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  1. Vidyasagar.Guru

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  2. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  3. Nandan Jain

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  4. srajal jain

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Popular Content

Showing content with the highest reputation since 04/16/2019 in all areas

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    आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी https://vidyasagar.guru/blogs/entry/1614-post/
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    अब प्रमाण और नय के द्वारा जाने गये जीव आदि तत्त्वों को जानने का अन्य उपाय बतलाते हैं - निर्देश-स्वामित्व-साधनाधिकरण-स्थिति-विधानतः॥७॥ अर्थ - निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान इन छह अनुयोगों के द्वारा भी सम्यग्दर्शन आदि तथा जीव आदि पदार्थों का ज्ञान होता है। जिस वस्तु को हम जानना चाहते हैं, उसका स्वरूप कहना निर्देश है। स्वामित्व से मतलब उस वस्तु के मालिक से है। वस्तु के उत्पन्न होने के कारणों को साधन कहते हैं। वस्तु के आधार को अधिकरण कहते हैं। काल की मर्यादा का नाम स्थिति है। विधान से मतलब उसके भेदों से है। इस तरह इन छह अनुयोगों के द्वारा उस वस्तु का ठीक ठीक ज्ञान हो जाता है। English - (Knowledge of the seven categories is attained) by description, ownership, cause, resting place (substratum), duration and division. विशेषार्थ- वस्तु को हम जानते तो प्रमाण और नय से ही हैं, किन्तु उसके जानने में ऊपर बतलायी गयी छह बातें उपयोगी होती हैं,उनसे उस वस्तु की पूरी-पूरी जानकारी होने में सहायता मिलती है। जैसे, हम यदि सम्यग्दर्शन को जानना चाहते हैं, तो उसके विषय में छह अनुयोग इस प्रकार घटाना चाहिए - तत्त्वार्थ के श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं, यह निर्देश है। सम्यग्दर्शन का स्वामी जीव होता है। सम्यग्दर्शन के साधन दो हैं- अन्तरंग और बहिरंग। अन्तरंग साधन अथवा कारण तो दर्शन मोहनीय कर्म का उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम है और जिनधर्म का सुनना, जिनबिम्ब का दर्शन, जातिस्मरण वगैरह बहिरंग साधन हैं। अधिकरण भी दो हैं - अन्तरंग और बहिरंग। सम्यग्दर्शन का अन्तरंग अधिकरण या आधार तो आत्मा ही है; क्योंकि सम्यग्दर्शन उसी को होता है। और बहिरंग आधार त्रसनाड़ी है; क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव त्रसनाड़ी में ही रहते हैं, उससे बाहर नहीं रहते। सम्यग्दर्शन की स्थिति कम से कम एक अन्तर्मुहूर्त मात्र है और अधिक से अधिक सादि अनन्त है; क्योंकि क्षायिक सम्यक्त्व एक बार प्राप्त होने पर कभी नहीं छूटता और मुक्त हो जाने पर भी बना रहता है। सम्यग्दर्शन के दो भेद भी हैं - निसर्गज और अधिगमज। तथा तीन भेद भी हैं - औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक। इसी तरह ज्ञान, चारित्र और जीव आदि पदार्थों में निर्देश आदि लगा लेना चाहिए।
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    Yes I find it very useful I thank u for increasing my knowledge
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    गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आचार्य श्री को मेरा शत शत नमन पंचम काल भी भाग्य पर अपने ? मन ही मन इतराता है ? ब्रहद हिमालय अपनी गोद मैं ? पा हर्षित हो जाता है ? चट्टानों पर पग रखें तो ? पुष्प वहाँ खिल जाते है ? मरुथल मैं विहार करें तो ? नीर कुण्ड मिल जाते है ? चरण धूलि जिनकी पाने को ? अम्बर तक झुक जाता हो ? सिद्ध शिला पर बैठे प्रभु से ? जिनका सीधा नाता हो ? वर्तमान के वर्द्धमान की ? छवि मैं जिनमें पाता हूँ ? ऐसे गुरू विद्यासागर को ? अपना शीश नवाता हूँ ? नमोस्तू भगवन ?
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    9 जुलाई 2019 , विश्व वंदनीय आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज (ससंघ) नेमावर में विराजमान हैं। हरदा (रेलवे कोड HD) से नेमावर 23 किलोमीटर की दूरी पर है। 8 जुलाई, सोमवार। परम् पूज्य आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ ● आज रात्रि विश्राम- सिंघी कॉलेज भवन (खातेगांव-नेमावर रोड पर) ✹ भव्य मंगल प्रवेश ✹ अष्टान्हिका पर्व की अष्टमी के पावन दिवस पर, भव्य अगवानी कल श्री नेमावर क्षेत्र पर। 9 जुलाई मंगलवार, प्रातःकाल 7:30 बजे 7 जुलाई, रविवार ❖ आज रात्रि विश्राम- नर्मदा स्कूल। (विहार मार्ग में) ❖ कल आहार चर्या- राँजी गाँव ❖ विशेष- 9 जुलाई को सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र श्री नेमावर में मंगल प्रवेश की पूर्ण सम्भावना। 6 जुलाई, शनिवार, अपरान्ह काल। आज रात्रि विश्राम - बोरखेड़ीकल आहार चर्या - बड़नगर विहार के दौरान कल बड़नगर में मनेगा दीक्षा दिवस। हजारों भक्त होंगे शामिल। सम्भावित विहार दिशा - नेमावर/ इन्दौर 5 जुलाई, शुक्रवार, अपरान्ह काल। 🥏मध्य प्रदेश मंगल विहार🥏 🍂आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार रेहटी जिला सीहोर से नसरुल्लागंज के लिए हुआ...!! ⛳ आज का रात्रि विश्राम:- सतराना 10 किमी 🛣 कल की आहार चर्या:- नसरुल्लागंज 10 किमी - 4 जुलाई, गुरुवार, अपरान्ह काल। परम् पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार ❖ आज रात्रि विश्राम- सलकनपुर में पुलिस थाना से थोड़ा आगे। ❖ कल की आहार चर्या- रेहटी ग्राम में सम्भावित। ❖ सम्भावित विहार दिशा-नेमावर 3 जुलाई, बुधवार, अपरान्ह काल। ■ परम् पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार होशंगावाद से हुआ। ● आज रात्रि विश्राम- अरविन्द स्कूल भवन। ● कल की आहार चर्या- बाया ग्राम में सम्भावित। ● सम्भावित विहार दिशा-नेमावर 2 जुलाई 2019 आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार होशंगाबाद की तरफ हुवा.! 🦋☀ आज रात्रि विश्राम - नीमसारिया पेट्रोल पम्प 12km 🦋☀ कल की आहारचर्या - होशंगाबाद 8km(सम्भावित)। 🍁 संभावित विहार दिशा - बुधनी होकर नेमावर/ इंदौर 1 जुलाई 2019 ● आज रात्रि विश्राम- बुधवाड़ा । ● कल की आहार चर्या- बाबई। ● सम्भावित विहार दिशा- इटारसी या होशंगाबाद होकर नेमावर /इन्दोर 30 जून 2019 5 :00 PM 🛣विश्व पूज्यनीय,जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार करनपुर से होशंगाबाद की ओर हुआ..!!🛣 ●संभावित रात्रिविश्राम- श्री ज्ञानसागर जी स्कूल 09km ● कल की आहरचर्या- सेमरी स्कूल भवन 09km 🌈आगामी दिशा- श्री नेमावर जी / इंदौर 🌈 29 जून 2019 4: 33 PM 🎪आचार्य भगवन श्री १०८ विद्यासागर महाराज ससंघ का मंगल विहार अभी अभी पिपरिया से हुआ ।। 🌠आज रात्रि विश्राम - रानी पिपरिया 🍂कल की आहारचर्या - करनपुर मे होने की संभावना 28 जून 2019 5: 05 PM आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार बनखेड़ी से पिपरिया के लिए हुआ...!! ⛳ आज का रात्रि विश्राम:- अंजनी नदी के पास https://goo.gl/maps/zZSyBpsYRn8NZM9U6 🛣 कल की आहार चर्या:- पिपरिया 11km 27 जून 2019 4 : 40 PM आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार पोडार से होशंगाबाद की ओर हुआ... रात्रि विश्राम - माला हनवारा 8km कल की आहरचर्या - बनखेड़ी 08km 26 जून 2019 4 : 36 PM 🍂आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार गाडरवारा से ठीक 4:36 बजे पिपरिया के लिए हुआ...!! _⛳ आज रात्रि विश्राम:- कमटी स्कूल 06km* 🛣 कल की आहार चर्या:- पुडार 10km 25 जून 2019 4 : 30 PM 🛣विश्व पूज्यनीय, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार ककराघाट से गाडरवाड़ा की ओर हुआ..!!