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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  1. राजस्थान प्रान्त में प्रगति की पात पर अग्रसर एक लघु नगर है। राणोली। आज यह लघु नगर है, किन्तु उस समय जब वहाँ एक महान आत्मा का जन्म हुआ था, तब था वह एक सामान्य ग्राम। भारत वर्ष के अनेक ग्रामों की तरह एक निरा देहात। ग्राम का मुख्यालय तब सीकर था। राणोली के मुख्य मार्ग पर पत्थर पाटे गये हैं, उपमार्गों पर चीखें (फलेग स्टोन) शेष समस्त मार्ग राजस्थान की प्रसिद्ध रेत को अपने वक्ष पर धरे अतीत की कहानी बतलाते हैं। खेतों में रेत मिश्रित भूरी माटी प्रतिवर्ष फसलों की सौगात देती है। आम मकानों, भवनों और झोपड़ियों की बनावट से राजपूताने की संस्कृति और शैली झाँकती है। प्रमुख भवनों और राजमहल की शिल्प पर मुगलकालीन प्रभाव है, जैसे राजपूत के दरबार में मुगल-कला की कालीन बिछी हुई हो। राणोली का प्रसिद्ध राजमहल वहाँ आज भी है और अपनी प्राचीनता की गाथा सुनाने में सक्षम है। राजमहल के समीप ही, मुख्य द्वार से हटकर एक हवेली है, जो त्रि-खण्डीय है, तीनों खण्ड में सोलह कक्ष हैं, जिनमें खण्डेलवाल (जैन) वंश का इतिहास गुम्फित है। गाँव में कुछ गलियाँ समतल हैं तो कुछ ऊँची-नीची। राजमहल के एक ओर बाजार का स्थान है जहाँ साप्ताहिक बाजार भरता है। ग्राम के उत्तर में लघु सरिता बहती है जिसका नाम खारी (नदी) है। यह नाम भी उतना ही प्राचीन है जितना राणोली का नाम। बरसात के दिनों में मेघों का वात्सल्य पाकर नदी चंचल हो पड़ती है, तब उसका पानी ऊधमी छोरों की तरह दौड़ता-सा राजमहल के प्रांगण में आकर खेलने लगता है। जब पानी राजमहल को स्पर्श कर लेना चाहता है, तो हवेली को भी क्यों न छुएगा ! हवेली के उत्तर में, कुछ ही दूरी पर एक विशाल जिनमंदिर अवस्थित है है यह प्राचीन जैनधर्म का संगीत सुना रहा है। पूजा के मीठे शब्द और धूप की सुहानी महक सहस्रों वर्ष से दे रहा है। राणोली की आग्नेय दिशा (मानें पूर्व-दक्षिण) में महानगर जयपुर है। यह मार्ग बड़ा प्यारा है, आत्मीय है, क्योंकि यह राणोली के अलावा यात्री को मदनगंज किशनगढ़ तो पहुँचाता ही है, अजमेर भी पहुँचाता है, नसीराबाद भी पहुँचा देता है और ब्यावर भी पहुँचाता है। राणोली की नैऋत्य दिशा में, कहें पश्चिम-दक्षिण में, सीकर नगर है। यह भी मात्र १९ किलोमीटर पर उद्योग और कृषि की दिशा में भी राणोली प्रगति पर है, जहाँ का आम नागरिक सादगी-पसन्द है और श्रम की दिशा में है। सीकर जिले के लघु ग्राम राणोली को महानताओं के नक्शे पर एक दिन चमकना ही था, सो वह दिन भी आया वहाँ। सन् १८९१ की शिशिर ऋतु का प्रसंग है। (विक्रम संवत १९४८ माह माघ) आकाश से शीत बरस रही थी और उस शीत/ठंडक को धरती पर मीलोंमील तक फैली भूरी रेत अपना स्पर्श देकर और दूना ठंडा कर पुन: प्रकृति को लौटा रही थी। लोग रात तो रात, दिन में भी कम्बल ओढ़े रहते थे। जिन्हें अपने कृषि-कार्यों से घर से निकलना पड़ता था, वे कान बाँधकर ही बाहर आते थे। ठंड का साम्राज्य पूरे देश पर चल रहा था,अत: राणोली कहाँ बच सकता था। यह पृथक बात है कि रेतयुक्त भूमि के लिए प्रसिद्ध सम्पूर्ण इलाके में राणोली की रेत कुछ अधिक ठंडक देती लग रही थी। एक दिन मध्याह्न में ही मंदिरजी में किन्हीं पंडितजी की शास्त्र सभा चल रही थी, घृतवरी श्रोता-समूह में बैठी ध्यान से सुन रही थीं, तभी पेट किंचित् पीड़ा के साथ हलचल हुई, वे चुपचाप उठीं और सीधी अपनी हवेली में आ गईं। जन्म-जन्म होता है, चाहे वह रात में हो या दिन में, नगर में हो या गाँव में। राणोली के चतुर नागरिक श्री चतुर्भुज जी जैन (छाबड़ा) के परिवार में उस दिन वातावरण शान्त न था। मुहल्ले की परिचित महिलायें उनके घर में बार-बार आ रही थीं। वे आती, मुँह तक ओढ़े हुए घर के भीतर जातीं, वहाँ उपस्थित चतुर्भुजजी की धर्मपत्नी श्रीमती घृतवरी