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  1. Vidyasagar.Guru

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  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  3. Kshama Jain

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  4. राजेश जैन भिलाई

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Showing content with the highest reputation since 04/16/2019 in all areas

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    आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी https://vidyasagar.guru/blogs/entry/1614-post/
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    अनेक नामो को धारण करने वाले वर्तमान शासन नायक अन्तिम तीर्थंकर भगवान् महावीर का जीवन परिचय एवं चारित्र के विकास का वर्णन इस अध्याय में है। 1. बालक महावीर का जन्म कहाँ हुआ था ? बालक महावीर का जन्म कुण्डग्राम (वैशाली) विहार में हुआ था। 2. तीर्थंकर महावीर के पाँच कल्याणक किस-किस तिथि में हुए थे? गर्भकल्याणक - आषाढ़ शुक्ल षष्ठी, शुक्रवार, 17 जून, ई.पू. 599 में। जन्मकल्याणक - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, सोमवार, 27 मार्च, ई.पू. 598 में। दीक्षाकल्याणक - मगसिर कृष्ण दशमी, सोमवार, 29 दिसम्बर, ई.पू.569 में। ज्ञानकल्याणक - वैशाख शुक्ल दशमी, रविवार, 23 अप्रैल, ई.पू.557 में। मोक्षकल्याणक - कार्तिककृष्ण अमावस्या, मङ्गलवार 15 अक्टूबर ई.पू. 527 में विक्रम सं.पूर्व 470 एवं शक पूर्व 605 में । (तीर्थ महा.और उनकी आचार्य परम्परा, भाग-1) 3. बालक महावीर कहाँ से आए थे? बालक महावीर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान से आए थे। 4. बालक महावीर के माता-पिता एवं दादा-दादी का क्या नाम था ? बालक महावीर की माता का नाम त्रिशला, पिता का नाम राजा सिद्धार्थ तथा दादा का नाम सर्वार्थ, दादी का नाम श्रीमती था। 5. त्रिशला के माता-पिता एवं दादा-दादी का क्या नाम था ? त्रिशला की माता का नाम सुभद्रादेवी, पिताका नाम राजा चेटक, दादा का नाम राजा केक तथा दादी का नाम यशोमति था। 6. राजा चेटक के कितने पुत्र एवं पुत्रियाँ थीं? राजा चेतक के दस पुत्र - धनदत्त, धनभद्र, उपेंद्र, सुदत्त, सिहद्त्त, सुकुम्भोज, अकम्पन, पतंगक, प्रभंजन और प्रभास तथा पुत्रियाँ- त्रिशला, मृगावती, सुप्रभा, प्रभावति, चेलना, ज्येष्ठा और चंदना। चेलना का अपर नाम वसुमति भी था। 7. चेटक का अर्थ क्या होता है? अनेक शत्रुओं को चेटी या दास बना लेने के कारण वह चेटक कहलाने लगे। 8. राजकुमार महावीर की दीक्षा स्थली, दीक्षा वन एवं दीक्षा वृक्ष का क्या नाम था ? राजकुमार महावीर की दीक्षा स्थली कुण्डलपुर, दीक्षा वन-षण्डवन एवं दीक्षा वृक्ष-शालवृक्ष था। 9. राजकुमार महावीर को वैराग्य कैसे हुआ था ? राजकुमार महावीर को वैराग्य जातिस्मरण के कारण हुआ। 10. मुनि महावीर की पारणा कहाँ एवं किसके यहाँ हुई थी ? मुनि महावीर की पारणा राजा कूल के यहाँ कूलग्राम में हुई थी। 11. महावीर का वंश एवं गोत्र कौन-सा था ? महावीर का वंश- नाथ एवं गोत्र - काश्यप था। 12. किस पालकी में बैठकर दीक्षा लेने गए थे? चन्द्रप्रभा पालकी में बैठकर दीक्षा लेने गए थे। 13. मुनि महावीर को केवलज्ञान कहाँ कौन से वृक्ष के नीचे हुआ था ? मुनि महावीर को केवलज्ञान षण्डवन/मनोहर वन (ऋजुकूला नदी) एवं शाल वृक्ष के नीचे हुआ था। 14. तीर्थंकर महावीर के समवसरण में मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ कितनी थीं? तीर्थंकर महावीर के समवसरण में 14,000 मुनि, 36,000 आर्यिकाएँ 1 लाख श्रावक और 3 लाख श्राविकाएँ थीं। 15. तीर्थंकर महावीर के मुख्य गणधर एवं मुख्य गणिनी एवं मुख्य श्रोता कौन थे? तीर्थंकर महावीर के मुख्य गणधर गौतम, गणिनी चंदना, श्रोता राजा श्रेणिक थे। 16. तीर्थंकर महावीर के यक्ष-यक्षिणी का क्या नाम था ? तीर्थंकर महावीर के यक्ष गुहाक, यक्षिणी सिद्धायनी। 17. तीर्थंकर महावीर के कितने गणधर थे। नाम बताइए? तीर्थंकर महावीर के11 गणधर थे। इन्द्रभूत (गौतम), वायुभूति, अग्निभूति, सुधर्मास्वामी, मौर्य, मौन्द्र, पुत्र, मैत्रेय, अकम्पन, अंधवेला तथा प्रभास थे। 18. तीर्थंकर महावीर का प्रथम समवसरण कहाँ लगा था? तीर्थंकर महावीर का प्रथम समवसरण विपुलाचल पर्वत पर लगा था। 19. तीर्थंकर महावीर की देशना कितने दिन तक और क्यों नहीं खिरी ? तीर्थंकर महावीर की देशना 66 दिन तक नहीं खिरी क्योंकि गणधर का अभाव था। 20. तीर्थंकर महावीर की देशना कब खिरी थी? तीर्थंकर महावीर की देशना श्रावण कृष्ण प्रतिपदा, शनिवार 1 जुलाई, ई.पू. 557 में खिरी थी। 21. तीर्थंकर महावीर के समवसरण में राजा श्रेणिक ने कितने प्रश्न किए थे? तीर्थंकर महावीर के समवसरण में राजा श्रेणिक ने 60 हजार प्रश्न किए थे। 22. तीर्थंकर महावीर ने योग निरोध करने के लिए कितने दिन पहले समवसरण छोड़ा था ? तीर्थंकर महावीर ने योग निरोध करने के लिए दो दिन पहले समवसरण छोड़ा था। 23. तीर्थंकर महावीर को सम्यग्दर्शन किस पर्याय में हुआ था ? तीर्थंकर महावीर को सम्यग्दर्शन सिंह की पर्याय में हुआ था। 24. तीर्थंकर महावीर का तीर्थकाल कितने वर्षों का है? तीर्थंकर महावीर का तीर्थकाल 21 हजार 42 वर्षों का है। (ति.प.4/1285) 25. सिंह से महावीर तक के भव बताइए? सिंह, सौधर्मस्वर्ग में देव, कनकोज्वल राजा, लान्तव स्वर्ग में देव, हरिषेण राजा, महाशुक्र स्वर्ग में देव, प्रिय मित्र नामक राजपुत्र, बारहवें स्वर्ग में देव, नंदराजा, अच्युत स्वर्ग में इन्द्र और तीर्थंकर महावीर। 26. तीर्थंकर महावीर ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध कब एवं कहाँ किया था? तीर्थंकर महावीर ने नंदराजा की पर्याय में जब संयम धारण किया था, तब प्रोष्ठिल गुरु के पादमूल में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया था। 27. सिंह को उपदेश देने वाले मुनियों के क्या नाम थे ? सिंह को उपदेश देने वाले मुनियों के नाम अमितकीर्ति एवं अमितप्रभ मुनि थे। 28. तीर्थंकर पार्श्वनाथ के निर्वाण पश्चात् कितने वर्षों के बाद बालक महावीर का जन्म हुआ था ? तीर्थंकर पार्श्वनाथ के निर्वाण के 178 वर्ष बाद बालक महावीर का जन्म हुआ था। 29.तीर्थंकर महावीर के कितने नाम थे, नाम बताइए? 1.वीर—जन्माभिषेक के समय इन्द्र को शंका हुई कि बालकइतने जलप्रवाहको कैसे सहनकोरेगा। बालक ने अवधिज्ञान से जानकर पैर के अंगूठे से मेरुपर्वत को थोड़ा-सा दबाया, तब इन्द्र को ज्ञात हुआ इनके पास बहुत बल है। इन्द्र ने क्षमा माँगी एवं कहा कि ये तो वीर जिनेन्द्र हैं। 2.वद्धमान-राजा सिद्धार्थ ने कहा जब से बालक प्रियकारिणी के गर्भ में आया उसी दिन से घर, नगर और राज्य में धन-धान्य की समृद्धि प्रारम्भ हो गई, अतएव इस बालक का नाम वर्द्धमान रखा जाए। 3.सन्मति - एक समय संजय और विजय नाम के दो चारण ऋद्धिधारी मुनियों को तत्व सम्बन्धी कुछ जिज्ञासा थी। वर्द्धमान पर दृष्टि पड़ते ही उनकी जिज्ञासा का समाधान हो गया तब मुनियों ने वर्द्धमान का नाम सन्मति रखा। 4.महावीर-वर्द्धमान मित्रों के साथ एक वृक्ष पर क्रीड़ा (खेल) कर रहे थे, तब संगमदेव ने भयभीत करने के लिए एक विशाल सर्प का रूप धारण कर वृक्ष के तने से लिपट गया। सब मित्र डर गए, डाली से कूदे और भाग गए, किन्तु वर्द्धमान सर्प के ऊपर चढ़कर ही उससे क्रीड़ा करने लगे थे। ऐसा देख संगमदेव ने अपने रूप में आकर वर्द्धमान की प्रशंसा कर महावीर नाम दिया। 5.अतिवीर-एक हाथी मदोन्मत्त हो किसी के वश में नहीं हो रहा था। उत्पात मचा रहा था। महावीर को ज्ञात हुआ तो वे जाने लगे, तब लोगों ने मना किया किन्तु वे नहीं माने और चले गए। हाथी महावीर को देख नतमस्तक हो सूंड उठाकर नमस्कार करने लगा। तब जनसमूह ने कुमार की प्रशंसा की और उनका नाम अतिवीर रख दिया। 30. मुनि महावीर पर किसने उपसर्ग किया था ? मुनि महावीर पर उपसर्ग भव नामक यक्ष अथवा स्थाणु नाम रुद्र ने किया। ऐसे दो नाम पुराणों में आते हैं।
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    आचार्य श्री के पास पहुँचे बिरला कोटा बूंदी सांसद ओम् बिरला जी॰एम॰ए॰ अध्यक्ष राकेश कुमार जैन के साथ आज वर्तमान के वर्धमान आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शनार्थ मध्यप्रदेश के जबलपुर पहुँचे। आचार्य श्री ने बिरला से चर्चा करते हुए कहा कि भारत में वर्षा के जल को बनाये रखने और धरती में जल को बनाए रखने के लिये नदियों को जोड़ेने की आवश्यकता हे जिस पर काम किया जाना चाहिये ऐसा करने से खेती, जानवर, पशु , पक्षी और मनुष्य सभी को पर्याप्त पानी मिल सकेगा और वर्षा से जो जल व्यर्थ बह जाता हे उसे अक्षुण रखा जा सकेगा। आचार्य श्री ने बिरला से चर्चा करते हुए कहा कि विश्व में भारत ही शाकाहार के लिये जाना जाता हे और यह हमारी पहचान हे जिसे अक्षुण रखने की आवश्यकता हे दुनिया के कई देश शाकाहार को मानने लगे हे और भारत को दुनिया इसी वजह से विश्व गुरु मानेगी। बिरला ने कहा की मेरी भावना हे कि आचार्य श्री को भारत रत्न से नवाज़ा जाये इसके लिये मेने अपनी और से राष्ट्रपति महोदय को पत्र लिखा हे | और शीघ्र ही आचार्य विद्यासागर जी महाराज को भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत किया जाना चाहिए।
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    आज प्रतिभास्थाली / दयोदय जबलपुर में मआचार्य भगवन विद्यासागर जी महाराज के दर्शन करने पहुँचे..भारत के गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह एंव मध्य प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह..!! ● श्री राजनाथ सिंह ने गुरु पादप्रक्षालन को किया..!! ● दोनों नेताओं ने गुरु पूजन के साथ श्रीफल अर्पित किया..!! ● जैन समाज की ऒर से मध्य-प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री श्री जयंत मलैया जी मौजूद रहें..!! ● करीब आधे घँटे तक चला गुरु जी से वार्तालाप..!! ● देश -प्रदेश के बड़े बड़े नेता समय समय पर गुरु चरणों में देते रहते हैं हाज़िरी..!! समाचार संकलन अक्षय रसिया,मड़ावरा