🛣 ● रात्रि विश्राम- पेट्रोलपम्प पर 8km ● कल की आहरचर्या- गाडरवाडा 8km 24 जून 2019 4 : 30 PM विश्व पूज्यनीय, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार तेंदुखेंडा से गाडरवाड़ा की ओर हुआ..!! ● रात्रि विश्राम- गुआरी 8 km ● कल की आहरचर्या- ककराघाट/नर्मदा नदी 8 km 23 जून 2019 4 : 10 PM राजमार्ग से हुआ विहार ⛳ आज रात्रि विश्राम:- गुटौरी 9 km कल की आहारचर्या - तेंदूखेड़ा (संभावित) 22 जून 2019 ● आज रात्रि विश्राम- कुम्हरोड़ा । ● कल की आहार चर्या- राजमार्ग चौराहा । कुम्हरोड़ा 🎷विशेष - पूज्यगुरुदेव की मंगल आगवानी करेगी आर्यिका माँ अनंतमति माताजी , आर्यिका माँ भावना मति माताजी , आर्यिका माँ अकम्पतिमति माताजी , आर्यिका माँ उपशांतमति माताजी ससंघ करेगी मंगल आगवानी🎷 *⛳मध्यप्रदेश विहार सूचना⛳* *🗓२१/०६/२०१९, शुक्रवार🗓* 👣➡⛳ *आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ* का आज सुबह विहार नहीं हुआ 🌳 आज आचार्यश्री ससंघ की *आहार चर्या मेरेगांव, जिला जबलपुर, मध्यप्रदेश* में हुई 👣➡⛳ *आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ* का आज आहार एवं सामयिक के बाद *मेरेगांव* से *🌳वर घटिया जंगल🌳* की ओर विहार हुआ (७ km) 🌌 आज आचार्यश्री ससंघ का *रात्रि विश्राम 🌳वर घटिया जंगल🌳 जिला नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश* में *🎪अस्थाई तंबुओं में🎪* हो रहा है 🌳 कल *२२/०६/२०१९* को आचार्यश्री ससंघ की *आहार चर्या जंगल में स्थित सरसला वन ग्राम, जिला नरसिंहपुर, मध्यप्रदेश* में *🎪अस्थाई तंबुओं में🎪* होने की संभावना है (८ km) ➡👣⛳ 20 जून आहार चर्या - बेलखेड़ा ग्राम आज रात्रि विश्राम:- मेरे गाँव (संभावित) दिनांक - 19 जून 2019 रात्रि विश्राम सम्भावित - मनकेड़ी 5.1 किमी कल की आहार चर्या - बेलखेड़ा ग्राम में सम्भावित। दिनांक - 18 जून 2019 दिन - मंगलवार, अपरान्ह काल। परम् पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार सहजपुर से हुआ। रात्रि विश्राम- राजदीप पब्लिक स्कूल शहपुरा भिटौनी। सम्भावित आहारचर्या - लम्हेटा से 2 किमी आगे करैया ग्राम मे | ( दिनांक - 17-जून-2019 समय - दोपहर 04:30 बजे अभी अभी परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ससंघ का तिलवारा घाट जबलपुर से हुआ विहार। प्रतिभास्थली दयोदय जबलपुर में आचार्य संघ का प्रवेश 21 मार्च को हुआ था, कुल 88 दिन का प्रवास यहाँ हुआ। आज सम्भावित रात्रि विश्राम - राजदीप स्कूल शहपुरा acharya shri vihar 2019-06-17 at 17.49.51.mp4 विहार .mp4
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    गुरुवर के चरणों में शत शत नमन नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु
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    संसारी प्राणी को मुख्य रूप से तीन ऋतुओं के माध्यम से राग-द्वेष, धर्म विषाद होता है। गर्मी में सर्दी और सर्दी में सूर्यनारायण याद आते हैं। जब जो है उस समय उससे राग क्यों नहीं? जाने के बाद अनुराग क्यों? जिस समय जो मौसम है उस समय उसी का आनंद क्यों नहीं लिया जाता। इन ऋतुओं को बार-बार परिवर्तित/समाप्त करने की अपेक्षा समाप्त करने की चाह रखने वाले मोह को ही समाप्त कर देना चाहिए। यह मोह का ही परिणाम है कि मनोनुरूप कार्य होने पर हम प्रशंसा के गीत गाने लगते हैं और मन की न होने पर उसी की अवहेलना/उपेक्षा करने लगते हैं। मानव मन की यह बहुत बड़ी कमजोरी है। स्वभाव का भान होते ही यह सारी बातें पीछे छूट जाती है। पैसा आ जाये तो खूब उत्साह विलास और चला जाये तो उदास, निराश किन्तु वास्तविकता समझ में आते ही न विलास न निराश बल्कि संन्यास आ जाता है। एक वह व्यक्ति जिसे हम आपके सामने लाकर रख रहे हैं, आप लोगों की अपेक्षा बहुत पीछे था पर कैसे बढ़ गया आगे, इस पर आप सभी को विचार करना है। चैन नहीं है बिल्कुल, रात बहुत बड़ी है, चारों ओर भोग सामग्री फैली है, सब तरफ गहन मौन छाया है। किसी को उठाना/बुलाना नहीं चाहता है वह/वह चाहता है कि सब लोग ऐसे ही सोते रहे और मैं चुपचाप धीरे से निकल जाऊँ/निकलने के लिये रस्सी नहीं तो क्या? कुछ भी ......। हाँ! will power होना चाहिए। आपके पास में धन, बल, पद का power हो सकता है पर will power नहीं है। हमें आज इस व्यक्ति के माध्यम से power की नहीं will power, self confidence की बात करनी है। यदि हमारी इच्छा शक्ति प्रबल हो तो बिना रस्सी के भी रस्सी का काम हो सकता है। फिर नसैनी की जरूरत नहीं सैनी (मन/इच्छा) भर हो, समझदारी भर हो। जहाँ चाह है वहाँ राह निकल ही आती है और रास्ता खोज लिया गया-साड़ियाँ बाँधकर नीचे उतर गया। वह। क्या सोचकर निकले? भवन को छोड़कर वन की ओर क्यों गया? इस भवन में सुख नहीं तो दूसरा भवन, राजभवन भी तैयार किया जा सकता था किन्तु सब कुछ छोड़कर वन की ओर क्यों? बस एक ही बात-आत्म श्रद्धान् self confidence, will power | काली-काली घटायें देखकर, बिजलियों की चमक और बादलों की गर्जन सुनकर सभी भयभीत हो जाते हैं, घबराते हैं किन्तु वह मयूर दल निर्भीक आनंद के साथ नाचता रहता है क्योंकि उसे इष्ट दिख गया है। कदम आगे बढ़ते गये, कंकर काटे आये पर रुके नहीं। रास्ते में पदचिह्न अंकित होते गये रत के निशान से। कष्ट का ज्ञान तो हुआ होगा पर दृढ़ता कैसी अद्भुत, जैसे अपने ही घर की ओर जा रहे हों, शरण्य की ओर जा रहे हों। पहुँच गये उल्लास के साथ, प्रणाम किया और तथास्तु के रूप में मिल गया आशीष। इतना ही सुनने मिला कि-केवल तीन दिन की आयु शेष है, शीघ्र ही अपने कल्याण में लग जा और फिर क्या? एक साथ दैगम्बरी दीक्षा। क्या साहस है, कहीं से आ गया, कैसे आ गया यह साहस। वन में किसने बुलाया? और भवन को किसने भुलाया? यह सूक्ष्म डोर दिखती ही नहीं फिर भी सम्बन्ध तारतम्य बना रहता है। रक्त की गन्ध पाकर स्यालनी आ गई बच्चों सहित, खाना शुरू हो गया लेकिन वह निडर निस्पृह खड़े हैं। मेरु की तरह अडिग। वही काया जिसे सरसों के दाने चुभते थे, रून कम्बल के बाल सह्य नहीं थे, रून दीपक के प्रकाश में पालन-पोषण हुआ, कमल पत्र में सुवासित चावलों के एक-एक दाने चुगे जाते थे, और आज अहा.....! हा.....will power, Self confidence वही काया, वही क्षेत्र वही भोग्य सामग्री, पर कहीं से आ गई ये दृष्टि। उनका नाम मालूम है क्या था? वे थे हमारे आदर्श सुकमाल स्वामी। बंधुओ! भूख है तो खोज हो ही जाती है अनाज की। दृष्टि होने पर गन्तव्य मिल ही जाता है। आत्मज्ञान के अभाव में यह संसारी प्राणी शरीर की सेवा में लगा रहता है किन्तु आत्मज्ञान प्राप्त होते ही कड़े से कड़े प्रबंध और वैभव सब पड़े रहते हैं फिर वह शिव राही शरीर की परवाह नहीं करता। शरीर तो अनेकों बार मिला, मिला और छूट पर उसको तो देखो जिसे मिला है। शरीर के मिलने पर हर्ष और छूटने पर विषाद क्यों? क्या कभी पुराने वस्त्र बदलते समय हम विषाद करते हैं। गीता में कहा गया है कि यह आत्मा अखेद्य है, अभेद्य है, अक्लेक्ष्य है नित्य ही सनातन है जो पानी में डूब नहीं सकती, अग्नि में जल नहीं सकती, वायु के द्वारा शोषित नहीं हो सकती ऐसी यह आत्मा अविनश्वर है। समयसार में भी कहा गया है कि शरीर के छिद जाने पर, मिट जाने पर भी इस आत्मा का कुछ भी नहीं बिगड़ता है। फिर भी हम हैं कि इस रहस्य को न समझकर शरीर के व्यामोह में फैंसे हुए हैं यही अज्ञानता हमारी दुख परतन्त्रता का कारण बनी हुई है। रणांगन में अर्जुन ने जब देखा कि सामने गुरु द्रोणाचार्य और सारे कुटुम्बीजन खड़े हुए हैं तब धीरे से नीचे गांडव रख दिया और ज्ञान योग की बात करने लगे। तब कहा गया- हे! अर्जुन, रणांगन में तुम ज्ञानयोग का उपदेश सुनना चाहते हो। मोह की वजह से तुम्हें सिर्फ और सम्बन्ध दिखाई दे रहे हैं, अन्याय नहीं दिख रहा। यदि तुम्हें अन्याय दिखता तो तुम रणांगन के कर्तव्य से पीछे नहीं हटते। रणांगन में सामने वाले की आरती नहीं होती वह तो अराति (शत्रु) होता है। शिक्षा देने वाले पर कैसे बाण चलाये अर्जुन। अरे यदि सही शिक्षा देने वाला होता तो अन्याय की ओर खड़ा ही क्यों होता। अर्जुन को दृष्टि प्राप्त हुई, मोह भंग हुआ, स्वाभिमान जागा, कर्तव्य का भान हुआ और फिर क्या हुआ? सो सभी को ज्ञात है। यह देश जब परतन्त्र था तो हमें एक नारा दिया गया था कि 'स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है'। यह नारा ही नहीं हमारा सिद्धान्त भी है। अनादिकाल से यह जीव परतन्त्रता का कष्ट भोग रहा है, यह भूल ही गया कि स्वतन्त्रता पाने का अधिकार हमारा जन्मसिद्ध ही है। इसके अन्दर स्वयं भगवान् बनने की शक्ति है पर वर्तमान में वह खोई हुई है। इसके अन्दर छिपा हुआ परमात्मा अभी सोया हुआ है, इसे जगाने की जरूरत है। जागृति के आते ही हमारे कदम गन्तव्य की ओर बढ़ने लगते हैं। संकल्पशक्ति का धनी वह वैराग्यवान साधक फिर लक्ष्य की प्राप्ति के लिये सब कुछ सहन करने तैयार हो जाता है सुकमाल स्वामी की तरह। धन्य है वे सुकमाल स्वामी जिन्होंने अति सुकुमार काया को पाकर भी मोक्षमार्ग में कमाल का काम कर दिया। वह काम किया जिसे युगों-युगों तक याद रखा जायेगा। ये कथायें ही नहीं हैं किन्तु जीवन को जगाने वाले प्रेरक प्रसंग है। इन्हें सुनकर हमारा स्वाभिमान जागृत हो जाता है, will power बढ़ जाता है। सुकमाल स्वामी ने तो तीन दिन में ही अपना सारा वैभव प्राप्त कर लिया जो अनन्त काल से खोया हुआ था। हम भी उन्हीं की तरह अपने खोये हुए स्वतंत्र वैभव को प्राप्त कर सकते हैं बस जरूरत है आत्म विश्वास की। उस आनंद वैभव की प्राप्ति हमें भी शीघ्रातिशीघ्र हो इसी भावना के साथ।
