thereafter increasing gradually it becomes 5 'Raju' in 'Brhmaloka', again it decreases gradually till it becomes one'Raju'in breadth at the end of the universe. Thus total height of the universe is 14 'Raju'. The cubic capacity of the whole universe is the cube of 7 'Raju', i.e. 7 x 7 x 7 = 343 cubic Raju. 4. What is 'Raju'? A round lump of 1000 kilogram heavy weight being fallen from the 'Indraloka' down towards earth and the distance it covers in six months that distance is equal to one'Raju'. This is the definition of scriptures. As regards general definition, one "Raju'is equal to innumberable 'Yojana'. 5. In how many 'Raju' the lower universe (Adholoka) exists and who live there? 'Adholoka' exists in 7 'Raju'. Seven earths (hells) exist in six 'Raju'. There is empty space between one and the second earth and also in subsequent earths - measuring some less innumerable Yojans. Above all there is Ratanprabha earth which is divided into three parts - 'Khara Bhaga', 'Pank Bhaga' and 'Abbahula Bhaga'. The 'Khara Bhaga' is 16000 Yojana thick, residences of 'Bhavan Vasi' and 'Vyantaras' exist in it. Nine types of 'Bhavan Vasi' save 'Asurkumar' and seven kinds of 'Vyantara' save 'Rakshasa' reside here. The 'Panka Bhaga' is 84,000 Yojana thick, 'Asurkumar' deities of 'Bhavan Vasi Devas' and 'Rakshasa' deities of 'Vyantaras' reside here. 'Abbahula Bhaga' is 80,000 Yojana thick. Infernal beings live here. Thus the thickness of the first earth is 1,80,000 Yojana. The thickness of the second Sarkara earth is 32,000 Yojana, of the third Baluka prabha 28,000 Yojana, of the fourth Pank prabha 24,000 Yojana, of the fifth Dhoom prabha 20,000 Yojana, of the sixth Tamah prabha 16,000 Yojana and that of the seventh Mahatamah prabha earth is 8,000 Yojana. And in the last one Raju which is called Kalkala earth, there live Nigod, etc. five Sthavaras (lowest form of life). (T.s., 146-149) 6. What is the base of the universe ? 'Ghanodadhivalaya' (circle of humid atmospheric air layers), 'Ghanvatavalaya' (circle of dense atmospheric air layers), 'Tanuvatvalaya' (circle of thin atmospheric air layers) are the base of the universe. Just as the skin surrounds the body from all the four sides and the bark surrounds the tree from all sides, similarly these three 'Vatvalaya' (atmospheric air-layers) surround the universe from all sides. Each of these three 'Vatvalayas' are 20,000 'Yojana' thick up to one 'Raju' height measuring from below the universe and in both sides of flanks, i.e. up to where five 'Sthavaras' live and below all the seven earth (hells) and also below sthe eighth earth named as 'Ishatpragbhara' earth. Above one 'Raju' in both sides of flanks, near the seventh earth (hell), each of these 'Vatvalayas' are respectively 7,5 & 4 Yojana, thick in all the eight directions, thereafter decreasing gradually these remain respectively 5,4 & 3 Yojana thick in all the eight directions of the middle universe. Again increasing gradually in all the eight directions of 'Brahamahaloka'they become respectively 7,5 & 4 Yojana thick, thereafter decreasing gradually above they become respectively 5, 4 and 3 Yojana thick in the flanks of 'Lokagra' (i.e. upper part of the universe) These three Vatvalayas become 2 Kosa (4000 'Dhanusha') one Kosa (2000 'Dhanusha') and 1575 ('Dhanusha') thick respectively at the peak of the Loka (Loka Shikhara). (Tiloya Pannati, 1/273-276) 7. What is the colour of 'Vatvalaya' ? 'Ghanodadhivatvalaya' is of cow-urine colour, 'Ghanvatvalaya' is like black-coloured 'Moong' and 'Tanuvatvalaya' is of multi-colours. (Tiloya Pannati, 1/271-272) 8. What is the dimension of 'Madhya Loka' (middle universe) ? The 'Madhya Loka' is expanded in one 'Raju' slanting from all sides and is 1,00,040 Yojana high, i.e. equal to the 'Sumeru Mountain'. The root of the Sumeru Mountain is 1000 Yojana as the foundation inside the 'Chitra Prathvi'. Thus it is 99,000 Yojana high and its peak is 40 Yojana high. There are innumerable continents and innumerable oceans in the 'Madhya Loka' which are surrounded with each other. Svayambhuramana ocean is spreaded in half(1/2) 'Raju' and the remaining half 'Raju' consists of innumerable continents and oceans. There is 'Jambudvipa' in the very middle of 'Madhya Loka'. It is of the shape of a flat metal plate (dish) and is spreaded in 1 lakh Yojana. 'Jambudvipa' is surrounded by the 'Lavana Samudra' which is of bangle's shape. It is spreaded in 2 lakh Yojana. 'Lavan Samudra' is surrounded by 'Dhatkikhanda Dvipa'. It is spreaded in four lakh Yojana. 'Dhatkikhand Dvipa' is enclosed (surrounded) by 'Kalodadhi' ocean. It is spreaded in 8 lakh Yojana. 'Pushkar Dvipa' is surrounded by 'Pushkar ocean'. It is spreaded in 16 lakh Yojana but due to existence of 'Manushottar' mountain in between it, its dimension remains 8 Lakhs Yojana. Dimension after 'Jambudvipa' is to be taken both sides, therefore, the 'Adhaidvipa' ('Jambudvipa', 'Dhatkikhand' and 'Ardha Pushkar') is 1+2+4+8+8+2 +4+8+8=45 Lakh Yojana. Human beings reside in this 'Adhaidvipa'. Human beings can not go beyond it, so, the name of this mountain - 'Manushottar Parvata',is meaningful. 9. Why this 'Dvipa' is called by the name of 'Jambudvipa'? One 'Anadhinidhana' (which has neither beginning nor end) tree of rose-apple exists in the north 'kuru' of 'Jambudvipa', that is why this 'Dvipa' is called by the name of 'Jambudvipa' similarly, because of the existence of 'Dhatki' tree in the north 'kuru'of 'Dhatkikhand', that 'Dvipa', is called by the name of 'Dhatkikhand. Similarly, because of the existence of 'Pushkar tree' in the north 'kuru' of 'Pushkar Dvipa' that 'Dvipa', is called by the name of 'Pushkara Dvipa'. (Sarvartha Siddhi. 3/9/383) 10. What are the names of mountains which divide the Jambudvipa, their colour, the ponds exist on them, the names of female deities reside on the lotus in the pond and the names of the rivers rise from them ? 11. Which are seven region divided by six mountains ? Bharatvarsha, Hamvatvarsha, Harivarsha, Videhavarsha, Ramyakvarsha, Hairanyavatvarsha, and Aairavaratavarse these are seven regions. 