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    संसारी प्राणी को मुख्य रूप से तीन ऋतुओं के माध्यम से राग-द्वेष, धर्म विषाद होता है। गर्मी में सर्दी और सर्दी में सूर्यनारायण याद आते हैं। जब जो है उस समय उससे राग क्यों नहीं? जाने के बाद अनुराग क्यों? जिस समय जो मौसम है उस समय उसी का आनंद क्यों नहीं लिया जाता। इन ऋतुओं को बार-बार परिवर्तित/समाप्त करने की अपेक्षा समाप्त करने की चाह रखने वाले मोह को ही समाप्त कर देना चाहिए। यह मोह का ही परिणाम है कि मनोनुरूप कार्य होने पर हम प्रशंसा के गीत गाने लगते हैं और मन की न होने पर उसी की अवहेलना/उपेक्षा करने लगते हैं। मानव मन की यह बहुत बड़ी कमजोरी है। स्वभाव का भान होते ही यह सारी बातें पीछे छूट जाती है। पैसा आ जाये तो खूब उत्साह विलास और चला जाये तो उदास, निराश किन्तु वास्तविकता समझ में आते ही न विलास न निराश बल्कि संन्यास आ जाता है। एक वह व्यक्ति जिसे हम आपके सामने लाकर रख रहे हैं, आप लोगों की अपेक्षा बहुत पीछे था पर कैसे बढ़ गया आगे, इस पर आप सभी को विचार करना है। चैन नहीं है बिल्कुल, रात बहुत बड़ी है, चारों ओर भोग सामग्री फैली है, सब तरफ गहन मौन छाया है। किसी को उठाना/बुलाना नहीं चाहता है वह/वह चाहता है कि सब लोग ऐसे ही सोते रहे और मैं चुपचाप धीरे से निकल जाऊँ/निकलने के लिये रस्सी नहीं तो क्या? कुछ भी ......। हाँ! will power होना चाहिए। आपके पास में धन, बल, पद का power हो सकता है पर will power नहीं है। हमें आज इस व्यक्ति के माध्यम से power की नहीं will power, self confidence की बात करनी है। यदि हमारी इच्छा शक्ति प्रबल हो तो बिना रस्सी के भी रस्सी का काम हो सकता है। फिर नसैनी की जरूरत नहीं सैनी (मन/इच्छा) भर हो, समझदारी भर हो। जहाँ चाह है वहाँ राह निकल ही आती है और रास्ता खोज लिया गया-साड़ियाँ बाँधकर नीचे उतर गया। वह। क्या सोचकर निकले? भवन को छोड़कर वन की ओर क्यों गया? इस भवन में सुख नहीं तो दूसरा भवन, राजभवन भी तैयार किया जा सकता था किन्तु सब कुछ छोड़कर वन की ओर क्यों? बस एक ही बात-आत्म श्रद्धान् self confidence, will power | काली-काली घटायें देखकर, बिजलियों की चमक और बादलों की गर्जन सुनकर सभी भयभीत हो जाते हैं, घबराते हैं किन्तु वह मयूर दल निर्भीक आनंद के साथ नाचता रहता है क्योंकि उसे इष्ट दिख गया है। कदम आगे बढ़ते गये, कंकर काटे आये पर रुके नहीं। रास्ते में पदचिह्न अंकित होते गये रत के निशान से। कष्ट का ज्ञान तो हुआ होगा पर दृढ़ता कैसी अद्भुत, जैसे अपने ही घर की ओर जा रहे हों, शरण्य की ओर जा रहे हों। पहुँच गये उल्लास के साथ, प्रणाम किया और तथास्तु के रूप में मिल गया आशीष। इतना ही सुनने मिला कि-केवल तीन दिन की आयु शेष है, शीघ्र ही अपने कल्याण में लग जा और फिर क्या? एक साथ दैगम्बरी दीक्षा। क्या साहस है, कहीं से आ गया, कैसे आ गया यह साहस। वन में किसने बुलाया? और भवन को किसने भुलाया? यह सूक्ष्म डोर दिखती ही नहीं फिर भी सम्बन्ध तारतम्य बना रहता है। रक्त की गन्ध पाकर स्यालनी आ गई बच्चों सहित, खाना शुरू हो गया लेकिन वह निडर निस्पृह खड़े हैं। मेरु की तरह अडिग। वही काया जिसे सरसों के दाने चुभते थे, रून कम्बल के बाल सह्य नहीं थे, रून दीपक के प्रकाश में पालन-पोषण हुआ, कमल पत्र में सुवासित चावलों के एक-एक दाने चुगे जाते थे, और आज अहा.....! हा.....will power, Self confidence वही काया, वही क्षेत्र वही भोग्य सामग्री, पर कहीं से आ गई ये दृष्टि। उनका नाम मालूम है क्या था? वे थे हमारे आदर्श सुकमाल स्वामी। बंधुओ! भूख है तो खोज हो ही जाती है अनाज की। दृष्टि होने पर गन्तव्य मिल ही जाता है। आत्मज्ञान के अभाव में यह संसारी प्राणी शरीर की सेवा में लगा रहता है किन्तु आत्मज्ञान प्राप्त होते ही कड़े से कड़े प्रबंध और वैभव सब पड़े रहते हैं फिर वह शिव राही शरीर की परवाह नहीं करता। शरीर तो अनेकों बार मिला, मिला और छूट पर उसको तो देखो जिसे मिला है। शरीर के मिलने पर हर्ष और छूटने पर विषाद क्यों? क्या कभी पुराने वस्त्र बदलते समय हम विषाद करते हैं। गीता में कहा गया है कि यह आत्मा अखेद्य है, अभेद्य है, अक्लेक्ष्य है नित्य ही सनातन है जो पानी में डूब नहीं सकती, अग्नि में जल नहीं सकती, वायु के द्वारा शोषित नहीं हो सकती ऐसी यह आत्मा अविनश्वर है। समयसार में भी कहा गया है कि शरीर के छिद जाने पर, मिट जाने पर भी इस आत्मा का कुछ भी नहीं बिगड़ता है। फिर भी हम हैं कि इस रहस्य को न समझकर शरीर के व्यामोह में फैंसे हुए हैं यही अज्ञानता हमारी दुख परतन्त्रता का कारण बनी हुई है। रणांगन में अर्जुन ने जब देखा कि सामने गुरु द्रोणाचार्य और सारे कुटुम्बीजन खड़े हुए हैं तब धीरे से नीचे गांडव रख दिया और ज्ञान योग की बात करने लगे। तब कहा गया- हे! अर्जुन, रणांगन में तुम ज्ञानयोग का उपदेश सुनना चाहते हो। मोह की वजह से तुम्हें सिर्फ और सम्बन्ध दिखाई दे रहे हैं, अन्याय नहीं दिख रहा। यदि तुम्हें अन्याय दिखता तो तुम रणांगन के कर्तव्य से पीछे नहीं हटते। रणांगन में सामने वाले की आरती नहीं होती वह तो अराति (शत्रु) होता है। शिक्षा देने वाले पर कैसे बाण चलाये अर्जुन। अरे यदि सही शिक्षा देने वाला होता तो अन्याय की ओर खड़ा ही क्यों होता। अर्जुन को दृष्टि प्राप्त हुई, मोह भंग हुआ, स्वाभिमान जागा, कर्तव्य का भान हुआ और फिर क्या हुआ? सो सभी को ज्ञात है। यह देश जब परतन्त्र था तो हमें एक नारा दिया गया था कि 'स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है'। यह नारा ही नहीं हमारा सिद्धान्त भी है। अनादिकाल से यह जीव परतन्त्रता का कष्ट भोग रहा है, यह भूल ही गया कि स्वतन्त्रता पाने का अधिकार हमारा जन्मसिद्ध ही है। इसके अन्दर स्वयं भगवान् बनने की शक्ति है पर वर्तमान में वह खोई हुई है। इसके अन्दर छिपा हुआ परमात्मा अभी सोया हुआ है, इसे जगाने की जरूरत है। जागृति के आते ही हमारे कदम गन्तव्य की ओर बढ़ने लगते हैं। संकल्पशक्ति का धनी वह वैराग्यवान साधक फिर लक्ष्य की प्राप्ति के लिये सब कुछ सहन करने तैयार हो जाता है सुकमाल स्वामी की तरह। धन्य है वे सुकमाल स्वामी जिन्होंने अति सुकुमार काया को पाकर भी मोक्षमार्ग में कमाल का काम कर दिया। वह काम किया जिसे युगों-युगों तक याद रखा जायेगा। ये कथायें ही नहीं हैं किन्तु जीवन को जगाने वाले प्रेरक प्रसंग है। इन्हें सुनकर हमारा स्वाभिमान जागृत हो जाता है, will power बढ़ जाता है। सुकमाल स्वामी ने तो तीन दिन में ही अपना सारा वैभव प्राप्त कर लिया जो अनन्त काल से खोया हुआ था। हम भी उन्हीं की तरह अपने खोये हुए स्वतंत्र वैभव को प्राप्त कर सकते हैं बस जरूरत है आत्म विश्वास की। उस आनंद वैभव की प्राप्ति हमें भी शीघ्रातिशीघ्र हो इसी भावना के साथ।
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    *‼आहारचर्या‼* *प्रतिभास्थली दयोदय जबलपुर* _दिनाँक :११/०५/२०१९_ *आगम की पर्याय महाश्रमण युगशिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज* _को आहार दान एवं सौभाग्य *श्रीमान दिलीप जी जैन घेबारी मुम्बई* को एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ है।_ इनके पूण्य की अनुमोदना करते है। 💐🌸💐🌸 *भक्त के घर भगवान आ गये* 🌹🌹🌹🌹 *_सूचना प्रदाता-:श्री प्रांजल जी जैन श्रीमति सपना-मुकुल जैन,सेतु,संगम कॉलोनी जबलपुर_* 🌷🌷🌷 *अंकुश जैन बहेरिया *प्रशांत जैन सानोधा
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    आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज द्वारा दिनांक - 15 अप्रैल, 1980, मंगलवार, वैशाख कृष्ण अमावस्या वि० सं० २०३७, स्थान-मोराजी, सागर (म० प्र०) में २ मुनि दीक्षायें प्रदान की मुनिश्री योगसागर जी मुनिश्री नियमसागर जी इस वर्ष वैशाख कृष्ण अमावस्या की पावन तिथि दिनांक - 4 मई 2019 को हम सभी मुनिश्री के रत्नत्रय की अनुमोदना करते है | 40 वें मुनि दीक्षा दिवस के पावन अवसर पर मुनिश्री योगसागर जी एवं मुनिश्री नियमसागर जी के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन।
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    चिकित्सा एवम शिक्षा के क्षेत्र में दान का अवसर जबलपुर। समाज का एक बड़ा वर्ग लम्बे समय से चिकित्सा एवम शिक्षा के समन्वित संस्थान के भाव रखकर आचार्य श्री जी से बारम्बार निवेदन कर रहा था। इसी निवेदन के फलस्वरूप पूर्णायु आयुर्वेदिक चिकित्सालय एवम अनुसंधान विद्यापीठ का आशीर्वाद जबलपुर को मिला है। इस संस्थान में 100 बेड का चिकित्सालय , ओषधियो के अनुसंधान का केंद्र, प्राकृतिक चिकित्सा का केंद्र, आयुर्वेद महाविद्यालय( जो भविष्य में यूनिवर्सिटी का रूप लेगा) निर्मित होगा, यहाँ महाविद्यालय में आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा के साथ प्राचीन सर्वसिद्ध प्रचलित नाड़ी परीक्षण की पद्धति से चिकित्सक प्रशिक्षित होंगे, प्रतिवर्ष 200 चिकित्सक को तैयार करने वाले इस महाविद्यालय में BAMS के कोर्स के साथ साथ नाड़ी परीक्षण की कला में सिद्ध हस्त किया जायेगा। यहाँ संचालित होने वाले चिकित्सालय में भारत वर्ष के नामचीन आयुर्वेदिक चिकित्सक , राजवैद्य, नाड़ी वैध, प्राकृतिक चिकित्सा के जानकार जटिल से जटिल रोगों का उपचार करेगे। औषधियो के अनुसंधान केंद्र में सतत शोध करके जड़ी बूटियों से शुद्ध एवम प्रभावशाली ओषधियॉ निर्मित की जायेगी। ये औषधियॉ जटिल से जटिल रोगों पर तुरन्त प्रभावशाली होगी। इस संस्थान को विश्वस्तरीय बनाने उच्च मानकों पर कार्य होगा। अब समाज के प्रत्येक वर्ग से अपील है जो चिकित्सा एवम शिक्षा के क्षेत्र में दान की भावना रखते है कि वे सभी इस संस्थान से अवश्य जुड़े। जैन समाज अब इस संस्थान के रूप में भारत को बड़ी सौगात देने जा रही है।
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    हमारे पहनावे हमारे भोजन बेकार साहित्य का हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ता है मैंने आचार्यश्री के प्रवचन सुने मन आनन्दित हो गया मेरा निजी आग्रह है किएक बार जरुर सुने अन्यथा आप आचार्यश्री के विशाल चिंतन से वंचित रहेगे
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    मुनिश्री समयसागर जी ससंघ की तस्वीरें
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    दिनांक - 22 अप्रैल 2019 स्थान - प्रतिबहस्थली दयोदय जबलपुर संधान सागर जी के केश लॉच.mp4
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    आज आचार्य श्री मुनिश्री दुर्लभसागर जी मुनिश्री नीरोगसागर जी मुनिश्री निश्चलसागर जी मुनिश्री श्रमणसागर जी मुनिश्री संधानसागर जी के जबलपुर में हुए केश लोच |
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    ”सत्य” ”अहिंसा” धर्म हमारा, ”नवकार” हमारी शान है, ”महावीर” जैसा नायक पाया…. ”जैन हमारी पहचान है.” महावीर भगवान के जन्म कल्याण दिवस की शुभकामनाएँ एवं बधाई
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    अब दान का लक्षण कहते हैं- अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥ अर्थ - अपने और दूसरों के उपकार के लिए धन वगैरह का देना, सो दान है। अर्थात् दान देने से दाता को पुण्य बन्ध होता है और जिसे दान दिया जाता है, उस पात्र के धर्मसाधन में उससे सहायता मिलती है। इन्हीं भावनाओं से दिया गया दान वास्तव में दान है। English - Charity is the giving of one's wealth to another for mutual benefit.