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    दिनांक - 22 अप्रैल 2019 स्थान - प्रतिबहस्थली दयोदय जबलपुर संधान सागर जी के केश लॉच.mp4
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    मर्म जीवन का (भाग -1) : लेखक - मुनि प्रमाणसागर जी
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    मर्म जीवन का (भाग - 2) : लेखक - मुनि प्रमाणसागर जी
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    पत्र क्रमांक-२०१ ११-०५-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर शब्दसमय, ज्ञानसमय, अर्थसमय के ज्ञाता दादागुरुवर परमपूज्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में नमोऽस्तु करता हूँ... हे गुरुवर! जिस प्रकार आप आगम ग्रन्थों के शब्दों के माध्यम से भावश्रुत को अपने ज्ञान की पर्याय बनाते थे। उसी प्रकार आपके लाड़ले शिष्य प्रिय आचार्य ब्यावर चातुर्मास में आगम अध्येता विद्वान् को पाकर मूल आगम ग्रन्थ की वाचना पृच्छनारूप स्वाध्याय करने का भाव हुआ और पूरे ४ माह उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन किया। इस सम्बन्ध में दीपचंद जी छाबड़ा (नांदसी) ने २०१५ भीलवाड़ा में बताया - आचार्यश्री के सान्निध्य में प्रथम वाचना स्वाध्याय ‘ब्यावर चातुर्मास प्रारम्भ हुआ तब हीरालाल जी शास्त्री साढूमल वालों से चर्चा हुई और आचार्यश्री के सान्निध्य में धवला पुस्तक-१ सत् प्ररूपणा, धवला पुस्तक-२ संख्या प्ररूपणा, धवला पुस्तक-३ की वाचना-पृच्छनारूप स्वाध्याय शुरु हो गया। प्रतिदिन पण्डित जी वाचना करते और फिर उस पर आचार्यश्री ऊहापोह करते। इस कक्षा के बाद आचार्यश्री जी कषाय पाहुड ग्रन्थ चूर्णीसूत्र का अध्ययन स्वयं करते। एक दिन स्वाध्याय के समय आचार्यश्री जी बोले-भव स्थिति को संयमपूर्वक पूरा करना है। पूरे चातुर्मास में आचार्यश्री ने खूब अध्ययन किया और पण्डित जी हीरालाल जी शास्त्री, पण्डित शोभाचन्द जी भारिल्ल, ऐलक पन्नालाल दिगम्बर जैन विद्यालय के प्रधानाध्यापक पण्डित प्रकाशचंद्र जैन (मेरठ वाले) आदि से घण्टों-घण्टों सिद्धान्त की चर्चा करते । शास्त्री जी ने आचार्यश्री जी की मेधाशक्ति एवं प्रत्युत्पन्नमति को देखते हुए। अपना समय अन्यत्र से बचाकर आचार्यश्री को अत्यधिक दिया करते थे। स्वाध्याय पूर्ण होने पर चातुर्मास के पश्चात् समापन समारोह में पण्डित जी बोले-मैंने आचार्य महाराज के साथ स्वाध्याय किया और आचार्य महाराज से स्वाध्याय के दौरान सिद्धान्त के कई नये दृष्टिकोण पाये और नये-नये चिंतनों का लाभ मिला। शुरु में मैं सोचता था कि विद्यासागर जी जवान मुनि हैं नये-नये दीक्षित हैं। अतः कितना सिद्धान्त पकड़ पायेंगे, कितनी रुचि ले पायेंगे। इस कारण मैं थोड़ा समय ही देता था, किन्तु ज्यों-ज्यों समय निकलता गया त्यों-त्यों आचार्य महाराज की प्रतिभा से परिचित होता गया और मुझे अहसास हुआ कि आचार्य ज्ञानसागर जी मुनि महाराज ने चार वर्ष के थोड़े से समय में अपने शिष्य मुनिवर आचार्य विद्यासागर जी की कितनी मजबूत नींव रख दी है।" इस तरह मेरे गुरुवर की प्रतिभा से आपके समान हर कोई विद्वान् शीघ्र उनकी प्रतिभा के वैशिष्ट्य से परिचित हो जाया करता था। ऐसे गुरु समर्पित गुरु के चरणों में समर्पण भाव से प्रणाम करता हुआ... आपका शिष्यानुशिष्य
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    पर से बोधित नहीं हुए पर, स्वयं स्वयं ही बोधित हो। समकित-संपति ज्ञान नेत्र पा जग में जग-हित शोभित हो ॥ विमोह-तम को हरते तुम प्रभु निज-गुण-गण से विलसित हो। जिस विध शशि तम हरता शुचितम किरणावलिले विकसित हो ॥१॥ जीवन इच्छुक प्रजाजनों को जीवन जीना सिखा दिया। असि, मषि, कृषि आदिक कर्मों को प्रजापाल हो दिखा दिया ॥ तत्त्व-ज्ञान से भरित हुए फिर बुध-जन में तुम प्रमुख हुए। सुर-पति को भी अलभ्य सुख पा विषय-सौख्य से विमुख हुए ॥२॥ सागर तक फैली धरती को मन-वच-तन से त्याग दिया। सुनन्द-नन्दा वनिता तजकर आतम में अनुराग किया। आतम-जेता मुमुक्षु बनकर परीषहों को सहन किया। इक्ष्वाकू-कुल-आदिम प्रभुवर अविचल मुनिपन वहन किया ॥३॥ समाधि-मय अति प्रखर अनल को निज उर में जब जनम दिया। दोष-मूल अघ-घाति कर्म को निर्दय बनकर भसम किया ॥ शिव-सुख-वांछक भविजन को फिर परम तत्त्व का बोध दिया। परम-ब्रह्म-मय अमृत पान कर तुमने निज घर शोध लिया ॥४॥ विश्व-विज्ञ हो विश्व-सुलोचन बुध-जन से नित वंदित हो। पूरण-विद्या-मय तन धारक बने निरंजन नंदित हो ॥ जीते छुट-पुट वादी-शासन अनेकान्त के शासक हो। नाभि-नन्द हे! वृषभ जिनेश्वर मम-मन-मल के नाशक हो ॥५॥ आदिम तीर्थंकर प्रभो आदिनाथ मुनिनाथ! आधि व्याधि अघ मद मिटे तुम पद में मम माथ ॥१॥ शरण, चरण हैं आपके तारण तरण जहाज। भव-दधि-तट तक ले चलो! करुणाकर जिनराज ॥२॥
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    वक्ता / गायक / प्रस्तुतकर्ता: Nandan Jain
  25. 1 point
    आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी द्वारा प्राकृत भाषा में प्रणीत ‘समयसार' का यह अनूदित रूप है। यह ग्रन्थ भुक्तिमुक्ति का बीज है। इस ग्रन्थ में जीवाजीवाधिकार, कर्तृकर्माधिकार, पुण्यपापाधिकार, आस्रवाधिकार, संवराधिकार, निर्जराधिकार, बन्धाधिकार, मोक्षाधिकार एवं सर्वविशुद्ध ज्ञानाधिकार का समावेश है। इस ग्रन्थ का अनुवाद करने में आचार्यश्री के समक्ष कुछ कठिनाइयाँ भी आई हैं, जिनका उल्लेख उन्होंने इस ग्रन्थ में किया है। ग्रन्थ पर्याप्त गम्भीर है, अत: कई टीका-प्रटीकाओं का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने माना है कि कहीं-कहीं शब्दानुवाद भी है, पर अधिसंख्य भावानुवाद जैसा उत्तम और प्रशस्त रूपान्तरण हुआ है। इस ग्रन्थराज ‘समयसार’ पर एक वृत्ति ‘तात्पर्य' संज्ञक है, जो जयसेनाचार्य द्वारा प्रणीत है। तदुपरि पूज्य अमृतचन्द्र की ‘आत्मख्याति' का भी मन्थन करना पड़ा। चेतना की लीलानुभूति से आप्यायित अन्तस् समुच्छल हो उठा और लयाधृत छन्द में निर्बाध बह चला। यही है सारस्वत समावेश दशा, जिसमें अनुभूति ‘समुचितशब्दच्छन्दोवृत्तादिनियन्त्रित होकर बह निकलती है। काव्य की रचना-प्रक्रिया का विवेचन करते हुए अभिनवगुप्तपाद ने यही कहा है।‘समयसार' का ही नहीं, नाट्यकाव्यात्मक आत्मख्यातिगत कलशारूप २७८ कारिकाओं का भी रूपान्तर बन पड़ा है। आचार्य कुन्दकुन्द की तीन रचनाएँ बड़ी प्रौढ़ मानी जाती हैं - प्रवचनसार, पञ्चास्तिकाय तथा समयसार।अमृतचन्द्रसूरि ने इन तीनों पर टीकाएँ लिखी हैं। इन उभय टीकाओं में गाथाओं की संख्या समान नहीं मिलती। समस्या यह भी आई-आचार्य अमृतचन्द्र की टीकाओं में कम और आचार्य जयसेन की टीकाओं में अधिक गाथाएँ क्यों हैं? ‘प्रवचनसार' की चूलिका का अवलोकन करते हुए स्त्रीमुक्ति निषेध' वाले प्रसंग पर ध्यान गया। वहीं १०-१२ गाथाएँ छूटी हैं। आचार्य अमृतचन्द्र ने इन पर टीकाएँ नहीं लिखीं।इससे अनुमान किया गया कि आचार्य अमृतचन्द्र को स्त्रीमुक्ति निषेध का प्रसंग इष्ट प्रतीत नहीं था। इन टीकाओं की प्रशस्तिओं से पता लगता है आचार्य जयसेन मूलसंघ के और अमृतचन्द्र सूरि काष्ठासंघ के सिद्ध हैं। आचार्यश्री को इससे एक नवीन विषय मिला। गम्भीर ग्रन्थान्तर का अधिगम, भाषान्तरण, लयबद्ध पद्यबद्धीकरण- यह सब एक से एक कठिन कार्य हैं, पर लगन और अभ्यास से सब कुछ सम्भव है। आत्मख्यातिगत २७८ कारिकाओं का संकलन ‘कलशा' नाम से ख्यात है। इसके १८८ वें काव्य के विषय में छन्द को लेकर के कठिनाई आई। वह न गद्य जान पड़ा और न पद्य। काफी जद्दोजहद के बाद लगा कि यह तो निराला और अज्ञेय की रचनाओं में प्राप्त अतुकान्त छन्द का प्राचीन रूप है। इसमें एक खोज यह भी हुई कि आचार्य अमृतचन्द्र संस्कृत लयात्मक काव्य के आद्य आविष्कर्ता हैं। आचार्यश्री ने उन लोगों से असहमति व्यक्त की है जो लोग शब्दज्ञान, अर्थज्ञान और ज्ञानानुभूति को परिग्रहवान् गृहस्थ और प्रमत्त में भी मानते हैं। उनका कहना है कि ज्ञानानुभूति तो आत्मानुभव है-शुद्धोपयोग है। वह परिग्रह और प्रमाद वाले गृहस्थ को तो क्या होगा-प्रमत्त दिगम्बर मुनि को भी नहीं हो सकता। भोग और निर्जरा एक साथ नहीं चल सकते। आगम इस मान्यता से असहमत है।
  26. 1 point
    कहना है गुरू का कि जड़ के बिना वृक्ष नहीं दया के बिना धर्म नहीं, पशुओं पर करुणा करना मानव का धर्म है, दया, प्रेम, अनुकंपा रखना यह व्यवहारिक धर्म है। पापों की शुद्धि करने आचार्यों ने गौदान कहा फिर गायों की हत्या करना निश्चित महापाप माना, पशु-वध से आ रही । प्राकृतिक आपदाएँ। नष्ट हो रहीं नैतिक संपदाएँ, रक्षक ही भक्षक बना मालिक ही मारक बना भंडारी ही लूट रहा खजाना देख यह देश की दुर्दशा संत की रो पड़ी आतमा...