12. Which river falls on which ocean ? Ganga, Rohit, Harit, Seeta, Nari, Suwarnkoola and Rakta these seven rivers fall in the east Lavan Samudra. Sindhu, Rohitasya, Harikanta, Seetoda, Narkanta, Rupyakoola and Raktoda, these seven rivers fall in the west Lavan Samudra. (Tattvarthasutra, 3/21) 13. How many tributaries are there of these rivers ? of Ganga - Sinndhu - 14000 of Harit-Haritkanta - 56000 of Nari-Narkanta - 56000 of Rakta-Raktoda - 14000 of Rohit-Rohitasya - 28000 of Seeta-Seetoda - 112000 of Suwarnakoola-Rupyakoola - 28000 Special mention : There are same numbers of tributaries of each of the river in pairs, i.e. there are 14000 tributories of the river Ganga, there are also 14000 tributaries of the Sindhu and so on. (Sarvarthasiddhi, 3/23/410) 14. What is the space-expansion of the Bharatkshetra ? The space-expansion of the the Bharatkshetra is 526 %. Yojana. (Tattvarthasutra, 3/24) 15. How many Arayakhandas and Mlechhakhandas are there in two & half continent ? There are 170 Arayakhandas & 850 Mlechhakhandas in two & half continent. 16. How many pleasure lands & lands of action are there in Adhaidvipa ? There are 30 pleasure lands & 15 lands of action in Adhaidvipa. 17. Whether the action & pleasure lands are only in such number or still more ? After Adhaidvipa there are inferior pleasure lands in all Dvipas up to Nagendra mountain situated in the last Swambhooraman Dvipa. But only animal live there. There are lands of action in the rest of the part of the outer Swambhooraman Dvipa of the Nagendra mountain and in the Swambhooraman ocean. (B.D.S. Teeka 35). Only animals also live there (Tirloksar, 323-324). 18. What is the shape of 'Dvipa' and oceans ? 'Jambudvipa' is of the shape of a flat metal plate and all 'Dvipa' and oceans after it are of bangle-shapped. 19. Why the 'Madhya Loka is called as 'Tiryaka Loka'? Innumerable Dvipas and oceans up to 'Svambhuramana'are situated in oblique shape on slanting-even earth, therefore it is called as 'Tiryaka Loka'. (Preamble of Raj Vartika, 3/7) 20. Who are called 'Jyotishi Deva'? The Sun, Moon, Planet, Lunar asterism and stars these five deities are brilliant/starry. Because of illuminating nature of these deities their 'Jyotishi Deva'name is meaningful. (Sarvartha Siddhi. 4/12/465) 21. What are Surya Chandrma ? Surya and Chandrma are space-vehicles of 'Jyotishi Devas'. There is rise of Atap Namkarma (Emitting warm light) in the sun-disc. Originally the sun-disc is cold and its rays are hot and there is rise of cold luster in the moon disc (Uddyot Namkaram) which is originally cold and its rays are also cold. Space vehicles of astral deities are earth-bodied. (Karam Kand, 33) 22. Where are the residences of 'Jyotishi' deities ? These deities live from 790 yojana height to 900 Yojana height from the 'Chitra' earth (the first earth of hells), i.e. in 110 yojana and are spreaded in one Raju 'Triyaka' up to 'Ghanodadhi Vat Valaya'. above 790 Yojana ...... ......... Stars. From it above 10 Yojana (till 800 Yojana) .... Sun (above 32 lakhs miles) From it above 80 Yojana (till 880 Yojana) ..... Moon. From it above 4 Yojana (till 884 Yojana) ..... Planet. From it above 4 Yojana (till 888 Yojana) ..... Budha (Mercury). From it above 3 Yojana (till 891 Yojana) ..... Shukra (Venus). From it above 3 Yojana (till 894 Yojana) ..... Guru (Jupiter). From it above 3 Yojana (till 897 Yojana) ..... Mangal (Mars) (Angaraka). From it above 3 Yojana (till 900 Yojana) ..... 'Shani', i.e. Saturn (Slow motion). Total above 110 Yojana. In between the gap of Mercury and Saturn 'Nitya Nagriyan' (Permanent residences) of remaining 83 planets are situated. (Triloksara, 332-333) Note - (1) According to Jain philosophy the Sun is at a distance of 32 lakhs mile from here and according to science it is 9 crore 30 lakhs miles away. (2) According to Jain philosophy the Moon is at a distance of 45 lakhs 20 thousands miles away from here and the science regards it only 2 lakh 40 thousands miles away. 23. What is the mutual intervening space between astral celestial planets ? The minimum intervening space between stars is /of 1 Kosa, the medium space is 50 Kosa and maximum space is 1000 yojan. The minimum intervening space between the Sun to Sun & Moon to moon is 99,640 yojan and the maximum space is 1 Lakh 660 yojan. (Raj vartika ch.4/13/6). 24. How many rays are there of the Moon and the Sun etc. ? The rays of the Moon are 12000, they are cold. There are also 12000 rays of the Sun but they are warm. The Venus has 2500 rays, they are sharp, i.e. they are bright with the light. The rays of the remaining astral deities are of faint light. (Triloksar, 341). 25. What is the shape of the celestial planes of astral deities ? Bifurcating an orange in two pieces if placed them facing upper side then the breadth portion remains upperside and a very little portion of the rounded part remains in lower side. Just of the same shape the celestial planes of the astral deities remain and, only their lower portion is visible to us. (Triloksar, 336) 26. What is eclipse ? The celestial plane of the Rahu move below the celestial plane of the Moon and the celestial plane of the Ketu moves below the celestial plane of the Sun and after each 6 months at the end of fifteenth day of lunar fortnights (Purnima and Amavashya) the Rahu covers the Moon and the Ketu covers the Sun. This is eclipse. (Triloksar, 339) 27. How one month increases in the two & half year ? There are 184 narrow lanes of the movement of the Sun and one lane is at a distance of 2 yojan from the next lane which takes one Muhurta time in crossing the lane hence, 30 Muhurtas (1 day) increases in 30 days, In this way 12 days in a year and one month increases in two & a half years. (Triloksar) 28. What is the shape of transporting deities of space planes of the Moon, etc. and in which directions they move ? Lion-shaped, etc. deities carry their respective space-vehicles in east, etc. directions, i.e. lions in the east direction, elephants in south direction, oxes in west direction, horses in north direction. Carrier deities of Moon & Sun are 4000 in one direction, and 16000 carrier deties in all the four directions. Carrier deities of remaining other space planes are 2000 each in one direction, totalling 8000 deities in all the four directions. But in constellations there are one thousand carrier deities in each direction total 4000 deities in all the four directions and in stars 500 in one direction and total 2000 in all the four directions. Space planes are carried by 'Abhiyogya' grade deities who are like servants in heaven, therefore, they make them selves as elephant etc. 29. How many Sun & Moon, etc. are there in Human universe ? The number of 'Jyotishi' deities in 'Adhaidvipa' is finite but in the whole 'Tiryaka Loka' the number of 'Jyotishi' deities is innumerable. 30. How much is the family of one Moon ? The family of one Moon consists of one Sun, 28 Nakshatra, 88 Graha and 66,975 Kora kori (crore x crore) Stars. (Siddhantsar Deepaka, 14/54) 31. In how many days one Sun completes the circumambulation of Jambudvipa ? In two days (day & night). 