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    चोरी का लक्षण कहते हैं- अदत्तादानं स्तेयम् ॥१५॥ अर्थ - बिना दी हुई वस्तु का लेना चोरी है। यहाँ भी ‘प्रमत्तयोगात्। इत्यादि सूत्र से ‘प्रमत्तयोग' पद की अनुवृत्ति होती है। अतः बुरे भाव से जो परायी वस्तु को उठा लेने में प्रवृत्ति की जाती है, वह चोरी है। उस प्रवृत्ति के बाद चाहे कुछ हाथ लगे या न लगे, हर हालत में उसे चोर ही कहा जायेगा। English - Taking through pramattayoga anything that is not given is stealing.
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    आगम में गारव शब्द का वर्णन आता है, उन्हें तीन प्रकार से व्याख्यायित किया गया है-१. रस गारव, २. ऋद्धि गारव, ३. सात गारव। यह गारव आत्मा के अन्दर एक ऐसी परिणति को उत्पन्न करता है, जो मान कषाय की सूक्ष्म परिणति जिसे अहंकार के नाम से भी जाना जाता है। पुण्य से साधन सम्पन्नता प्राप्त होने पर भी कभी जिन का मन फूलता नहीं है, ऐसे गारव से रहित जीवन जीने वाले गुरुदेव जब आहारचर्या के लिये श्रावक के चौके में जाते हैं, उस समय श्रावक थाली में ५० प्रकार के व्यंजनों को दिखाता है, फिर भी अंगुली के इशारे से सभी को हटा देते हैं और नीरस आहार जिसमें नमक-मीठा नहीं ग्रहण करते हैं। ये दोनों रस भोजन के राजा कहे जाते हैं। हरी सब्जी, फल रहित आहार को ग्रहण करते हैं। जब वही आहार कोई भक्त श्रावक ग्रहण करते हैं तो वह आहार स्वादिष्ट लगता है। यह आगम में ऋद्धियों का वर्णन है, उन्हीं का प्रभाव जानो। भले ही ऋद्धि आज नहीं हैं। आचार्यश्री जिस भी तीर्थक्षेत्र पर पहुँच जाते हैं, वहाँ उनके तप के प्रभाव से धन की वर्षा होने लगती है। भीड़ उमड़ने लगती है, क्षेत्र का विकास होने लगता है फिर भी कभी मन में ये भाव नहीं आता कि मैं इसका कर्ता हूँ या ये मेरे द्वारा हो रहा है, मैं नहीं आता तो ये क्षेत्र वीरान पड़े होते। इस प्रकार मानसिक प्रसन्नता के भाव से दूर रहते हैं। गुरुदेव लौकिक शिक्षा में कक्षा नौवीं तक पढ़े हैं और पढ़े-लिखे लोग उनके चरणों में पड़े रहते हैं। लौकिक पढ़ाई की हीनता के बावजूद ४-५ वर्षों में आचार्य ज्ञानसागरजी से आगम का अथाह ज्ञान आत्मसात किया फिर भी ज्ञानऋद्धि से प्रभावित नहीं हुए। इसी क्रम में आगे कहना चाहूँगा, सातावेदनीय की तीव्र उदीरणा होते हुए भी जंगल में जाते हैं, मंगल हो जाता है। चौकों की लाइन लग जाती है, कभी मन के कोने में विचारों की गूंज नहीं आ पाती कि ऐसे भी साधु हैं, जिनके लिये चौकों की पंक्ति नहीं मिलती। ऐसे भाव से रहित होना सात गारव से निरपेक्ष है।५० वर्षों से रस, ऋद्धि, सात गारव से निरपेक्ष एवं निर्लिप्त दृष्टि बनाकर आत्म साधना में लीन रहकर अपने शिष्यों को इसी प्रकार की दूरी बनाकर रहने का संदेश देते हैं।
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    पर से बोधित नहीं हुए पर, स्वयं स्वयं ही बोधित हो। समकित-संपति ज्ञान नेत्र पा जग में जग-हित शोभित हो ॥ विमोह-तम को हरते तुम प्रभु निज-गुण-गण से विलसित हो। जिस विध शशि तम हरता शुचितम किरणावलिले विकसित हो ॥१॥ जीवन इच्छुक प्रजाजनों को जीवन जीना सिखा दिया। असि, मषि, कृषि आदिक कर्मों को प्रजापाल हो दिखा दिया ॥ तत्त्व-ज्ञान से भरित हुए फिर बुध-जन में तुम प्रमुख हुए। सुर-पति को भी अलभ्य सुख पा विषय-सौख्य से विमुख हुए ॥२॥ सागर तक फैली धरती को मन-वच-तन से त्याग दिया। सुनन्द-नन्दा वनिता तजकर आतम में अनुराग किया। आतम-जेता मुमुक्षु बनकर परीषहों को सहन किया। इक्ष्वाकू-कुल-आदिम प्रभुवर अविचल मुनिपन वहन किया ॥३॥ समाधि-मय अति प्रखर अनल को निज उर में जब जनम दिया। दोष-मूल अघ-घाति कर्म को निर्दय बनकर भसम किया ॥ शिव-सुख-वांछक भविजन को फिर परम तत्त्व का बोध दिया। परम-ब्रह्म-मय अमृत पान कर तुमने निज घर शोध लिया ॥४॥ विश्व-विज्ञ हो विश्व-सुलोचन बुध-जन से नित वंदित हो। पूरण-विद्या-मय तन धारक बने निरंजन नंदित हो ॥ जीते छुट-पुट वादी-शासन अनेकान्त के शासक हो। नाभि-नन्द हे! वृषभ जिनेश्वर मम-मन-मल के नाशक हो ॥५॥ आदिम तीर्थंकर प्रभो आदिनाथ मुनिनाथ! आधि व्याधि अघ मद मिटे तुम पद में मम माथ ॥१॥ शरण, चरण हैं आपके तारण तरण जहाज। भव-दधि-तट तक ले चलो! करुणाकर जिनराज ॥२॥
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    आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी द्वारा प्राकृत भाषा में प्रणीत ‘समयसार' का यह अनूदित रूप है। यह ग्रन्थ भुक्तिमुक्ति का बीज है। इस ग्रन्थ में जीवाजीवाधिकार, कर्तृकर्माधिकार, पुण्यपापाधिकार, आस्रवाधिकार, संवराधिकार, निर्जराधिकार, बन्धाधिकार, मोक्षाधिकार एवं सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार का समावेश है। इस ग्रन्थ का अनुवाद करने में आचार्यश्री के समक्ष कुछ कठिनाइयाँ भी आई हैं, जिनका उल्लेख उन्होंने इस ग्रन्थ में किया है। ग्रन्थ पर्याप्त गम्भीर है, अत: कई टीका-प्रटीकाओं का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने माना है कि कहीं-कहीं शब्दानुवाद भी है, पर अधिसंख्य भावानुवाद जैसा उत्तम और प्रशस्त रूपान्तरण हुआ है। इस ग्रन्थराज ‘समयसार’ पर एक वृत्ति ‘तात्पर्य' संज्ञक है, जो जयसेनाचार्य द्वारा प्रणीत है। तदुपरि पूज्य अमृतचन्द्र की ‘आत्मख्याति' का भी मन्थन करना पड़ा। चेतना की लीलानुभूति से आप्यायित अन्तस् समुच्छल हो उठा और लयाधृत छन्द में निर्बाध बह चला। यही है सारस्वत समावेश दशा, जिसमें अनुभूति ‘समुचितशब्दच्छन्दोवृत्तादिनियन्त्रित होकर बह निकलती है। काव्य की रचना-प्रक्रिया का विवेचन करते हुए अभिनवगुप्तपाद ने यही कहा है।‘समयसार' का ही नहीं, नाट्यकाव्यात्मक आत्मख्यातिगत कलशारूप २७८ कारिकाओं का भी रूपान्तर बन पड़ा है। आचार्य कुन्दकुन्द की तीन रचनाएँ बड़ी प्रौढ़ मानी जाती हैं - प्रवचनसार, पञ्चास्तिकाय तथा समयसार।अमृतचन्द्रसूरि ने इन तीनों पर टीकाएँ लिखी हैं। इन उभय टीकाओं में गाथाओं की संख्या समान नहीं मिलती। समस्या यह भी आई-आचार्य अमृतचन्द्र की टीकाओं में कम और आचार्य जयसेन की टीकाओं में अधिक गाथाएँ क्यों हैं? ‘प्रवचनसार' की चूलिका का अवलोकन करते हुए स्त्रीमुक्ति निषेध' वाले प्रसंग पर ध्यान गया। वहीं १०-१२ गाथाएँ छूटी हैं। आचार्य अमृतचन्द्र ने इन पर टीकाएँ नहीं लिखीं।इससे अनुमान किया गया कि आचार्य अमृतचन्द्र को स्त्रीमुक्ति निषेध का प्रसंग इष्ट प्रतीत नहीं था। इन टीकाओं की प्रशस्तिओं से पता लगता है आचार्य जयसेन मूलसंघ के और अमृतचन्द्र सूरि काष्ठासंघ के सिद्ध हैं। आचार्यश्री को इससे एक नवीन विषय मिला। गम्भीर ग्रन्थान्तर का अधिगम, भाषान्तरण, लयबद्ध पद्यबद्धीकरण- यह सब एक से एक कठिन कार्य हैं, पर लगन और अभ्यास से सब कुछ सम्भव है। आत्मख्यातिगत २७८ कारिकाओं का संकलन ‘कलशा' नाम से ख्यात है। इसके १८८ वें काव्य के विषय में छन्द को लेकर के कठिनाई आई। वह न गद्य जान पड़ा और न पद्य। काफी जद्दोजहद के बाद लगा कि यह तो निराला और अज्ञेय की रचनाओं में प्राप्त अतुकान्त छन्द का प्राचीन रूप है। इसमें एक खोज यह भी हुई कि आचार्य अमृतचन्द्र संस्कृत लयात्मक काव्य के आद्य आविष्कर्ता हैं। आचार्यश्री ने उन लोगों से असहमति व्यक्त की है जो लोग शब्दज्ञान, अर्थज्ञान और ज्ञानानुभूति को परिग्रहवान् गृहस्थ और प्रमत्त में भी मानते हैं। उनका कहना है कि ज्ञानानुभूति तो आत्मानुभव है-शुद्धोपयोग है। वह परिग्रह और प्रमाद वाले गृहस्थ को तो क्या होगा-प्रमत्त दिगम्बर मुनि को भी नहीं हो सकता। भोग और निर्जरा एक साथ नहीं चल सकते। आगम इस मान्यता से असहमत है।
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    (वसंततिलका छन्द) हे! शांत संत अरहंत अनंत ज्ञाता, हे! शुद्ध बुद्ध शिव सिद्ध अबद्ध धाता। आचार्यवर्य उवझाय सुसाधु सिन्धु, मैं बार-बार तुम पाद-पयोज वंदूँ ॥१॥ है मूलमंत्र नवकार सुखी बनाता, जो भी पढ़े विनय से अघ को मिटाता। है आद्य मंगल यही सब मंगलों में, ध्याओ इसे न भटको जग जंगलों में॥२॥ सर्वज्ञदेव अरहंत परोपकारी, श्री सिद्ध वन्द्य परमातम निर्विकारी। श्री केवली कथित आगम साधु प्यारे, ये चार मंगल, अमंगल को निवारे ॥३॥ श्री वीतराग अरहंत कुकर्मनाशी, श्री सिद्ध शाश्वत सुखी शिवधामवासी। श्री केवली कथित आगम साधु प्यारे, ये चार उत्तम, अनुत्तम शेष सारे ॥४॥ ये बाल-भानु सम हैं अरहंत स्वामी, लोकाग्र में स्थित सदाशिव सिद्ध नामी। श्री केवली कथित आगम साधु प्यारे, ये चार ही शरण हैं जग में हमारे ॥५॥ जो श्रेष्ठ हैं, शरण, मंगल कर्मजेता, आराध्य हैं परम हैं शिवपंथ नेता। हैं वन्द्य खेचर, नरों, असुरों, सुरों के, वे ध्येय पंच गुरु हों हम बालकों के ॥६॥ है घातिकर्म दल को जिनने नशाया, विज्ञान पा सुख अनूप अनंत पाया। हैं भानु भव्य-जन-कंज विकासते हैं, शुद्धात्म की विजय से, अरहंत वे हैं ॥७॥ कर्त्तव्य था कर लिया, कृतकृत्य द्रष्टा, हैं मुक्त कर्म तन से निज द्रव्य स्रष्टा! हैं दूर भी जनन मृत्यु तथा जरा से, वे सिद्ध सिद्धिसुख दें मुझको जरा से ॥८॥ ज्ञानी, गुणी मत-मतान्तर ज्ञान धारें, संवाद से सहज वाद-विवाद टारें। जो पालते परम पंच-महाव्रतों को, आचार्य वे सुमति दें हम सेवकों को ॥९॥ अज्ञान रूप-तम में भटके फिरे हैं, संसारि जीव हम हैं दुख से घिरे हैं। दो ज्ञान ज्योति उवझाय ! व्यथा हरो ना, ज्ञानी बनाकर कृतार्थ हमें करो ना ॥१०॥ अत्यंत शांत विनयी समदृष्टि वाले, शोभें प्रशस्त यश से शशि से उजाले। हैं वीतराग परमोत्तम शील वाले, वे प्राण डालकर साधु मुझे बचा लें ॥११॥ अर्हत् अकाय परमेष्ठि विभूतियों के, आचार्यवर्य उवझाय मुनीश्वरों के। जो आद्यवर्ण अ, अ, आ, उ, म को निकालो, ओंकार पूज्य बनता, क्रमशः मिला लो ॥१२॥ आदीश हैं अजित संभव मोक्षधाम, वंदूँ गुणौघ अभिनंदन हैं ललाम। सद्भाव से सुमति पद्म सुपार्श्व ध्याऊँ, चंद्रप्रभू चरण से चिति ना चलाऊँ ॥१३॥ श्री पुष्पदन्त शशि-शीतल शील पुञ्ज, श्रेयांस पूज्य जगपूजित वासुपूज्य। आदर्श से विमल, संत अनंत, धर्म, मैं शांति को नित नमूं मिल जाय शर्म ॥१४॥ श्री कुन्थुनाथ अरनाथ सुमल्लि स्वामी, सद्बोध-धाम मुनिसुव्रत विश्व-नामी। आराध्य देव नमि और अरिष्ट नेमी, श्री पार्श्व-वीर प्रणमूँ,निज धर्म प्रेमी ॥१५॥ हैं भानु से अधिक भासुर-कान्ति वाले, निर्दोष हैं इसलिए शशि से निराले। गंभीर नीर-निधि से जिन सिद्ध प्यारे, संसार सागर किनार मुझे उतारें ॥१६॥