  27. 1 point
    बहते-बहते ज्ञानधारा ने सुनी अचानक कुंडलपुर में एक पाषाण खंड के गिरने की आवाज़, नीचे बैठा था एक युवा गिरी जोर से सिर पर खाने लगा वह चक्कर... तभी पहाड़ चढ़ते गुरू की पड़ी उस पर एक दृष्टि, युवा ने जोड़े हाथ झुका लिया सिर दर्द हुआ पल भर में छूमंतर गुरु की करुणामयी एक नज़र पा असाता भी पलट कर हुआ साता, ज्यों ही युवा ने झुकाया माथा यही तो महिमा है वास्तविक संत की प्राणी की तो बात ही क्या पाषाण भी हो जाता मृदुः! कठोर पाषाण भी हो जाता मोम-सा! सच है गुरु बिन हो जाता है जीवन रूक्ष रेगिस्तान-सा तुच्छ तिनके-सा, क्षुद्र धूल के कण-सा। दमोह से सागर विहार में चल रहे थे अनेकों भक्त साथ में तभी गुजरे नागरवेल के नीचे से कहा एक विद्वान् ने धीरे से इसके पत्तों का रस तो केवल आँखों को ही करता निर्मल, किंतु आपके ज्ञान का रस अंतर्दृष्टि को कर देता निर्मल। चलते-चलते बैठ गये एक शिला पर कुछ पल.. उठकर जाने लगे जब गुरु से स्पर्शित शिला को तब ले जाने की लगी होड़ भक्तों की बोली पर बोली लगने लगी पाँच लाख तक आ पहुँची। सूरि जब मंत्र फूँक बना देते पाषाण को भगवान तब जिस पाषाण पर बैठे सूरि भगवान क्यों न हो उसका मूल्य महान? समीप ही थी चाय की दुकान मालिक था उसका बलराम उसी की थी वह शिला देख भक्तों का समुदाय उसका हृदय खिला... उठाकर शिला ले गया घर बोला लोगों से हाथ जोड़कर चाहे पाँच करोड़ रुपये भी दो फिर भी नहीं दे सकता यह शिला प्रस्तर लगाकर गुरु की तस्वीर पूजने लगा उसे… लिखते-लिखते लेखनी थम गई शब्दों की श्रृंखला कम पड़ गयी आखिर कहाँ तक लिखें बाह्य चमत्कार! संतात्मा की चैतन्य सत्ता में होते नित नवीन स्वानुभूतिमय चिन्मय चमत्कार। "दीवसमा आइरिया अप्पं परं च दीवदि'' कहती-कहती रुकती नहीं बहती जा रही ज्ञानधारा... गुरू की सातिशय पुण्य वर्गणाओं का पाकर निमित्त अनेकों कार्य होते जाते सहज नित, किंतु पर कर्तृत्व से रहते हैं परे जीवन के सत्य को पहचानने स्वातम को जानने जीवन को संयमित रखने देते हैं जन-जन को संदेश। कुंदकुंद यतिवर के समयसार वट्टकेर मुनिवर के मूलाचार समंतभद्र की तार्किक टंकार रूप त्रिवेणी का देते हैं उपदेश। जो पर्वत-सम अचल जल-सम विमल पवन-सम निस्संग सिंह-सम निर्भय चन्द्र जैसे सौम्य, सूर्य जैसे दिव्य अवनि जैसी सहिष्णुता अंबर जैसी विशालता वचन और वृत्ति में एकरूपता। जिनके दर्पण सम जीवन में... भीषण गर्मी हो या सर्दी पंखा, कूलर, घास, चटाई नहीं करते उपयोग कदापि चलना न पड़े कभी रात में इसीलिए सीमित आहार ले दाल, रोटी, भात गर्म पानी, छाँछ नमक, मीठा पूरा त्याग फल, मेवा न कोई साग। निर्जल किये नौ उपवास रहे नित्य स्वातम के पास पाटे पर ही शाम से हो जाता सवेरा दिन में सोते नहीं रात में भी अल्प निद्रा, शेष काल ज्ञान ध्यान में रत अनुकंपा अनुशासन की मूरत मानो मुक्ति का वायुवेग-सा रथ विलोम शब्दों के विशेषज्ञ दाक्षिणात्य होकर भी उत्तरापथ के हिंदी भाषियों से कहीं अधिक निष्णात, शब्दार्थ में हासिल है महारत वे स्वयं हैं विद्या के सागर और उनका शब्द-शब्द विद्या का सागर!! दीक्षित शिष्य समुदाय है भारी तीन सौ साधु साध्वी पिच्छीधारी कई दशक ऐलक-क्षुल्लक आठ सौ ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणी अणुव्रती हजारों व्यसन-त्यागी अनेकों साहित्य के क्षेत्र में गुरूदेव ने वही लिखा जो लखा वही कहा जो रस चखा; क्योंकि पहले अनुभव की आँख से देखते हैं। फिर वे जुबाँ से यथार्थ बोलते हैं।
  28. 1 point
    भले ही महावीर नाम हो बच्चे का, किंतु देखते ही छिपकली को भाग जाये तो वीर कैसा? भले ही अर्थ नाम हो पैसे का, किंतु अनर्थ के गर्त तक ले जाये तो अर्थ का अर्थ कैसा? जीवन के अर्थ से ही कर दे वंचित वह व्यर्थ है पैसा; क्योंकि अर्थ बढ़ने से... नींद कम, बेचैनी ज्यादा बढ़ती है पवित्रता कम, कल्मषता ज्यादा बढ़ती है नैतिकता कम, विलासिता ज्यादा बढ़ती है सुविधा कम, दुविधा ज्यादा बढ़ती है मित्रता कम, शत्रुता ज्यादा बढ़ती है निडरता कम, भयभीतता ज्यादा बढ़ती है, किंतु वीतरागता के बढ़ने से बढ़ती है सहजता! अध्यात्म के बढ़ने से बढ़ती है समता!! अंतस् को भिगो देती है यह वार्ता... तारंगा क्षेत्र की है यह घटना गुरूवर आसीन थे गुफा में नयन आर्द्र थे करूणा के जल से, लीन थे किसी गहन चिंतन में तभी दीक्षित शिष्याओं ने गुफा में प्रवेश कर त्रियोग से नमन कर निहारा आचार्य श्री को… शुद्धोपयोग दशा में करते आत्म क्रीड़ा, लेकिन शुभोपयोग में आते ही देख जीवों की दशा गुरू मन में भर आयी पीड़ा। शिष्या ने सोचा मन ही मन... हे दयानिधान! आपकी चेतना क्यों है आज चिंतित? आत्मा क्यों है इतनी व्यथित? कुछ क्षण बनी रही स्तब्धता… पूरी तरह नीरवता… कहाँ से बात करें प्रारंभ कुछ समझ में नहीं आ रहा? तभी गुरु के खुले नयन, शिष्या ने किया निवेदन सुनना चाहते हैं गुरूदेव! आपश्री का गहन चिंतन, तभी गुफा की तरफ संकेत कर बोले गुरुवर इन सब पृथ्वीकायिक जीवों का क्या होगा? वहीं पर छोटे-छोटे पौधों की तरफ करके इशारा कहने लगे यतिवर इन जीवों का उद्धार कैसे होगा? नहीं है इनके पास समझने को मन चाहे कितना भी सोचूँ मैं इनके बारे में, पर नहीं जानते ये... कैसे हो अपना कल्याण? मंदिर बन भी गया पृथ्वी पे अभिषेक भी हो गया जल से दीया जल भी गया अनल से वायुकायिक संत को छू भी रहा, लेकिन वे तो जानते नहीं कुछ एक ही इंद्रिय है पास इनके तोड़ते-काटते मसाला भरते आग पर रखते तो कभी तलते वनस्पति की वेदना जान सकते हैं सर्वज्ञ भगवंत। कब होगा इनके दुःखों का अंत?? कहते-कहते नयनों में भर आया जल... आगे कुछ बोल नहीं पाये संत। पर-पीड़ा में भीगे गुरु को देख यूं प्रथम बार... आँखें सबकी भर आयीं शिष्या बोली करके नमस्कार हे दयासिंधु यतिराज! ऐसी करूणा भाव से ही आप श्री पहुँच जायेंगे मोक्षनगर सुनते ही कहा गुरू ने मुझे चिंता नहीं अपने मोक्ष की चिंतित हैं- क्या होगा इन जीवों का? कब होगी पहचान इन्हें निजातम की? कब टूटेंगे बंधन इनके मिटेंगे भ्रमण भव-भव के? तुम सुन सकते हो बात यह, किंतु ये तो सुन भी सकते नहीं तुम कह सकते हो बात अपनी, किंतु ये तो कुछ कह भी सकते नहीं। कहते-कहते दयालु गुरू हो गये मौन... गला रूंध-सा गया सोचती रही शिष्या आखिर ये हैं कौन संत हैं या भगवंत? प्राणी मात्र के प्रति दया से भीगा है समूचा जिनका मन, ऐसे ही संत करते तीर्थंकर प्रकृति का बंधन उनके श्रीचरण में अगणित वंदन… समता के धनी संत को पा . प्रकृति में उमड़ आयी अपूर्व पुलकन... समय था दोपहर का गढ़ाकोटा से विहार हुआ गुरूवर का, ज्यों ही पुल तक आया संघ पाँच फीट पानी पुल पर देख रह गये दंग कैसे होगा रास्ता पार? दिख नहीं रहा मार्ग शिष्यगण सोच रहे मन में… कि सहजता से मुस्कुराते हुए बोले गुरूवर विषय-कषायों के मैले जल से। भरा हुआ है संसार-समंदर उसे पार करने का संकल्प है जब तो इतने से जल से क्या डर! सभी कर लीजिए एक सामायिक आदेश मान गुरू का हुए शिष्य ध्यान में लीन ज्यों-ज्यों मन चेतन में रमने लगा, नयन खुले तो पाया पानी पुल के नीचे आ गया अजब करिश्मा हुआ... प्रकृति ने भी गुरू आदेश का पालन किया। हँसते हुए शिष्यों से कहकर चल दिये गुरुराज रूको मत, चलिये साथ अभी तो करना है भवसागर पार!! शिवपथगामी महासंत चले जा रहे कदम दर कदम आज पुलक उठी है प्रकृति, जो हैं आध्यात्मिक यति करके उनसे रति। महिमा जिनकी दिनोंदिन बढ़ती जा रही कीर्ति स्वयं गुरू का गुण-कथन कर रही विज्ञान की देन है भौतिक प्रगति जबकि धर्म की देन है सन्मति, गति-सन्मति दोनों हैं पास जिनके वह क्यों न करे प्रगति? वास्तव में गति ही प्रगति को संभव कर सकती सम्यक् मति ही चुनौती स्वीकार कर सकती इसीलिए अंतर्यात्रा की ओर पल-पल गतिमान हैं जो उनके गुणों से हो जाती सहज रति!
