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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  1. मंगलाचरण सन्मति को मम नमन हो, मम मति सन्मति होय। नर-सुर-पशु गति सब मिटे, पंचम गति होय ॥१॥ चन्दन चन्दर - चाँदनी, से जिन-धुनी अतिशीत। उसका सेवन मैं करूँ, मन-वच-तन कर नीत ॥२॥ सुर, सुर-गुरु तक गुरु चरण, रज सर पर सुचढ़ाय। यहमुनि, मन-गुरु-भजन में, निशिदिन क्यों नलगाय ॥३॥ कुन्दकुन्द को नित नमू, हृदय-कुन्द खिल जाय। परम सुगन्धित महक में, जीवन मम घुल जाय ॥४॥ गुण-निधि समन्तभद्रगुरु, महके अगुरु सुगंध। अर्पित जिनपद में रहे, गन्ध-हीन मम छन्द ॥५॥ तरणि ज्ञानसागर गुरो, तारो मुझे ऋषीश। करुणाकर! करुणा करो, कर से दो आशीष ॥६॥ देवागम का मैं करूँ, पद्यमयी अनुवाद। मात्र प्रयोजन मम रहा, मोह मिटे परमाद ॥७॥
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  2. आप्तमीमांसा (२६ सितम्बर,१९८३) आचार्य समन्तभद्रस्वामी द्वारा संस्कृत भाषाबद्ध आप्तमीमांसा' (देवागमस्तोत्रम्) का आचार्यश्री द्वारा पद्यबद्ध यह भाषान्तरण है। उनकी इस कृति में दस परिच्छेद हैं, जिनमें ११४ कारिकाएँ हैं। इसी आप्त-मीमांसा का ज्ञानोदय छन्द' में पद्यानुवाद आचार्यश्री ने किया, पद्यानुवाद के प्रारम्भ में सात दोहों में मंगलाचरण है। मंगलाचरण हमें उनके गुणोदय आदि ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। अन्तर केवल इतना है कि अन्तिम दोहे में ग्रन्थ का नाम बदल दिया गया है। अन्त में पद्यानुवाद-प्रशस्ति है, जिसके एक दोहे में शोध कर पढ़ने का परामर्श है और दूसरे में इसकी रचना का काल है निधि-नभ-नगपति-नयन का सुगन्ध-दशमी योग। लिखा ईसरी में पढ़ो, बनता शुचि उपयोग॥ अर्थात् वीरनिर्वाण संवत् २५०९ की भाद्रपद शुक्ला दशमी, सुगन्धदशमी, विक्रम संवत् २०४०, शुक्रवार, २६ सितम्बर, १९८३ को सिद्धक्षेत्र तीर्थराज सम्मेदशिखर के पादमूल में स्थित ईसरी नगर गिरीडीह, बिहार प्रान्त में इसे लिखा, इसके पढ़ने से शुद्धोपयोग बनेगा।
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  3. कल्याणमन्दिर स्तोत्र (1971) ‘कल्याणमंदिर स्तोत्र' आचार्य कुमुदचन्द्र, अपरनाम श्री सिद्धसेन दिवाकर द्वारा विरचित है। इसका पद्यानुवाद आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने मदनगंज-किशनगढ़, अजमेर (राज.) में सन् १९७१ के वर्षायोग में किया। इस स्तोत्र को पार्श्वनाथ स्तोत्र भी कहते हैं। मूल स्तोत्र एवं अनुवाद दोनों ही वसन्ततिलका छन्द में निबद्ध हैं। इस कृति में उन कल्याणनिधि, उदार, अघनाशक तथा विश्वसार जिन-पद-नीरज को नमन किया गया है जो संसारवारिधि से स्व-पर का सन्तरण करने के लिए स्वयम् पोत स्वरूप हैं। जिस मद को ब्रह्मा और महेश भी नहीं जीत सके, उसे इन जिनेन्द्रों ने क्षण भर में जलाकर खाक कर दिया। यहाँ ऐसा जल है जो आग को पी जाता है। क्या वड़वाग्नि से जल नहीं पिया गया है? स्वामी! महान गरिमायुत आपको वे, संसारि जीव गह, धार स्व-वक्ष मेंऔ। कैसे सु आशु भवसागर पार होते; आश्चर्य! साधुजन की महिमा अचिन्त्य ॥१२॥
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  4. भक्ति पाठ आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने चतुर्विध संघ पर कृपा कर प्रातः स्मरणीय, फलतः नितान्त उपादेय नौ भक्तियों का अनुवाद हिन्दी भाषा में कर दिया है। इससे संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ उपासक जन भी अर्थावबोधपूर्वक अपनी चेतना को सुस्नात और सिक्त कर सकेंगे। उपासक इन्हीं के पाठारम्भ से अपनी दिनचर्या आरम्भ करते हैं और इसी से सम्पन्न भी। इससे इनकी महत्ता स्पष्ट है। ये नौ भक्तियाँ हैं-सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति, नन्दीश्वरभक्ति, चैत्यभक्ति, शान्तिभक्ति तथा पञ्चमहागुरुभक्ति। पहली भक्ति है-‘सिद्धभक्ति' । पंच परमेष्ठियों (परमे तिष्ठति इति परमेष्ठी) में चार कक्षाओं के अधिकारी मनुष्य हैं और एक कक्षा के अधिकारी हैं मुक्त आत्माएँ। ये ही मुक्त आत्मायें ‘सिद्ध' कही जाती हैं। आठों प्रकार के कर्मों के क्षय से जब शरीर भी नहीं रहता तो उसे (विदेह/मुक्त) सिद्ध कहते हैं। ये ऊर्ध्वलोक के लोकाग्र में पुरुषाकार छायारूप में स्थित रहते हैं। इनका पुनः संसार में आगमन नहीं होता। ये सच्चे परम देव हैं। संसारी भव्यजीव वीतराग भाव की साधना से इस अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। वे ज्ञान शरीरी हैं। सिद्धभक्ति में इन्हीं के गुण-गण का वर्णन किया गया है। इसमें पूर्व में की गई उनकी साधना और उससे उपलब्ध ऊँचाइयों का विवरण है। दूसरी है-चारित्रभक्ति। इसमें रत्नत्रय में परिगणित चारित्ररूप रत्न की महिमा गाई गई है और उसकी सुगन्ध आचार में प्रस्फुटित हो, यह कामना व्यक्त की गई है। दर्शन, ज्ञान और चारित्र की सम्मिलित कारणता है-मोक्ष के प्रति । जैन शास्त्रों में इसके अन्तर्गत अत्यन्त सूक्ष्म और वर्गीकृत विवेचन मिलता है। आचार्यश्री ने भी बहुत से पारिभाषिक शब्दों का सांकेतिक प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए कायोत्सर्ग, गुप्तियाँ, महाव्रत, ईर्या आदि समितियाँ, तेरहविध चारित्र, कर्म-निर्जरा 311 I तीसरी भक्ति है-योगिभक्ति । सनातनी विद्या की अभिव्यक्ति की दो धाराएँ हैं-शब्द और प्रातिभ। अभिव्यक्ति की दूसरी धारा श्रमणमार्ग की धारा है। तप एवं खेद के अर्थ वाली दिवादि गण में पठित ' श्रमु' धातु में ‘ल्युट्' प्रत्यय होने पर ‘श्रमण' शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है-तपन या तप करना । पर धारा विशेष में यह योगरूढ़' है-यों यौगिक तो है ही। तप ही इस धारा की पहचान है। यह तत्त्व न तो उस मात्रा में ब्राह्मण धारा में है और न ही बौद्ध धारा में। योगिभक्ति में आचार्यश्री ने प्रबल तपोविधि का विवरण दिया है। कहा गया है ‘‘बाह्याभ्यन्तर द्वादशविध तप तपते हैं मद-मर्दक हैं।'' चौथी भक्ति है-आचार्यभक्ति। पंच परमेष्ठी में तृतीय स्थान आचार्य का है। अध्यात्ममार्ग के पथिक को आचार्य की अँगुली, उनका हस्तावलम्ब अनिवार्य है और यह उनकी भक्ति से ही सम्भव है। कहा गया है उपास्या गुरवो नित्यमप्रमत्तैः शिवार्थिभिः। तत्पक्षतार्थ्य-पक्षान्तश्चरा विघ्नोरगोत्तराः॥ सागारधर्मामृत २/४५ आचार्य रूप श्री सद्गुरु स्वयं दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप और वीर्य-इन पाँच प्रकार के आचारों का पालन करते हैं और अन्य साधुओं से भी उसका पालन कराते हैं, दीक्षा देते हैं, व्रतभंग या सदोष होने पर प्रायश्चित्त कराते हैं। आस्रव के लिए कारणीभूत सभी सम्भावनाओं से अपने को बचाते हैं। इसमें आचार्य के छत्तीस गुण बताये गये हैं। पाँचवी भक्ति है- निर्वाणभक्ति । आचार्यश्री का संकल्प है निर्वाणों की भक्ति का करके कायोत्सर्ग। आलोचन उसका करूँ ले प्रभु तव संसर्ग ॥ ‘महावीर' पदवी से विभूषित तीर्थंकर वर्धमान का निर्वाणान्त पंचकल्याणक अत्यन्त शोभन शब्दों से वर्णित है। इन तीर्थंकर के साथ कतिपय अन्य पूर्ववर्ती तीर्थंकरों की निर्वाणभूमियाँ उनके चिह्नों के साथ वर्णित हैं। छठी भक्ति है-नन्दीश्वरभक्ति। यह १६ जून, १९९१ को सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि, बैतूल (म० प्र०) में अनूदित हुई थी जबकि शेष भक्तियाँ गुजरात प्रान्तवर्ती श्री विघ्नहर पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र महुआ, सूरत गुजरात में २२ सितम्बर, १९९६ को अनूदित हुई थीं। नन्दीश्वर-यह अष्टम द्वीप है। जो नन्दीश्वर सागर से घिरा हुआ है। यह स्थान इतना रमणीय और प्रभावी है कि उसका वर्णन पढ़कर स्वयं आचार्यश्री तो प्रभावित हुए ही हैं और भी कितने मुनियों तथा साधकों को भी यहाँ से दिशा मिली है। ऐसे ही परम पुनीत स्थानों में सम्मेदाचल, पावापुर का भी उल्लेखनीय स्थान है। ऐसे अनेक जिन भवन हैं जो मोक्षसाध्य के हेतुभूत हैं। चतुर्विध देव तक सपरिवार यहाँ इन जिनालयों में आते हैं। आचार्यश्री इन और ऐसे अन्य जिनालयों के प्रति सश्रद्ध नतशिर हैं। सातवीं भक्ति है-चैत्यभक्ति। आचार्यश्री ने बताया है कि जिनवर के चैत्य प्रणम्य हैं। ये किसी द्वारा निर्मित नहीं हैं अपितु स्वयं बने हैं। इनकी संख्या अनगिनत है। औरों के साथ आचार्यश्री की भी कामना है कि वे भी उन सब चैत्यों का भरतखण्ड में रहकर भी अर्चन-वन्दन-पूजन करते रहें ताकि वीर-मरण हो जिनपद की प्राप्ति हो और सामने सन्मति लाभ हो। आठवीं भक्ति है-शान्तिभक्ति। इस भक्ति में दु:ख-दग्ध धरती पर जहाँ कषाय का भानु निरन्तर आग उगल रहा हो, किसे शान्ति अभीष्ट न होगी ? तीर्थंकर शान्तिनाथ शीतल-छायायुक्त वह वट वृक्ष हैं, जहाँ अविश्रान्त संसारी को विश्रान्ति मिलती है। इसीलिए आचार्यश्री कहते हैं सोलहवें तीर्थंकर शान्तिनाथ को दृष्टिगत कर शान्तिनाथ हो विश्वशान्ति हो भाँति-भाँति की भ्रान्ति हरो। प्रणाम ये स्वीकार करो लो किसी भाँति मुझ कान्ति भरो ॥ इस संकलन की अन्तिम भक्ति है-पंच महागुरुभक्ति। इसमें अन्ततः पंच परमेष्ठियों के प्रति उनके गुणगणों और अप्रतिम वैभव का स्मरण करते हुए आचार्यश्री कामना करते हैं कष्ट दूर हो कर्मचूर हो बोधिलाभ हो सद्गति हो। वीरमरण हो जिनपद मुझको मिले सामने सन्मति हो ॥ इन विविध विध भक्तियों में जिनदर्शन सम्मत सर्वविध चिन्तन का सार आ गया है- विशेष कर आत्मचिन्तन का। इस प्रकार आचार्यश्री की निर्झरिणी लोकहितार्थ निरन्तर सक्रिय है।
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  5. (वसंततिलका छन्द) कल्याण-खाण-अघनाशक औ उदार, हैं जो जिनेश-पद-नीरज विश्वसार। संसारवार्धि वर पोत! स्ववक्षधार, उन्हें यहाँ नमन मैं कर बार-बार ॥१॥ रे! रे! हुवा स्तवन ना जिनदेव जी का, धीमान से जब बृहस्पति से प्रभू का। तो मैं उसे हि करने हत जा रहा हूँ, क्यों धृष्टता अहमता दिखला रहा हूँ ॥२॥ मेरे समान लघु-धी कवि लोग सारे, सामान्य से तव सुवर्णन भी विचारे। कैसे करे अहह! नाथ! नहीं करेंगे, उल्लू दिवान्ध रवि को न यथा लखेंगे ॥३॥ है आपको विगतमोह मनुष्य जाना, भो! किन्तु जो तव गुणों उसने गिना ना। तूफान से जलविहीन समुद्र हो तो, वार्धिस्थ रत्नचय का अनुमान है क्या? ॥४॥ मैं स्तोत्र को तव विभो! करने चला हूँ, हैं आप नैक-गुणधाम, व मन्द-धी हूँ। तो बाल भी जलधि की सुविशालता को, फैला स्वहस्त युग को कहता नहीं क्या? ॥५॥ गाये गये तव न भो! गुण योगियों से, मेरा प्रवेश उनमें फिर हन्त कैसे? है हो गई इक यहाँ स्थिति जो अनोखी, गाते स्व वाणि बल से फिर भी विहंग ॥६॥ जो स्तोत्र हे! जिन! सुदूर रहे महात्मा! तेरा हि नाम जग को दुख से बचाता। संतप्त भी पथिक जो रवि ताप से यों, होता सुशान्त जलमिश्रित वायु से है ॥७॥ होते हि वास तव भव्य सुचित्त में त्यों, होते प्रभो शिथिल हैं घनकर्मबन्ध। आते हि चन्दन-सुवृक्ष-सुबीच मोर; हैं दौड़ते सकल ज्यों अहि एक ओर ॥८॥ हो देखते झट जिनेन्द्र! तुझे मनुष्य, होते सुदूर सहसा दुख से अवश्य। गंभीर शूर वसुधापति को यहाँ जो, हैं चोर देख सहसा द्रुत भागते यों ॥९॥ कैसे जिनेश तुम तारक हो जनों के, जो आपको हृदय से धर, पार होते। वा चर्मपात्र जल में तिरता परन्तु, पात्रस्थ वायु बल है उस कर्म में ही ॥१०॥ ब्रह्मा महेश मद को नहिं जीत पाये, भो! आप किन्तु उसको क्षण में जलाये। है ठीक! अग्नि बुझती जल से यहाँ पे, पीया गया न जल क्या? बड़वाग्नि से पै ॥११॥ स्वामी! महान गरिमायुत आपको वे, संसारि जीव गह, धार स्व-वक्ष में औ। कैसे सु आशु भवसागर पार होते, आश्चर्य! साधुजन की महिमा अचिन्त्य ॥१२॥ भो! क्रोध नष्ट पहले जब की बता दो, कर्मोंघ नष्ट तुमसे फिर बाद कैसे? है ठीक ही हरित पूरित भूरुहों को, शीतातिशीत हिम क्या? न यहाँ जलाता ॥१३॥ शुद्धात्मरूप! तुमको जिन! ढूँढ़ते हैं, योगी सदा हृदय नीरज कोश में वे। है ठीक ही, कमल बीज प्रसूतस्थान, अन्यत्र क्या मिलत है? तजकर्णिका को ॥१४॥ छद्मस्थ जीव तव देव! सु ध्यान से ही, यों शीघ्र देह तज वे परमात्म होते। पाषाण जो कनक मिश्रित ईश! जैसा, संयोग पा अनल का द्रुत हेम होता ॥१५॥ भो नित्य भव्य उर में जिन! शोभते हो, कैसे सुनाश करते? उस काय को क्यों? ऐसा स्वभाव रहता समभावियों का, जो हैं महापुरुष विग्रह को नशाते ॥१६॥ जो आपको जिन! अभेद विचार से है, आत्मा से ध्यान करता, तुम-सा हि होता। जो नीर को अमृत मान, उसे हि पीता, क्या नीर जो न उसके विष को नशाता ? ॥१७॥ हे वीतराग! तुमको परवादि लोग, ब्रह्मा-महेश-हरि रूप वि जानते हैं। है ठीक काचकमलामय रोग वाले, क्या शंख को विविध वर्णमयी न जानें? ॥१८॥ धर्मोपदेश जब हो जन दूर होवे, सान्निध्य से हि तब, वृक्ष अशोक होते। है भानु के उदय से जन मोद पाते, उत्फुल्ल क्या तरु-लता दल हो न पाते ॥१९॥ वर्षा यहाँ सुमन की करते हि देव, आश्चर्य! वे कुसुम सर्व अधोमुखी क्यों? है ठीक ही, सुमन बंध सभी हि जाते, नीचे मुनीश! तुमको लख के सदैव ॥२०॥ गंभीर वक्ष जलराशि विनिर्गता जो, हे भारती, तव उसे करते सुपान। हैं भव्य, जीव फलतः मुदमोद होते; औ शीघ्र ही जनन मृत्युविहीन होते? ॥२१॥ स्वामी मनो! नम सुभक्ति सुभाव से ज्यों, स्वर्गीय चामर कलाप हि बोलता है। जो भी करें नमन साधु वराग्र को भो! होगा हि निर्मल तथा वह ऊर्ध्वगामी ॥२२॥ गंभीर भारति-विधारक आपको त्यों, औ श्याम! हेममणिनिर्मित आसनस्थ! आमोद से निरखते सब भव्य मोर, स्वामी! सुमेरु पर मोर पयोद को ज्यों ॥२३॥ भो! आपके हि शित मण्डल ज्योति से जो, देखो हुवा छबि विहीन अशोक वृक्ष। सान्निध्य से फिर विभो तब वीतराग! क्या भव्य चेतन न रागविहीन होते? ॥२४॥ ये आपके अमर दुंदुभि हैं बताते, आके करो अलस छोड़ जिनेन्द्र सेवा। जो आप हैं वह शिवालय सार्थवाह, इत्थं विचार मम है अरु ठीक भी है॥२५॥ जाज्वल्यमान तुमसे त्रय लोक देख, नष्टाधिकार वह चन्द्र हताश होके। यों तीन छत्र मिष से तुम पास आके, सेवा प्रभो शशि यहाँ करता हि तेरी ॥२६॥ संपत्ति से भरितलोक समान आप, कान्ति प्रताप यश का अरु हैं सुधाम। हेमाद्रि दिव्य मणि निर्मित साल से ज्यों, शोभायमान भगवन् इह हो रहे हैं ॥२७॥ देवेन्द्र की जिन! यहाँ नमते हुए की, माला, सुमोच मणिमण्डित मौलियों की। लेती सुआश्रय सदा तव पाद का है, अन्यत्र ना सुमन वासव, ठीक भी है॥२८॥ हैं नाथ! आप भववारिधि से सुदूर, तो भी स्वसेवक जनाऽऽकर को तिराते। है आपको उचित पार्थिव भूप सा भी, आश्चर्य कर्मफल शून्य तथापि आपि ॥२९॥ त्रैलोक्यनाथ जिन हैं। धनहीन भी हैं। हैं आप अक्षर विभो! लिपिहीन भी हैं। ना आप में करण बोध शतांश में भी, विज्ञान है विशद किन्तु जगत्प्रकाशी ॥३०॥ धूली अहो कमठ ने नभ में उड़ा दी, तो भी ढकी तव विभो! उससे न छाया। देखो! जिनेश वह ही फलतः दुरात्मा, धिक् धिक् महान दुख को बहुकाल पाया ॥३१॥ भो! दैत्य से कमठ से घनघोर वर्षा, अश्राव्य गर्जनमयी तुमपें हुई भी। पै आप पे असर तो उसका पड़ा ना, पै दैत्य को नरक में रु पड़ा हि जाना ॥३२॥ धारे हुए सकल थे गलमुंड माला, जो त्यागते अनल को मुख से निराला। भेजा कुदैत्य तव पास पिशाच ऐसे, पै दैत्य के हि दुखकारण हो गए वे ॥३३॥ वे जीव धन्य महि में त्रयलोकनाथ! प्रातः तथा च अपराह्नविभो! सु सन्ध्या। उत्साह से मुदित हो वर भक्ति साथ, शास्त्रानुकूल तव पाद से पूजते हैं॥३४॥ ना आप आज तक भी श्रुतिगम्य मेरे, मानें मुनीश! भववारिधि में हि ऐसा। आ जाय मात्र सुनने तव नाम मन्त्र, आता समीप फिर भी विपदा फणी क्या? ॥३५॥ तेरी न पादयुग पूजन पूर्व में की, जो हैं यहाँ सुखद ईप्सित-वस्तु-दाता। ऐसे विचार मम है फलतः मुनीश, देखो हुवा अब अनादर पात्र मैं हूँ ॥३६॥ मोहान्धकार सु तिरोहित लोचनों से, देखा न पूर्व तुमको जिन! एक बार। ऐसा न हो यदि विभो! मुझको बतादो; क्यों पाप कर्म दिन-रैन मुझे सताते ॥३७॥ देखे गये श्रवणगम्य हुये व पूजे; पै भक्ति से न चित में तुमको बिठाया। हूँ दुःख भाजन हुवा फलतः जिनेश! रे! भावहीन करणी सुख को न देती ॥३८॥ संसार-त्रस्त-जन-वत्सल औ शरण्य, हे नाथ! ईश्वर दया-वर -पुण्य-धाम! हूँ भक्ति से नत, दया मुझमें दिखा के; उद्युक्त हो दुरित अंकुर को जलाने ॥३९॥ हैं आप जीत वसुकर्म सुकीर्तिधारी, पा, पाद कंज युग को यदि आपके मैं। स्वामी! सुदूर निज चिंतन से रहूँ तो; हूँ भाग्यहीन, व मरा, अयि तात! वन्द्य ॥४०॥ श्री पार्श्वनाथ! भवतारक! लोकनाथ! सर्वज्ञदेव! व विभो! सुरनाथ वन्द्य! रक्षा अहो! मम करो, करुणासमुद्र; संसारत्रस्त मुझको, उस छोर भेजो ॥४१॥ पादारविन्द युग-भक्ति-सुपाक, कोई, है तो यहाँ तव विभो भववार्धिपोत! मेरे लिये इह तथा परजन्म में भी हैं आप ही व शरणागत पाल स्वामी ॥४२॥ रोमांचितांगयुत जो तप भव्य जीव, एकाग्र हो तव मुखांबुज में अली से। हैं स्रोत की सुरचना करते यहाँ पे; ऐसे यथाविधि जिनेन्द्र! विभो! शरण्य ॥४३॥ जननयन कुमुदचन्द्र!, परमस्वर्गीय भोग को भोग। वे वसुकर्म नाशकर, पाते शीघ्र मोक्ष को लोग ॥४४॥
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  6. एकीभाव स्तोत्र (मन्दाक्रांता छंद) मेरे द्वारा, अमित भव में, प्राप्त नो कर्म सारे, तेरी प्यारी, जबकि स्तुति से, शीघ्र जाते निवारे। मेरे को, क्या, फिर वह न ही, वेदना से बचाती? स्वामी! सद्यः लघु दुरित को क्या नहीं रे भगाती? ॥१॥ वे ही हर्ता दुख तिमिर के दिव्य-भानू-जिनेश, ऐसे सारे गणधर कहें आपको ज्यों दिनेश। पै है मेरे मुदित मन में वास तेरा हमेशा, तो कैसी ओ! फिर हृदय में रे! रहे पाप दोषा ॥२॥ जो कोई भी विमल मन से मन्त्र से स्तोत्र से या, भव्यात्मा ज्यों भजन करता आपका मोद से या। श्रद्धानी के अहह उसके देह वल्मीक से त्यों सारी नाना वर-विषमयी व्याधियाँ दौड़ती जो ॥३॥ आने से जो अमर पुर से पूर्व ही मेदिनी भी, स्वामी! तेरे सुकृत बल से हेमता को वरी थी। पै मेरे तो मन-भवन में वास जो आपका है, कोढी काया कनक मय हो देव! आश्चर्य क्या है? ॥४॥ तेरे में ही सब विषय संबंधिनी शक्ति भी है, स्वामी! जो है प्रतिहत नहीं, लोक बंधू तभी हैं। मैं कोढ़ी हूँ चिर हृदय में आप मेरे बसे हैं, कैसे काया-जनित-मल दुर्गन्ध को हा! सहे हैं ॥५॥ जन्मों से मैं भ्रमण करता भाग्य से अत्र आया, कर्मों ने तो भव विपिन में हा! मुझे रो रुलाया। मैं तो तेरे नय-सरसि में देव! गोता लगाता, कैसे है औ! फिर अब मुझे दुःख दावा जलाता? ॥६॥ होता तेरे चरण युग सान्निध्य से पद्म देख! लक्ष्मी-धामा, सुरभित तथा हेम जैसा सुरेख। पै मेरा जो मन तव करे स्पर्श सर्वांग को का, तो क्या पाऊँ न फिर अब मैं सौख्य मोक्षादिकों का? ॥७॥ प्याला पीया वच अमृत का आपके भक्ति से है, जो पाया भी मनुज जब आशीष को आपसे है। प्रायः स्वामी! अतुल सुख में लीन भी है यहाँ पे, कैसे पीड़ा दुरित मय कांटे उसे दे वृथा पै ॥८॥ व्योमस्पर्शी मणिमय तथा मान का स्तम्भ भाता, आँखों का ज्यों विषय बनता, मानको त्यों नशाता। आया ऐसा सुबल उसमें आपके संग से है, स्वामी! देखो वह इसलिए ही खड़ा ठाट से है॥९॥ काया को छू तव जब हवा, जो लता को हिलाती, सद्यः ही है जन-निचयकी रोग धूली मिटाती। ध्यानी के तो उर जलज पे आप बैठे यदा हैं, पाता है तो वह स्वधन आश्चर्य भी क्या तदा है॥१०॥ मेरे सारे भव भव दुखों को विभो जानते हैं, होती क्लांती सतत जिनकी याद से हा! मुझे हैं। विश्वज्ञाता सदय तुमको भक्ति से आज पाया, हूँ मैं तेरा मम हृदय में ठीक विश्वास लाया ॥११॥ स्वामी-जीवं-धरवदन से आपके मंत्र को जो, कुत्ता पाता जबकि सुनके अंत में सौख्यको यों। मालाको ले सतत जपता आपके मंत्र को जो, आशंका क्या फिर अमर हो इंद्रता को वरे तो? ॥१२॥ कोई ज्ञानी वर चरित में लीन भी जो सदा है, तेरी श्रद्धा यदि न उसमें तो सभी हा वृथा है। भारी है रे! शिव-सदन के द्वार पे मोह ताला, कैसे खोले, उस बिन उसे, हो सके जो उजाला ॥१३॥ तेरा होता यह यदि न वाक्दीप तत्त्वावभासी, जो है स्वामी! वरसुखद औ मोक्षमार्ग प्रकाशी। छाई फैली शिवपथ जहाँ मोहरूपी निशा है, पाते कैसे फिर तब उसे हाय? मिथ्या दिशा है॥१४॥ आत्मा की जो द्युति अमित है मोद दात्री तथा है, मोही को तो वह इह न ही प्राप्य हा! यो व्यथा है। पै सारे ही लघु समय में आपके भक्त लोग, पाते हैं तव स्तवन से जो उसे धार योग ॥१५॥ भक्ती गंगा नय-हिमगिरी से समुत्पन्न जो है, पैरों को छु तव अरुशिवां बोधि में जा मिली है। मेरा स्वामी! सुमन उसमें स्नान भी तो किया है, तो काया में विकृति फिर भी क्यों रही देव! हा! है॥१६॥ ध्याऊँ भाऊँ जब अचल हो, आपको ध्येय मान, ऐसी मेरी यह मति तदा आप औ मैं समान। मिथ्या ही पे मम मति विभो! कर्म का पाक रे है, तो भी दोषी तव स्तवन से मोक्ष लक्ष्मी वरे है॥१७॥ वाणीरूपी जलधि जग में व्याप्त तेरा जहाँ पे, सप्ताभंगी लहर-मल-मिथ्यात्व को है हटाते। ज्ञानी ध्यानी मथकर उसे चित्तमंदार से वे, सारे ही हैं द्रुत परम पीयूष पी तृप्त होते ॥१८॥ श्रृंगारों को वह पहनता जन्म से जो कुरूप, बैरीयों से परम डरता जो धरे शस्त्र भूप। अष्टांगों से मदन जब तू और बैरी न तेरे, तेरे में क्यों कुसुम पट हो शस्त्र तो नाथ! मेरे॥१९॥ सेवा होती तव अमर से आपकी क्या प्रशंसा, सेवा पाती उस अमर की पे प्रशंसा जिनेशा। धाता, त्राता धगपति तथा मोक्षकांता-सुकांत, ऐसे गावे तव यश यहाँ तो प्रशंसा नितांत ॥२०॥ तेरी वाणी तव चरण तू दूसरों सा न ईश, तो कैसा हो तव स्तवन में जो हमरा प्रवेश। तो भी स्वामी! यह स्तुति सदा आपके सेवकों को, होगी प्यारी अभिलषित को और देगी सुखों को ॥२१॥ रागी द्वेषी जिनवर नहीं, ना किसी की अपेक्षा, मेरे स्वामी? वर सुखद है मार्ग तेरा उपेक्षा। तो भी तेरी वह निकटता कर्महारी यहाँ है, ऐसी भारी विशद महिमा दूसरों में कहाँ है? ॥२२॥ कोई तेरा स्तवन करता भाव से है मनुष्य, होता ना ही शिवपथ उसे वाम स्वामी? अवश्य। जाते जाते शिव सदन की ओर जो आत्म ध्याता, मोक्षार्थी तो तव-समय में यो न संदेह लाता ॥२३॥ जो कोई भी मनुज मन में आपको धार ध्याता, भव्यात्मा यों अविरल प्रभो! आप में लौ लगाता। जल्दी से है शिव सदन का श्रेष्ठ जो मार्ग पाता; श्रेयोमार्गी वह तुम सुनो! पंचकल्याण पाता ॥२४॥ ज्ञानी योगी स्तुति कर सके ना यदा वे यहाँ हैं, तो कैसे मैं तव स्तुति करूं पै तदा रे मुधा है। तो भी तेरे स्तवन मिष से पूर्ण सम्मान ही है, आत्मार्थी को विमल सुख का, स्वर्ग का वृक्ष ही है ॥२५॥ हैं वादिराज वर-लक्षण पारगामी, है न्याय-शास्त्र सब में बुध अग्रगामी। हैं विश्व में नव रसान्वित काव्य धाता, हैं आपसा न जग भव्य सहाय दाता ॥२६॥ त्रैलोक्य पूज्य यतिराज सुवादिराज, आदर्श सादृश सदा वृष-शीश-ताज। वन्दूँ तुम्हें सहज ही सुख तो मिलेगा, ‘विद्यादिसागर' बनूं दुख तो मिटेगा ॥
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  7. एकीभाव स्तोत्र (1971) आचार्य वादिराज प्रणीत संस्कृत भाषाबद्ध इस कृति का ‘मन्दाक्रान्ता छन्द' में पद्यबद्ध भाषान्तरण आचार्यश्री द्वारा किया गया है। इस कृति में यह कहा जा रहा है कि जब आराधक के हृदय में आराध्य से एकीभाव हो गया है, तब यह भव-जलन कैसे हो रही है ? “कैसे है औ! फिर अब मुझे दुःख दावा जलाता ?'' ॥६॥ रचयिता का हृदय पुकार उठता है जो कोई भी मनुज मन में आपको धार ध्याता, भव्यात्मा यों अविरल प्रभो! आप में लौ लगाता। जल्दी से है शिव सदन का श्रेष्ठ जो मार्ग पाता; श्रेयोमार्गी वह तुम सुनो! पंचकल्याण पाता ॥२४॥ इस काव्य का पद्यानुवाद भी आपने मदनगंज-किशनगढ़, अजमेर (राज.) में सन् १९७१ के चातुर्मास काल में किया है।
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  8. समाधिसुधा-शतक (1971) आचार्य पूज्यपाद के द्वारा चित्त को विभाव परिणति से हटाकर स्वभाव में स्थिर करने के लिए समाधितंत्र ग्रन्थ का सृजन हुआ। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने वसंततिलका छन्द के १०५ पद्यों में पद्यानुवाद करके अंत में रचनाकार के स्मरणपूर्वक स्व-नाम का उल्लेख करते हुए उनके श्री-चरणों में प्रणाम निवेदित किया है। अध्यात्म-परक छन्द का पद्यानुवाद दृष्टव्य काया अचेतन-निकेतन दृश्यमान, दुर्गन्ध-धाम पर है। क्षण नश्यमान। तो रोष-तोष किसमें मम हो महात्मा!, मध्यस्थ हूँ इसलिए जब चेतनात्मा ॥४६॥ समाधि-सुधा-शतकम् नामक यह पद्यानुवाद सन् १९७१ के मदनगंज-किशनगढ़, अजमेर (राजस्थान) में हुए वर्षायोग काल के दौरान पूर्ण हुआ था। इस कृति में उन देहानुरागी जीवों को चेतावनी दी गई है जिन्होंने मिथ्यात्व के उदय से जड़ देह को ही आत्मा समझ रखा है। ऐसा मोहग्रस्त रागी अपने स्वभाव' को कभी नहीं समझ सकता। अतः रचयिता कहते हैं जो ग्रन्थ त्याग, उर में शिव की अपेक्षा, मोक्षार्थी मात्र रखता, सबकी उपेक्षा। होता विवाह उसका शिवनारि-संग; तो मोक्ष चाह यदि है बन तू निसंग ॥७१॥ जो आत्म ध्यान करता दिन-रैन त्यागी, होता वही परम आतम वीतरागी। संघर्ष में विपिन में स्वयमेव वृक्ष; होता यथा अनल है अयि भव्य दक्ष! ॥९८॥
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  9. जल वर्षाते घने बादले, काले-काले डोल रहे। झंझा चलती बिजली तड़की घुमड़-घुमड़ कर बोल रहे ॥ पूर्व वैर-वश कमठ देव हो इस विध तुमको कष्ट दिया। किन्तु ध्यान में अविचल प्रभु हो घाति कर्म को नष्ट किया ॥१॥ द्युति-मय बिजली-सम पीला निज फण का मण्डप बना लिया। नाग इन्द्र तव कष्ट मिटाने तुम पर समुचित तना दिया। दृश्य मनोहर तब वह ऐसा विस्मय-कारी एक बना। संध्या में पर्वत को ढकता समेत-बिजली मेघ घना ॥२॥ आत्म ध्यान-मय कर में खरतर खड्ग आपने धार लिया। मोहरूप निज दुर्जय रिपु को पल-भर में बस मार दिया। अचिन्त्य-अद्भुत आर्हत् पद को फलतः पाया अघहारी। तीन लोक में पूजनीय जो अतिशयकारी अतिभारी ॥३॥ मनमाने कुछ तापस ऐसे तप करते थे वनवासी। पाप-रहित तुम को लख, इच्छुक तुम-सम बनने अविनाशी ॥ हम सब का श्रम विफल रहा यो समझ सभी वे विकल हुए। शम-यम-दममय सदुपदेश सुन तव चरणन में सफल हुए ॥४॥ समीचीन विद्या-तप के प्रभु रहे प्रणेता वरदानी। उग्र-वंशमय विशाल नभ के दिव्य सूर्य, पूरण ज्ञानी ॥ कुपथ निराकृत कर भ्रमितों को पथिक सुपथ के बना दिये। पार्श्वनाथ मम पास वास बस, करो, देर अब बिना किये ॥५॥ (दोहा) खास दास की आस बस श्वाँस-श्वाँस पर वास। पाश्र्व करो मत दास को उदासता का दास ॥१॥ ना तो सुर-सुख चाहता शिव-सुख की ना चाह। तव थुति-सरवर में सदा होवे मम अवगाह ॥२॥
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  10. पर से बोधित नहीं हुए पर, स्वयं स्वयं ही बोधित हो। समकित-संपति ज्ञान नेत्र पा जग में जग-हित शोभित हो ॥ विमोह-तम को हरते तुम प्रभु निज-गुण-गण से विलसित हो। जिस विध शशि तम हरता शुचितम किरणावलिले विकसित हो ॥१॥ जीवन इच्छुक प्रजाजनों को जीवन जीना सिखा दिया। असि, मषि, कृषि आदिक कर्मों को प्रजापाल हो दिखा दिया ॥ तत्त्व-ज्ञान से भरित हुए फिर बुध-जन में तुम प्रमुख हुए। सुर-पति को भी अलभ्य सुख पा विषय-सौख्य से विमुख हुए ॥२॥ सागर तक फैली धरती को मन-वच-तन से त्याग दिया। सुनन्द-नन्दा वनिता तजकर आतम में अनुराग किया। आतम-जेता मुमुक्षु बनकर परीषहों को सहन किया। इक्ष्वाकू-कुल-आदिम प्रभुवर अविचल मुनिपन वहन किया ॥३॥ समाधि-मय अति प्रखर अनल को निज उर में जब जनम दिया। दोष-मूल अघ-घाति कर्म को निर्दय बनकर भसम किया ॥ शिव-सुख-वांछक भविजन को फिर परम तत्त्व का बोध दिया। परम-ब्रह्म-मय अमृत पान कर तुमने निज घर शोध लिया ॥४॥ विश्व-विज्ञ हो विश्व-सुलोचन बुध-जन से नित वंदित हो। पूरण-विद्या-मय तन धारक बने निरंजन नंदित हो ॥ जीते छुट-पुट वादी-शासन अनेकान्त के शासक हो। नाभि-नन्द हे! वृषभ जिनेश्वर मम-मन-मल के नाशक हो ॥५॥ आदिम तीर्थंकर प्रभो आदिनाथ मुनिनाथ! आधि व्याधि अघ मद मिटे तुम पद में मम माथ ॥१॥ शरण, चरण हैं आपके तारण तरण जहाज। भव-दधि-तट तक ले चलो! करुणाकर जिनराज ॥२॥