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    अजमेर की नसिया में चल रहा चातुर्मास, नित्य प्रवचन में आते अनेकों श्रोतागण जब आया पर्व दशलक्षण बिना शास्त्र खोले, कंठस्थ मोक्षशास्त्र का किया शुद्ध वाचन गुरू हुए प्रसन्न श्रोता हुए चकित, विद्याधर थे सहज । अभी बहुत सीखना है शेष... चारित्र को पाना है विशेष। व्रती विद्याधर की ज्ञान-गरिमा में लगे चार चाँद, किंतु मन को छू न पाया ज्ञान का मान। गुरु की वृद्धावस्था साथ ही रोग था 'सायटिका' गर्मी का था मौसम हवा में वर्जित था शयन अतः बंद कक्ष में करते शयन विद्याधर भी रहते वहीं गुरु के संग दर्द होने पर बार-बार दबाते । खुली हवा में सोने को कहते, किंतु गुरु के सोने पर वे वहीं सो जाते सेवा में त्रियोग से तत्पर गुरू का हृदय से रहता आशीष उन पर...। पूछा कजौड़ीमल से एक दिन विद्या रात में पढ़ता है या सोता रहता है? बोले वह लगता तो है पढ़ता ही होगा लेकिन ध्यान नहीं दिया। अब से ध्यान दूँगा, संत-निवास में ही रहकर देर रात में उठकर... जब देखा तब पढ़ रहा था ज्यों ही देखा घड़ी की ओर पूरा एक बज रहा था...। उठकर आये पास में बोले बड़े प्यार से ब्रह्मचारी जी! बंद करो पढ़ाई अभी कोई परीक्षा नहीं आई देर तक जगना अच्छा नहीं, बात उनकी मान शीघ्र समेटे शास्त्र सो गये बिछाकर चटाई। प्रभात में बैठे ही थे दर्शन करके पूछा मुनिवर ने कुछ पढ़ता है रात में? बोले गुरूभक्त कजोड़ीमल एक बात समझ नहीं आई हीरा भी लाकर दूँ और परख भी मैं ही करूं।' महाराज! आपका शिष्य है होनहार... बड़ी लगन है उसमें; रात्रि आठ से एक बजे तक पढ़कर, प्रातः साढ़े चार बजे उठकर सामायिक पाठ आदि करता है। सुनकर प्रशंसा शिष्य की गुरु आनंद से भर गये। स्वयं मन ही मन कहने लगे पहले क्यों नहीं आ गये! क्यों इतनी देर कर गये!! नित-प्रतिदिन नया विषय ज्ञान के खजाने से निकल रहा था लगन के साथ पढ़ते हुए विद्या का विकास हो रहा था...। सच ही कहा है ‘‘विद्या योगेन रक्ष्यते विद्या की रक्षा होती है अभ्यास से इसीलिए विद्यार्जन कर रहे पूर्ण लगन से। दो माह बीत गये पढ़ाने लगे अब आठ घंटे, चाहते थे संपूर्ण ज्ञानामृत शिष्य के हृदय में भर देना वह भी अपना चित्त-कटोरा करके रखते सदा सीधा गुरू-बादल से नीर बरसता मन-सीपी खुली रहती हर बूंद मोती बन जाती। इस तरह रात-दिन चिंतन-मनन-पठन चल रहा था, जो भी देते गुरू ज्ञान उसे करते उसी दिन याद छोड़ते नहीं कल पर क्योंकि वे जानते थे ‘कल कामने इच्छा के अर्थ में है कल् धातु जब तक रहेगी कल की कामना कल-कल करता रहेगा, पल-पल आकुल-व्याकुल होता रहेगा इसीलिए कल के लिए होना नहीं है विकल अकल से काम लेना है। नकल करना है अब निकल परमातम की। हे आत्मन्! कल का भरोसा नहीं आज का कार्य आज ही करना है, यों समझाते स्वयं को बढ़ते जाते आगे-आगे...। मानो मिल गया भूले को मार्ग प्यासे को समंदर भूखे को मिष्ठान्न अंधे को नयन। पाया जबसे गुरू-ज्ञान का भंडार मिल गया जीवन का आधार लगने लगा अब उन्हें... साँसों की सरगम में महागान गुरूवर हैं, हृदय-देश के शासक संविधान गुरूवर हैं, अज्ञान तमहारक अवधान गुरूवर हैं। मेरी हर समस्या का समाधान गुरूवर है...। गुरूपद में सर्वस्व अर्पण कर वरद हस्त प्राप्त कर चिंतन-मनन में ध्यान-अध्ययन में, भूल गये बाहर की दुनिया आहारोपरांत गुरू के । जो भी आते श्रावक बुलाने सिर झुकाये मौन से । चले जाते साथ उनके भोजन करने। बचपन से ही नहीं थी भोजन में गृद्धता खा लेते जो भी माँ के हाथ से मिलता, भोजन के प्रति निस्पृहता, सात्विकता देखकर गुरु ने एक दिन पूछा ठीक चल रही है साधना? कहकर- ‘हाँ । फिर हो गये मौन...। भोजन के बाद मन को थकाने वाले न करें कार्य, रखे मन प्रसन्न और शांत कर सके ताकि उत्साह से सामायिक, तब बनेगी एकाग्रता । यही साधना लायेगी ज्ञान में निखार सुनकर यों गुरु-वचन हितकार। उपयोग का उपयोग करना ही समय का सदुपयोग करना है, भोगों में उपयोग का भ्रमना ही समय का दुरूपयोग करना है, जानकर यूं स्वयं को साधना में डुबाने लगे। शब्द में छिपे छंद को मुक्त कर सुप्त संगीत को जगाकर वीणा बजाता है वादक। और इधर देह में सोये ब्रह्म को पुकार कर ज्ञानचक्षु से निहारकर विद्याधर हुए अद्भुत कलाविद्, आत्मज्ञायक, यह सब ज्ञानी गुरू का ही है चमत्कार अन्यथा कैसे मिल पाता। अल्प समय में ज्ञान का महान उपहार?? इस देश को चलाने चाहिए राष्ट्राधीश । अदालत को चलाने चाहिए न्यायाधीश विद्यालय में चाहिए अध्यापक मंच पर चाहिए संचालक और मुझे भी चाहिए पल-पल गुरू ज्ञानसागर, जो पामर को बनाते हैं परम ब्रह्म से मिला देते हैं मिटाकर भरम अहं को विसर्जित कर बना देते हैं अर्हं। ऐसे गुरु लाखों में हैं एक, जैसे पुत्र का पिता होता है एक सती का पति होता है एक गुलाम का मालिक होता है एक, यूँ मन ही मन गुरु-गुण गाते रहे आनंद-सर में गोते लगाते रहे… ‘जैसा संग वैसा रंग इस उक्ति को चरितार्थ करते रहे। छाता खोल लोग बारिश से बचते रहे, मगर ये गुरु-वचनामृत से भीगते रहे शीत में लोग देह को ढंकते रहे, मगर ये गुरू-कृपा की शीतलता अनुभवते रहे गर्मी में लोग तप्त उर्मियों से व्याकुल होते रहे। कृत्रिम हवा खाते रहे, मगर ये दिन-रात ज्ञानाचरण में तपते रहे। यूँ पता ही न चला पलक झपकते ही वर्ष बीत गया, दक्षिण का विद्या उत्तर में जा ज्ञान में खो गया।
  41. 1 point
    बहुत ही सुन्दर भजन है
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    (वसन्ततिलका छन्द) सन्तों नमस्कृत सुरों बुध मानवों से, ये हैं जिनेश्वर नमूँ मन वाक्तनों से। पश्चात् करूँ स्तुति निरंजन की निराली, मेरा प्रयोजन यही कि मिटे भवाली॥१॥ स्वामी! अनन्त-गुण-धाम बने हुए हो, शोभायमान निज की घुति से हुए हो। मृत्युंजयी सकल-विज्ञ विभावनाशी, वंदूँ तुम्हें, जिन बनूँ सकलावभासी ॥२॥ सच्चा निजी पद निरापद सम्पदा है, तो दूसरा पद घृणास्पद आपदा है। है। भव्यकंजरवि! यों तुमने बताया, शुद्धात्म से प्रभव वैभवभाव पाया ॥३॥ जो चाहता शिव सुखास्पद सम्पदा है, वो पूजता तव पदाम्बुज सर्वदा है। पाना जिसे कि धन है अयि ‘वीर’ देवा! क्या निर्धनी धनिक की करता न सेवा? ॥४॥ सत् तेज से मदन को तुमने जलाया, अन्वर्थ नाम फलरूप ‘महेश' पाया। नीराग से अमित सन्मति विज्ञ प्यारे, स्वामी मदीय मन को तुम ही सहारे॥५॥ हे! देव दो नयन के मिस से तुम्हारे, हैं वस्तु को समझने नय मुख्य प्यारे। यों जान, मान, हम लें उनका सहारा, पायें अवश्य भवसागर का किनारा ॥६॥ उत्पाद ध्रोव्य व्यय भाव सुधारता हूँ, चैतन्यरूप वसुधातल पालता हूँ। पाते प्रवेश मुझमें तुम हो इसी से, स्वामी! यहाँ अमित सागर में शशी से ॥७॥ जो आपमें निरत है सुख लाभ लेने, आते न पास उसके विधि कष्ट देने। क्या सिंह के निकट भी गज झुण्ड जाता? जाके उसे भय दिखाकर क्या सताता ? ॥८॥ हे! शुद्ध! बुद्धमुनिपालक! बोधधारी!, है कौन सक्षम कहे महिमा तुम्हारी ? ऐसा स्वयं कह रही तुम भारती है, शास्त्रज्ञ पूज्य गणनायक भी व्रती हैं ॥९॥ है आपने स्वतन की ममता मिटादी, सच्चेतना सहज से निज में बिठादी। लो! देह में इसलिए कनकाभ जागी, मोह्मन्धकार विघटा, निज, ज्योति जागी ॥१०॥ श्रीपाद ये कमल-कोमल लोक में हैं, ये ही यहाँ शरण पंचम काल में हैं। है भव्य कंज खिलता, इन दर्श पाता, पूजें अतः हृदय में इनको बिठाता ॥११॥ लोहा बने कनक पारस संग पाके, मैं शुद्ध किन्तु तुमसा तुम संग पाके। वो तो रहा जड़, रहे तुम चेतना हो, कैसा तुम्हें जड़ तुला पर तोलना हो? ॥१२॥ सानन्द भव्य तुम में लवलीन होता, पाता स्वधाम सुख का, गुणधाम होता। औ देह त्याग कर आत्मिक वीर्य पाता, संसार में फिर कभी नहिं लौट आता ॥१३॥ काले घने भ्रमर से शिर में तुम्हारे, ये केश हैं नहि विभो! जिनदेव प्यारे। ध्यानाग्नि से स्वयं को तुमने जलाया, लो! सान्द्र थूम मिस बाहर राग आया ॥