  29. 1 point
    जगतवंद्य हैं ऐसे संत धन्य हैं ये भावी भगवंत जो अतीत के विकल्प से परे हैं वर्तमान के आनंद से भरे हैं, इसीलिए कुछ अनागत को जान लेते हैं यह घटना साक्षी है इस बात की जब श्रावक ने किया गुरूवर का पड़गाहन, ले गया कक्ष में की भक्ति से पूजन गुरु-चरण पा फूला न समाया, पर ज्यों ही सात मिनट में छोड़ अंजली कर लिया आहार संपन्न। उसका हृदय भर आया रोते-रोते गुरू-पद में सिर टेक बोल गया वह तनिक तन का भी ख्याल करिये... अपना नहीं तो हम भक्तों का ध्यान रखिये! श्रावक की बात सुनकर भी बिना बोले ही मुस्कान मात्र से संतुष्ट कर, चले आये मंदिर के द्वार साथ ही आ गया सारा परिवार... ज्यों ही निकल आये घर से छत गिर गई ऊपर से अचरज से देख रही सारी जनता यह कैसा है करिश्मा... भावी घटना को कैसे जान लिया? तरह-तरह की करने लगे बातें आश्चर्य से भर आयी सबकी आँखें… इसी श्रावक के यहाँ आहार को आये; क्योंकि मरण से बचाना था उन्हें, शीघ्र आहार कर आये इसीलिए कि स्वयं को अकालमरण से बचना था इन्हें धन्य है गुरु की विशुद्ध परिणति परिमार्जित प्रबुद्ध मति! दो तरह के विकल्प आते हैं लौकिक व्यक्ति में एक वह कि ऐसा सटीक लिखूँ कि लोग पढ़ने को मजबूर हो जाये, दूसरा यह कि ऐसा जीवन जीऊँ कि मुझ पर लिखने को लोग मजबूर हो जायें, किंतु अध्यात्मयोगी गुरूवर कहते हैं कि पढ़ने योग्य लिखा जाये इसकी अपेक्षा बेहतर है लिखने योग्य किया जाये।” वास्तव में दीपक को स्वयं के बारे में आवश्यकता नहीं पड़ती बोलने की, दीपक के विषय में बोल देता है प्रकाश स्वयं ही। संत को अपने बारे में आवश्यकता नहीं बोलने की उनका सदाचरण ही बोल देता है उनके बारे में। ज्ञानधारा के पास नहीं हैं कर्ण फिर भी सुना-अनसुना कर लेती है वह श्रवण, नहीं है उसके पास नयन फिर भी कर लेती है दरश, नहीं हैं उसके पास घ्राण फिर भी आ जाती है महक, नहीं है उसके पास रसन फिर भी कर लेती है रसास्वादन, नहीं है उसके पास परस फिर भी कर लेती है स्पर्शन, नहीं है उसके पास मन फिर भी रखती है वह स्मरण | स्मृतियाँ ताजी हो आयीं उसकी बात पुरानी है गिरनार के विहार की पद-विहार करते-करते दायें पैर के अँगूठे में। अचानक हो गई भयंकर पीड़ा... धरती से भी छू जाये तो हो असह्य वेदना फिर भी चलते रहे लगातार भीतर में चलती रही स्वसंवेदना… शिष्यों ने गुरु की पीड़ा जानकर अनेकों चिकित्सकों को बुलवाकर कराया उपचार, किंतु तनिक न मिली राहत परिश्रम व्यर्थ रहा निस्सार... तभी वहाँ दर्शनार्थ आये कहा एक भक्त ने “बड़ी कृपा होगी मुझ पर बस एक बार दें मुझे सेवा का अवसर इस दर्द को ठीक कर सकता हूँ मैं तकलीफ किञ्चित् भी नहीं होगी उन्हें निवेदन है आप विश्वास रखें मुझ पे।" देख उसके भावों की दृढ़ता भाषा की विनम्रता सौंप दिये चरण निश्चिंतता से प्रथमतः परोक्ष ही प्रणाम कर आज्ञा ली उसने अपने गुरु से, चरण को सीने से लगा दिया दोनों आँखों को मूंद लिया। लगे सब सोचने कि अब यह अँगूठे को खींचेगा कहीं दर्द तो नहीं बढ़ा देगा? लेकिन कुछ किया नहीं उसने श्रद्धा से सहलाया उसने आँखें खोल बोला वह दर्द रह गया क्या अब? सभी जन थे अति विस्मित चलकर देखा गुरुवर ने दर्द चला गया जड़ से चलने में वेदना नहीं किञ्चित्, घेर लिया लोगों ने उसे आखिर यह चमत्कार सीखा किससे? कुछ कहा नहीं उसने ज्यों ही ऊपर के वस्त्र उतार दिये बदन से, सबने पढ़ा अपनी आँखों से लिखा था उसके सीने पे “आचार्य विद्यासागरजी महाराज की जय” इन्हीं की कृपा से करता हूँ इलाज यही है मेरी चिकित्सा का राज़! हतप्रभ हुई शिष्य मण्डली एकसाथ फूटी स्वरावली, जिनका नाम खुदा है तुम्हारे सीने में वह यही हैं तुम्हारे सामने! सुनते ही वह लिपट गया गुरु के चरणों से... खोज रहा था जिन्हें वह वर्षों से, परोक्ष में ही सुनकर गुरु की वार्ता हो गई जिसे अपूर्व आस्था आज मिल गये वह गुरू-चरण... गुरु की कृपा ने ही गुरु को निरोग कर दिया, अपनी झोली में उसने सातिशय पुण्य भर लिया। सभी को श्रीराम का स्मरण हो आया नदी में बाँध हेतु पत्थर डालते राम तत्काल वह डूब जाता, शेष नल-नील आदि भक्तगण लेकर राम का नाम डालते पत्थर तो तैर जाता, राम-नाम से मंत्रित पत्थर भी तैरता है। राम के हाथ से छूटा पत्थर भी डूबता है। गुरु-नाम के स्पर्श से रोग भी भाग जाता है। सोया हुआ भाग्य भी जाग जाता है, ‘स विभवो मनुष्याणां यः परोपभोग्यः’ मानव का वही धन है सही जो अन्य के लिए हो उपयोगी।
  30. 1 point
    शाम ढले वैय्यावृत्ति करते-करते बोल गया एक शिष्य मेरी अंतिम श्वास तक इस जीवन की शाम न हो तब तक, गुरूदेव आपका प्रत्यक्ष बना रहे संयोग य ही है कर जोड़ आपसे अनुरोध… क्योंकि भूखे के लिए भोजन आवश्यक है। प्यासे के लिए जल आवश्यक है। रोग के लिए औषध आवश्यक है। तो सम्यक् मरण के लिए आप जैसे गुरु का समागम आवश्यक है... सुनते ही बात शिष्य की मुखरित हुए आचार्यश्री जब तक तुम्हें भासित होता रहेगा मेरा संयोग, तब तक मिल न पायेगा तुम्हें निज स्वभाव का सहयोग, इसीलिए अब करो कुछ ऐसा स्थिर कर त्रियोग हो समयोग, स्वभाव में संयोग का अभाव हो अनुभूत तभी गुरु का संयोग हो फलीभूत। कहकर घंटों डूबे रहे स्वयं में निज ज्ञानबाग में विचरण कर वैराग्य की फुहार पाकर स्वानुभूति-कोयल की कुहुक श्रवण कर निज में ही आनंदित रहते स्वातम में नित रमते... क्योंकि अपनों के घेरे में अंधेरा ही अंधेरा है... और अपने घर में उ जाला ही उजाला है। भगवंत-पथ पर चलते आध्यात्मिक रस चखते जानते वे अंतर्मना कि ‘परायत्तं परोक्षं स्वायत्तं प्रत्यक्ष पराधीन है परोक्ष स्वाधीन है प्रत्यक्ष, अक्ष का लक्ष्य है जब मेरा तब पर का पक्ष ले वर्द्धन नहीं करना जग-फेरा अक्ष अर्थात् आत्मा के प्रति प्रीत रहे मेरी यह स्वाधीन परिणति ही मीत है मेरी।
  31. 1 point
    एक समर्पित शिष्या ने आज सवेरे मन में कुछ भावना ले कर जोड़ किया निवेदन क्षेत्र था पाटन तीन वर्ष से हो रहा लगातार वमन गुरुवर! मुझ पर कृपा कीजिये स्वास्थ्य-लाभ का आशीर्वाद दे मुझे दीक्षा के योग्य बना लीजिये...। स्नेह-भरी दृष्टि से निहार दे दिया आशीर्वाद का उपहार, ज्यों ही आशीष की रश्मियाँ उतर गईं हृदय के भीतर चेतना को कर गई तरबतर, अपूर्व-सा हुआ स्पंदन सहज ही मुकुलित हुए नयन... गुरू-कर से निःसृत तरंगों के स्पर्शन से अंतर स्नेह के वर्षण से रोग हुआ पलभर में छूमंतर, तन हुआ निरोग आ गया दीक्षा का योग। गुरू ने उँडेलकर अपनी ऊर्जा पिच्छी को सिर पर रखा पूर्ण हुई भावना उ स अपूर्व घड़ी का क्या कहना! जैसे सेठ और किंकर का संबंध है भौतिकता का शिक्षक और विद्यार्थी में बौद्धिकता का आत्मा-परमात्मा में भगवत्ता का वैसे ही गुरु-शिष्य में संबंध है आत्मीयता का, आत्मीय भाव पढ़ लेते वे भाषा की भी आवश्यकता नहीं उन्हें! एक दिवस एक सज्जन ने पाकर गुरुपद-छाँव कह दी मन की बात आबाल वृद्ध पर अद्भुत है आपका प्रभाव! सुनते ही बंद हुए नयन डूब गये चिंतन की गहराई में... पर के ऊपर प्रभाव पड़े मेरा इसमें मेरी कोई महिमा नहीं, मेरे स्वभाव का प्रभाव रहे मुझ पर यही मेरी गरिमा है सही, जिससे पर-भाव का अभाव नित्य अनुभूत हो। विभाव परिणति का तिरोभाव लक्ष्य मूलभूत हो, निजानंद की छाँव हो यथाख्यात संयम की नाव हो शाश्वत सिद्धालय-सा गाँव हो बस पर भाव न हो ऐसा मेरा मुझ पर स्वभाव का प्रभाव हो।
  32. 1 point
    नियमित दिनचर्या देख इनकी समझ में आता ‘मूलाचार' देख अध्यात्म-प्रवृत्ति इनकी दिख जाता ‘समयसार। आचरण में डूबा ज्ञान जिनका सहज होता रहता ध्यान जिनका, ज्ञान से सामने वालों को आकर्षित नहीं करना है जिन्हें बल्कि स्वयं के अज्ञान को प्रक्षालित करने का लक्ष्य है जिन्हें। स्मृति दिलाती है यह घटना जब मथुरा पहुँचे आचार्यश्री शाहदरा से आये तब लाला सुमतप्रसादजी बोले वह कर दी है मैंने आगे की सारी व्यवस्था, सुन लाला की बात कहा गुरु ने मंद मुस्कान के साथ मुझे पाना है सिद्धावस्था आवश्यक नहीं कोई व्यवस्था।'' तभी उठाकर पिच्छी कमण्डल पीछे-पीछे सारा शिष्य-मण्डल च ल दिये मथुरा से आगरा दिल्ली छूट गया भक्तों का मन से दिया।
  33. 1 point
    गंतव्य तक अविराम चलते रहना लक्ष्य है यतीश्वर का ज्ञानधारा में अविरल बहते रहना उ द्देश्य है सूरीश्वर का, कर्तव्यशील कदमों से पथ लाँघते नैनागिर से कटनी होते हुए जा रहे तीर्थराज सम्मेदशिखर... संग कई भक्तगण कर रहे पद विहार... यात्रा में जगह-जगह हुए मंगल प्रवचन सुन गुरू के अमृत-वचन अनेकों भव्यात्माओं ने छोड़ दिए सप्त व्यसन... जीवंत तीर्थ का शाश्वत तीर्थ से मिलन भावतीर्थ का द्रव्यतीर्थ से मिलन। लो! चलते-चलते आ गये सुखद क्षण...। आचार्य संघ का हो गया मंगल पदार्पण! बीस तीर्थंकरों की निर्वाण भूमि पावन है यहाँ का कण-कण निजानुभूति गहराने निकट भविष्य में मुक्ति पाने आये गुरु मुक्तात्माओं से मिलने… हर दिन पर्वत की वंदना करते स्व सिद्धत्व को श्रद्धा से अनुभवते, अपने असंख्यप्रदेश पात्र में ब रसती पवित्र ऊर्जा को नितांत एकाकी हो अहोभाव से स्पर्शते, गुरूवर की पुलकित मति तीर्थ वंदना की अलौकिक स्मृति भीड़ अधिक होने से शिखरजी से ईसरी लौट आये आचार्यश्री। गुरु के संयम-प्रभाव से चलायमान महासमंदर में अनेकों सरिताएँ समाहित होने लगीं, कोई ऐलक कोई मुनिदीक्षा ले । भव्यात्माएँ ज्ञानार्णव में अवगाहित होने लगीं।
  34. 1 point