देवी से वार्ता करतीं, कुछ धैर्य-सा बँधातीं और लौट जातीं। घृतवरीजी गर्भवती थीं, प्रसवकाल सन्निकट था। अत: पास-पड़ोस की हितैषी महिलायें एक किस्म से उनकी देख-रेख में सहायक हो रही थीं। चतुर्भुजजी के कर्ण कोई संदेश सुनने के लिये उतावले हो रहे थे, परन्तु घर के भीतर से लौटती माताएँ चुपचाप लौट रही थीं, कोई खुशखबरी नहीं सुनाती थीं। पल लम्बे लग रहे थे। मिनिट घंटों का रूप धारण कर बीत रहे थे। तभी भीतर से घृतवरीजी के कराहने की आवाज कुछ तेज हो पड़ी। चतुर्भुजजी अपने प्रथम पुत्र छगन को बाहर खेल आने के लिए सामझा रहे थे। वह तीन वर्ष का था। छगन का मन उस रोज खेल में नहीं लग रहा था, वह तो घर के भीतर से आती अपनी माता की कराह सुन - सुन चकित था। बालक ने पूछा क्या हो गया है माई को। पिता ने समझाया ज्वर चढ़ा है, सिर में दर्द है, पेट में दर्द है, इसलिये चीख रही है। बालक बालक था, जो समझाया, वह मान लिया। तब तक भीतर से नन्हें शिशु के रोने की आवाज आई। प्रसव कराने वाली प्रौढ़ धाया कूदती-फुदकती-सी बाहर आयी और चतुर्भुजजी की ओर देख, हँसकर बोली- “भाई, तेरे घर दूसरा छोरा आ गया है। आनन्द मना धाया से संदेश सुन चतुर्भुज हँस पड़े, फिर पूछने लगे - दोनों स्वस्थ हैं ? हाँ जी, दोनों ठीक हैं। उत्तर सुन चतुर्भुज को संतोष हुआ। वे आवश्यक कार्यों में लग गये। (कुछ लोगों का कहना है कि उस वक्त घृतवरी देवी को जुड़वाँ पुत्र प्राप्त हुए थे, किन्तु जन्म के ६ माह बाद ही एक ठंडा पड़ गया था और दूसरा जीवित रह गया था, जो भूरामल के नाम से विख्यात हुआ) कुछ ही समय के बाद घर का कोलाहल शांत हो गया। सभी जन अपने-अपने कार्यों में लग गये। वातावरण ऐसा हो गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। सुख-दु:ख, आनन्द-पीड़ा से परे एक सामान्य वातावरण बन गया था उनके घर में। माता घृतवरी बच्चे का मुख देख रही थी - गोरे रंग का शिशु, अपने बड़े भाई छगन की तरह ही चेहरा लेकर आया था। माता निहारती रही। फिर अचानक बुदबुदायी - ये तो बिलकुल भूरा है, भूरा। माता की बलिहारी कि सोने जैसे प्रखर रंग-रूपवाले पुत्र को सोनेलाल या हीरालाल नहीं बोली। अपनी वस्तु को अपने ही मुँह से श्रेष्ठ कहने का चलन इस देश में नहीं रहा है। सो भला वह भोली माँ उस परम्परा को कैसे तोड़ती ? कैसे कहती वह अपने मुख से कि उसने सूर्य की तरह आभावाला पुत्ररत्न जन्मा है? कैसे कहती वह कि उसके पुत्र के चेहरे की लुनाई को देखकर देवगण भी झिझक सकते थे ? अपने गर्भ से नि:सृत हीरा को उस भोली माता ने हीरा भी नहीं कहा, उसने तो सहज ही कह दिया था - भूरा। पिता ने जब दृष्टि पसारी नवजात शिशु के चेहरे पर, तो वे भी न कह सके कि उनके घर देवोपम बालदेव ने जन्म लिया है। वे भी उसकी देह के रंग को देखकर उसे “भूरा” कहकर निश्चिन्त हो गये। मगर चतुर्भुजजी अपने नेत्रों से एक सत्य देख चुके थे उसी क्षण उन्होंने देखा कि नवजात शिशु भूरा के नाभि-नाल आपस में जुड़े हुए नहीं थे। वे पृथक्-पृथक् थे। शिशु जन्मते ही रोया भी नहीं था। अत: पहले आत्मतसल्ली के लिये चतुर्भुजजी ने वैद्यराजजी को बुलाया, उन्हें शिशु दिखाया। वैद्य ने अवलोकन के बाद सबको निश्चिन्त कर दिया, बोले डरने की बात नहीं है, प्रसव क्रिया सामान्य रही है, बालक को कोई तकलीफ नहीं है। वैद्य चला गया, परन्तु चतुर्भुजजी विचार करते रहे, उन्हें शिशु की स्थिति से बोध लगा कि यह पिंडरोगी नहीं रहेगा, काफी उम्र तक स्वस्थ एवं कर्मठ रहेगा तथा संसार के मायावी द्वन्द्व-फन्द से पृथक् रहेगा। रिश्तेदारों का आगमन। पड़ोसियों का आगमन। कहें रोज किसी न किसी का आगमन। हर व्यक्ति माता द्वारा सम्बोधित शब्द “भूरा” कह कर उसका गौरव-वर्धन करता और चला जाता। कालान्तर में शिशु का नाम भूरामल पड़ गया। भूरामल का दूसरा नाम शान्तिकुमार भी था।
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