32. In how many days one Moon completes the circumambulation of Jambudvipa ? In takes some more time than 2 days (day-night). Due to this very reason there is decrease increase in Moon-rising. 33. What is Amavashya and Purnima ? The Rahu covering one phase each day in each lane out of the 16 phases of the moon-disc sequentially covers up to 15 phases. In this way in which lane only one phase is seen in the last, that is Amavashya. From the 1st day of the light half of the lunar fortnight that Rahu goes on leaving one phase each in each lane through his particular movement due to which one day the full moon-disc is seen, that is Purnima. Or the moon-disc precisely by its very nature transforms itself as dark-lustre for 15 days and as light-lustre for the similar number of days. (Triloksar, 342 Distinctive meaning) 34. What is Uttarayana & Dakshinayana ? When the Sun remains in the first lane then the Dakshinayana (i.e. the Sun's movement towards south of the equator) starts from the first day of the dark half oflunar month Shravana and when it reaches in the last lane then the uttrayana ,(i.e. the Sun's northward progress) starts. The Sun remains Dakshinayana from lunar month Shravana to lunar month Pausha (183 days) and from the lunar month Magha till lunar month Asar (183 days) the Sun remains Uttarayana. (T. S., 412) 35. How many lanes are there of the Sun & Moon ? There are 184 lanes of the Sun and in these very lanes there are 15 lanes of the Moon. Both of these move in them. 36. What happens when the Sun reaches in the first lane ? When the Sun reaches in the first lane then the Chakravarti visits Jina idol enshrined in the Sun's celestial plane from the upper portion of his palace in the city of Ayodhya. The object of ocular-sense of the Chakravarti measures 472637/, yojana ,i.e. 18,90,53,400 miles. (Triloksar, 391) 37. How many distance the Sun & the Moon each cover in one minute ? The Sun moves 4,37,62311/, miles in a minute in the first lane and in the first lane the Moon moves 4,22,797 31/164 miles in a minute. (Triloksar, 388, Distinctive meaning) 38. Whether the earth moves ? No. The Sun and the Moon circamambulate the Sumeru mountain. The Sumeru mountain, i.e. the Earth is static and the Sun and the Moon circamambulate. 39. Whether all stellar discs move ? All the five types of stellar deities of the Adhaidvipa, i.e. of the human universe constantly go on moving and all stellar deities other than of the human universe remain static. (Tattvartha sutra 4/13/15) 40. How the days become greater and small ? When the Sun moves in the interior lane (first lane) then the day becomes of 18 Muhurta (14 hours 24 minutes) and the night of 12 Muhurta (9 hours 36 minutes) and when moves in the outer lane (last lane) then night becomes of 18Muhurta and the day of 12 Muhurta. The Sun moves in the interior lane in the lunar month ofShravan and in the lunar month of Magha the Sun moves in the outermost lane. (Triloksar, 379) 41. Whether the speed / gait of the Sun and the Moon decrease-increase ? Yes. The gait of Sun & the Moon in the first lane is like that of elephant, (i.e. extreme slow) in the middle lane like the gait of the horse (medium gait) and in that of the outer lane like the gait of the lion (fastest gait). (Triloksar, 388) 42. Whether the gait of all the stellar deities is identical ? No. The Moon is of the slowest gait of all. The Sun is faster than it, Planets are faster then the Sun, the constellations are more faster than the Planets and still more faster gait is that of the stars. (Triloksar, 403) 43. Up to where the warmth/heat of the Sun spreads ? The warmth of the Sun spreads from the middle portion of the Sudarshan Meru up to the sixth part of the Lavan ocean and the Chitra earth is 800 yojana below the Sun's disc and the root of the Chitra earth is 1000 yojana. The heat / warmth of the Sun spreads 1800 yojana ,i.e. 72,00000 miles in lower side. The stellar universe exists up to 100 yojana above the Sun's disc. Hence the warmth of the Sun spreads up to 100 yojanas (4,00000 miles) in the upper side. (Triloksar, 397) 44. How much is the movement region of the Sun & the Moon ? The movement area of the Sun and the Moon is called Char Kshetras. There is one Char Kshetra each of two Moon and two Sun ,i.e. one char Kshetra of two Sun and one of two Moon. There is one Char Kshetra of two Sun of the Jambudvipa; 2 char Kshetras of four Sun of Lavan Samudra, 6 Char Kshetra of 12 Sun's of Dhatkikhand dvipa, 21 Char Kshetra of 42 Sun of Kalodadhi Samudra and 36 Char Kshetra are of the 72 Sun of Pushkardha dvipa. The Sun and Moon related to the Jamboodvipa move precisely in area measuring 180 Yojan of Jambudvipa and also move in Lavan ocean measuring 33048/1 yojan ,i.e. two Moon and two Sun move in the area measuring 180+33048/6, = 51048/ yojana. The remaining Moon & Sun up to Pushkardha move in their own respective areas / regions. (Triloksar, 374-375) 45. How day and night happen ? When the Sun remains in east-west of Sumeru mountain then there is day in east 'Videha' and west 'Videha'regions and night in Bharat-Airavata regions and when the Sun remains in south - north of Sumeru mountain then there is day in Bharat-Airavata kshetra and night in Videha kshetra. 46. In how many Raju the 'Urdhaloka' exists and what is there? Residence places of celestial beings (Heaven) start right after one hair's thickness from the peak of 'Sumeru' mountain of ' Madhyaloka'. 'Saudharma-Aisana' heavens are in 1.5 Raju from 'Chitra' earth and are situated facing each other face to face), 'Sanat KumaraMahendra' heavens are in 1.5 Raju, 'Brahama-Brahmottara'heavens are in 1/2 Raju, 'Lantava-Kapistha' heavens in 1/2 Raju, 'Shukra-Mahashukra' heavens are in 1/2 Raju, 'Satara-Sahasrara' heavens are in 1/2 Raju, 'Anata-Pranata' heavens are 1/2 Raju, 'Arana-Achuta' heavens are in 1/2 Raju. All these are situated facing each other. Thus 16 heavens are situated in 6 Raju. And above these 16 heavens there are, Navagriveyaka, NavAnudisha, Panch Anuttara Viman and also 'Sidha Shila' in one Raju. Thus the Urdhaloka (upper world) is situated in 7 Raju and 'Adholoka' (lower world) in 7 Raju. Thus the total height of 'Loka' is 14 Raju. Note - The height of Sumeru mountain is included in 'Urdhaloka'. (Triloksar, 458) 47. What is the base of space planes (Vimana) of heavens ? The Vimana of the pair of 'Saudharma' is situated on a kind of compact mass of water (solid) and of the pair of 'Sanatkumara' on the air, that of 'Brahama', etc. Four 'Kalpas' (heavens) are situated on both, the water and air and Vimana ofremaining 'Anata-Pranata' etc. are situated on the pure sky. (T. P., 8/206-207) 48. Where is 'Siddhyalaya'? "Siddha-Shila' exists, above 12 Yojana from the flag-staff of 'Sarvartha Siddhi Vimana' in the very middle of Ishatpragbhar earth which is 45 lakh yojan round and eight yojan thick in the middle like a mass of silver and gold and full of many kinds of jewels which decreasing gradually becomes one 'Angula' in the end. It is like an inverted white parasol (an open white umbrella kept its breadth portion facing upside). The Breadth of Ishatpragbhar named eight earth is one Raju in east-west, Length (north south) 7 Raju and thickness (height) measures eight yojans. (T. P. 8/675-681) There are three 'Vatvalaya' (air layers) above this earth, which are respectively 2 'Kosa' (4,000 Dhanusha), one 'Kosa' (2,000 Dhanusha) and 1,575 'Dhanusha' thick. 