१४॥ लो! आपके सुभग-सौम्य-शरीर द्वारा, दोषी शशी अयशधाम नितान्त हारा। वो आपके चरण की नख के बहाने, सेवा तभी कर रहा यश कान्ति पाने॥१५॥ लो आपकी सुखकरी कविता विभा से, मोहान्धकार मिटता अविलम्बता से। ज्योतिर्मयी अरुण है जब जाग जाता, कैसे कहूँ कि तम है कब भाग जाता ? ॥१६॥ सौंदर्य पान कर भी मुख का तुम्हारे, प्यासा रहा मन तभी, तुम यों पुकारे। पीयूष पी निज, तृषा यदि है बुझाना, बेटा! तुझे सहज शाश्वत शांति पाना ॥१७॥ मूँगे समा अधर पे स्मित सौम्य रेखा, है प्रेम से कह रही मुझ को सुरेखा। आनन्द वार्थि तुम में लहरा रहा है, पूजें तुम्हें, बन दिगम्बर, भा रहा है ॥१८॥ नक्षत्र है गगन के इक कोन में ज्यों, आकाश है दिख रहा तुम बोध में त्यों। ऐसी अलौकिक विभा तुम ज्ञान की है, मन्दातिमन्द पड़ती धुती भानु की है ॥१९॥ है एक साथ तुममें यह विश्व सारा, उत्पन्न हो मिट रहा ध्रुव भाव धारा। कल्लोल के सम सरोवर में न स्वामी! पै ज्ञेय ज्ञायकतया, शिवपंथगामी ॥२०॥ मैं रागत्याग तुझमें अनुराग लाके, होता सुखी कि जितना लघु ज्ञान पाके। तेरी बृहस्पति सुभक्ति करें, तथापि, से स्वर्ग में नहिं सुखी उतना कदापि ॥२१॥ ज्यों ही मदीय मन है तव स्पर्श पाता, त्यों ही त्वदीय सम भासुर हो सुहाता। रागी विराग बनता तव संघ में हैं, लो ! नीर, दूध बनता गिर दूध में है ॥२२॥ मानूँ तुम्हें तुम शशी तुम में भरी हैं, सच्ची सुधा गुणमयी मन को हरी है। ऐसा न हो, मम मनोमणि से भला यों, सम्यक्त्वरूप झरना, झर है रहा क्यों? ॥२३॥ सम्मोह से भ्रमित हो जग पाप पाता, पै आपका मन नहीं अघ ताप पाता। लोहा स्वभाव तजता जब जंग खाता, हो पंक में कनक पै सब को सुहाता ॥२४॥ हो केवली तुम बली शुचि शान्त शाला, ऐसा तुम्हें कब लखें अघ दृष्टि वाला। हो पीलिया नयन रोग जिसे हमेशा, पीला शशी नियम से दिखता जिनेशा ॥२५॥ ऐसी कृपा यह हुई मुझपे तुम्हारी, आस्था जगी कि तुममें मम निर्विकारी। संसार भोग फलतः रुचते नहीं हैं, प्रत्यक्ष मात्र तुम हो जड़ गौण ही है ॥२६॥ स्वामी! निवास करते मुझमें सुजागा, आत्मानुराग फलतः पर राग भागा। लो दूध में जब कि माणिक ही गिरेगा, क्या लाल लाल तब दूध नहीं बनेगा? ॥२७॥ वैराग्य से तुम सुखी भज के अहिंसा, होता दुखी जगत है कर राग हिंसा। सत् साधना सहज साध्य सदा दिलाती, दुःसाधना दुखमयी विष से पिलाती ॥२८॥ श्रद्धा समेत तुम में रममान होता, वो ओज तेज तुम सा स्वयमेव ढोता। काया हि कंचन बने कि अचेतना हो, आश्चर्य क्या? धुतिमई यदि चेतना से ॥२९॥ जैसा कि वृक्ष फल फूल ला सुहाता, माथा, धरा जननि के पद में झुकाता। ऐसे लगे कि गुण भार लिए हुए हो, चैतन्यरूप-जननी पद में झुके हो ॥३०॥ छत्रादि स्वर्णमय वैभव पा लिए हो, स्वामी! न किन्तु उनसे चिपके हुए हो। तेरी अपूर्व गरिमा गणनायकों से, जाती कसै न फिर क्या? हम बालकों से ॥३१॥ विज्ञानरूप रमणी तुममें शिवाली, जैसी लसी अमित अव्यय कांतियाली। वैसी नहीं शशिकला शशि में निराली, अत्यन्त चूँकि कुटिला व्यय-शीलवाली ॥३२॥ देखा विभामय विभो मुख आपका है, ऐसा मुझे सुख मिला नहिं नाप का है। जैसा यहाँ गरजता लख मेघ को है, पाता मयूर सुख भूलत खेद को है ॥३३॥ सर्वज्ञ हो इसलिए विभु हो कहाते, निस्संग हो इसलिए सुख चैन पाते। मैं सर्वसंग तजके तुम संग से हैं, आश्चर्य आत्म सुख लीन अनंग से हूँ ॥३४॥ आकाश में उदित हो रवि विश्वतापी, संतप्त त्रस्त करता जग को प्रतापी। पै आप कोटि रवि तेज स्वभाव पाये, बैठे मदीय उर में न मुझे जलाये ॥३५॥ वे कामधेनु सुरपादप स्वर्ग में ही, सीमा लिए दुख घुले सुख दें, विदेही! पै आपका स्तवन शाश्वत मोक्ष-दाता, ऐसा वसन्ततिलका यह छन्द गाता ॥३६॥ जो आपकी स्तुति सरोवर में घुली है, मेरी खरी श्रमणता शुचि हो चुली है। तो साधु स्तुत्य मम क्यों न सुचेतना हो? औ शीघ्र क्यों न कल-केवल-केतना हो? ॥३७॥ तल्लीन नित्य निज में तुम हो खुशी से, नीरादि से परम शीतल से इसी से। पा अग्नि योग जल है जलता जलाता, कर्माग्नि से तुम नहीं, यह साधु गाथा ॥३८॥ लो आपकी रमणि एक गुणावली है, दूजी सती विशदकीर्तिमयी भली है। पै एक तो रम रही नित आप में है, कैसा विरोध यह? एक दिगंत में है ॥३९॥ देवाधिदेव मुनिवन्छ कुकाम वैरी, पाती प्रवेश तुम में मति हर्ष मेरी। जैसी नदी अमित सागर में समाती, लेती सुखी मिलन से दुख भूल जाती ॥४०॥ उत्फुल्ल नीरज खिले तुम नेत्र प्यारे, हैं शोभते करुण केशर पूर्ण धारें। मेरा वहीं पर अतः मन स्थान पाता, जैसा सरोज पर जा अलि बैठ जाता ॥४१॥ हैं आप दीनजनरक्षक, साधु माने, दावा प्रचण्ड विधि कानन को जलाने। पंचेंद्रि-मत्त-गज-अंकुश हैं सुहाते, हैं मेघ विश्वमदताप-तृषा बुझाते ॥४२॥ चारों गती मिट गयी तुम ईश! शम्भू, से ज्ञान पूर निजगम्य अतः स्वयम्भू। ध्यानाग्नि दीप्त मम हो तुम बात हो तो, संसार नष्ट मम हो तुम हाथ हो तो ॥४३॥ ले आपको नमन तो सघना अघाली, पाती विनाश पल में दुखशील वाली। फैला पयोद दल हो नभ में भले ही, थोड़ा चले पवन तो बिखरे उड़े ही ॥४४॥ श्रीपाद मानस सरोवर आपका है, होते सुशोभित जहाँ नख मौक्तिका हैं। स्वामी! तभी मनस हंस मदीय जाता, प्रायः वहीं विचरता चुग मोति खाता ॥४५॥ लो! आपके चरण में भवभीत मेरा, विश्रान्त है अभय पा मन है अकेला। माँ का उदारतम अंक अवश्य होता, निःशंक से शरण पा शिशु चूँकि सोता ॥४६॥ हो वर्धमान गतमान प्रमाणधारी, क्यों ना सुखी तुम बनो जब निर्विकारी। स्वात्मस्थ से अभय हो मन अक्षजेता, हो दुःख से बहुत दूर निजात्मवेत्ता ॥४७॥ सन्मार्ग पे विचरता मुनि से अकेला, स्वामी! हुआ बहुत काल व्यतीत मेरा। मेरै थके पग अभी कितना विहारा, बोलो कि दूर कितना तुम धाम प्यारा ॥४८॥ स्वामी अपूर्व रवि से द्युति धाम प्यारे, ये तेज सैन रवि सन्मुख हो तुम्हारे। मानों नहीं स्वयं को रवि है विरागी! क्यों अग्नि है मम तपो मणि में सुजागी? ॥४९॥ हे ईश धीश मुझमें बल बोधि डालो! कारुण्य धाम करुणा मुझमें दिखा लो। देहात्म में बस विभाजन तो करूंगा, शीघ्रातिशीघ्र सुख भाजन तो बनूँगा ॥५०॥ विज्ञान से शमित की रति की निशा है, पाया प्रकाश तुमने निज की दशा है। तो भी निवास करते मुझमें विरागी! आलोक धाम तुम हो, तम मैं सरागी ॥५१॥ शुद्धात्म में तुम सुनिश्चय से बसे हो, जो जानते जगत को व्यवहार से हो। होती सदा सहजवृत्ति सुधी जनों की, इच्छामयी विकृतवृत्ति कुधी जनों की ॥५२॥ संसार को निरखते न यथार्थ में हैं, लो आप केवल निजीय पदार्थ में हैं। संसार ही झलकता दुग में तथा हैं, नाना पदार्थ दल दर्पण में यथा हैं ॥५३॥ स्वादी तुम्हीं समयसार स्वसम्पदा के, आदी कुधी सम नहीं जड़ सम्पदा के। औचित्य है अमर जीवन उच्च जीता, मक्खी समा मल न, पुष्य पराग पीता ॥५४॥ है वस्तुतः जड़ अचेतन ही तुम्हारी, वाणी तथापि जग पूज्य प्रमाण प्यारी। है एक हेतु इसमें तुमने निहारा, विज्ञान के बल अलोक त्रिलोक सारा ॥५५॥ सम्यक्त्व आदिक निजी बल मोक्षदाता, वे ही अपूर्ण जब लौं सुर सौख्यधाता। औचित्य वस्त्र बनता निज तन्तुओं से, ऐसा कहा कि तुमने मित सत् पदों से ॥५६॥ होता विलीन भवदीय उपासना में, तो भूलता सहज ही सुख याचना मैं । जो डूबता जलधि में मणि ढूँढ लाने, क्या मांगता जलधि से मणि दे! सयाने ॥५७॥ औचित्य है प्रथम अम्बर को हटाया, पश्चात् दिगम्बर विभो! मन को बनाया। रे! धान का प्रथम तो छिलका उतारो, लाली उतार, फिर भात पका, उड़ालो ॥५८॥ शंका न मृत्यु भय ने सबको हराया, संसार ने तब परिग्रह को सजाया। है सेव्य है अभय सेवक मैं विरागी, मैं भी बनूँ अभय जो सब ग्रन्थत्यागी ॥५९॥ जो देह नेह मद को तजना कहाता ! स्वामी ! अतीन्द्रिय वही सुख है सुहाता। तेरे सुशान्त मुख को लख ले रहा है, ऐसा विबोध, मन का मल धो रहा है ॥६०॥ गंभीर सागर नहीं शशि दर्श पाता, गांभीर्य त्याग तट बाहर भाग आता। गंभीर आप रहते निज में इसी से, लेते प्रभावित नहीं जग में किसी से ॥६१॥ है चाहता अबुध ही तुम पास आना, धारे बिना नियम संयम शील बाना। धीमान कौन वह है। श्रम देख रोये, चाहे यहाँ सुफल क्या बिन बीज बोये ॥६२॥ शुद्धात्म में रुचि बिना शिवसाधना है, रे निर्विवाद यह आत्मविराधना है। हो आत्मघात शिर से गिरि फोड़ने से, तेरा यही मत इसे सुख मानने से ॥६३॥ ना आत्म तृप्ति उदयागत पुण्य में है, वो शांति की लहर ना शशिबिम्ब में है। जो आपके चरण का कर स्पर्श पाया, आनन्द ईदृश कही अब लौ न पाया ॥६४॥ स्वामी! निजानुभवरूप समाधि द्वारा, पाया, मिटी-भव-भवाब्धि, भवाब्धि पारा। ये धैर्य धार बुध साधु समाधि साधे, साधे अतः सहज को निज को अराधे ॥६५॥ है वज्र, कर्म-धरणीधर को गिराता, दावा बना कुमत कानन को जलाता। ऐसा रहा सुखद शासन शुद्ध तेरा, पाथेय पंथ बन जाय सहाय मेरा ॥६६॥ से तेज भानु भवसागर को सुखाने, गंगा तुम्हीं तृषित की कुतृषा बुझाने। से जाल इंद्रियमयी मछली मिटाने, मैं भी, तुम्हें सुबुध भी, इस भाँति मानें ॥६७॥ मेरी मती स्तुति सरोवर में रहेगी, हेगी मदाग्नि मुझमें, ह क्या करेगी। पीयूष सिंधु भर में विषबिन्दु क्या है? अस्तित्व में पर प्रभाव दबाव क्या है?॥६८॥ स्याद्वादरूप मत में, मत अन्य खारे, ज्यों ही मिले मधुर से बन जाएँ प्यारे। मात्रानुसार यदि भोजन में मिलाओ, खारा भले लवण हे अति स्वाद पाओ ॥