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  11. पद्यानुवादक-प्रशस्ति लेखक कवि मैं हूँ नहीं मुझमें कुछ नहिं ज्ञान। त्रुटियाँ होवें यदि यहाँ, शोध पढ़ें धीमान ॥१॥ निधि-नभ-नगपति-नयन का सुगन्ध-दशमी योग। लिखा ईसरी में पढ़ो बनता शुचि उपयोग ॥२॥ मंगल - कामना विहसित हो जीवनलता विलसित गुण के फूल। ध्यानी मौनी सूँघता महक उठी आ-मूल ॥१॥ सान्त करूँ सब पाप को हरूँ ताप बन शान्त। गति-अगति रति मति मिटे मिले आप निज प्रान्त ॥२॥ रग रग से करुणा झरे दुखी जनों को देख। विषय-सौख्य में अनुभवू स्वार्थ-सिद्धि की रेख ॥३॥ रस-रूपादिक हैं नहीं मुझ में केवलज्ञान। चिर से हूँ चिर औ रहूँ, हूँ जिनके बल जान ॥४॥ तन मन से औ वचन से पर का कर उपकार। यह जीवन रवि सम बने मिलता शिव-उपहार ॥५॥ हम, यम दम शम सम धरें, क्रमशः कम श्रम होय। देवों में भी देव हो अनुपम अधिगम होय ॥६॥ वात बहे मंगलमयी छा जावे सुख छाँव। गति सबकी सरला बने टले अमंगल भाव ॥७॥ मन ध्रुव निधि का धाम हो, क्यों? बनता तू दीन। है उसको बस देख ले, होकर निज में लीन ॥८॥
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  12. आप्तमीमांसा सर पर फिरते छतर चँवर वर स्वर्णासन पर अधर लसे। ऊपर से सुर उतर उतर कर तुम पद में बन भ्रमर बसे ॥ इस कारण से पूज्य हमारे बने प्रभो! यह बात नहीं। इस विध वैभव माया-जाली भी पाते क्या? ज्ञात नहीं ॥१॥ जरा-रहित है रोग-रहित है उपमा से भी रहित रहा। तव तन अकालमरणादिक से रहित रहा द्युति सहित रहा ॥ इस कारण से भी तुम प्रभु तो पूज्य हमारे नहीं बने। देवों की भी दिव्य देह है देव सुखों में तभी सने ॥२॥ आगम, आगमकर्ता अनगिन तीर्थकरों की कमी नहीं। किन्तु किसी की कभी किसी से बनती नहिं है कमी यही ॥ कौन सही फिर कौन सही ना! इसीलिए सब आप्त नहीं। किन्तु एक ही इन सब में ही गुरु चेता' यह बात रही ॥३॥ कहीं किसी में मोहादिक की तरतमता वह विलस रही। अतः ईश तुम, तुम में जड़ से अघ की सत्ता विनस रही ॥ यथा कनक-पाषाण, कनक हो समुचित साधन जब मिलता। चरित-बोध-दृग आराधन से बाह्याभ्यन्तर मल मिटता ॥४॥ सूक्ष्म रहें कुछ, दूर रहें कुछ बहुत पुराने तथा रहें। पदार्थ सब प्रत्यक्ष रहे हैं किसी पुरुष के, पता रहे ॥ अनलादिक अनुमान-विषय हैं, स्पष्ट किसी को यथा रहें। इसीलिए सर्वज्ञ-सिद्धि हो साधु-सन्त सब बता रहे ॥५॥ ‘सो' तुम ही ‘सर्वज्ञ' रहे प्रभु दोष-कोष से मुक्त रहे। बोल, बोलते युक्ति-शास्त्र से युक्त रहें उपयुक्त रहें। विसंवाद तव मत में नहिं है पक्षपात से दूर रहा। अन्य मतों से बाधित भी ना क्षमता से भरपूर रहा ॥६॥ अपने को सर्वज्ञ मानकर मान-दाह में दग्ध हुए। सदा सर्वथा मतैकान्त के क्षार-स्वाद में दग्ध हुए। सुधा-सार है तव मत, जिसके सेवन से तो वंचित हैं। बाधित हो प्रत्यक्ष-ज्ञान से उनका मत अघ रंजित है ॥७॥ पोषक हैं एकान्त मतों के अनेकान्त से दूर रहें। निजके निज ही शत्रु रहें वे औरों के भी क्रूर रहें। उनके मत में पुण्य, पुण्य-फल, नहीं पापफल, पाप नहीं। नाथ! मोह नहिं, मोक्ष नहीं हो, इह भव, परभव आप नहीं ॥८॥ पदार्थ सारे भावरूप ही होते यदि यूँ मान रहे। सभी अभावों का फिर क्या हो निश्चित ही अवसान रहे ॥ सबके सब फिर विश्वरूप हों आदि नहीं फिर अन्त नहीं। आत्मरूप का विलय हुआ यूँ तुम मत में भगवन्त नहीं ॥९॥ प्रागभाव का मन से भी यदि करो अनादर घोर कहीं। घट पट आदिक कार्यद्रव्य हो अनादि फिर तो छोर नहीं ॥ अभाव जो प्रध्वंस रूप है उसका स्वागत नहिं करते। कार्यद्रव्य ये नियम रूप से अनन्तता को हैं धरते ॥१०॥ रहा ‘परस्पर अभाव' घट पट आदिक में जो एक खरा। उसे न माना, विशेष बिन, सब एक रूप हों, देख जरा ॥ अभाव जो अत्यन्त रूप है द्रव्य अचेतन चेतन में। जिस बिन चेतन बने अचेतन चेतनता आती तन में ॥११॥ अभाव को एकान्त रूप से मान रहे वे भूल रहे। भावपक्ष को पूर्ण रूप से उड़ा रहे प्रतिकूल रहे। प्रमाणता को आगम, अधिगम कभी नहिं फिर धर सकते। निजमत पोषण, परमत शोषण फिर किस विध हैं कर सकते ॥१२॥ स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महाविरोधक बने हुए। पदार्थ भावाभावात्मक हो ऐसा कहते तने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित, सब वृथा रही। दोष घने एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥१३॥ भाव रूप ही रहा कथंचित् पदार्थ को जिनमत जानो। वही इष्ट फिर अभावमय हो रहा कथंचित् पहिचानो॥ उभय रूप भी, अवाच्य सो है, नहीं सर्वथा तथा रहा विविध नयों का लिया सहारा छन्द यहाँ यह बता रहा ॥१४॥ अपने अपने चतुष्टयों से सत्त्व रूप ही सभी रहें। किन्तु सभी परचतुष्टयों से असत्त्व ही गुरु सभी कहें॥ ऐसा यदि तुम नहीं मानते चलते पथ विपरीत कहीं। बिना अपेक्षा ‘सदसत् सब' यूँ कहना यह बुध-रीत नहीं ॥१५॥ अस्तिरूप औ नास्ति रूप भी उभय रूप यों तत्त्व रहा। अवक्तव्य भी, तीन रूप भी शेष भंग, मय सत्त्व रहा ॥ अनेकान्तमय वस्तुतत्त्व यह स्याद्वाद से अवगत हो। विसंवाद सब मिटते इससे सुधी जनों का अभिमत हो ॥१६॥ किसी एक जीवादि वस्तु में बात तुम्हें यह ज्ञात रहे। अस्तिपना वह नियम रूप से नास्तिपना के साथ रहे ॥ कारण सुन लो, एक वस्तु में कई विशेषण हैं रहते। ‘सो' सहभावी ज्यों सहधर्मी वैधर्मी का, गुरु कहते ॥१७॥ किसी एक जीवादि वस्तु में बात तुम्हें यह ज्ञात रहे। नास्तिपना वह नियम रूप से अस्तिपना के साथ रहे ॥ कारण सुन लो एक वस्तु में कई विशेषण हैं रहते। ‘सो' सहभावी ज्यों सहधर्मी वैधर्मी का, गुरु कहते ॥१८॥ शब्दों का जो विषय बना है विशेष्य उसकी यह गाथा। विधि औ निषेध वाला होता छन्द यहाँ है यह गाता ॥ यथा अनल हो साध्यधर्म जब धूम्र हेतु हो वहाँ सही। किन्तु नीर जब साध्य-धर्म हो धूम्र हेतु तब रहा नहीं ॥१९॥ इसी तरह ही शेष भंग भी साधित हो गुरु समझाते। समुचित नय के प्रयोग द्वारा सब उलझन को सुलझाते ॥ कारण इसमें किसी तरह भी विरोध को कुछ जगह नहीं। हे मुनिनायक! तव शासन में मुनि यह रमता वजह यही ॥२०॥ इसविध निषेध-विधिवाली यह पद्धति स्वीकृत जब होती। बुधस्वीकृत वह वस्तुव्यवस्था कार्यकारिणी तब होती ॥ ऐसा यदि ना मान रहे तुम अर्थशून्य सब कार्य रहें। बाह्याभ्यन्तर साधन भी वे व्यर्थ रहें यूँ आर्य कहें ॥२१॥ अनन्त धर्मों का आकर ही प्रति पदार्थ का बाना हो। उन उन धर्मों में पदार्थ का भिन्न भिन्न ही भाना हो ॥ एक धर्म जब मुख्य बना ‘सो' शेष धर्म सब गौण हुए। स्याद्वाद का स्वाद लिया जो विवाद सारे मौन हुए ॥२२॥ एक रहा है अनेक भी है, उभय रूप भी तत्त्व रहा। अवक्तव्य भी शेष भंगमय विविध रूप यूँ सत्त्व रहा संशय-मथनी सप्तभंगिनी का प्रयोग यूँ सुधी करें। उचित नयों से, नय विधान में कुशल रहें, सुख सभी वरें ॥२३॥ द्वैत नहीं अद्वैत तत्त्व है मतैकान्त का यह कहना। अपने वचनों से बाधित है विरोध-बहाव में बहना ॥ क्योंकि कारकों तथा क्रियाओं में दिखता वह भेद रहा। और एक खुद, खुद का किस विध जनक रहा, यह खेद महा ॥२४॥ मानो तुम अद्वैत विश्व को पाप-पुण्य दो कर्म नहीं। कर्म-पाक फिर सुख, दुख दो ना इह भव, परभव धर्म नहीं ॥ ज्ञान तथा अज्ञान नहीं दो द्वैत-भाव का नाश हुआ। बन्ध मोक्ष फिर कहाँ रहे दो यह कहना निज हास हुआ ॥२५॥ यदि तुम मानो किसी हेतु से सिद्ध हुआ अद्वैत रहा। हेतु साध्य दो मिलने से फिर सिद्ध हुआ वह द्वैत रहा ॥ अथवा यदि अद्वैत सिद्ध हो बिना हेतु यूँ मान रहे। बिना हेतु फिर द्वैत सिद्ध हो इसविध क्यों ना मान रहे ॥२६॥ बिना हेतु के अहेतु ना हो जैसा सबको अवगत है। बिना द्वैत अद्वैत नहीं हो वैसा ही यह बुधमत है॥ निषेध-वाचक वचन रहें जो विधि-वाचक के बिना नहीं। निषेध उसका ही होता जो निषेध्य, जिसके बिना नहीं ॥२७॥ पृथक् पृथक् ही पदार्थ सारे ऐसा यदि एकान्त रहा। गुणी तथा गुण अभिन्न होते पता नहीं? क्या भ्रान्त रहा ॥ पृथक् नाम का गुण यदि न्यारा गुणी तथा गुण से होता। बहु अर्थों में ‘सो' है कहना विफल आपपन से होता ॥२८॥ द्रव्य रूप एकत्व भाव को नहीं मानते यदि बुध हो। जनन मरण आदिक किसके हो प्रेत्यलोक फिर किस विध हो ॥ और नहीं समुदाय गुणों का सजातीयता बने नहीं। तथा नहीं संतान श्रृंखला और दोष बहु घने यहीं ॥२९॥ ज्ञान ज्ञेय से भिन्न रहा यदि चिदात्म से भी भिन्न रहा। असत् ठहरते ज्ञान ज्ञेय दो सत्वत् फिर क्या? प्रश्न रहा ॥ अभाव जब हो ज्ञान-भाव का ज्ञेय-भाव फिर कहाँ टिके। बाह्याभ्यन्तर ज्ञेय शून्य फिर हे जिन! परमत कहाँ टिके ॥३०॥ समान जो सामान्य मात्र को विषय बनाते वचन सभी। विशेष वचनातीत वस्तु है बौद्धों का है कथन यही ॥ अतः नहीं सामान्य वस्तुतः वचन सत्य से वंचित हो। ऐसे वचनों से फिर कैसे कथन कथ्य श्रुति संगत हो ॥३१॥ पृथक्पना एकत्वपना मय पदार्थ कहते तने हुए। स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महा विरोधक बने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष सभी एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥३२॥ पृथक्पना एकत्वपना यदि भ्रातृपना को छोड़ रहें। दोनों मिटते क्योंकि परस्पर दोनों का वह जोड़ रहें॥ लक्षण से तो भिन्न भिन्न हों किन्तु द्वयात्मक द्रव्य कथा। अन्वय आदिक भेद भले हो तन्मय साधन भव्य यथा ॥३३॥ सत् सबका सामान्य रूप है इसीलिए बस एक सभी। निज निज गुण लक्षण धर्मों से पृथक् परस्पर एक नहीं ॥ कभी विवक्षित भेद रहा हो अभेद किंवा रहा कभी। बिना हेतु के नहीं सहेतुक बुध साधित है रहा सही ॥३४॥ यथार्थ है यह प्रति पदार्थ में अमित गुणों का वास रहा। वर्णन उनका युगपत् ना हो वर्षों से विश्वास रहा ॥ इसीलिए वक्ता पर आश्रित मुख्य गौणता रहती है। मुख्य गौण भी सत् ही होता असत् नहीं श्रुति कहती है ॥३५॥ भेद तथा है अभेद दोनों नहिं है ऐसा मत समझो। प्रमाण के ये विषय रहे हैं कुछ सोचो तुम मत उलझो ॥ एक वस्तु में इनका रहना नहीं असंगत, विदित रहे। मुख्य गौण की यही विवक्षा जिनमत में ही निहित रहें ॥३६॥ नित्य रूप एकान्त पक्ष का यदि तुम करते पोषण हो। पदार्थ में परिणमन नहीं हो क्रिया मात्र का शोषण हो। कर्ता किसका पहले से ही कारक का वह नाम नहीं। प्रमाण फिर क्या? रहा बताओ प्रमाण-फल का काम नहीं ॥३७॥ प्रमाण कारक से यदि मानो पदार्थ भासित होते हैं। जैसे इन्द्रियगण से निज निज विषय प्रकाशित होते हैं। नित्य रहे हैं वैसे वे भी विकार किस में किस विध हो। जिनमत से जो विमुख रहे हों सुख तुम मत में किस विध हो ॥३८॥ सांख्य पुरुष सम सदा सर्वथा कार्य रहे सद्रूप रहे। यदि यूँ कहते, किसी कार्य का उदय नहीं मुनि भूप कहे॥ फिर भी यदि तुम विकारता की करो कल्पना वृथा रही। नित्य रूप एकान्त पक्ष की वही बाधिका व्यथा रही ॥३९॥ पुण्य क्रिया नहिं पाप क्रिया नहिं औ सुख दुख फल नहीं रहे। जन्मान्तर फिर कैसा होगा मूल बिना फल नहीं रहे। कर्म-बन्ध की गंध नहीं जब मोक्षतत्त्व की बात नहीं। ऐसे मत के नायक नहिं जिन! मुमुक्षुओं के नाथ सही ॥४०॥ क्षणिक रूप एकान्त पक्ष के आग्रह का यदि स्वागत हो। प्रेत्यभाव का अभाव होगा शिवसुख भी ना शाश्वत हो ॥ स्मरणादिक ज्ञानों का निश्चित क्यों ना ‘सो अवसान रहा। किसी कार्य का सूत्रपात नहिं फल का फिर अनुमान कहाँ? ॥४१॥ कार्य सर्वथा असत्य ही हो ऐसा तव मत मूल रहा। कार्य सभी आकाशकुसुम सम कभी न जनमें भूल अहा ॥ उपादान कारण सम होता कार्य नियम यह नहीं रहा। किसी कार्य के होने में फिर संयम भी वह नहीं रहा ॥४२॥ तथा कार्य-कारण-भावादिक क्षणिक पंथ में रहे कदा। आपस में ना अन्वय रखते अन्य अन्य ही रहे सदा ॥ जिस विध है सन्तानान्तर से भिन्न रूप सन्तान रही। एकमेक सन्तान नहीं है सन्तानी से जान सही ॥४३॥ पृथक्-पृथक् सब यदपि रहा पर अनन्य सा टिमकार रहा। और वही उपचार कहो यूँ क्यों न झूठ उपचार रहा ॥ तथा मुख्य जो अर्थ रहा है कभी नहीं उपचार रहा। बिना मुख्य उपचार नहीं हो सन्तों का उद्गार रहा ॥४४॥ सदसत् उभयानुभयात्मक जो वस्तु धर्म का कथन रहा। सब धर्मों के साथ उचित ना सुगत पन्थ का वचन रहा ॥ सन्तानी सन्तान भाव से अन्य रहा या अन्य नहीं। कह नहिं सकते अवक्तव्य है इसीलिए बुध मान्य नहीं ॥४५॥ सन्तानी सन्तानन में यदि सदादि चहुविध कथन नहीं। अवक्तव्यमय वस्तु धर्म में सदादि किस विध वचन सही ॥ किसी तरह भी किसी धर्म का कथन नहीं फिर वस्तु नहीं। तुम्हें विशेषण विशेष्य रीता वस्तु इष्ट ही अस्तु कहीं ॥४६॥ अपने मन से होकर परमन से पदार्थ ओझल होता। जिसकी सत्ता विद्यमान है निषेध उस ही का होता ॥ किन्तु यहाँ पर किसी भाँति भी यदि जिसका अस्तित्व नहीं। उसका विधान निषेध ना हो सुनो जरा वस्तुत्व यही ॥४७॥ सभी तरह के धर्मों से यदि पूर्ण रूप से रहित रहा। अवक्तव्य वह वस्तु नहीं हो मतैकान्त से सहित रहा ॥ आप पने से वस्तु वही पर अवस्तु पर पन से होती। अनेकान्त की पूजा फलतः हम से तन मन से होती ॥४८॥ अवक्तव्य हो प्रति पदार्थ में धर्म रहे कुछ औ न रहे। ऐसा यदि है बोल रहे क्यों बन्द रहे मुख मौन रहे॥ यदि मानो हम बोल रहे ‘सो' मात्र रहा उपचार अहा। मृषा रहा उपचार सत्य से दूर रहा बिन सार रहा ॥४९॥ अवक्तव्य, क्यों अभाव है या उसका ही नहिं बोध रहा। कथन शक्ति का या अभाव है जिस कारण अवरोध रहा ॥ जब कि सुगत अति विज्ञ बली है तुम सबकी दृग खोल रहा । मायावी बन बोल रहा क्या? लगता यह सब पोल रहा ॥५०॥ हिंसा का संकल्प किया वह कभी न हिंसा करता है। भाव किये बिन हिंसा करता चित्त दूसरा मरता है॥ इन दोनों को छोड़ तीसरा चित्त बन्ध में है फँसता। फँसा मुक्त नहिं और मुक्त हो क्षणिक पंथ पर जग हँसता ॥५१॥ कभी किसी का नाश हुआ ‘सो' रहा अहेतुक सुगत कहे। हिंसक से हिंसा होती है यह कहना फिर गलत रहे। और चित्त की सन्तति का यदि नाश मोक्ष का मूल रहा। समतादिक वसु साधन से हो मोक्ष मानना भूल रहा ॥५२॥ कपाल आदिक उद्भव में तो हेतु अपेक्षित रहता हो। घट आदिक के किन्तु नाश में हेतु उपेक्षित रहता हो ॥ इन दोनों में विशेषता कुछ रही नहीं कुछ भेद नहीं। कहने भर को भेद रहा है हेतु एक है खेद यही ॥५३॥ रूपादिक की नामादिक की विकल्प की जो सन्तति है। कार्य नहीं ‘सो' औपचारिकी कहती सौगत की मति है॥ विनाश विकास फिर किसके हो तथा सततता किसकी हो। भला बता! आकाशकुसुम को आँख देखती किसकी ओ ॥५४॥ स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महा विरोधक बने हुए। पदार्थ नित्यानित्यात्मक ही ऐसा कहते तने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष सभी एकान्तवाद में आते हैं श्रुति बता रही ॥५५॥ स्मृति पूर्वक प्रत्यक्ष ज्ञान वह बिना हेतु का नहिं होता। अतः प्रवाहित तत्त्व कथंचित् नित्य रहा यह सुन श्रोता ॥ क्षणिक कथंचित् क्योंकि उसी की प्रतिपल मिटती पर्यायें। कदाग्रही के यह ना बनता है जिन तव मत समझायें ॥