'Siddha Parmesthi' of the maximal height (Avgahna) of 525 'Dhanusha' up to minimal height of 3.5 hand are ensconced on the upper portion of the last Vatvalaya. 49. What is the extents (measurement) of Siddha Kshetra ? 45,00,000 Yojana ,i.e. equal to human-region-measurement. 50. What is the length, breadth and height of Trasanali (A channel or tunnel of mobile beings)? There is a 'Trusnali' in the middle of the universe which is one 'Raju' in length, one 'Raju' in breadth and some less of 13 'Raju' height and the 'Lokanari' is of 14 'Raju' out of which there is Kalkala named an immobile world in one Raju where mobile being do not live and in the middle portion of the seventh hell the hellish beings live. There are no mobile beings below 3999 %, yojana, i.e. in 3,19,94,666 /, Dhanusha. Similarly the intervening space from the Sarvarthsiddhi celestial plane up to Isatpragbhar ,is 12 yojana ,i.e. 96000 Dhanusha and the thickness of the Ishatpragbhar, is 8 yojana, i.e. 64000 Dhanusha and all the three atmospheric Air-layers (Vatvalayas) of the peak are 2 Kosa (4000 Dhanusha), 1 Kosa (2000 Dhanusha) are 1575 Dhanusha thick, no mobile beings live in this region (except Samudghat ,i.e. emanation of soul-points from the body without leaving the body by the Teerthankara and Uppada' (Instantaneous birth of infernal & celestial being). 3,19,94,666 2/, Dhanusha +96000 Dhanusha + 64000 Dhanusha + 7575 Dhanusha= 3,21,62,241 2, Dhanusha less 13 Raju high, is the Tras Nali. (T. P. , 2/6-7) 51. Describe the distinguishing features of Sumeru mountain & Nandishwardvipa ? Sumeru Moutain - It is the first of all mountain of the middle universe. Situated in the large middle portion of Videh region, it is of golden colour and is of peak-shaped. There are total five Sumeru mountains - one in Jambudvipa, 2 in Dhatkikhanda and 2 in Pushkardhadvipa. There are 16 Jina temples in each of the Sumeru, thus total 80 Jina temples in all and total 8640 Jina idol are enshrined in them. This mountain is regarded as the seat of birth-anointment of Teerthankaras. The height of the Sumeru mountain is 1 Lakh 40 yojana. The root of the Sumeru mountain is 1000 yojana. There are Bhadrashal forest, Nandan forest, Saumnasa forest and Panduka forest over it, from the middle of the Panduka forest the peak of the Sumeru mountain starts which is 40 yojan high. There is Pandukshila in the east-north of that peak, the Panduk Kambla in south-east direction, the Rakta in the south-west direction and Rakta Kambla in the north-west direction which are of crescent shaped on which celestial beings perform auspicious bathing (anonintment) respectively of all Teerthankaras of Bharat, west Videh, Airavat and east Videh. Similarly, there are Vijaya and Achal named two Merus in the east and west direction respectively in the Dhatkikhanda dvipa and there are Mandar and Vidyunmali named two Meru in the east and west direction respectively in the Pushkardvipa. The structure of natural Jina temples on these is just like Sumeru (Sudarshan Meru). The speciality is that the height of each of these is 84000 yojan and the root of 1000 yojan is separate. Hence, the total height of all of these four mountains is 85000 yojan. (T.P., 4/2617) Nandiswar dvipa - There are innumerable continents and oceans in this middle universe among which after the 7 continent and 7 ocean there is the eighth continent Nandiswar dvipa. In the east direction of this continent there is one Anjangiri named mountain of black colour, leaving apart 1 lakh yojan around it there are four oblong-ponds. There are Ashoka, Saptparan, Champaka and Amra named forests in all four directions of each of the oblong-pond. There are 16 forests in one direction of this Dvipa and total 64 forests in all the four directions. In the centre of each of the oblong-ponds there is one each Dadhimukh mountain of white colour and there are four Ratikar mountains of red colour in all the four corners of each of the oblong-pond Celestial deities make merriment amusement on the interior Ratikaras and Jina temples are there on outer Ratikaras. Thus in one direction there are one Anjangiri, 4 Dadhimukha and 8 Ratikar mountains, over these mountains there are 13 natural Jina temples, In the same way there are 13 natural Jina temples each in all the three remaining directions. Hence there are 52 natural Jina temples belonging to Nandishwaadvipa. Each Jina temple is enshrined with 108 Jina idols of gems. The stature of these Jina idols is 500 Dhanusha which are ensconced in lotus-posture and attract the minds of the celestial beings and celestial female beings. Their nails, red face, black and white eyes, black eyebrows and the black hair of the head add to the grace & splendour, the countenance seems as if the resonant preaching of the Teerthankara in the form of Omkar sound, which is destroyer of sins, is revealed, the gleam of crores of Suns & Moons becomes faded before the light of those jewels-made idols. Only those may have sight of those idols who owe intense feelings of attachmentlessness and renunciation. Those idols do not speak but right faith rises merely seeing them. We pay our obeisance to those pleasure-bestowing Jina idols. The Saudharma Indra, etc. celestial beings come here along with their family to perform anointment and worship. Kalpavasi celestial beings perform worship in the east direction, the Bhavanvasi in the south direction, the Vyantra deities in the west and the Astral deities in the north, with great devotion, Human beings can not go there, They perform worship in this very place by establishing Jina temples of Nandishwar Dvipa.