६९॥ ले आपकी प्रथम मैं स्तुति का सहारा, पश्चात् नितांत निज में करता विहारा। ज्यों बीच बीच निज पंख विहंग फैला, फैला विहार करता नभ में अकेला ॥७०॥ मिथ्यात्व से भ्रमित चित्त सही नहीं है, तेरे उसे वचन ये रुचते नहीं हैं। मिश्री मिला पय से रुचता कहाँ है? जो दीन पीड़ित दुखी ज्वर से अहा है ॥७१॥ लालित्य पूर्ण कविता लिख के तुम्हारी, होते अनेक कवि हैं कवि नामधारी। मैं भी सुकाव्य लिख के कवि तो हुआ हूँ, आश्चर्य तो यह निजानुभवी हुआ हूँ ॥७२॥ श्रद्धासमेत तुमको यदि जानता है, शुद्धात्म को वह अवश्य पिछानता है। धूवाँ दिखा अनल का अनुमान होता, है तर्क शास्त्र पढ़ते दृढ़ बोध होता ॥७३॥ मोहादि कर्म मल को तुमने मिटाया, स्वामी स्वकीय पद शाश्वत सौख्य पाया। लेता सहार मुनि से अब मैं तुम्हारा, तोता जहाज तज कुत्र उड़े विचारा ॥७४॥ त्यों आपके स्तवन की किरणावली है, पाती प्रवेश मुझमें सुखदा भली है। ज्यों ज्योति पुंज रवि की प्रखरा प्रभाली, से रंध में सदन के घुसती निराली ॥७५॥ कामारिरूप तुम में मन को लगाता, है वस्तुतः मुनि मनोभव को मिटाता। हो जाय नाश जब कारण का तथापि, क्या कार्य का जनम से जग में कदापि ॥७६॥ स्वामी तुम्हें न जिसने रुचि से निहारा, देता उसे न ‘दृग' दर्शन है तुम्हारा। जो अन्ध है, विमल दर्पण क्या करेगा, क्या नेत्र देकर कृतार्थ उसे करेगा? ॥७७॥ वाणी सुधा सदृश सज्जन संगती से, तेरी, बने कलुष दुर्जन संगती से। औचित्य मेघ जल है गिरता नदी में, तो स्वाद्य पेय बनता, विष से अही में ॥७८॥ जैसा सुशान्त रस वो मम आत्म से है, धारा प्रवाह झरता इस काव्य से है। वैसा कहाँ झर रहा शशि बिंब से है, पूजें तुम्हें तदपि दूर सुवृत्त से है ॥७९॥ संसार के विविध वैभव भोग पाने, पूजें तुम्हें बस कुधी जड़, ना सयाने। ले स्वर्ण का हल, कृषि करता कराता, वो मूर्ख ही कृषक है जग में कहाता ॥८०॥ है मोह नष्ट तुममें फिर अन्न से क्या? त्यागा असंयम, सुसंयम भार से क्या? मारा कुमार तुमने फिर वस्त्र से क्या? हैं पूज्य ही बन गये, पर पूज्य से क्या? ॥८१॥ मेरा जभी मन बना शिवपंथगामी, संसार भोग उसको रुचते न स्वामी। धीमान कौन वह है घृत छोड़ देगा, क्या! मान के परम नीरस छाछ लेगा ॥८२॥ मेरी भली विकृति पै मति चेतना है, चैतन्य से उदित है जिन-देशना है। कल्लोल के बिन सरोवर तो मिलेगा, कल्लोल वो बिन सरोवर क्या मिलेगा? ॥८३॥ लो! आपके स्तवन से बहु निर्जरा हो, स्वामी! तथापि विधिबंधन भी जरा हो। अच्छी दुकान चलती धन खूब देती, तो भी किराय कम से कम क्या न लेती? ॥८४॥ वो आपकी सकल वस्तुप्रकाशिनी है, नासा प्रमाणमय, विभ्रम-नाशिनी है। नासाग्र पे इसलिए तुम साम्यदृष्टि, आसीन है सतत शाश्वत शान्ति सृष्टि ॥८५॥ हैं आप नम्र गुरु चूँकि भरे गुणों से, हैं पूज्य राम निज में रमते युगों से। पी, पी, पराग निजबोधन की सुखी हैं, नीराग हैं, पुरुष हैं, प्रकृती तजीं हैं ॥८६॥ हो धीर वीर तुम चूँकि निजात्म जेता, मारा कुमार तुमने शिव साधु नेता। सर्वज्ञ हो इसलिए तुम सर्वव्यापी, बैठे मदीय मन में अणु हो तथापि ॥८७॥ साता नहीं उदय में जब हो असाता, मैं आपके भजन में बस डूब जाता। है चन्द्र को निरखता सघनी निशा में, जैसा चकोर रुचि से न कभी दिवा में ॥८८॥ धाता तुम्हीं अभय दे जग को जिलाते, नेता तुम्हीं सहज सत्पथ भी दिखाते। मृत्युंजयी बन गये भगवान् कहाते, सौभाग्य है, कि मम मन्दिर में सुहाते ॥८९॥ ऐसी मुझे दिख रही तुम भाल पे है, जो बाल की लटकती लद गाल पे है। तालाब में कमल पे अलि भा रहा हो, संगीत ही गुनगुना कर गा रहा हो ॥९०॥ काले घने कुटिल चिक्कण केश प्यारे, ऐसे मुझे दिख रहे शिर के तुम्हारे। जैसे कहीं मलयचन्दन वृक्ष से ही, हो कृष्ण नाग लिपटे अयि दिव्य देही! ॥९१॥ चाहूँ न राज सुख मैं सुरसम्पदा भी, चाहूँ न मान यश देह नहीं कदापि। है ईश गर्दभ समा तन भार ढोना, कैसे मिटे, कब मिटे, मुझको कहो ना ! ॥९२॥ मेरी सुसुप्त उस केवल की दशा में, ये आपकी सहज तैर रहीं दशायें। यों आपका कह रहा श्रुत सत्य प्यारा, मैंने उसे सुन गुना रुचि संग धारा ॥९३॥ संसार से विरत हूँ तुम ज्योति में हैं, निस्तेज कर्म मुझमें जब होश में हूँ। बैठा रहे निकट नाग कराल काला, टूटा हुआ, कि जिसका विषदन्त भाला ॥९४॥ विज्ञान से अति सुखी बुध वीतरागी, अज्ञान से नित दुखी मद-मत्त, रागी। ऐसा सदा कह रहा मत आपका है, धर्मात्म का सहचरी, रिपु पाप का है ॥९५॥ हो आज सीमित भले मम ज्ञान आरा, होगी असीम तुम आश्रय पा अपारा। प्रारम्भ में सरित हो पतली भले ही, पै अन्त में अमित सागर में ढले ही ॥९६॥ लो आपके सुखमयी पदपंकजों में, श्रद्धासमेत नत हैं तब लौं विभो मैं। विज्ञानरूप रमणी मम सामने आ, ना नाच गान करती जब लौं न नेहा ॥९७॥ स्वामी तुम्हें निरख सादर नेत्र दोनों, आरूढ़ मोक्षपथ हों मम पैर दोनों। ले ईश नाम रसना, शिर तो नती से, यों अंग अंग हुरषे तुम संगती से ॥९८॥ हो मृत्यु से रहित अक्षर हो कहाते, हो शुद्ध जीव जड़ अक्षर हो न ततै। तो भी तुम्हें न बिन अक्षर जान पाया, स्वामी अतः स्तवन अक्षर से रचाया ॥९९॥ चाहूँ कभी न दिवि को अयि वीर स्वामी, पीऊँ सुधारस स्वकीय बनूँ न कामी। पा ज्ञानसागर सुमंथन से सुविद्या, विद्यादिसागर बनँ तज हैं अविद्या ॥१००॥
  43. 1 point
    आँखें लाल है, मन अन्दर कौन, दोनों में दोषी ? हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। आओ करे हायकू स्वाध्याय आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं। आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं। आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं। लिखिए हमे आपके विचार क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं। इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
  44. 1 point
    लगभग २६०० वर्ष पूर्व इस भारत भूमि पर एक महापुरुष का जन्म हुआ। जिसने इस धरती पर फैले अज्ञान को दूर कर सत्य, अहिंसा और प्रेम का प्रकाश फैलाया। उन महापुरुष को जन-जन अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर के नाम से जानते हैं। भगवान महावीर संक्षिप्त जीवन-दर्शन इस प्रकार है :- मधु नाम के वन में एक पुरुरवा नाम का भील रहता था। कालिका उसकी पत्नी का नाम था। एक दिन रास्ता भूलकर सागरसेन नाम के मुनिराज उस वन में भटक रहे थे, कि पुरुरवा हिरण समझकर उन्हें मारने के लिए उद्यत हुआ, तब उसकी पत्नी ने कहा कि स्वामी! ये वन के अधिष्ठाता देव हैं। इन्हें मारने से तुम संकट में पड़ जाओगे, कहकर रोका। तब दोंनो प्रसन्नचित्त हो मुनिराज के पास पहुँचे तथा उपदेश सुनकर शक्त्यानुसार मांस का त्याग किया। आयु के अंत में निर्दोष व्रतों का पालन करते हुए, शान्त परिणामों से मरण प्राप्त कर वह भील सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ। स्वर्ग सुख भोगकर भरत चक्रवर्ती की अनन्तमति नामक रानी से मारीचि नाम का पुत्र हुआ तथा प्रथम तीर्थकर वृषभनाथ जी के साथ देखा-देखी दीक्षित हो गया। भूख प्यास की बाधा सहन न कर सकने के कारण भ्रष्ट हो, अहंकार के वशीभूत होकर तापसी बन सांख्य मत का प्रवर्तक बन गया। तथा अनेक भवों तक पुण्य-पाप के फलों को भोगता हुआ, सिंह की पर्याय को प्राप्त हुआ। एक समय वह हिरण का भक्षण कर रहा था, तभी अजितञ्जय और अमितदेव नाम के दो मुनिराजों के उपदेश सुन जातिस्मरण होने पर व्रतों को धारण किया तथा सन्यास धारण किया जिसके प्रभाव से सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नाम का देव हुआ। आगे आने वाले भवों में चक्रवर्ती आदि की विभूति का उपभोग कर जम्बूद्वीप में नंद नाम का राजपुत्र हुआ। प्रोष्ठिल नाम के मुनिराज से दीक्षा ले सोलह कारण भावना भाते हुए महापुण्य तीर्थकर प्रकृति का बंध किया फिर आयु के अंत में आराधना पूर्वक मरण कर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में इन्द्र हुआ। वहां से च्युत होकर अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर हुआ। भगवान महावीर का जन्म वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर राज्य के काश्यप गोत्रीय नाथ वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और त्रिशला रानी के आँगन में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के शुभ दिन हुआ। बालक सौभाग्यशाली, अत्यन्त सुन्दर, बलवान, तेजस्वी, मुक्तिगामी जीव था। सौधर्म इन्द्र ने सुमेरू पर्वत पर भगवान बालक का अभिषेक करने के बाद 'वीर' नाम रखा। जन्म समय से ही पिता सिद्धार्थ का वैभव, यश, प्रताप, पराक्रम और अधिक बढ़ने लगा। इस कारण उस बालक का नाम वर्द्धमान भी पड़ा। राजकुमार वर्द्धमान असाधारण ज्ञान के धारी थे। संजयन्त और विजयन्त नामक दो मुनि अपनी तत्व विषयक कुछ शंकाओं को लिए आकाश मार्ग से गमन कर रहे थे तभी बालक वर्द्धमान को देखते ही उनको समाधान प्राप्त हो जाने से उन्होंने उस बालक का नाम 'सन्मति' रखा। एक दिन कुण्डलपुर में एक बड़ा हाथी मदोन्मत्त होकर गजशाला से बाहर निकल भागा। वह मार्ग में आने वाले स्त्री पुरुषों को कुचलता हुआ नगर में उथल-पुथल मचाते हुए घूम रहा था। जिससे जनता