५६॥ सभी दशाओं में ज्यों-का-त्यों द्रव्य सदा यह लसता है। द्रव्य कभी सामान्य रूप से नहीं जनमता नशता है॥ पर्यायों से किन्तु जनमता क्रमशः मिटता रहता है। एक द्रव्य में जनन मरण स्थिति घटती, जिनमत कहता है ॥५७॥ नियम रहा यह कारण मिटता दिखा कार्य का मुख प्यारा। कारण, कारण लक्षण न्यारा तथा कार्य का भी न्यारा ॥ किन्तु कार्य कारण दोनों की जाति एक ही है भाती। जाति क्षेत्र भी भिन्न रहे तो गगनकुसुम की स्थिति आती ॥५८॥ एक पुरुष तो कलश चाहता, एक मुकुट को, देख दशा। कलश मिटा जब मुकुट बनाया एक रुलाया एक हँसा ॥ निरख कनक की स्थिति कनकार्थी शोक किया ना नहीं हँसा। मिटना बनना स्थिर भी रहना रहा सहेतुक, नहीं मृषा ॥५९॥ केवल दधि का त्याग किया है दुग्ध-पान वह करता है। दुग्ध-पान का त्याग किया है दधि का सेवन करता है। दोनों का सेवन ना करता जो है गोरस का त्यागी। तत्त्व त्रयात्मक रहा इसी से गुरु कहते यूं बड़भागी ॥६०॥ कार्य तथा कारण ये दोनों रहें परस्पर न्यारे हैं। तथा गुणी से गुण भी होते न्यारे न्यारे सारे हैं। विशेष से सामान्य सर्वथा सदा भिन्न ही रहता है। ऐसा यदि एकान्त रूप से वैशेषिक मत कहता है ॥६१॥ एक कार्य के अनेक कारण होते यह फिर नहिं रहता। क्योंकि एक में भाग नहीं हैं बहुरूपों में वह बहता ॥ एक कार्य यदि बहु भागों में भाजित हो फिर एक कहाँ?। कार्य-विषय में पर-मत में यूँ दोषों का अतिरेक रहा ॥६२॥ कार्य तथा कारण ये न्यारे देश-काल वश भी न्यारे। घट पट में ज्यों भेदात्मक व्यवहार रहा है सुन प्यारे॥ तथा मूर्त सब कार्य कारणों की स्थिति पूरी जुदी रही। उसमें फिर वह एक देशता कभी न बनती सही रही ॥६३॥ कार्य तथा कारण में होता आश्रय-आश्रयि भाव रहा। समवायी-समवाय-बन्ध तब स्वतंत्र ना यह भाव रहा ॥ बन्ध-रहित संबंध रहा यह तुम में सब निर्बन्ध अरे। समवायी-समवाय निरे जब आपस में कब बन्ध करे ॥६४॥ नित्य एक सामान्य रहा है उसी भाँति समवाय रहा। एक एक अवयव में व्यापे यह जिन का व्यवहार रहा ॥ आश्रय के बिन रह नहिं सकते फिर इनकी क्या कथा रही। मिटतीं बनतीं क्षणिकाओं में कौन व्यवस्था बता सही ॥६५॥ भिन्न रहा समवाय सर्वथा तथा भिन्न सामान्य रहा। आपस में फिर बन्धन इनका किस विध कब वह मान्य रहा ॥ इनसे फिर गुण पर्ययवाले पदार्थ का भी बन्ध नहीं। फिर क्या कहना, गगनकुसुम सम तीनों की ही गन्ध नहीं ॥६६॥ अणु अणु मिलकर स्कन्ध बने ना चूंकि सभी वे निरे निरे। स्कन्ध बने तो अविभागी ना रह सकते अणु निरे परे ॥ अवनि अनल औ सलिल अनिल ये भूतचतुष्टय भ्रान्ति रही। अन्यपना या अनन्यपनमय मतैकान्त में शान्ति नहीं ॥६७॥ कार्य-मात्र की भ्रान्ति रही तो अणु स्वीकृति भी भ्रान्ति रही। क्योंकि कार्य का दर्शन ही तो कारण का अनुमान सही ॥ भूत चतुष्टय औ अणु का जब अभाव निश्चित होता हो। उनके गुण-जात्यादिक का वह वर्णन क्यों ना? थोथा हो ॥६८॥ एकमेक यदि कार्य कारण हो एक मिटे इक शेष रहा। इनमें अविनाभाव रहा ‘सो' रहा शेष निश्शेष अहा ॥ दो की संख्या भी नहिं टिकती यदि मानो वह कल्पित है। कल्पित सो मिथ्या मानी है मात्र सांख्य-मत जल्पित है ॥६९॥ स्याद्वादमय न्यायमार्ग जैन के महाविरोधक बने हुए। गुण, गुणधर आदिक उभयात्मक ऐसा कहते तने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष सभी एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥७०॥ द्रव्य तथा पर्यायों में वह रहा कथंचित् ऐक्य सही। कारण? दोनों का प्रदेश है एक रहा व्यतिरेक नहीं ॥ परिणामी परिणाम रहे हैं द्रव्य तथा ये पर्यायें। शक्तिमान यदि द्रव्य रहा तो रही शक्तियाँ पर्यायें ॥७१॥ इसी तरह इन दोनों का बस भिन्न-भिन्न ही नाम रहा। संख्या इनकी निरी निरी है न्यारे लक्षण काम रहा ॥ यथार्थ में यह अनेकान्त से बनता सुन नानापन है। परन्तु हा! एकान्त पक्ष में तनता मनमानापन है॥७२॥ गुणी गुणादिक सदा सर्वदा आपेक्षिक यदि साधित हों। दोनों कल्पित होने से वे सिद्ध नहीं हों बाधित हों ॥ अनपेक्षिक ही सिद्धि उन्हीं की ऐसा यदि तुम मान रहे। विशेषता सामान्य पना ना सहचर का अवसान रहे ॥७३॥ स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महाविरोधक बने हुए। आपेक्षिक अनपेक्षिक द्वयमय ‘पदार्थ' कहते तने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष सभी एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥७४॥ धर्म बिना धर्मी नहिं धर्मी के बिन भी वह धर्म नहीं। रहा परस्पर अन्वय इनका आपेक्षित है मर्म यही ॥ स्वरूप इनका किन्तु स्वतः है ज्ञापक कारक अंग यथा। ज्ञान स्वत: तो ज्ञेय स्वत: है कर्म-करण निजरंग कथा ॥७५॥ हेतु मात्र से तत्त्व ज्ञात हो सिद्ध हो रहे काम सभी। इन्द्रिय आगम आप्तादिक फिर व्यर्थ रहे कुछ काम नहीं ॥ या आगम से तत्त्व ज्ञात हो सबके आगम मौलिक हो। उनमें वर्णित पदार्थ-सारे लौकिक भी पर-लौकिक हों ॥७६॥ स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महाविरोधक बने हुए। तत्त्व ज्ञात हो शास्त्र, हेतु से ऐसे कहते तने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष सभी एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥७७॥ वक्ता यदि वह आप्त नहीं तो वस्तु तत्त्व का बोध न हो। मात्र हेतु से साधित जो है बोध नहीं वह बोझ अहो! परन्तु वक्ता आप्त रहा तो वचन उन्हीं के शास्त्र बने। उन शास्त्रों से तत्त्व ज्ञात कर भविक सभी सुख-पात्र बने ॥७८॥ भीतर के निज-ज्ञान मात्र से जाने जाते अर्थ रहें। ऐसा यदि एकान्त रहा तो मनस वचन सब व्यर्थ रहें। उपदेशादिक प्रमाण नहिं फिर सभी प्रमाणाभास रहे। एकान्तिक आग्रह करने से अपना ही उपहास रहे॥७९॥ साध्य तथा साधन का जब भी ज्ञान हमें जो होता है। मात्र रहा वह ज्ञान एक है और नहीं कुछ होता है॥ ऐसा यदि एकान्त रहा तो कहाँ साध्य फिर साधन हो। और, पक्ष में साध्य-दर्शिका निजी-प्रतिज्ञा बाधक हो ॥८०॥ बाह्य अर्थ परमार्थ रहे हैं अंतरंग कुछ खास नहीं। ऐसा यदि एकान्त रहा तो रहा प्रमाणाभास नहीं ॥ वस्तु-तत्त्व का कथन यदपि जो यद्वा तद्वा करते हैं। उन सबके सब कार्य सिद्ध हों वितथ सत्यता वरते हैं ॥८१॥ स्याद्वादमय न्यायमार्ग जैन के महाविरोधक बने हुए। बाह्याभ्यन्तर उभय रूप है ‘पदार्थ' कहते तने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष घने एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥८२॥ बना ज्ञान जब ज्ञेय स्वयं का अन्तरंग में रहता है। रहा प्रमाणाभास लुप्त तब यही जिनागम कहता है॥ किन्तु ज्ञान जब बाह्य अर्थ को ज्ञेय बनाता तनता है। बने प्रमाणाभास वही तब प्रमाण भी बस बनता है॥८३॥ कहा, 'जीव' यूँ शब्द रहा यह बाह्य अर्थ से सहित रहा। हेतु शब्द ज्यों नाम रहा है निजी अर्थ से विहित रहा ॥ अर्थ शून्य मायादिक का ही नामकरण हो नहिं ऐसा। प्रमाण का भी नाम रहा है सार्थक मायादिक वैसा ॥८४॥ बुद्धि तथा वह शब्द, अर्थ ये संज्ञायें हैं गुरु कहते। बुद्धयादिक के वाच्यभूत जो वाचक बन करके रहते ॥ उन उन सम हो बुद्धयादिक ये बोधरूप भी तीन रहें। उनको भासित करते दर्पण में पदार्थ आ लीन रहें ॥