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  5. पूज्यगुरूदेव आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महामुनिराज के तिलवारा घाट जबलपुर में हुए केश लोच |
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  6. तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 7 प्रतियोगिता : आज लाइव नहीं हैं - पर शीघ्र भाग लेले https://kahoot.it/challenge/03434669 www.kahoot.it Game PIN: 03434669 आपके कितने अंक आए - कमेन्ट मे बता सकते हैं \ आपके Rank भी कमेन्ट में लिखें
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  7. कब, कहाँ, किस अवस्था में स्थान सन विशेष १. अजमेर (राजस्थान) १९६८ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ २. अजमेर (राजस्थान) १९६९ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ३. किशनगड (अजमेर, राज.) १९७० मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ४. किशनगड (अजमेर, राज.) १९७१ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ५. नसीराबाद (अजमेर, राज.) १९७२ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ६. ब्यावर (अजमेर, राज.) १९७३ आचार्य अवस्था में क्षुल्लकजी साथ में थे ७. अजमेर(राज.) १९७४ आचार्य अवस्था में क्षुल्लकजी साथ में थे ८. फिरोजाबाद (उ. प्र.) १९७५ आचार्य अवस्था में क्षुल्लकजी साथ में थे ९. कुण्डलपुर जी (दमोह, म. प्र.) १९७६ आचार्य अवस्था में ससंघ १०. कुण्डलपुर जी (दमोह, म. प्र.) १९७७ आचार्य अवस्था में ससंघ ११. नेनागिरि जी (म. प्र.) १९७८ आचार्य अवस्था में ससंघ १२. थूवौन जी (म. प्र.) १९७९ आचार्य अवस्था में ससंघ १३. मुक्तागिरि जी (म. प्र.) १९८० आचार्य अवस्था में ससंघ १४. नेनागिरि जी (म. प्र.) १९८१ आचार्य अवस्था में ससंघ १५. नेनागिरि जी (म. प्र.) १९८२ आचार्य अवस्था में ससंघ १६. ईसरी (गिरिडीह, झारखण्ड) १९८३ आचार्य अवस्था में ससंघ १७. मडियाजी, जबलपुर (म. प्र.) १९८४ आचार्य अवस्था में ससंघ १८. आहार जी (टीकमगड, म. प्र.) १९८५ आचार्य अवस्था में ससंघ १९. पपौरा जी (टीकमगड, म. प्र.) १९८६ आचार्य अवस्था में ससंघ २०. थूवौन जी (म. प्र.) १९८७ आचार्य अवस्था में ससंघ २१. जबलपुर मढ़िया जी (म.प्र.) १९८८ आचार्य अवस्था में ससंघ २२. कुण्डलपुर जी (दमोह, म. प्र.) १९८९ आचार्य अवस्था में ससंघ २३. मुक्तागिरि जी (बैतूल, म. प्र.) १९९० आचार्य अवस्था में ससंघ २४. मुक्तागिरि जी (बैतूल, म. प्र.) १९९१ आचार्य अवस्था में ससंघ २५. कुण्डलपुर जी (दमोह, म. प्र.) १९९२ आचार्य अवस्था में ससंघ २६. रामटेक जी (नागपुर महा.) १९९३ आचार्य अवस्था में ससंघ २७. रामटेक जी (नागपुर महा.) १९९४ आचार्य अवस्था में ससंघ २८. कुण्डलपुर जी (दमोह, म. प्र.) १९९५ आचार्य अवस्था में ससंघ २९. महुआ जी (सूरत, गुजरात) १९९६ आचार्य अवस्था में ससंघ ३०. सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर (देवास, म. प्र.) १९९७ आचार्य अवस्था में ससंघ ३१. भाग्योदय तीर्थ, सागर (म. प्र.) १९९८ आचार्य अवस्था में ससंघ ३२. गोम्मटगिरि जी, इन्दौर (म. प्र.) १९९९ आचार्य अवस्था में ससंघ ३३. अमरकंटक (शहडोल, म. प्र.) २००० आचार्य अवस्था में ससंघ ३४. तिलवाराघाट (जबलपुर, म. प्र.) २००१ आचार्य अवस्था में ससंघ ३५. सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर (देवास, म. प्र.) १००२ आचार्य अवस्था में ससंघ ३६. अमरकंटक (शहडोल, म. प्र.) २००३ आचार्य अवस्था में ससंघ ३७. तिलवाराघाट (जबलपुर, म. प्र.) २००४ आचार्य अवस्था में ससंघ ३८. बीना जी बारह (सागर, म. प्र.) २००५ आचार्य अवस्था में ससंघ ३९. अमरकंटक (शहडोल, म. प्र.) २००६ आचार्य अवस्था में ससंघ ४०. बीना जी बारह (सागर, म. प्र.) २००७ आचार्य अवस्था में ससंघ ४१. रामटेक जी (नागपुर महा.) २००८ आचार्य अवस्था में ससंघ ४२. अमरकंटक (शहडोल, म. प्र.) २००९ आचार्य अवस्था में ससंघ ४३. बीना जी बारह (सागर, म. प्र.) २०१० आचार्य अवस्था में ससंघ ४४. चन्द्रगिरि, डोंगरगढ़ (छ. ग.) २०११ आचार्य अवस्था में ससंघ ४५. चन्द्रगिरि, डोंगरगढ़ (छ. ग.) २०१२ आचार्य अवस्था में ससंघ ४६. रामटेक जी (नागपुर महा.) २०१३ आचार्य अवस्था में ससंघ ४७. विदिशा (मध्यप्रदेश) २०१४ आचार्य अवस्था में ससंघ ४८. बीना जी बारह (सागर,म. प्र.) २०१५ आचार्य अवस्था में ससंघ ४९. हबीबगंज, भोपाल (म. प्र.) २०१६ आचार्य अवस्था में ससंघ ५०. रामटेक जी (नागपुर, महा.) २०१७ आचार्य अवस्था में ससंघ ५१. खजुराहो(म. प्र.) २०१८ आचार्य अवस्था में ससंघ चातुर्मास स्थलों की जानकारी राज्यवार १. मुनि अवस्था में आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज के साथ पाँच चातुर्मास सन् १९६८ से १९७२ तक किए - स्थान सन विशेष १. अजमेर (राजस्थान) १९६८ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ २. अजमेर (राजस्थान) १९६९ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ३. किशनगड (अजमेर, राज.) १९७० मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ४. किशनगड (अजमेर, राज.) १९७१ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ५. नसीराबाद (अजमेर, राज.) १९७२ मुनि अवस्था में आ०श्री ज्ञानसागरजी के साथ ६. ब्यावर (अजमेर, राज.) १९७३ आचार्य अवस्था में क्षुल्लकजी साथ में थे २. आचार्यश्री ने राजस्थान में ४ नगरों में चातुर्मास किये हैं - अजमेर (राजस्थान) नगर में ३ चातुर्मास किशनगढ जिला-अजमेर (राजस्थान) में २ चातुर्मास नसीराबाद जिला-अजमेर (राजस्थान) में १ चातुर्मास ब्यावर जिला-अजमेर (राजस्थान) में १ चातुर्मास ३. उत्तरप्रदेश में १ चातुर्मास किया - फिरोजाबाद सन् - १९७५ ४. आचार्यश्री ने मध्यप्रदेश के अनेक क्षेत्रों एवं नगरों में ३३ चातुमास