भयभीत हो प्राण बचाने हेतु इधर-उधर भागने लगी। तब वर्द्धमान ने निर्भय हो हाथी को वश में कर मुट्ठियों के प्रहार से उसे निर्मद बना दिया। तब जनता ने बालक की वीरता से प्रसन्न हो बालक को 'अतिवीर' नाम से सम्मानित किया। वर्द्धमान एक बार मित्रों के साथ खेल रहे थे तभी संगम नामक देव विषधर का रूप धरकर आया। जिसे देखकर सभी मित्र डर के मारे भाग गये। परन्तु वर्द्धमान सर्प को देख रंच मात्र भी नहीं डरे, अपितु निर्भयता से उसी के साथ खेलने लगे। तब देव प्रकट होकर भगवान की स्तुति करने लगा एवं उनका नाम 'महावीर' रखा। जब वर्द्धमान यौवन अवस्था को प्राप्त हुए। तब माता-पिता ने वर्द्धमान का विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ करने का निर्णय लिया। अपने विवाह की बात जब महावीर को ज्ञात हुई तो उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। गृहस्थ जीवन के बंधन में न फंसते हुए तीस (30) वर्ष की यौवनावस्था में स्वयं ही दिगम्बर दीक्षा अंगीकार की। बारह वर्ष तक मौन पूर्वक साधना करते हुए व्यालीस (42) वर्ष की अवस्था में केवलज्ञान प्राप्त किया फिर लगभग तीस (30) वर्ष तक भव्य जीवों को धर्मोपदेश देते हुए बहात्तर (72) वर्ष की आयु में कार्तिक वदी अमावस्या के ब्रह्ममुहूर्त में (सूर्योदय से कुछ समय पहले) पावापुर ग्राम के सरोवर के मध्य से निवाण को प्राप्त किया। भगवान महावीर का शेष परिचय गर्भ - तिथी - आषाढ़ शुक्ल ६ जन्म - तिथी - चैत्र शुक्ल १३ दीक्षा - तिथी - मार्ग कृष्ण १० केवलज्ञान - तिथी वैशाख शुक्ल १० उत्सेध/वर्ण - ७ हाथ/ स्वर्ण वैराग्य कारण - जाति स्मरण दीक्षोपवास - बेला दीक्षावन/वृक्ष - नाथवन/साल वृक्ष सहदीक्षित - अकेले सर्वऋषि संख्या - २४,००० गणधर संख्या - ११ मुख्य गणधर - इन्द्रभूत आर्यिका संख्या - ३६,००० तीर्थकाल - २९,०४२ वर्ष यक्ष - गुहयक यक्षिणी - सिद्धायिनी योग निवृत्तिकाल - दो दिन पूर्व केवलज्ञान स्थान - ऋजुकूला चिहन - सिंह समवशरण में श्रावक संख्या - १ लाख श्राविका - ३ लाख मुख्य श्रोता - श्रेणिक विशेष - केवलज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात् गणधर के अभाव में छयासठ (६६) दिन तक भगवान महावीर की दिव्य ध्वनि नहीं हुई। जिस दिन भगवान महावीर की प्रथम देशना हुई भी उसे वीर शासन जयन्ती के रूप में (श्रावण कृ. १) मनाते हैं।
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    जैन श्रावक की पहचान के तीन चिह्न कहे गये हैं। उसमें सर्वप्रथम प्रतिदिन देव दर्शन, दूसरा रात्रि भोजन त्याग और तीसरा छान कर पानी पीना है। रात्रि भोजन त्याग का अर्थ – सूर्य अस्त होने के पश्चात् चारों प्रकार के आहार (भोजन) का त्याग करना है। वे चार प्रकार के आहार- खाद्य - दाल, रोटी भात आदि। स्वाद - इलायची, लौंग, सौंफ आदि। लेय - रवड़ी, लपसी, दही आदि। पेय - जल, रस, दूध आदि। जो श्रावक रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग करता है उसे एक वर्ष में छह महीने के उपवास का फल मिलता है। दिन का बना भोजन रात में करने से अथवा रात में बना भोजन रात में करने से रात्रि भोजन का दोष तो लगता ही है किन्तु रात में बना भोजन दिन में करने से भी रात्रि भोजन का दोष लगता है। वैज्ञानिकों के अनुसार - सूर्य के प्रकाश में अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड नाम की अदृश्य किरणें होती हैं। इन किरणों के धरती पर पड़ते ही अनेक सूक्ष्म जीव यहाँ - वहाँ भाग जाते हैं अथवा उत्पन्न ही नहीं होते, किन्तु सूर्य अस्त होते ही वे कीटाणु बाहर निकल आते हैं, उत्पन्न हो जाते हैं। रात्रि में भोजन करने पर वे असंख्यात सूक्ष्म त्रस जीव जो भोजन में मिल गए थे मरण को प्राप्त हो जाते हैं अथवा पेट में पहुँचकर अनेक रोगों को जन्म देते हैं। चिकित्सा शास्त्रियों का अभिमत है कि कम से कम सोने से तीन घंटे पूर्व तक भोजन कर लेना चाहिए। रात्रि में भोजन करते समय यदि चींटी पेट में चले जाये तो बुद्धि नष्ट हो जाती है, जुआ से जलोदर रोग उत्पन्न हो जाता हैं, मक्खी से वमन हो जाता है, मकड़ी से कुष्ट रोग उत्पन्न हो जाता है तथा बाल गले में जाने से स्वर भंग एवं कंटक आदि से कण्ठ में (गले में)पीड़ा आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते है। अत: स्वास्थ्य की रक्षा हेतु भी रात्रि भोजन का त्याग अनिवार्य है। धार्मिक दृष्टिकोण - रात्रि में बल्व आदि का प्रकाश होने पर भी जीव हिंसा के दोष से बच नहीं सकते, बरसात के दिनों में साक्षात् देखने में आता है कि रात्रि में बल्व जलाते ही सैकड़ों कीट - पंतगे उत्पन्न हो जाते हैं, जो कि दिन में बल्व (लट्टू)जलाने पर उत्पन्न नहीं होते। सूक्ष्म जीव तो देखने में ही नहीं आते। तथा रात्रि के अंधकार में भोजन करने पर सैकड़ों जीवों का घात होना संभव हैं अत: धर्म, स्वास्थ्य तथा कुल परम्परा की रक्षा हेतु रात्रि भोजन का त्याग नियम से करना चाहिए। रात्रि भोजन से उत्पन्न पाप के फलस्वरूप जीव उल्लू, कौआ, विलाव, गृद्ध पक्षी, सूकर, गोह आदि अत्यन्त पाप रूप अवस्था दुर्गति को प्राप्त होता है तथा मनुष्य अत्यन्त विद्रुप शरीर वाला, विकलांग, अल्पायु वाला और रोगी होता है एवं भाग्य हीन, आदर हीन होता हुआ नीच कुलों में उत्पन्न होकर अनेक दु:खों को भोगता है। जल गालन - जल स्वयं जलकायिक एकेन्द्रिय जीव है एवं उस जल में अनेक त्रस जीव पाए जाते हैं। वे इतने सूक्ष्म होते हैं कि नग्न आँखों से दिखाई नहीं पड़ते। वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मदर्शी यंत्रों की सहायता से देखकर एक बूंद जल में 36,450 जीव बताए हैं। जैन ग्रंथों के अनुसार उक्त जीवों की संख्या काफी अधिक (असंख्यात) है। ऐसा कहा जाता है कि एक जल की बूंद में इतने जीव पाए जाते हैं कि वे यदि कबूतर की तरह उड़े तो पूरे जम्बूद्वीप को व्याप्त कर लें। उक्त जीवों के बचाव के लिए पानी छानकर ही पीना चाहिए। जल को अत्यन्त गाढ़े (जिससे सूर्य का विम्ब न दिखे) वस्त्र को दुहरा करके छानना चाहिए। छन्ने की लंबाई, चौड़ाई से डेढ़ गुनी होनी चाहिए। छना हुआ जल एक मुहूर्त (४८ मिनट) तक, सामान्य गर्म जल छह (६) घंटे तक तथा पूर्णत: उबला जल चौबीस (२४) घंटे तक उपयोग करना चाहिए। इसके बाद उसमें त्रस जीवों की पुन: उत्पत्ति की संभावना रहने से उनकी हिंसा का दोष लगता हैं। छने हुए जल में लौंग, इलायची आदि पर्याप्त मात्रा में (जिससे पानी का स्वाद व रंग परिवर्तित हो जाए) डालने पर वह पानी प्रासुक हो जाता है एवं उसकी मर्यादा छह घंटे की मानी गई हैं।
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    भेदविज्ञान विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के विचार इस शरीर का क्या स्वरूप है ? यह जानना ही भेद-विज्ञान है। चतुर्थ गुणस्थान वाला भेदविज्ञान श्रद्धात्मक होता है और सप्तम गुणस्थान वाला भेदविज्ञान अनुभूति परक होता है। जैसे एक स्कूल में है और एक प्रयोगशाला में है। मैं काया में अवश्य हूँ लेकिन काया के बिना भी रह सकता हूँ यह श्रद्धान ही भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान की शुरुआत ही सही जीवन की शुरुआत है, यह केवलज्ञान तक ले जाने वाला है, जो कभी अंत को प्राप्त नहीं होता है। अनेक बार शरीर को पाया पर यह बोध नहीं आया कि मैं कौन हूँ? मैं एक आत्म तत्व हूँ और शरीर से पृथक् हूँ, इस प्रकार का ज्ञान भेदविज्ञान माना जाता है। शरीर की वेदना को पड़ोसी की वेदना समझना सम्यक ज्ञान है, भेदविज्ञान है। भेदविज्ञानियों के पास जाकर सतचित में आनंद की प्राप्ति का प्रयास करो, फिर स्वयं सच्चिदानंद बन जाओगे। भेदविज्ञान का परिणाम है फूल सा मुस्कराना। शरीर अलग है, आत्मा अलग है, इस प्रकार का ज्ञान होना भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान से ध्यान की भूमिका बन जाती है। हम रात-दिन निमित्त को दोष देते रहते हैं, यह सब भेदविज्ञान के अभाव के कारण होता है। भेद-भाव से व्यक्ति राग-द्वेष करता रहता है और भेदविज्ञान प्राप्त कर ले तो राग-द्वेष समाप्त हो जाता है। भेदविज्ञान के बल पर ही धर्म में लीन हुआ जाता है। आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं, मात्र भेदविज्ञान की आवश्यकता है।
