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Popular Content

Showing content with the highest reputation on 09/04/2019 in all areas

  1. 1 point
    गुरु प्रभावना मे दे सहयोग इस बार दस लक्षण पर्व पर आपके मंदिर मे इस का प्रिंट निकाल कर जरूर लगाए प्रिंट करने के लिए पीडीऍफ़ डाउनलोड कर सकते हैं Acharya shree app poster.pdf
  2. 1 point
    ? दशलक्षण का उद्देश्य वीतरागता की ओर बढना विषयों का विमोचन करते हुए! दशलक्षण धर्म के माध्यम से हमें दुनियाँ की और कोई वस्तु प्राप्त नहीं करना है किन्तु जो पञ्चेन्द्रिय के विषय हैं, उनको छोड़ते जाना है। जिस रुचि के साथ ग्रहण किया है उसी के अनुरूप उसका विमोचन करना भी आवश्यक है। जिस प्रकार कचरे को व्यर्थ मानकर फेंक देते हैं उसी प्रकार पञ्चेन्द्रिय के विषयों को व्यर्थ मानकर उनका त्याग करना है। आत्मा को पहचानने और शरीर से पृथक् अवलोकन करने के लिये दश-लक्षण धर्म को सुनना मात्र ही पर्याप्त नहीं है, उसे प्राप्त करना भी अनिवार्य है। जीवन का एक-एक क्षण उत्तम-क्षमा के साथ निकले। एक-एक क्षण मार्दव के साथ, विनय के साथ निकले। एक-एक श्वाँस हमारी वक्रता के अभाव में चले। ऋजुता और शुचिता के साथ चले। हमें कहने की आवश्यकता न पड़े और हमारा जीवन स्वयं ही उपदेश देने लगे, यही हमारा धर्म है। यही धर्म का माहात्म्य भी है। ~~~ दशलक्षण धर्म की जय! ~~~ णमो आइरियाणं। ~~~ जय जिनेंद्र, उत्तम क्षमा! ~~~ जय भारत!?
  3. 1 point
    अब सम्यग्दर्शन के विषय रूप से कहे गये सात तत्त्वों में से जीव तत्त्व का वर्णन करते हैं- औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपरिणामिकौ च ॥१॥ अर्थ - औपशमिक, क्षायिक, मिश्र, औदयिक और पारिणामिक ये जीव के पाँच भाव हैं। English - The distinctive characteristic of the soul are the dispositions (thought-activities) arising from subsidence, destruction, destruction-cum-subsidence of karmas, the rise of karmas, and the inherent nature or capacity of the soul. विशेषार्थ - जैसे मैले पानी में निर्मली मिला देने से मैल नीचे बैठ जाता है और जल स्वच्छ हो जाता है। वैसे ही कारण के मिलने पर प्रतिपक्षी कर्म की शक्ति के दब जाने से आत्मा में निर्मलता का होना औपशमिक भाव है। ऊपर वाले दृष्टान्त में उस स्वच्छ जल को, जिसके नीचे मैल बैठ गया है, किसी साफ बर्तन में निकाल लेने पर उसके नीचे का मैल दूर हो जाता है और केवल निर्मल जल रह जाता है। वैसे ही प्रतिपक्षी कर्म का बिलकुल अभाव होने से आत्मा में जो निर्मलता होती है, वह क्षायिक भाव है। जैसे - उसी पानी को दूसरे बर्तन में निकालते समय कुछ मैल यदि साथ में चला आये और आकर जल के नीचे बैठ जाये तो उस समय जल की जैसी स्थिति होती है, वैसे ही प्रतिपक्षी कर्म के सर्वघाती स्पर्द्धकों का उदयाभावी क्षय और आगे उदय में आने वाले निषेकों का सत्ता में उपशम होने से तथा देशघाती स्पर्द्धकों का उदय होते हुए जो भाव होता है, उसे क्षायौपशमिक भाव कहते हैं। उसी का नाम मिश्र भाव है। द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के निमित्त से कर्म का फल देना उदय है और उदय से जो भाव होता है, उसे औदयिक भाव कहते हैं और जो भाव कर्म की अपेक्षा के बिना स्वभाव से ही होता है, वह पारिणामिक भाव है। इस तरह ये जीव के पाँच भाव होते हैं।
  4. 1 point
    मार्दव शारीरिक चेष्टा का नाम नहीं है मार्दव का मतलब कोमलता, ऋजुता का भाव है।
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