    मुक्तागिरि होते हुए नैनागिर में आ विराजे गुरूदेव, तभी चरण वंदना कर बोला एक युवक “भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी हूँ मैं' प्रसन्न मुद्रा में जवाब दिया आचार्यश्री जी ने और मैं वीतराग विज्ञान का..." जब गुरु ने कुछ भी नहीं दी प्रतिज्ञा युवक था हैरान साधु जबर्दस्ती देते नियम निरस्त हुई यह धारणा। आस्था में डूबकर बोला वह जो चाहे आप दीजिए नियम मुझे, जब कुछ न बोले गुरूदेव तब ज्ञात से अज्ञात की ओर... शब्द से नि:शब्द की ओर राग से विराग की ओर मोह से मोक्ष की ओर चलने का कर लिया संकल्प, समर्पित हो गुरूदेव के पकड़ लिए चरण गुरु ने दे दी चरणों में शरण। हर्षातिरेक से अहोभाग्य मान सदा के लिए रख दिया गुरु-चरण में माथ ‘ओम्' कहते हुए सिर पर पिच्छी रख रख लिया अपने साथ। दस जनवरी का दिवाकर हुआ उदित कुछ विशेष रोशनी ले मुकुलित कमल हो गये पूर्ण विकसित अलिगण करने लगे गुंजन... लो छह साधक को क्षुल्लक दीक्षा दे महान उपकार कर दिया भारत की वसुंधरा को अद्भुत उपहार दे दिया!! पंछियों की भाँति स्वतंत्र जल की भाँति निर्मल सरिता की भाँति गतिमान चट्टान की भाँति अविचल गुरूकुल पद्धति के समर्थक आत्म विद्या पारंगत श्रुत के समाराधक ऐसे महान साधक के गाँव-गाँव नगर-नगर प्रत्येक श्रावक के घर-घर गूंज उठते नारे... ‘ज्ञान के सागर विद्यासागर ‘धर्मदिवाकर विद्यासागर धर्मध्वज फहराते यूँ आचार्य श्री द्रोणगिरि पधारे।
  35. 1 point
    यों क्षुल्लक दीक्षा प्रदान कर नैनागिर से चातुर्मास संपन्न कर पहुँचना था मदनगंज किशनगढ़ दे दिया था वचन तिथि हुई निश्चित, लेकिन बीच में ही देह में बढा ताप असाता के राक्षस ने डेढ़ माह दिया संताप संत भयंकर देह दाह में भी थे निश्चित जो मिटाने चले हैं भव आताप। ज्वर मंद होते ही किया विहार पर मन ही मन यह कर लिया विचार अब आगे से किसी को वचन नहीं देना इससे हो जाता है विकल्प; क्योंकि परिस्थितिवश चाहते हुए भी पूरा न कर पाते संकल्प। संकल्प-विकल्प से परे हो जीवन जीना है मुझे कल-कल का कारण कल से परे हो निष्कल होना है मुझे। श्रावक भले ही करे आग्रह वे गृहवासी हैं गृह परिग्रह से परे श्रमण रत्नत्रयधारी हैं। आग्रह, आवेश, आक्रोश ये तीन आकार का बना शिकार भटक रहा अनंत संसार अब मुझे होना है निराकार, तो गुरू-आज्ञा करके स्वीकार ध्येय बनाये रखना है चिन्मय चिदाकार। अब वचन देना नहीं किसी श्रावक को वचन दे दिया है मन ही मन अपने गुरूवर को अनुभव से सीख ली स्वयं ने पहुँच गये किशनगढ़ में, समाज थी सारी प्रसन्न पंच कल्याणक हुए सानंद संपन्न तन कमजोर होने पर भी चेतन था बलजोर… सिरदर्द और देह में शुष्कता बढ़ती जा रही थी। मौसम में उष्णता दिन पर दिन तेज हो रही थी... तभी घी लेना स्वीकार कर सर्व फलों का कर दिया त्याग... असंयमी कहता है यह भव मीठा, परभव किसने दीठा' संयमी संत कहते हैं इस भव में त्याग तो परभव में कैसा संताप? यूँ परम त्यागी यतिवर ‘दक्षिण के संत उत्तर के बसंत' मुनि ने विचरण कर थूबौन में उन्यासी का किया चातुर्मास। शिष्य की गुरु से क्या है अनजानी? गुरु ने शिष्य के मन की पहचानी एक दिवस क्षुल्लक समयसागरजी । पहुँचे गुरुवर के समीप... प्रत्येक अष्टमी-चतुर्दशी करते नियमित उपवास आज भी रख दी उपवास की भावना शीश धर चरण में की वंदना। गुरू ने किया आदेशित उपवास नहीं, करना है ऊनोदर तभी नियमसागरजी ने सोचा अपने मन के अंदर... मैं भी गुरु से माँग लँ ऊनोदर किया निवेदन गुरु से हाथ जोड़कर आचार्यश्री! मैं करना चाहता हूँ ऊनीदर' कुछ पल सोचकर कहा गुरू ने यदि कर सकते हो उपवास तो कर लो आज सौभाग्य मान किया उपवास। गुरू होते जननी-सम ज्यों जननी एक बेटे को पानी डाल पिलाती दूध दूजे को मलाई डाल पिलाती दूध शिष्य को कब क्या करना है कहाँ कितने समय रहना है गुरु ही यह जानते हैं ऐसे गुरु को शिष्य भगवान मानते हैं।
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    समय भी निःशब्द अपने कदमों से सरक रहा था आगे कि अचानक... समयसागर जी हो गये अस्वस्थ पण्डितजी ने किया अनुरोध चिकित्सा संभव नहीं यहाँ, हृदय काम कर नहीं रहा शरीर से ठंडा पसीना आ रहा नाड़ी का पता चल नहीं रहा... गंभीर है स्थिति! कटनी ले जाने की दीजिए अनुमति… धीरे से पूछा पण्डितजी ने यदि सुधरता नहीं स्वास्थ्य तो करेंगे क्या आप? क्षुल्लक समयसागरजी ने मंद स्वर में उत्तर दिया धरकर शांतभाव ‘‘सल्लेखना लूंगा।'' क्या समाधि के लिए तैयार है मन? बोले संयत स्वर में क्षुल्लक जी आप चिंता न करें श्रीमान्! मृत्यु महोत्सव को तैयार है मेरा चेतन।' मरण से निर्भय हूँ मैं; क्योंकि जान लिया है। स्वभाव से अमर हूँ मैं। वाह-वाह धन्य! आह्लाद के स्वर फूट पड़े। पण्डितजी के सूकंठ से… “जैसे जाके नदिया-नारे वैसे वाके भरखा। जैसे जाके बाप-मताई वैसे वाके लरका''। जैसे गुरु वैसे शिष्य जैसे दाता वैसे पात्र जैसी दीक्षा वैसे संस्कार, जो कुएँ में होता है। वही बाल्टी में आता है। जो गुरु में होता है। वही शिष्य में आता है।
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    गर्भ में रखा जिसे नौ माह वह क्षेत्र की अपेक्षा दूर है बहुत, लेकिन मन से दूर कैसे हो सकता? रह-रहकर याद सताने लगी भूख जाती रही राते उनींदी बीतने लगीं। आखिर एक दिन बोली- स्वामी! पुत्र दर्शन बिन रहा नहीं जाता अब अधिक विरह सहा नहीं जाता आत्मीय निगाहों से निहार बोले मल्लप्पाजी अब नहीं वह पुत्र हमारा दीक्षा के पूर्व तक था विद्याधर हमारा... तुम्हें जाने से रोकता नहीं मैं, किंतु जा नहीं सकता अभी मैं..." हास्य-विनोद में कह गई वह कहीं श्रमण न बन जाओ क्या इसी भय से जाना नहीं चा... वाक्य पूर्ण होने से पूर्व ही कहने लगे मल्लप्पाजी गृहस्थ जीवन के दायित्व से करके पलायन आगम भी नहीं देता अनुमति दीक्षा की, ब दल जाए बाहर से भेष भले ही पर भीतरी भावना बदलती नहीं। दो पुत्रों में अभी प्रौढ़ता आयी नहीं दोनों पुत्रियों का भी है विकल्प, मुनि होने का मन में है विचार पर कर नहीं पाता संकल्प। इसी वार्तालाप में स्वामी से ले अनुमति आखिर श्रीमति और अनंतनाथ शांता, सुवर्णा को ले साथ चल पड़ी दर्शनार्थ… यात्रा के दौरान सोच रही शांता शांत मन से... यदि संख्या से निकाल दें। मूल एक का अंक तो गिर जाती है गणित की इमारत शून्य को निकालते ही ढह जाती है भूगोल की इमारत और अध्यात्म के हटाते ही बिखर जाती है आनंद की इमारत। मैं प्रवेश पाना चाहती हूँ। परमानंद के महल में, जड़ महल में होती चहल-पहल बहुत पर स्वातम का अनुभव कहाँ? परेशानियों का हल कहाँ? भोगों के भग्न भवन में दुखों का आसव रूकता कहाँ? अंतहीन अतृप्ति रूप-वासना में एक ही आत्म पदार्थ पर वास रहता कहाँ? अतः किसी से ऐसा राग करना नहीं कि वह न रहे तो मैं रह ना सँकू, और किसी से ऐसा द्वेष करना नहीं कि वह रहे तो मैं रह ना सँकू, यों शांत निःशब्द भावात्मक विरक्ति के दुर्गम पथ पर कल्पना से विचर रही थी... ‘सुवर्णा' भावों से भीगी कहे बिना कुछ भी वर्ण साथ दे अंतस् से बहन का साधना-पथ पर चाहती है अविराम चलना भावों की आहट को कोई सुन न ले इस शंका से रास्ते भर रही मौन।। किंतु साथ थे अनंतनाथ बचपन से ही मेधावी कार्य में कर्मठ योगी अकथ ही हृदय के समझ गये भाव बोले- व्रत लेने की भूल मत करना बहुत कठिन है संयम-पथ अपनाना। उल्लास उर्मियाँ उठ रही हैं। चित्त में नूतन अंगड़ाई है । दोनों के उमंगित हैं तन उल्लसित हैं कदम, पुलकित है मन। मनोरथ पर सवार देखा दोनों बहनों ने आ गया है अजमेर वहाँ से पहुँच कर सवाई माधोपुर अभिभूत हुए दर्शन कर, ब्रह्मचर्य व्रत लेने की भावना व्यक्त कर आशीर्वाद मिला ‘देखो आहारोपरांत प्रार्थना करने पर आजीवन व्रत ब्रह्मचर्य प्रदान किया ब्राह्मी, सुंदरी की परंपरा का निर्वाह किया। ज्ञात हुई जब यह बात बहुत रोये अनंतनाथ... यदि होता मुझे पता तो साथ में नहीं लाता, जब तक नहीं होती अध्यात्म की अनुभूति तब तक नियम-संयम लगते निरर्थक। इधर मल्लप्पाजी शांतिनाथ के साथ आ पहुँचे ‘सवाई माधोपुर दोनों पुत्रियों को देख श्वेत शाटिका में हुए चिंतातुर, पूछा आचार्यश्री से क्या आजीवन दिया है व्रत । या काल है नियत...?" यतिवर रहे मौन; क्योंकि जाना जा सकता है बिना बोले भी शब्दानुच्चारणेऽपि स्वस्यानुभवनमर्थवत्’ क्षेत्र महावीर जी में आये दर्शनार्थ अ नन्य भक्त कजौड़ीमल, तभी निर्देश दिया उन्हें पहुँचा दो दोनों ब्रह्मचारिणी को। ‘मुजफ्फरनगर' आचार्य धर्मसागरजी के संघ में। देख अपनी सुता को धवल परिधान में माँ का मन हो गया विरत, अनंतनाथ, शांतिनाथ लेने गये आज्ञा घर लौटने की तो वीतराग भाव से भरकर बोले मुनिश्री ‘पर घर का छोड़ो आकर्षण निज घर में करो पदार्पण! दुर्लभ मनुज जन्म रूपी रत्न को मत फेंको वासना के गहरे समंदर में जिस पथ का किया है अनुकरण मैंने चल पड़ो इसी अनंत शांति के पथ पे..." श्रुतिपुट में पड़ते ही सुमधुर शब्द खो गई मति स्मृति में। सुदू...र वर्षों पीछे कहते थे भैया विद्या “बैठकर णमोकार की कार में जाना है सिद्धों के दरबार में'' खेल-खेल में सिखाई जिन्होंने धर्म की वर्णमाला, प्रारंभ होती है जो दया से दया होती है भरपूर उन्हीं में, जो सिंहवृत्ति वाले होते साधु महानता के होते मेरू यही हैं हमारे आज से गुरू...। यूँ ठान मन में पूछ ली मन की बात, गुरूवर! वैराग्य होता है क्या? तत्काल दिया समाधान सधे शब्दों में राग-आग सम है तो वैर विकराल ज्वालामुखी-सा है द्वेष स्वरूपा, राग-द्वेष से रहित होने की साधना है वैराग्य। दृष्टि में विरक्ति है यदि आत्म रुचि है यदि तो मार्ग यह सरल है अत्यंत, दृष्टि में आसक्ति है यदि आत्म रुचि नहीं है यदि तो मार्ग यह जटिल है निश्चित। गहन भाषा कुछ उतरी भीतर कुछ तिरोहित हो गई बाहर, किंतु समझ में आ गई भावों की भाषा झट झुका दिया शीश एक चरण में अनंत तो दूसरे चरण में शांति। दर्शनीय था दृश्य मानो आदिप्रभु के चरणों में विराजित हों भरत, बाहुबली उन्नीस सौ पचहत्तर दो मई के दिन दोनों भ्राता ने ले लिया ब्रह्मचर्य व्रत संघ में ही रहकर हो गये साधना रत… इधर वैराग्य के वेग को रोक न पाये मल्लप्पाजी भी, सो श्रुतसागर आचार्य के संघ में रहकर करने लगे धर्म-साधना... कुछ ही समय में आचार्य धर्मसागरजी के संघ में सम्मिलित हो बन गये मुजफ्फरनगर में विशाल जनमेदिनी के मध्य ‘मल्लप्पा' से 'मुनि मल्लिसागरजी ‘श्रीमंति' से हो गई ‘आर्यिका समयमति' धन्य माता-पिता की मति!! चल पड़े जिन-पथ पर प्रशंसनीय है परिवार यह! घर में एक सदस्य को छोड़ साथ चल पड़े सत्पथ पर सप्तम परम स्थान को पाने, युग के आदि में आदिप्रभु के पूरे परिवार ने ग्रहण की थी ज्यों दीक्षा त्यों विलुप्त होती परम्परा को सं यम की संजीवनी बूटी दे पुनर्जीवित कर दिया।