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    जिसे सर्वत्र बुरा कहा जाता है ऐसा कार्य पाप कहलाता है। वे कितने होते हैं एवं उनका फल क्या है, इसका वर्णन इस अध्याय में है | पाप के बारे में इतना याद रखाना है कि पाप और पारा कभी पचता नहीं है। 1. पाप किसे कहते हैं एवं कितने होते हैं ? जिस कार्य के करने से इस लोक में एवं परलोक में अनेक प्रकार के दु:खों को सहन करना पड़ता है और निंदा एवं अपयश को सहन करना पड़ता है, उसे पाप कहते हैं। पाप 5 होते हैं - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह। 2. पाप की शाब्दिक परिभाषा क्या है ? "पाति रक्षति आत्मानं शुभादिति पापम्"। "तदसट्टेद्यादि'। जो आत्मा को शुभ से बचाता है, वह पाप है। जैसे - असातावेदनीय आदि। 3. हिंसा किसे कहते हैं ? मन, वचन, काय से किसी भी प्राणी को मारना, दु:ख देना हिंसा कहलाती है एवं स्वयं का घात करना भी हिंसा कहलाती है। 4. हिंसा कितने प्रकार की होती है ? हिंसा चार प्रकार की होती है - संकल्पी हिंसा, आरम्भी हिंसा, उद्योगी हिंसा एवं विरोधी हिंसा। संकल्पी हिंसा - संकल्प पूर्वक किसी भी प्राणी को मारने का भाव करना यह संकल्पी हिंसा है। संकल्प करने के बाद जीव मरे या न मरे पाप अवश्य ही लगता है। किसी जीव की बलि चढ़ाना, पुतला दहन करना, काष्ठादि में बने चित्रों को मारना, चिड़िया आदि आकार के गोली बिस्कुट खाना, बूचड़खाने की हिंसा, कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करना, वीडियो गेम में चिड़िया को मारना, लक्ष्मणरेखा, मच्छर मारने के बेट आदि का प्रयोग करना, एन्टी पेस्ट इमल्सन कराना संकल्पी हिंसा है। आरम्भी हिंसा - गृहस्थ को भोजन बनाने के लिए पानी भरना, अग्नि जलाना, हवा करना, वनस्पति छीलना, बनाना। घर की सफाई करना, शरीर की सफाई करना, वस्त्र की सफाई करना आदि में षट्काय जीवों की विराधना होती है। यह आरम्भी हिंसा कहलाती है। श्रावक के लिए यह हिंसा क्षम्य है, किन्तु विवेक पूर्वक करें। उद्योगी हिंसा - श्रावक का जीवन धन के बिना नहीं चल सकता है। धन प्राप्ति के लिए वह खेती, व्यापार, सरकारी सेवा आदि कार्य करता है। इसमें जो हिंसा होती है, वह उद्योगी हिंसा है, यह भी श्रावक के लिए क्षम्य है। उद्योगी हिंसा एवं हिंसा के उद्योग में स्वर्ग-पाताल का अंतर है। बूचड़खाने, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि के करने में महापाप है, इसे उद्योगी हिंसा में नहीं ले सकते हैं। यह संकल्पी हिंसा है। विरोधी हिंसा - स्वयं की रक्षा, परिवार की रक्षा, समाज की रक्षा, संस्कृति की रक्षा, धर्म आयतनों की रक्षा एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए, किसी से युद्ध करना पड़ता है और युद्ध में कोई मर भी जाता है,तो वह विरोधी हिंसा है। जैसे - लक्ष्मण ने रावण को मारा था। यह हिंसा भी श्रावक के लिए क्षम्य है। श्रावक का मात्र संकल्पी हिंसा का त्याग होता है। आरंभी, उद्योगी एवं विरोधी हिंसा का नहीं। 5. हिंसा का समीकरण क्या है ? हिंसा न करते हुए हिंसक - जैसे - धीवर मछली पकड़ने गया। एक भी मछली जाल में नहीं फंसी फिर भी वह हिंसक कहलाएगा। कोई किसी को मारने के उद्देश्य से निकला और वह व्यक्ति नहीं मिला तो भी मारने का पाप लगेगा। हिंसा हो जाने पर भी हिंसक नहीं - जैसे - डॉक्टर रोगी का ऑपरेशन कर रोगी को बचाना चाह रहा था, किन्तु वह मरण को प्राप्त हो गया फिर भी डॉक्टर हिंसक नहीं। इसी प्रकार ईयसमिति से चलता साधु, फायर ब्रिगेड की गाड़ी, एम्बुलेंस आदि। हिंसा एक करे - फल अनेक भोगते हैं - बलि एक व्यक्ति चढ़ा रहा है, हजारों उसकी अनुमोदना (प्रशंसा) कर रहे हैं। सबको पाप लगेगा और सामूहिक पाप का फल भूकम्प, बाढ़, ट्रेन, प्लेन दुर्घटना में हजारों का मरण होना। इसी प्रकार पशु-पक्षियों की लड़ाई में आनंद मानना, पुतला दहन में आनंद मानना आदि । बहुत से हिंसा करें किन्तु फल एक को - एक राज्य का स्वामी दूसरे राज्य पर आक्रमण करके उसके साथ युद्ध छेड़ देता है। हजारों सैनिक एक-दूसरे को मारते हुए मर जाते हैं। सबका पाप राजा को लगेगा, सैनिक तो केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए शस्त्र चलाते हैं। विवाह में जो भी आरम्भ होता है, उसका पाप दूल्हा एवं दुल्हन को लगता है। कार्य वही किन्तु परिणामों में अंतर - पहले कोई आलू-प्याज खाता था एवं स्वयं बनाता भी था।उसने अब आलू-प्याज खाना बंद कर दिया, किन्तु परिवार के लिए बनाना पड़ता है, मजबूरी है। पहले कषाय तीव्र थी, अब मंद कषाय है। 6. हिंसा किन-किन कारणों से होती है ? हिंसा मुख्य चार कारणों से होती है क्रोध के कारण - जैसे-द्वीपायन मुनि को क्रोध आने के कारण द्वारिका भस्म हो गई थी। तोताराजा की कहानी। सर्प - नेवला-बेटा, महिला की कहानी आदि। मान के कारण - भरतचक्रवर्ती ने बाहुबली पर चक्र चला दिया। माया के कारण - 1. कई ऐसे व्यक्ति मिलेंगे धन के कारण बालक का अपहरण किया था। पकड़ने के डर से लोग क्या कहेंगे हमारा मायाचार जान लेंगे इस कारण उसे मार देते हैं। 2. स्त्री का दुराचार ज्ञात हो गया तो पति वैराग्य धारण की बात घर में कहता है। स्त्री समझ जाती है, मेरा दुराचार ज्ञात हो गया। इससे दीक्षा ले रहे हैं। वह सोचती ये मेरा मायाचार प्रकट कर देंगे। अत: भोजन में विष मिला देती है और वही भोजन पति को दे देती है। जिससे पति का मरण हो जाता है। 3. गर्भपात भी मायाचार के कारण होता है। लोभ के कारण - पाण्डवों को लाक्षागृह में बन्द कर दिया और वहाँ आग लगा दी। भले ही वे सुरंग से निकल गए। बूचड़खाने में जो हिंसा हो रही है, वह भी लोभ के कारण हो रही है। 7. हिंसा त्याग का फल क्या होता है ? खदिरसार भील (राजा श्रेणिक के जीव ने) मात्र कौवे के माँस का त्याग किया था। जिसके कारण अगले ही भव में तीर्थंकर पद को प्राप्त करने वाला होगा। यमपाल चाण्डाल ने भी एक दिन (चतुर्दशी) के लिए हिंसा का त्याग करके स्वर्गीय सम्पदा को प्राप्त किया था। 8. हिंसा करने का क्या फल है ? हिंसा ही दुर्गति का द्वार है,पाप का समुद्र है तथा माँसभक्षी जीव नरकों के दुखों को भोगते हैं एवं यहाँ भी जेल आदि में यातनाओं को सहन करते हैं। (ज्ञा, 8/17-18) 9. झूठ पाप किसे कहते हैं ? आँखों से जैसा देखा हो, कानों से जैसा सुना हो वैसा नहीं कहना झूठ है, जिससे किसी का जीवन ही चला जाए, ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए एवं अंधे से अंधा, चोर से चोर, डाकू से डाकू कहना भी असत्य (झूठ) है। क्योंकि अंधे से अंधा कहने में उसे पीड़ा होती है। किसी ने कहा है - अंधे से अंधा कहो, तुरतई परहै टूट। धीरे-धीरे पूछ लो, कैसे गई है फूट॥ 10. झूठ बोलने के क्या-क्या कारण हैं ? अज्ञान, क्रोध, लोभ, भय, मान, स्नेह आदि के कारण झूठ बोला जाता है। लोभ - सत्यघोष नामक पुरोहित लोभ के कारण झूठ बोलता था। स्नेह - गुरु पत्नी से स्नेह होने के कारण राजा वसु झुठ बोला था। गुरु क्षीरकदम्ब का पुत्र पर्वत, सेठ का पुत्र नारद और राजा का पुत्र वसु की कहानी। 11. झूठ बोलने का फल क्या होता है ? सत्यघोष ने झूठ बोला। यहाँ अपमान को सहन किया और अब नरकों के दु:खों को सहन कर रहा है। 12. चोरी पाप किसे कहते हैं ? दूसरों की रखी हुई, गिरी हुई, भूली हुई अथवा नहीं दी हुई वस्तु को लेना या लेकर के दूसरों को देना चोरी कहलाती है। दस प्राण तो सभी जानते हैं, किन्तु 11 वाँ प्राण अन्न है। अन्न के बिना प्राण ठहरते नहीं है। अत: उसे भी प्राण कहा है। अन्न धन से प्राप्त होता है, अत: धन को बारहवाँ प्राण कहा है। अत: किसी के धन की चोरी करने का अर्थ है, उसके प्राण ही ले लेना। 13. चोरी करने के क्या कारण हैं ? गरीबी के कारण, धनवान बनने के लिए एवं कोई धनवान न रहे गरीब हो जाए, इन तीन कारणों से जीव चोरी करता है। 14. चोरी करने का क्या फल है ? जब पकड़े जाते हैं तो अनेक प्रकार के दण्ड भोगने पड़ते हैं और कभी किसी को फाँसी भी हो जाती हैं एवं परलोक में नरक आदि के दु:खों को सहन करना पड़ता है। 15. कुशील पाप किसे कहते हैं ? जिनका परस्पर में विवाह हुआ है, ऐसे स्त्री-पुरुष का एक दूसरे को छोड़कर अन्य स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध रखना कुशील कहलाता है एवं गालियाँ देना भी कुशील पाप कहलाता है। 16. कुशील पाप क्यों होता है ? एक तो चारित्रमोहनीय का तीव्र उदय, दूसरा इन्द्रिय सुख मिले, इस कारण यह कुशील पाप होता है। 17. कुशील पाप का क्या फल है ? परस्त्री सेवन करने वालों को नरकों में लोहे की गर्म - गर्म पुतलियों से आलिंगन करवाया जाता है एवं यहाँ एड्स जैसी बीमारी भी इसी कारण से होती है। 18. परिग्रह पाप किसे कहते हैं ? क्षेत्र - वास्तु, हिरण्य - सुवर्ण, धन - धान्य, दासी - दास, और कुष्य - भाण्ड इन पदार्थों में मूच्छ (तीव्र लालसा) रखना परिग्रह पाप है। 19. परिग्रह क्यों इकट्ठा करते हैं ? दुनिया में सबसे बड़ा व्यक्ति बनूँ इस भावना को लोग परिग्रह को इकट्ठा करते हैं। 20. परिग्रह के बिना श्रावक का कैसे जीवनयापन होगा ? जितना आवश्यक है, उतना रखना तो ठीक है। कुछ ज्यादा भी रखते हैं तो समय पर राष्ट्र, धर्म, साधर्मी के लिए दान देना, यह तो संचय कहलाएगा, किन्तु आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करना परिग्रह है। 21. परिग्रह पाप का क्या फल है ? बहुत परिग्रह जब नष्ट होता है तब मानव आकुल - व्याकुल हो जाता है एवं जब सरकार की ओर से छापे पड़ते हैं तब धन भी चला जाता है और बदनामी भी होती है एवं बहुत परिग्रह वाला नरक आयु का भी बंध करता है। 22. पाँच पापों में प्रसिद्ध होने वालों के नाम बताइए ? हिंसा पाप में धनश्री नाम की सेठानी, झूठ पाप में सत्यघोष नाम का पुरोहित, चोरी पाप में एक तापसी, कुशील पाप में यमदण्ड नाम का कोतवाल और परिग्रह पाप में श्मश्रुनवनीत नामक वणिक प्रसिद्ध हुए। (रक.श्रा., 65)
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