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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

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  1. अब तत्त्वों को बतलाते हैं - जीवाजीवास्रव-बन्ध-संवर-निर्जरा-मोक्षास्तत्त्वम्॥४॥ अर्थ - जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष, ये सात तत्त्व हैं। English - (The) soul, (the) non-soul, influx, bondage, stoppage, gradual dissociation and liberation constitute reality. जिसका लक्षण चेतना है, वह जीव है। जिनमें चेतना नहीं पायी जाती, ऐसे पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये पाँच अजीव हैं। कर्मों के आने के द्वार को आस्रव कहते हैं। आत्मा और कर्म के प्रदेशों के परस्पर में मिलने को बन्ध कहते हैं। आस्रव के रुकने को संवर कहते हैं। कर्मों के एकदेश क्षय होने को निर्जरा कहते हैं। और समस्त कर्मों का क्षय होने को मोक्ष कहते हैं। शंका - तत्त्व सात ही क्यों हैं ? समाधान - यह मोक्षशास्त्र है, इसका प्रधान विषय मोक्ष है, अतः मोक्ष को कहा। मोक्ष जीव को होता है, अतः जीव का ग्रहण किया। तथा संसार पूर्वक ही मोक्ष होता है और संसार अजीव के होने पर होता है; क्योंकि जीव और अजीव के आपस में बद्ध होने का नाम ही संसार है। अतः अजीव का ग्रहण किया। संसार के प्रधान कारण आस्रव और बंध हैं। अतः आस्रव और बंध का ग्रहण किया। तथा मोक्ष के प्रधान कारण संवर और निर्जरा हैं, इसलिए संवर और निर्जरा का ग्रहण किया।
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  2. अब तत्त्वों को जानने का उपाय बतलाते हैं- प्रमाणनयैरधिगमः॥६॥ अर्थ - प्रमाण और नयों के द्वारा जीवादिक पदार्थों का ज्ञान होता है। सम्पूर्ण वस्तु को जानने वाले ज्ञान को प्रमाण कहते हैं। और वस्तु के एकदेश को जानने वाले ज्ञान को नय कहते हैं। English - Knowledge (of the seven categories) is attained by means of pramana and naya. विशेषार्थ - प्रमाण के दो प्रकार हैं - स्वार्थ और परार्थ। जिसके द्वारा ज्ञाता स्वयं ही जानता है। उसे स्वार्थ प्रमाण कहते हैं। इसी से स्वार्थ प्रमाण ज्ञानरूप ही होता है; क्योंकि ज्ञान के द्वारा ज्ञाता स्वयं ही जान सकता है। दूसरों को नहीं बतला सकता। और जिसके द्वारा दूसरों को ज्ञान कराया जाता है, उसे परार्थ प्रमाण कहते हैं। इसी से परार्थ प्रमाण वचनरूप होता है; क्योंकि ज्ञान के द्वारा ज्ञाता स्वयं जानकर वचन के द्वारा दूसरों को ज्ञान कराता है। आगे ज्ञान के पाँच भेद बतलाये हैं - मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान। इनमें से श्रुतज्ञान के सिवा शेष चार ज्ञान तो स्वार्थ प्रमाण ही हैं, क्योंकि वे मात्र ज्ञानरूप ही हैं, परन्तु श्रुतज्ञान ज्ञानरूप भी है और वचनरूप भी है, अतः श्रुतज्ञान स्वार्थ भी है और परार्थ भी है। ज्ञानरूप श्रुतज्ञान स्वार्थ प्रमाण है, और वचनरूप श्रुतज्ञान परार्थ प्रमाण है। जैसे तत्त्वार्थसूत्र के ज्ञाता को तत्त्वार्थसूत्र में वर्णित विषयों का जो ज्ञान है, वह ज्ञानात्मक श्रुत होने से स्वार्थ प्रमाण है। और जब वह ज्ञाता अपने वचनों के द्वारा दूसरों को उन विषयों का ज्ञान कराता है, वह वचनात्मक श्रुतज्ञान परार्थ प्रमाण है। इस श्रुतज्ञान के ही भेद नय हैं।
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  3. अब प्रमाण और नय के द्वारा जाने गये जीव आदि तत्त्वों को जानने का अन्य उपाय बतलाते हैं - निर्देश-स्वामित्व-साधनाधिकरण-स्थिति-विधानतः॥७॥ अर्थ - निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान इन छह अनुयोगों के द्वारा भी सम्यग्दर्शन आदि तथा जीव आदि पदार्थों का ज्ञान होता है। जिस वस्तु को हम जानना चाहते हैं, उसका स्वरूप कहना निर्देश है। स्वामित्व से मतलब उस वस्तु के मालिक से है। वस्तु के उत्पन्न होने के कारणों को साधन कहते हैं। वस्तु के आधार को अधिकरण कहते हैं। काल की मर्यादा का नाम स्थिति है। विधान से मतलब उसके भेदों से है। इस तरह इन छह अनुयोगों के द्वारा उस वस्तु का ठीक ठीक ज्ञान हो जाता है। English - (Knowledge of the seven categories is attained) by description, ownership, cause, resting place (substratum), duration and division. विशेषार्थ- वस्तु को हम जानते तो प्रमाण और नय से ही हैं, किन्तु उसके जानने में ऊपर बतलायी गयी छह बातें उपयोगी होती हैं,उनसे उस वस्तु की पूरी-पूरी जानकारी होने में सहायता मिलती है। जैसे, हम यदि सम्यग्दर्शन को जानना चाहते हैं, तो उसके विषय में छह अनुयोग इस प्रकार घटाना चाहिए - तत्त्वार्थ के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं, यह निर्देश है। सम्यग्दर्शन का स्वामी जीव होता है। सम्यग्दर्शन के साधन दो हैं- अन्तरंग और बहिरंग। अन्तरंग साधन अथवा कारण तो दर्शन मोहनीय कर्म का उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम है और जिनधर्म का सुनना, जिनबिम्ब का दर्शन, जातिस्मरण वगैरह बहिरंग साधन हैं। अधिकरण भी दो हैं - अन्तरंग और बहिरंग। सम्यग्दर्शन का अन्तरंग अधिकरण या आधार तो आत्मा ही है; क्योंकि सम्यग्दर्शन उसी को होता है। और बहिरंग आधार त्रसनाड़ी है; क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव त्रसनाड़ी में ही रहते हैं, उससे बाहर नहीं रहते। सम्यग्दर्शन की स्थिति कम से कम एक अन्तर्मुहूर्त मात्र है और अधिक से अधिक सादि अनन्त है; क्योंकि क्षायिक सम्यक्त्व एक बार प्राप्त होने पर कभी नहीं छूटता और मुक्त हो जाने पर भी बना रहता है। सम्यग्दर्शन के दो भेद भी हैं - निसर्गज और अधिगमज। तथा तीन भेद भी हैं - औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक। इसी तरह ज्ञान, चारित्र और जीव आदि पदार्थों में निर्देश आदि लगा लेना चाहिए।
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  4. अब सम्यग्दर्शन का लक्षण कहते हैं - तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्॥२॥ अर्थ - जो पदार्थ जिस स्वभाव वाला है, उसका उसी स्वभाव रूप से निश्चय होना तत्त्वार्थ है और तत्त्वार्थ का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। English - Belief in substances ascertained as they are is right faith. विशेषार्थ - ‘तत्त्व’ और ‘अर्थ’ इन दो शब्दों के मेल से ‘तत्त्वार्थ' शब्द बना है। तत्त्व शब्द भाव सामान्य का वाचक है। अतः जो पदार्थ जिस रूप में स्थित है, उसका उसी रूप में होना ‘तत्त्व है। और जिसका निश्चय किया जाता है, उसे ‘अर्थ' कहते हैं। अतः तत्त्व रूप अर्थ को तत्त्वार्थ कहते हैं। आशय यह कि तत्त्व का मतलब है भाव और अर्थ का मतलब है भाववान्। अतः न केवल भाव का और न केवल भाववान् का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। किन्तु भाव-विशिष्ट भाववान् का श्रद्धान करना ही सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन के दो भेद हैं - सराग सम्यग्दर्शन और वीतराग सम्यग्दर्शन। प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य ये सराग सम्यग्दर्शन के सूचक हैं। रागादिक की तीव्रता के न होने को प्रशम कहते हैं। संसार, शरीर और भोगों से भयभीत होने का नाम संवेग है। सब प्राणियों को अपना मित्र समझना अनुकम्पा है। आगम में जीवादि पदार्थों का जैसा स्वरूप कहा है, उसी रूप उन्हें मानना आस्तिक्य है। सराग सम्यग्दृष्टि में ये चारों बातें पायी जाती हैं तथा आत्मा की विशुद्धि का नाम वीतराग सम्यग्दर्शन है |
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  5. अब सम्यग्दर्शन आदि और जीव आदि के व्यवहार में आने वाले व्यभिचार (दोष) को दूर करने के लिए सूत्रकार निक्षेपों का कथन करते हैं | नाम-स्थापना-द्रव्य-भावतस्तन्न्यासः॥५॥ अर्थ - सम्यग्दर्शन आदि और जीव आदि का नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव के द्वारा निक्षेप होता है। जिस पदार्थ में जो गुण नहीं है, लोक व्यवहार चलाने के लिए अपनी इच्छा से उसको उस नाम से कहना नाम निक्षेप है। English - These are installed (in four ways) by name, representation, substance (potentiality) and actual state. जैसे माता-पिता ने अपने पुत्र का नाम इन्द्र रख दिया। किन्तु उसमें इन्द्र का कोई गुण नहीं पाया जाता। अत: वह पुत्र नाममात्र से इन्द्र है, वास्तव में इन्द्र नहीं है। लकड़ी, पत्थर, मिट्टी के चित्रों में तथा शतरंज के मोहरों में हाथी घोड़े वगैरह की स्थापना करना स्थापना निक्षेप है। स्थापना दो प्रकार की होती है - तदाकार और अतदाकार पाषाण या धातु की बनी हुई तदाकार प्रतिबिम्ब में जिनेन्द्र भगवान् की या इन्द्र की स्थापना करना तदाकार-स्थापना है और शतरंज के मोहरों में जो कि हाथी या घोड़े के आकार के नहीं हैं, हाथी घोड़े की स्थापना करना अर्थात् उनको हाथी घोड़ा मानना अतदाकार स्थापना है। शंका - नाम और स्थापना में क्या भेद है ? समाधान - नाम और स्थापना में बहुत भेद है। नाम तो केवल लोकव्यवहार चलाने के लिए ही रखा जाता है। जैसे किसी का नाम इन्द्र या जिनेन्द्र रख देने से इन्द्र या जिनेन्द्र की तरह उसका आदर सम्मान नहीं किया जाता। किन्तु धातु पाषाण के प्रतिबिम्ब में स्थापित जिनेन्द्र की अथवा इन्द्र की पूजा साक्षात जिनेन्द्र या इन्द्र की तरह ही की जाती है। जो पदार्थ आगामी परिणाम की योग्यता रखता हो, उसे द्रव्य निक्षेप कहते हैं। जैसे इन्द्र की प्रतिमा बनाने के लिए जो काष्ठ लाया गया हो, उसमें इन्द्र की प्रतिमारूप परिणत होने की योग्यता है, अतः उसे इन्द्र कहना द्रव्यनिक्षेप है। वर्तमान पर्याय से युक्त वस्तु को भावनिक्षेप कहते हैं। जैसे स्वर्ग के स्वामी साक्षात् इन्द्र को इन्द्र कहना भाव निक्षेप है। ऐसे ये चार निक्षेप हैं। विशेषार्थ - इन निक्षेपों का यह प्रयोजन है कि लोक में प्रत्येक वस्तु का चार रूप से व्यवहार होता पाया जाता है। जैसे इन्द्र का व्यवहार नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव के रूप में होता देखा जाता है। इसी तरह सम्यग्दर्शन आदि और जीव आदि का व्यवहार भी चार रूप से हो सकता है। अतः कोई नाम को ही भाव न समझ ले, या स्थापना को ही भाव न समझ बैठे, इसलिए व्यभिचार (दोष) को दूर करके यथार्थ वस्तु को समझाने के लिए ही यह निक्षेप की विधि बतलायी है। इनमें से नाम, स्थापना और द्रव्य, ये तीन निक्षेप तो द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से हैं और चौथा भावनिक्षेप पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से है।
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  6. आगे बतलाते हैं कि सम्यग्दर्शन कैसे उत्पन्न होता है। तन्निसर्गादधिगमाद्वा॥३॥ अर्थ - वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार से उत्पन्न होता है - स्वभाव से और पर के उपदेश से। जो सम्यग्दर्शन पर के उपदेश के बिना स्वभाव से ही उत्पन्न होता है, उसे निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं और जो सम्यग्दर्शन पर के उपदेश से उत्पन्न होता है, उसे अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं। English - That (This right faith) is attained by intuition or by acquisition of knowledge. विशेषार्थ - दोनों ही सम्यग्दर्शनों की उत्पत्ति का अन्तरंग कारण तो एक ही है, वह है दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम्। उसके होते हुए जो सम्यग्दर्शन दूसरे के उपदेश के बिना स्वयं ही प्रकट हो जाता है, उसे निसर्गज कहते हैं और परोपदेशपूर्वक जो होता है, उसे अधिगमज कहते हैं। सारांश यह है कि जैसे पुरानी किंवदन्ती के अनुसार कुरुक्षेत्र में बिना ही प्रयत्न के सोना पड़ा हुआ मिल जाता है, वैसे ही किसी दूसरे पुरुष के उपदेश के बिना, स्वयं ही जीवादि तत्त्वों को जानकर जो श्रद्धान होता है, वह निसर्गज सम्यग्दर्शन है और जैसे सोना निकालने की विधि को जानने वाले मनुष्य के प्रयत्न से खान से निकाला हुआ स्वर्ण पाषाण सोना रूप होता है। वैसे ही दूसरे पुरुष के उपदेश की सहायता से जीवादि पदार्थों को जानकर जो श्रद्धान होता है, वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है।
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