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    गुरु के गुण में डूबते गहराई से पहुँच जाते स्वयं तक और स्वयं की गहराई में डूबते तो बाहर आ जाते गुरु-तट तक, विद्या और ज्ञान में अंतर कहाँ रह गया था! जो ज्ञान था वह विद्या में प्रवेश कर चुका था, तभी तो जनता ने एक कंठ से कहा विद्यासागर भी यही हैं ज्ञानसागर भी यही हैं सिर्फ कुण्ड बदला है पानी तो वही है!! परिवर्तनशील है समय फिसलता जा रहा है रेत की भाँति वह मनुज अपने नाजुक कर से काल की सरकती प्रकृति को कहाँ थाम पाता, कितना पराधीन है वह? या यूँ कहें कि वास्तव में स्वाधीन ही है यह तभी तो परद्रव्य का मनाक्” भी कुछ कर नहीं सकता, जिसने संयम की श्वास दी उसे शिष्य भूल भी नहीं सकता। जिसने बनाया विद्याधर को विद्यासागर उन्हें कैसे बिसराया जा सकता? अतः शिष्य ने हृदय-पुस्तिका पर धड़कन की टाँकी से श्वासों का रूप दे उभार लिया, इस तरह गुरू-सा बन गुरु का ऋण उतार दिया। ज्ञानधारा ज्यों-ज्यों बढ़ती गई आगे त्यों-त्यों धरा पर उकेरती रही यादें उभरती गयीं अंतर की कुछ बातें और लिखती गयी... जब तक रवि-शशि गगन में, तब तक हो गुरू नाम। भावी भगवन् शिष्य-गुरू, द्वय को नम्र प्रणाम।" जब-जब पथिक गुजरते गुरू-शिष्य की कथा पढ़ते... अद्भुत संबंध की सराहना करते ज्ञानधारा के लिखे लेख से कुछ सीखते यूँ गुजर रहा था काल… कि सन् चौहत्तर सोनीजी की नसिया में हो रहे चौमासे में निज श्रामण्य के अनुभव से जो लखा सो लिखा रचा ‘श्रमण शतकम् प्रथम संस्कृत रचना के रूप में विमोचन के समय प्रकाण्ड विद्वान् जगन्मोहनलाल जी शास्त्री ने किया अवलोकन कृति का जब समझ न पाये शब्दार्थ तब ज्ञानी आचार्य विद्यासागरजी कृत पढ़कर हिन्दी अनुवाद ज्ञात हुआ अर्थ, बोले वे “संस्कृत पढ़ते पढ़ाते हो गए मुझे पचास वर्ष फिर भी समझ नहीं पाया मैं अज्ञ!" ‘कन्नड़ भाषी' होकर भी कितनी परिष्कृत है इनकी संस्कृत! नूतन आचार्य धनी हैं। विलक्षण प्रतिभा के, अनूठे संगम हैं ज्ञान व साधना के, स्वनाम धन्य, विद्वत् मान्य प्रबुद्ध चिंतक हैं निज शुद्ध आतमा के। मैं श्रेष्ठ हूँ यह सिद्ध करने अज्ञ करता साधना मैं सिद्धसम हूँ यह अनुभवने विज्ञ करते आत्म-आराधना। नहीं है चाहत चित्त में स्वयं को सच्चा मुनि सिद्ध करने की चाहत है चेतन में एकमात्र । सिद्धिवधू वरने की, सो पहुँच गये ‘श्मशान घाट' ‘छतरी योजना' नाम से प्रसिद्ध है जो। एकांत में निर्मोही संत ने किया केशकुंचन सहज हुआ क्लेश का विमोचन लगा आसन बैठ गये ध्यान में... जलती है धू-धू जहाँ देह की चिता... जलने लगी वहीं विकारों की चिता, चेतन में लीन होने लगा मन धाराप्रवाह पवित्र ऊर्जा का होने लगा आगमन पूर्वदिशा में सम्मेदशिखर से पश्चिम में गिरनार से उत्तर में विदेहक्षेत्र से द क्षिण में गोम्मटेश्वर से नैऋत्य से मूलभूत नायक ज्ञायक तत्त्व रूप निज को निज में थिर करने वाली, वायव्य से प्रभावित हुई वायु पाप धूल को उड़ाने वाली, ईशान से देवाधिदेव के देवत्व की विकारों को शांत करने वाली, आग्नेय कोण से पराकर्षण को निस्तेज कर तप तेज को बढ़ाने वाली, ऊर्ध्व से अनंत सिद्धों की पवित्र ऊर्जा का वर्षण संकल्प-विकल्प का गमन अधो से मूलाधार की शक्ति प्रदाता यों दसों दिशा से बहती ऊर्जा… ज्यों-ज्यों दिखने लगे निज दोष त्यों-त्यों बढ़ने लगा गुणकोष अनेक प्रतिकूलताओं में भी दिखने लगा भव का कूल आत्मिक सुख का मूल। जितना-जितना उपयोग गहराया उतना-उतना आत्मानंद उछल आया, ज्ञान ने ज्ञान को जाना अहा! अपूर्व था वह क्षण दृष्टि ने निज दृष्टा को पहचाना परमार्थ स्वरूप की ओर दृष्टि होते ही मिट जाती है सर्व निमित्ताधीन वृत्ति शुद्धात्म धरा पर ज्ञान वृष्टि होती है। दिख जाती है अनंत गुण संपत्ति!! निजात्म तत्त्व की कमनीयता निहारते-निहारते बीत गये एक दो नहीं पूरे छत्तीस घंटे मानो आचार्य के छत्तीस गुणों को पार कर जाना चाहते हैं शिवधाम को, लेकिन निश्चय के उपरांत आना पड़ता है व्यवहार में, संत अभी संसार में हैं। पर संसार नहीं रखते स्वयं में धन्य है आपका श्रामण्य। यूँ कहने लगा धरा का कण-कण जन-जन का अंतर्मन...
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    लगभग २६०० वर्ष पूर्व इस भारत भूमि पर एक महापुरुष का जन्म हुआ। जिसने इस धरती पर फैले अज्ञान को दूर कर सत्य, अहिंसा और प्रेम का प्रकाश फैलाया। उन महापुरुष को जन-जन अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर के नाम से जानते हैं। भगवान महावीर संक्षिप्त जीवन-दर्शन इस प्रकार है :- मधु नाम के वन में एक पुरुरवा नाम का भील रहता था। कालिका उसकी पत्नी का नाम था। एक दिन रास्ता भूलकर सागरसेन नाम के मुनिराज उस वन में भटक रहे थे, कि पुरुरवा हिरण समझकर उन्हें मारने के लिए उद्यत हुआ, तब उसकी पत्नी ने कहा कि स्वामी! ये वन के अधिष्ठाता देव हैं। इन्हें मारने से तुम संकट में पड़ जाओगे, कहकर रोका। तब दोंनो प्रसन्नचित्त हो मुनिराज के पास पहुँचे तथा उपदेश सुनकर शक्त्यानुसार मांस का त्याग किया। आयु के अंत में निर्दोष व्रतों का पालन करते हुए, शान्त परिणामों से मरण प्राप्त कर वह भील सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ। स्वर्ग सुख भोगकर भरत चक्रवर्ती की अनन्तमति नामक रानी से मारीचि नाम का पुत्र हुआ तथा प्रथम तीर्थकर वृषभनाथ जी के साथ देखा-देखी दीक्षित हो गया। भूख प्यास की बाधा सहन न कर सकने के कारण भ्रष्ट हो, अहंकार के वशीभूत होकर तापसी बन सांख्य मत का प्रवर्तक बन गया। तथा अनेक भवों तक पुण्य-पाप के फलों को भोगता हुआ, सिंह की पर्याय को प्राप्त हुआ। एक समय वह हिरण का भक्षण कर रहा था, तभी अजितञ्जय और अमितदेव नाम के दो मुनिराजों के उपदेश सुन जातिस्मरण होने पर व्रतों को धारण किया तथा सन्यास धारण किया जिसके प्रभाव से सौधर्म स्वर्ग में सिंह केतु नाम का देव हुआ। आगे आने वाले भवों में चक्रवर्ती आदि की विभूति का उपभोग कर जम्बूद्वीप में नंद नाम का राजपुत्र हुआ। प्रोष्ठिल नाम के मुनिराज से दीक्षा ले सोलह कारण भावना भाते हुए महापुण्य तीर्थकर प्रकृति का बंध किया फिर आयु के अंत में आराधना पूर्वक मरण कर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में इन्द्र हुआ। वहां से च्युत होकर अंतिम तीर्थकर भगवान महावीर हुआ। भगवान महावीर का जन्म वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर राज्य के काश्यप गोत्रीय नाथ वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और त्रिशला रानी के आँगन में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के शुभ दिन हुआ। बालक सौभाग्यशाली, अत्यन्त सुन्दर, बलवान, तेजस्वी, मुक्तिगामी जीव था। सौधर्म इन्द्र ने सुमेरू पर्वत पर भगवान बालक का अभिषेक करने के बाद 'वीर' नाम रखा। जन्म समय से ही पिता सिद्धार्थ का वैभव, यश, प्रताप, पराक्रम और अधिक बढ़ने लगा। इस कारण उस बालक का नाम वर्द्धमान भी पड़ा। राजकुमार वर्द्धमान असाधारण ज्ञान के धारी थे। संजयन्त और विजयन्त नामक दो मुनि अपनी तत्व विषयक कुछ शंकाओं को लिए आकाश मार्ग से गमन कर रहे थे तभी बालक वर्द्धमान को देखते ही उनको समाधान प्राप्त हो जाने से उन्होंने उस बालक का नाम 'सन्मति' रखा। एक दिन कुण्डलपुर में एक बड़ा हाथी मदोन्मत्त होकर गजशाला से बाहर निकल भागा। वह मार्ग में आने वाले स्त्री पुरुषों को कुचलता हुआ नगर में उथल-पुथल मचाते हुए घूम रहा था। जिससे जनता भयभीत हो प्राण बचाने हेतु इधर-उधर भागने लगी। तब वर्द्धमान ने निर्भय हो हाथी को वश में कर मुट्ठियों के प्रहार से उसे निर्मद बना दिया। तब जनता ने बालक की वीरता से प्रसन्न हो बालक को 'अतिवीर' नाम से सम्मानित किया। वर्द्धमान एक बार मित्रों के साथ खेल रहे थे तभी संगम नामक देव विषधर का रूप धरकर आया। जिसे देखकर सभी मित्र डर के मारे भाग गये। परन्तु वर्द्धमान सर्प को देख रंच मात्र भी नहीं डरे, अपितु निर्भयता से उसी के साथ खेलने लगे। तब देव प्रकट होकर भगवान की स्तुति करने लगा एवं उनका नाम 'महावीर' रखा। जब वर्द्धमान यौवन अवस्था को प्राप्त हुए। तब माता-पिता ने वर्द्धमान का विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ करने का निर्णय लिया। अपने विवाह की बात जब महावीर को ज्ञात हुई तो उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। गृहस्थ जीवन के बंधन में न फंसते हुए तीस (30) वर्ष की यौवनावस्था में स्वयं ही दिगम्बर दीक्षा अंगीकार की। बारह वर्ष तक मौन पूर्वक साधना करते हुए व्यालीस (42) वर्ष की अवस्था में केवलज्ञान प्राप्त किया फिर लगभग तीस (30) वर्ष तक भव्य जीवों को धर्मोपदेश देते हुए बहात्तर (72) वर्ष की आयु में कार्तिक वदी अमावस्या के ब्रह्ममुहूर्त में (सूर्योदय से कुछ समय पहले) पावापुर ग्राम के सरोवर के मध्य से निवाण को प्राप्त किया। भगवान महावीर का शेष परिचय गर्भ - तिथी - आषाढ़ शुक्ल ६ जन्म - तिथी - चैत्र शुक्ल १३ दीक्षा - तिथी - मार्ग कृष्ण १० केवलज्ञान - तिथी वैशाख शुक्ल १० उत्सेध/वर्ण - ७ हाथ/ स्वर्ण वैराग्य कारण - जाति स्मरण दीक्षोपवास - बेला दीक्षावन/वृक्ष - नाथवन/साल वृक्ष सहदीक्षित - अकेले सर्वऋषि संख्या - २४,००० गणधर संख्या - ११ मुख्य गणधर - इन्द्रभूत आर्यिका संख्या - ३६,००० तीर्थकाल - २९,०४२ वर्ष यक्ष - गुहयक यक्षिणी - सिद्धायिनी योग निवृत्तिकाल - दो दिन पूर्व केवलज्ञान स्थान - ऋजुकूला चिहन - सिंह समवशरण में श्रावक संख्या - १ लाख श्राविका - ३ लाख मुख्य श्रोता - श्रेणिक विशेष - केवलज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात् गणधर के अभाव में छयासठ (६६) दिन तक भगवान महावीर की दिव्य ध्वनि नहीं हुई। जिस दिन भगवान महावीर की प्रथम देशना हुई भी उसे वीर शासन जयन्ती के रूप में (श्रावण कृ. १) मनाते हैं।