किये हैं - सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में ५ चातुर्मास सिद्धक्षेत्र नैनागिरि जी में ३ चातुर्मास सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरी जी में ३ चातुर्मास अतिशय क्षेत्र थुबोन जी में २ चातुर्मास जबलपुर मढ़िया जी में ४ चातुर्मास सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर में २ चातुर्मास सर्वोदय तीर्थ अमरकटक में ४ चातुर्मास अतिशय क्षेत्र बीना बारहा जी में ४ चातुर्मास अतिशय क्षेत्र अहार जी १ चातुर्मास अतिशय क्षेत्र पपौरा जी १ चातुर्मास गोम्मटगिरि, इन्दौर में १ चातुर्मास भाग्योदय तीर्थ, सागर १ चातुर्मास शीतल धाम, विदिशा १ चातुर्मास हबीबगंज, भोपाल में १ चातुर्मास स्वर्णोदय तीर्थ क्षेत्र खजुराहो १ चातुर्मास ५. बिहार (वर्तमान में झारखंड) में १ चातुर्मास किया - ईसरी जी में सन् १९८३ ६. महाराष्ट्र में ५ चातुमास किये - अतिशय क्षेत्र रामटेक जिला नागपुर महाराष्ट्र में सन् १९९३, १९९४, २००८, २०१३, २०१७ ७. गुजरात में १ चातुर्मास किया - अतिशय क्षेत्र महुआ जी, जिला सूरत (गुजरात) सन् १९९६. ८. छत्तीसगढ़ में २ चातुर्मास - अतिशय क्षेत्र चन्द्रगिरि, डोंगरगढ़ में सन् २०११, २०१२. ९. परमपूज्य आचार्यश्री ने अब तक ७ राज्यों में चातुर्मास किये जिनका क्रमश: नाम इस प्रकार हैं - राजस्थान ७ उत्तरप्रदेश १ मध्यप्रदेश ३४ बिहार(वर्तमान में झारखंड) १ महाराष्ट्र ५ गुजरात १ छत्तीसगढ़ २ ५१ चातुर्मास अब तक
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  8. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: आचार्य विद्यासागर जी, रवीन्द्र जैन
    पञ्चमहागुरुभक्ति भक्ति पाठ : पूज्यपाद भक्तियाँ (संस्कृत) का आचार्य श्री द्वारा पद्यानुवाद गायन : रवीन्द्र जैन
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  9. हम भी व्यक्ति दूसरों पर गुस्सा करते रहते हैं और सोचते हैं कि सामने वाले ने हमें गुस्सा दिलाया अब हमें बदलना होगा अपने आप को किसी भी दूसरे को दोषी ना माने मैं अंतर में झांकी ऐसा परिवर्तन करना ही होगा हमें।
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  10. ज्ञानी तभी तुम सभी सहसा बनोगे, संपूर्ण प्राणि वध को जब छोड़ दोगे। है साम्यधर्म वह है जिसमें न हिंसा, विज्ञान संभव कभी न बिना अहिंसा ॥१४७॥ हैं चाहते जबकि ये जग जीव जीना, होगा अभीष्ट किसको फिर मृत्यु पाना? यों जान, प्राणि वध को मुनि शीघ्र त्यागें, निग्रंथ रूप धर के, दिन-रैन जागें ॥१४८॥ हे जीव! जीव जितने जग जी रहे हैं, विख्यात वे सब चराचर नाम से हैं। निग्रंथ साधु बन, जान अजान में ये, मारें कभी न उनको न कभी मराये ॥१४९॥ जैसा तुम्हें दुख कदापि नहीं सुहाता, वैसा अभीष्ट पर को दुख हो न पाता। जानो उन्हें निज समान दया दिखाओ, सम्मान मान उनको मन से दिलाओ ॥१५०॥ जो अन्य जीव वध है वध ओ निजी है, भाई यही परदया, स्वदया रही है। साधु स्वकीय हित को जब चाहते हैं, वे सर्व जीव वध निश्चित त्यागते हैं ॥१५१॥ तू है जिसे समझता वध योग्य वैरी, तू ही रहा 'वह' अरे यह भूल तेरी। तू नित्य सेवक जिसे बस मानता है, तू ही रहा'वह' जिसे नहिं जानता है ॥१५२॥ रागादि भाव उठना यह भाव हिंसा, होना अभाव उनका समझो अहिंसा। त्रैलोक्य पूज्य जिनदेव हमें बताया, कर्त्तव्यमान निजकार्य किया कराया ॥१५३॥ कोई मरो मत मरो नहिं बंध नाता, रागादि भाव वश ही द्रुत कर्म आता। शास्त्रानुसार नय निश्चय नित्य गाता, यों कर्म-बंध-विधि है, हमको बताता ॥१५४॥ है एक हिंसक तथैक असंयमी है, कोई न भेद उनमें कहते यमी हैं। हिंसा निरंतर नितांत बनी रहेगी, भाई जहाँ जब प्रमाद-दशा रहेगी ॥१५५॥ हिंसा नहीं पर उपास्य बने अहिंसा, ज्ञानी करे सतत ही जिस की प्रशंसा। ले लक्ष्य कर्म क्षय का बन सत्यवादी, होता अहिंसक वही मुनि अप्रमादी ॥१५६॥ हिंसा मदीय यह आतम ही अहिंसा, सिद्धान्त के वचन ये कर लो प्रशंसा। ज्ञानी अहिंसक वही मुनि अप्रमादी, हा! सिंह से अधिक हिंसक हो प्रमादी ॥१५७॥ उत्तुंग मेरु गिरि सा गिरि कौन सा है? निस्सीम कौन जग में इस व्योम सा है? कोई नहीं परम धर्म बिना अहिंसा, धारो इसे विनय से तज सर्व हिंसा ॥१५८॥ देता तुझे अभय पार्थिव शिष्य प्यारा, तू भी सदा अभय दे जग को सहारा। क्या मान तू कर रहा दिन-रैन हिंसा, संसार तो क्षणिक है भज ले अहिंसा ॥१५९॥
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  11. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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  12. अहिंसा विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार https://vidyasagar.guru/quotes/parmarth-deshna/ahinsa/
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  13. अहिंसा की उपासना कोई तिलक लगाने वाला कर रहा है, यह कोई नियम नहीं है क्योंकि अहिंसा का कोई तिलक नहीं होता। अहिंसा आत्मा की वृत्ति है और वह आत्मा पशुओं के पास भी होती है। संसार में ऐसा कोई जीव नहीं जिसके पास आत्मा न हो आत्मा के बिना जीव ही नहीं हो सकता। यह आत्मा सबके पास है, आपके पास भी है लेकिन आपके पास अहिंसा नहीं, अहिंसा के अभाव में आपकी आत्मा हिंसक हो गई है, क्रूर हो गई है, आप अपनी आत्मा में अहिंसा की प्रतिष्ठा करें। जीवन को अहिंसक बनाएँ इसी में जीवन की सार्थकता है। अहिंसा को न भूलें, धर्म को न भूलें लेकिन यह भी याद रखें कि मन्दिर जाकर घंटी बजाना ही धर्म नहीं है। धर्म तो करुणा, दया का नाम है। जो ट्रकों में भरकर जानवर कत्लखाने जा रहे हैं, इन जानवरों की रक्षा करो,इनकी जान बचाओ यही सही धर्म है। -१९९७, नेमावर