८५॥ वक्ता श्रोता ज्ञाता के जो बोध वचन है ज्ञान तथा। न्यारे न्यारे रहे कथंचित् क्रमशः सुन तू मान तथा ॥ यदि मानो वे रहीं भ्रान्तियाँ प्रमाण भी फिर भ्रान्त रहा। बाह्याभ्यन्तर भ्रान्त रहे तो अन्धकार आक्रान्त रहा ॥८६॥ शब्दों में भी तथा बुद्धि में प्रमाणता तब आ जाती। बाह्य अर्थ के रहने पर ही, नहीं अन्यथा, श्रुति गाती ॥ तथा सत्य की असत्यता की रही व्यवस्था यही सही। अर्थ-लाभ में अलाभ में यों क्रमशः, वरना! कभी नहीं ॥८७॥ दैव दिलाता सभी सिद्धियाँ ऐसा कहता पता चला। पौरुष किसविध दैव-विधाता हो सकता तू बता भला ॥ दैव दैव को मनो बनाता मोक्ष कभी फिर मिले नहीं। व्यर्थ रहा पुरुषार्थ सभी का मोह कभी फिर हिले नहीं ॥८८॥ पौरुष से ही सभी सिद्धियाँ मिलती कहता तू ऐसा। भला बात दैवानुकूल ही पौरुष चलता यह कैसा ॥ पौरुष से ही सदा सर्वथा पौरुष आगे यदि चलता। सभी जीव पुरुषार्थशील हैं सबका पौरुष कब फलता ॥८९॥ स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महाविरोधक बने हुए। दैव तथा पौरुष दोनों का आग्रह करते तने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित, सब वृथा रहीं। दोष घने एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥९०॥ अबुद्धिपूर्वक जीवात्मा का पौरुष जब वह चलता है। सुख दुख का जो भी मिलना है वही दैव का फलना है॥ किन्तु बुद्धिपूर्वक जीवात्मा पौरुष जब वह करता है। तब जो सुख दुख मिलता, समझो, पौरुष से वह झरता है॥९१॥ पर को दुख देने भर से यदि पापकर्म ही बँधता है। पर को सुख-पहुँचाने से यदि पुण्य कर्म ही बँधता है॥ कई अचेतन विष आदिक औ कषाय विरहित मुनि त्यागी। निमित्त दुख-सुख में होने से पाप-पुण्य के हों भागी ॥९२॥ जिससे निज को सुख होता सो पाप-बन्ध का कारण है। जिससे निज को दुख होता सो पुण्य-बन्ध का कारण है। ऐसा यदि एकान्त रहा तो विराग मुनि, औ बुध जन भी। क्यों ना होंगे दोनों क्रमशः पुण्य-पाप के भाजन ही ॥९३॥ उभय रूप एकान्त मान्यता स्वयं बना कर तने हुए। स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महाविरोधक बने हुए ॥ अवाच्य मत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष घने एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥९४॥ यदा कदा अपने में या पर में जो सुख दुख हो जाते। क्रमशः विशुद्धि संक्लेशों के सुनो अंग वे कहलाते ॥ यही एक कारण पा आस्रव पुण्य-पाप का हो जाता। वरना आस्रव तत्त्व कहाँ हो अरहन्तों का ‘मत' गाता ॥९५॥ कर्मबन्ध अज्ञानमात्र से होता दें यदि मान रहा। ज्ञेय रहें ‘सो अनन्त' फिर क्यों होगा केवलज्ञान महा ॥ अल्प ज्ञान से मोक्ष मिले यदि ऐसा कहता ‘अन्ध' अहा। बहुत रहा अज्ञान, इसी से मोक्ष नहीं, विधि-बन्ध रहा ॥१६॥ उभयरूप एकान्त मान्यता स्वयं बनाकर तने हुए। स्याद्वादमय न्यायमार्ग के महाविरोधक बने हुए ॥ अवाच्यमत में अवाच्य कहना भी अनुचित सब वृथा रही। दोष घने एकान्त पक्ष में आते हैं श्रुति बता रही ॥९७॥ मोह-लीन अज्ञान भाव से कर्मबन्ध वह होता है। मोह-हीन अज्ञान भाव से कर्मबन्ध वह खोता है॥ अल्पज्ञान भी मोहरहित जो मोक्ष-महल में ले जाता। वरना, विधि-बन्धन ही भाई मोह-गहल में क्यों जाता ॥९८॥ कामादिक ये जहाँ उपजते सुनो वही संसार रहा। जिसका संचालन होता है कर्म-बन्ध अनुसार रहा ॥ कर्मों का कारण जीवों का अपना-अपना भाव रहा। जीव भव्य ये अभव्य भी हैं चिर से बस भटकाव रहा ॥९९॥ भव्यपना औ अभव्यपन ये जीवों के बस! आप रहें। मूंग मोठ कुछ पकते, कुछ नहिं, भले अनल का ताप सहे ॥ भव्यपने की व्यक्ति सादि हो अभव्यपन की अनादिनी। स्वभाव को कब तर्क छू सकी? श्रुति गाती सुख-सुदायिनी ॥१००॥ लोकालोकालोकित करता युगपत् केवलज्ञान रहा। वही आपका तत्त्वज्ञान जिन! प्रमाण है वरदान रहा ॥ तथा नयात्मक ज्ञान रहा जो स्याद्वाद से है भाता। विषय बनाता क्रमशः सबको ‘प्रमाण' फलत: कहलाता ॥१०१॥ आदिम प्रमाण का फल सुन लो विरागपन है अमल रहा। त्याज्य-त्याग में ग्राह्य-ग्रहण में प्रीति इतर का सुफल रहा ॥ या विनाश अज्ञानभाव का स्याद्वाद का फल माना। किसमें हित औ अहित निहित है आत्मबोध का बल पाना ॥१०२॥ सही अर्थ से बात कराता स्यात्पद शाश्वत सार रहा। अनेकान्त को साथ कराता दिखा वस्तु का पार अहा ॥ रहा ज्ञेय लो उसके प्रति ही सदा विशेषण धार रहा। सो श्रुतिधर के हे जिनवर! तव वचनों का श्रृंगार रहा ॥१०३॥ दूर रहा, एकान्तवाद से स्याद्वाद वह कहलाता। मूल रहा सापेक्षवाद का तभी कथंचित् विधि-दाता ॥ सप्तभंग-मय कथन-प्रणाली समयोचित ही अपनाता। त्याज्य ग्राह्य क्या? तथा बताता, रखें उसी से अब नाता ॥१०४॥ स्याद्वादमय ज्ञान रहा औ पूरण केवलज्ञान रहा। सकल-ज्ञेय को विषय बनाते दोनों सो परमाण अहा ॥ परोक्ष औ प्रत्यक्ष रहें ये इनमें से यदि एक रहा। वस्तुतत्त्व का कथन नहीं हो बोध नहीं कुछ नेक रहा ॥१०५॥ साध्य-धर्म को विपक्ष से तो सदा बचाने दक्ष रहा। किन्तु साथ ही साध्य-सिद्धि में लेता अपना पक्ष रहा ॥ स्याद्वादमय प्रमाण का जो सुनो अर्थ है विषय रहा। उसी अर्थ की विशेषता को विषय बनाता सुनय रहा ॥१०६॥ कई भेद उपभेद कई हैं, सुनो, नयों के, जता रहे। भिन्न-भिन्न एकान्तरूप से विषय नयों के तथा रहे॥ त्रैकालिक उन विषयों का ही एकतान यह द्रव्य रहा। और द्रव्य भी अनेक विध है उपादेय निज द्रव्य रहा ॥१०७॥ भिन्न-भिन्न नय-विषयों का वह समूह मिथ्या नहिं होता। क्योंकि सुनो तो हठाग्रही ना जिनमत के नय हे! श्रोता ॥ रहें परस्पर निरपेक्षित जो, मिथ्या नय हैं कहलाते। सापेक्षित नय समीचीन हो वस्तु, जनाते वह तातें ॥१०८॥ वस्तुतत्त्व का प्रतिपादन जब, जब वचनों से होता है। विधान का या निषेध का तब तब आलम्बन होता है॥ निजवश ही तो वस्तु रही है परवश सो वह रही नहीं। यही व्यवस्था रही, अन्यथा सूनी, सब कुछ रही नहीं ॥१०९॥ वस्तुतत्त्व यह तदतत् होता यह कहना तो समुचित है। किन्तु वस्तु तो तत् ही है बस! यह प्रलाप तो अनुचित है॥ असत्य वचनों से फिर भी यदि तत्त्वदेशना होती हो। कैसी हित करने वाली ‘सो' दुःख लेश ना हरती हो ॥११०॥ नियम रहा प्रत्येक वचन वह निजी अर्थ का पक्ष धरे। अन्य वचन के किन्तु अर्थ का निषेध करने दक्ष अरे॥ सुगत कहें सामान्य स्वार्थ को इसी भाँति बस हम माने। तो फिर सबको गगनपुष्प सम जाने माने पहिचाने ॥१११॥ यदि मानो सामान्य वचन वह विशेष के प्रति मौन रहा। मिथ्या सो एकान्त रहा है सत्य वचन फिर कौन रहा ॥ सुनो! इष्ट के परिचय देने में सक्षम ‘स्यात्कार' रहा। सत्य अर्थ का चिह्न यही है, सो उसका सत्कार रहा ॥११२॥ विधेय है प्रतिषेध्य वस्तु का अविरोधी सुन आर्य महा। कारण, है वह इष्ट कार्य का अंग रहा अनिवार्य अहा ॥ आपस में आदेयपना औ हेयपना का पूरक है। स्याद्वाद बस यही रहा सब वादों का उन्मूलक है॥११३॥ विराग का उपदेश सही है सराग का उपदेश नहीं। यही ज्ञान बस ध्येय रहा है और आस कुछ लेश नहीं ॥ लिखी आप्तमीमांसा फलतः शास्त्रबोध अनुसार रहा। आत्महितैषी बनो सुनो यह मात्र बोध निस्सार रहा ॥११४॥
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