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  14. हरदा निकटस्थ नेमावर में स्थित सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में रविवार १७ अगस्त को आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी ने कहा- जिसके द्वारा अहिंसा की पुष्टि नहीं हो सकती वह सत्य नहीं कहला सकता। सत्य वहीं है जहाँ अहिंसा है और अहिंसा वहीं है जहाँ सत्य है। सत्य और अहिंसा एक-दूसरे के पूरक हैं। सत्य को छोड़कर अहिंसा नहीं और अहिंसा को छोड़कर सत्य नहीं, हमारे जीवन में सत्य और अहिंसा दोनों होना चाहिए। अहिंसा के अभाव में हमारा जीवन कोई मायना नहीं रखता। आज असत्य ही सत्य सा सिद्ध हो रहा है जब सत्य असत्य के रूप में ढल जाता है तब दर्द होने लगता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम सत्य अहिंसा को अपने जीवन में स्थान दें आज हमारे जीवन से अहिंसा निकल गई सत्य चला गया उसी का परिणाम है कि भारत में हिंसा का दौर तेजी से शुरू हो गया। यदि देश की दशा सुधारना है, उन्नति करना है तो जीवन में अहिंसा को स्थान दीजिए। आचार्यश्री जी ने फिर कहा हमारे जीवन में प्रशम, संवेग आस्तिक्य और अनुकंपा ये चारों होना चाहिए। अनुकंपा के बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं, मनुष्य की मनुष्यता अनुकंपा यानि करुणा से ही पहचानी जा सकती है। यदि मनुष्य में मनुष्यता है तो करुणा ही उस मनुष्य का मापदण्ड है दूसरा और कुछ नहीं। आज हमको आवश्यकता है कि हम अपनी मरी मनुष्यता को जिंदा करें। मनुष्य के पास जब दया रहती है तब वह भेद नहीं करता कि यह जानवर है या आदमी है, दया में भेद नहीं होता। दया समान रूप से सभी के साथ एक समान की जाती है। दया के अभाव में आज मनुष्य जानवरों से भी गया बीता हो गया, वह आज जानवरों को खाने लगा। जानवरों को खाना या जानवरों को मारना मनुष्यता की हत्या है। जीवन तो सबको प्यारा होता है फिर किसी का जीवन क्यों छठीना जाये? यह भारत विश्व प्रसिद्ध था इसने अपना आदर्श कभी न खोया। भारतीय संस्कृति बड़ी गौरवपूर्ण संस्कृति है यहाँ के लोग बड़े अहिंसक थे। एक समय था जब भारत में गाय का दूध भी लोग नहीं बेचते थे, दूध नहीं बेचने का मतलब दूध को नि:शुल्क बांट देते थे लेकिन बेचते नहीं थे। कहाँ गया वह भारत? आज तो वह गाय का खून बेच रहा है। भारत को अपनी अहिंसा को समझना होगा अपने अतीत के भारत को याद करना होगा, और इसका दायित्व हम सबका भी है। यहाँ के लोग खेती करते थे पशुओं का पालन करते थे। पशुओं का पालन करने वाला देश आज पशुओं को ही कत्ल कर रहा है जो ठीक भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है। यह तो सरासर अन्याय है कि अनुपयोगी पशुओं को काटा जाता है। कोई भी जीवन अनुपयोगी कैसे हो सकता है जीवन तो मूल्यवान होता है जीवन को अनुपयोगी नहीं कहना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि आज हमको हिंसा के विरोध में अपना अभियान चलाना होगा। लोगों को जागृत करना होगा। करुणा, दया को जागृत करना होगा तभी हम देश में कत्लखानों में हो रही इस भयानक हिंसा को रोक सकते हैं अन्यथा हिंसा बढ़ती ही जायेगी और देश का पतन होता ही जायेगा। आदमी धर्म को जानता है इसलिए तो उसे रात्रि के बारह बजे भी पूछेगे कि क्या दीक्षा लेना है? तो वह मना कर देगा। दीक्षा लेने के लिए मना क्यों कर दिया? इससे सिद्ध है कि वह अच्छी तरह जानता है कि धर्म क्या है अधर्म क्या है? आज धर्म को समझने की आवश्यकता है लेकिन धर्म को वही समझ सकता है जो अधर्म को अच्छी तरह जानता है क्योंकि अधर्म को समझना ही धर्म की पहचान है। हम धर्म को समझने की बात बहुत करते हैं लेकिन अधर्म को छोड़ने की बात नहीं करते। यदि हम धर्म को समझना चाहते हैं तो हमको धर्म के अंगों को पहले समझना होगा तभी हम धर्म अर्थात् चारित्र की बात को दूसरे के सामने कह सकते है अन्यथा नहीं। निरीह होकर, निभीक होकर बोलना तो सबको आता है लेकिन निरीह होकर, निभीक होकर चारित्र पालना सबको नहीं आता, यह तो बहुत कम लोगों को आता है। निरीह होकर वही चारित्र पाल सकता है जो निभीक रहेगा, जिसको संसार की कोई चाह नहीं, जो न ख्याति चाहता है, न पूजा,न अपना मान-सम्मान। अपने सम्मान की चाह करने वाला व्यक्ति निभांक होकर चारित्र का पालन नहीं कर सकता, निभीक होकर चारित्र पालने में स्वार्थ सबसे बड़ी बाधा है सबसे पहले हमको स्वार्थ का त्याग करना होगा स्वार्थ को त्यागे बिना हमारा कल्याण संभव नहीं। स्वार्थ परमार्थ को बिगाड़ देता है, परमार्थ के लिए स्वार्थ को पहले छोड़ना होगा। स्वार्थ को छोड़े बिना परमार्थ की साधना संभव हो ही नहीं सकती। आज हम २१ वीं सदी के प्रवेश का इंतजार कर रहे हैं लेकिन हम २१ वीं सदी में प्रवेश करें इसके साथ हमारे पास कौन से आदर्श हैं? शायद हम कत्लखाने मुक्त भारत, मांस निर्यात मुक्त भारत के साथ यदि हम २१ वीं सदी में प्रवेश करें तो बहुत अच्छा होगा। अहिंसा के साथ प्रवेश करें, अहिंसा हमारा आदर्श हो यदि हमारे साथ अहिंसा है तो समझ लेना सब कुछ हमारे साथ है और यदि हमारे पास अहिंसा नहीं तो समझो हमारे पास कुछ भी नहीं। अहिंसा का अर्थ दया है, दया के क्षेत्र में किया गया कार्य कभी भी फालतू नहीं जा सकता, जीवन का सही सदुपयोग तो यही है कि हम करुणावान हों। आप मनुष्य हैं विकासशील हैं लेकिन आपके विकास का क्या अर्थ है आपने जानवरों को क्या समझा है? अरे! जानवर भी जीव है उसके पास भी आत्मा है उसके पास भी संवेदना है। जानवरों के साथ संवेदना का व्यवहार रखो यदि संवेदना नहीं रही तो फिर आपके पास मात्र जड़ता है। आप चेतन हैं चेतना की बात करो चेतना का काम करो। मानव जीवन कल्याण के लिए है। कल्याण इसी में है कि हमारे अंदरकरुणा होदय हो, सत्य हो, बस इसी में हम सबका कल्याण है।
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  15. स्वाध्याय को परम तप कहा है, द्वसके कितने भेद हैं तथा स्वाध्याय करने से क्या-क्या लाभ हैं। इसका वर्णन द्वस अध्याय में है। 1. स्वाध्याय किसे कहते हैं ? सत् शास्त्र का पढ़ना, मनन करना या उपदेश देना आदि स्वाध्याय माना जाता है, इसे परम तप कहा है। 2. स्वाध्याय के कितने भेद हैं ? स्वाध्याय के दो भेद हैं - निश्चय स्वाध्याय और व्यवहार स्वाध्याय। 3. निश्चय स्वाध्याय किसे कहते हैं ? ज्ञानभावनालस्यत्यागः स्वाध्यायः- अालस्य त्यागकर ज्ञान की आराधना करना निशश्चय स्वाध्याय है । 4. व्यवहार स्वाध्याय किसे कहते हैं ? अंग प्रविष्ट और अंग बाह्य आगम की वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और उपदेश करना व्यवहार स्वाध्याय है। तत्वज्ञान को पढ़ना, स्मरण करना आदि व्यवहार स्वाध्याय है। 5. व्यवहार स्वाध्याय के कितने भेद हैं ? स्वाध्याय के पाँच भेद हैं वाचना - निर्दोष ग्रन्थ (अक्षर) और अर्थ दोनों को प्रदान करना वाचना स्वाध्याय है। पृच्छना - संशय को दूर करने के लिए अथवा जाने हुए पदार्थ को दृढ़ करने के लिए पूछना सो पृच्छना है। परीक्षा (पढ़ाने वाले की) के लिए या अपना ज्ञान बताने के लिए पूछना, पृच्छना नहीं है। वह तो पढ़ाने वाले का उपहास करना या अपने को ज्ञानी बतलाना है। अनुप्रेक्षा - जाने हुए पदार्थ का बारम्बार चिंतन करना सो अनुप्रेक्षा है। जैसा कि किसी ने कहा है बाटी जली क्यों, पान सड़ा क्यों ? घोड़ा अड़ा क्यों, विद्या भूली क्यों ? सबका एक ही उत्तर है, पलटा नहीं था। आम्नाय - शुद्ध उच्चारण पूर्वक पाठ को पुन:-पुनः दोहराना आम्नाय स्वाध्याय है और पाठ को याद करना भी आम्नाय है। भक्तामर, णमोकार मंत्र आदि के पाठ इसी में गर्भित हैं। धर्मोपदेश - आत्मकल्याण के लिए, मिथ्यामार्ग व संदेह दूर करने के लिए, पदार्थ का स्वरूप, श्रोताओं में रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए धर्म का उपदेश देना धर्मोपदेश है। (तसू, 9/25) 6. कौन-कौन सी गति के जीव स्वाध्याय करते हैं ? मात्र दो गति के जीव स्वाध्याय करते हैं - मनुष्य और देव। 7. कौन-कौन सी गति के जीव धर्मोपदेश देते हैं ? मनुष्य और देवगति के जीव धर्मोपदेश देते हैं। 8. कौन-कौन सी गति के जीव धर्मोपदेश सुनते हैं ? चारों गतियों के जीव धर्मोपदेश सुनते हैं। 9. क्या नारकी भी धर्मोपदेश सुनते हैं ? हाँ, सोलहवें स्वर्ग तक के देव तीसरे नरक तक धर्मोपदेश देने जा सकते हैं। जैसे - सीता का जीव लक्ष्मण के जीव को सम्बोधने के लिए तीसरे नरक गया था। (प्रथमानुयोग की अपेक्षा) 10. ज्ञान के कितने अंग हैं परिभाषा बताइए ? ज्ञान के 8 अंग हैं व्यञ्जनाचार - व्याकरण के अनुसार अक्षर, पद, मात्रा का शुद्ध पढ़ना, पढ़ाना व्यञ्जनाचार है। अर्थाचार - सही-सही अर्थ समझकर पढ़ना-पढ़ाना अर्थाचार है। उभयाचार - शुद्ध शब्द और अर्थ सहित आगम को पढ़ना-पढ़ाना उभयाचार है। कालाचार - शास्त्र पढ़ने योग्य काल में ही पढ़ना-पढ़ाना। अयोग्य काल में सूत्र ग्रन्थ (सिद्धान्त ग्रन्थ) पढ़ने का निषेध है। जैसे- नंदीश्वर श्रेष्ठ महिम दिवसों में, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या,पूर्णिमा तीनों संध्याकालों में, अपर रात्रि में, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, उल्कापात आदि में गणधर देवों द्वारा और ग्यारह अंग, 10 पूर्वधारियों के द्वारा रचित शास्त्र, श्रुतकेवली के द्वारा रचित शास्त्र पढ़ना-पढ़ाना वर्जित है। भावना ग्रन्थ, प्रथमानुयोग, चरणानुयोग, करणानुयोग पढ़ने का निषेध नहीं है। विनयाचार - द्रव्य शुद्धि अर्थात् वस्त्र शुद्धि, काय शुद्धि एवं क्षेत्र शुद्धि के साथ विनयपूर्वक पढ़ना पढ़ाना विनयाचार है। उपधानाचार - धारणा सहित आराधना करना, स्मरण सहित स्वाध्याय करना भूलना नहीं अथवा नियम पूर्वक अर्थात् कुछ त्यागकर स्वाध्याय करना। बहुमानाचार - ज्ञान का, ग्रन्थ का और पढ़ाने वालों का आदर करना, आगम को उच्चासन पर रख कर मंगलाचरण पूर्वक पढ़ना, समाप्ति पर भी भक्ति (जिनवाणी स्तुति) करना आदि। अनिह्नवाचार - जिस शास्त्र से, या जिन गुरु से आगम का ज्ञान हुआ है, उनके नाम को नहीं छुपाना। जैसे - किसी अल्प ज्ञानी गुरु से पढ़े तो उनका नाम लेने से हमारा महत्व घट जाएगा। इससे विशेष ज्ञानी या प्रसिद्ध गुरु का नाम लेना यह निह्नव है और ऐसा नहीं करना अनिह्नवाचार है। (मू,269) 11. स्वाध्याय से कौन-कौन से लाभ हैं ? स्वाध्याय करने से प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा होती है। ज्ञान एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है। सहनशीलता आती है। अज्ञान का नाश होता है। उलझे हुए प्रश्न सुलझ जाते हैं। मन की चंचलता दूर होती है। ज्ञान से चारित्र की प्राप्ति होती है, प्रत्याख्यान नामक 9 वें पूर्व का अध्ययन तीर्थंकर के पादमूल में वर्ष पृथक्त्व तक करता है तब उसे परिहार विशुद्धि संयम की प्राप्ति होती है। देवों द्वारा पूजा भी होती है। जब आचार्य श्री धरसेनजी ने मुनि नरवाहनजी और मुनि सुबुद्धिजी को अध्ययन कराया, अध्ययन की समाप्ति पर भूत जाति के देवों ने पूजन की थी और एक महाराज की दंत पंक्ति सीधी की थी। इसके कारण उनका मुनि भूतबलीजी एवं मुनि पुष्पदन्तजी नाम आचार्य श्री धरसेनजी ने रखा था। ज्ञान के कारण ही मुनि माघनन्दिजी का स्थितिकरण हुआ था। अर्थात् वह पुनः मुनि बन गए। तत्व चिंतन के लिए नए-नए विषय प्राप्त होते हैं। शास्त्र स्वाध्याय सुनते-सुनते एक अजैन बालक कालान्तर में क्षुल्लक गणेशप्रसाद वर्णी बने थे। नोट:- मंगलाचरण तीन बार किया जाता है - आदि, मध्य और अन्त में।
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  16. वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: NandKumar
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