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    03 अनासक्त महायोगी [Anasakt Mahayogi hindi.pdf] द्र्श्तियों में भी परिवर्तन आता हैं | कई युगद्रष्टा जन्म लेते हैं | अनेको की सिर्फ स्मर्तियाँ शेष रहेती हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व अपनी अमर गाथाओं को चिरस्थाई बना देते हैं | उन्ही महापुरुषों का जीवन स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता हैं | आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के सम्पूर्ण जिवंव्र्त पर आधारित चम्पू महाकाव्य का हिंदी अनुवाद |
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    जिसे सर्वत्र बुरा कहा जाता है ऐसा कार्य पाप कहलाता है। वे कितने होते हैं एवं उनका फल क्या है, इसका वर्णन इस अध्याय में है | पाप के बारे में इतना याद रखाना है कि पाप और पारा कभी पचता नहीं है। 1. पाप किसे कहते हैं एवं कितने होते हैं ? जिस कार्य के करने से इस लोक में एवं परलोक में अनेक प्रकार के दु:खों को सहन करना पड़ता है और निंदा एवं अपयश को सहन करना पड़ता है, उसे पाप कहते हैं। पाप 5 होते हैं - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह। 2. पाप की शाब्दिक परिभाषा क्या है ? "पाति रक्षति आत्मानं शुभादिति पापम्"। "तदसट्टेद्यादि'। जो आत्मा को शुभ से बचाता है, वह पाप है। जैसे - असातावेदनीय आदि। 3. हिंसा किसे कहते हैं ? मन, वचन, काय से किसी भी प्राणी को मारना, दु:ख देना हिंसा कहलाती है एवं स्वयं का घात करना भी हिंसा कहलाती है। 4. हिंसा कितने प्रकार की होती है ? हिंसा चार प्रकार की होती है - संकल्पी हिंसा, आरम्भी हिंसा, उद्योगी हिंसा एवं विरोधी हिंसा। संकल्पी हिंसा - संकल्प पूर्वक किसी भी प्राणी को मारने का भाव करना यह संकल्पी हिंसा है। संकल्प करने के बाद जीव मरे या न मरे पाप अवश्य ही लगता है। किसी जीव की बलि चढ़ाना, पुतला दहन करना, काष्ठादि में बने चित्रों को मारना, चिड़िया आदि आकार के गोली बिस्कुट खाना, बूचड़खाने की हिंसा, कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करना, वीडियो गेम में चिड़िया को मारना, लक्ष्मणरेखा, मच्छर मारने के बेट आदि का प्रयोग करना, एन्टी पेस्ट इमल्सन कराना संकल्पी हिंसा है। आरम्भी हिंसा - गृहस्थ को भोजन बनाने के लिए पानी भरना, अग्नि जलाना, हवा करना, वनस्पति छीलना, बनाना। घर की सफाई करना, शरीर की सफाई करना, वस्त्र की सफाई करना आदि में षट्काय जीवों की विराधना होती है। यह आरम्भी हिंसा कहलाती है। श्रावक के लिए यह हिंसा क्षम्य है, किन्तु विवेक पूर्वक करें। उद्योगी हिंसा - श्रावक का जीवन धन के बिना नहीं चल सकता है। धन प्राप्ति के लिए वह खेती, व्यापार, सरकारी सेवा आदि कार्य करता है। इसमें जो हिंसा होती है, वह उद्योगी हिंसा है, यह भी श्रावक के लिए क्षम्य है। उद्योगी हिंसा एवं हिंसा के उद्योग में स्वर्ग-पाताल का अंतर है। बूचड़खाने, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि के करने में महापाप है, इसे उद्योगी हिंसा में नहीं ले सकते हैं। यह संकल्पी हिंसा है। विरोधी हिंसा - स्वयं की रक्षा, परिवार की रक्षा, समाज की रक्षा, संस्कृति की रक्षा, धर्म आयतनों की रक्षा एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए, किसी से युद्ध करना पड़ता है और युद्ध में कोई मर भी जाता है,तो वह विरोधी हिंसा है। जैसे - लक्ष्मण ने रावण को मारा था। यह हिंसा भी श्रावक के लिए क्षम्य है। श्रावक का मात्र संकल्पी हिंसा का त्याग होता है। आरंभी, उद्योगी एवं विरोधी हिंसा का नहीं। 5. हिंसा का समीकरण क्या है ? हिंसा न करते हुए हिंसक - जैसे - धीवर मछली पकड़ने गया। एक भी मछली जाल में नहीं फंसी फिर भी वह हिंसक कहलाएगा। कोई किसी को मारने के उद्देश्य से निकला और वह व्यक्ति नहीं मिला तो भी मारने का पाप लगेगा। हिंसा हो जाने पर भी हिंसक नहीं - जैसे - डॉक्टर रोगी का ऑपरेशन कर रोगी को बचाना चाह रहा था, किन्तु वह मरण को प्राप्त हो गया फिर भी डॉक्टर हिंसक नहीं। इसी प्रकार ईयसमिति से चलता साधु, फायर ब्रिगेड की गाड़ी, एम्बुलेंस आदि। हिंसा एक करे - फल अनेक भोगते हैं - बलि एक व्यक्ति चढ़ा रहा है, हजारों उसकी अनुमोदना (प्रशंसा) कर रहे हैं। सबको पाप लगेगा और सामूहिक पाप का फल भूकम्प, बाढ़, ट्रेन, प्लेन दुर्घटना में हजारों का मरण होना। इसी प्रकार पशु-पक्षियों की लड़ाई में आनंद मानना, पुतला दहन में आनंद मानना आदि । बहुत से हिंसा करें किन्तु फल एक को - एक राज्य का स्वामी दूसरे राज्य पर आक्रमण करके उसके साथ युद्ध छेड़ देता है। हजारों सैनिक एक-दूसरे को मारते हुए मर जाते हैं। सबका पाप राजा को लगेगा, सैनिक तो केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए शस्त्र चलाते हैं। विवाह में जो भी आरम्भ होता है, उसका पाप दूल्हा एवं दुल्हन को लगता है। कार्य वही किन्तु परिणामों में अंतर - पहले कोई आलू-प्याज खाता था एवं स्वयं बनाता भी था।उसने अब आलू-प्याज खाना बंद कर दिया, किन्तु परिवार के लिए बनाना पड़ता है, मजबूरी है। पहले कषाय तीव्र थी, अब मंद कषाय है। 6. हिंसा किन-किन कारणों से होती है ? हिंसा मुख्य चार कारणों से होती है क्रोध के कारण - जैसे-द्वीपायन मुनि को क्रोध आने के कारण द्वारिका भस्म हो गई थी। तोताराजा की कहानी। सर्प - नेवला-बेटा, महिला की कहानी आदि। मान के कारण - भरतचक्रवर्ती ने बाहुबली पर चक्र चला दिया। माया के कारण - 1. कई ऐसे व्यक्ति मिलेंगे धन के कारण बालक का अपहरण किया था। पकड़ने के डर से लोग क्या कहेंगे हमारा मायाचार जान लेंगे इस कारण उसे मार देते हैं। 2. स्त्री का दुराचार ज्ञात हो गया तो पति वैराग्य धारण की बात घर में कहता है। स्त्री समझ जाती है, मेरा दुराचार ज्ञात हो गया। इससे दीक्षा ले रहे हैं। वह सोचती ये मेरा मायाचार प्रकट कर देंगे। अत: भोजन में विष मिला देती है और वही भोजन पति को दे देती है। जिससे पति का मरण हो जाता है। 3. गर्भपात भी मायाचार के कारण होता है। लोभ के कारण - पाण्डवों को लाक्षागृह में बन्द कर दिया और वहाँ आग लगा दी। भले ही वे सुरंग से निकल गए। बूचड़खाने में जो हिंसा हो रही है, वह भी लोभ के कारण हो रही है। 7. हिंसा त्याग का फल क्या होता है ? खदिरसार भील (राजा श्रेणिक के जीव ने) मात्र कौवे के माँस का त्याग किया था। जिसके कारण अगले ही भव में तीर्थंकर पद को प्राप्त करने वाला होगा। यमपाल चाण्डाल ने भी एक दिन (चतुर्दशी) के लिए हिंसा का त्याग करके स्वर्गीय सम्पदा को प्राप्त किया था। 8. हिंसा करने का क्या फल है ? हिंसा ही दुर्गति का द्वार है,पाप का समुद्र है तथा माँसभक्षी जीव नरकों के दुखों को भोगते हैं एवं यहाँ भी जेल आदि में यातनाओं को सहन करते हैं। (ज्ञा, 8/17-18) 9. झूठ पाप किसे कहते हैं ? आँखों से जैसा देखा हो, कानों से जैसा सुना हो वैसा नहीं कहना झूठ है, जिससे किसी का जीवन ही चला जाए, ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए एवं अंधे से अंधा, चोर से चोर, डाकू से डाकू कहना भी असत्य (झूठ) है। क्योंकि अंधे से अंधा कहने में उसे पीड़ा होती है। किसी ने कहा है - अंधे से अंधा कहो, तुरतई परहै टूट। धीरे-धीरे पूछ लो, कैसे गई है फूट॥ 10. झूठ बोलने के क्या-क्या कारण हैं ? अज्ञान, क्रोध, लोभ, भय, मान, स्नेह आदि के कारण झूठ बोला जाता है। लोभ - सत्यघोष नामक पुरोहित लोभ के कारण झूठ बोलता था। स्नेह - गुरु पत्नी से स्नेह होने के कारण राजा वसु झुठ बोला था। गुरु क्षीरकदम्ब का पुत्र पर्वत, सेठ का पुत्र नारद और राजा का पुत्र वसु की कहानी। 11. झूठ बोलने का फल क्या होता है ? सत्यघोष ने झूठ बोला। यहाँ अपमान को सहन किया और अब नरकों के दु:खों को सहन कर रहा है। 12. चोरी पाप किसे कहते हैं ? दूसरों की रखी हुई, गिरी हुई, भूली हुई अथवा नहीं दी हुई वस्तु को लेना या लेकर के दूसरों को देना चोरी कहलाती है। दस प्राण तो सभी जानते हैं, किन्तु 11 वाँ प्राण अन्न है। अन्न के बिना प्राण ठहरते नहीं है। अत: उसे भी प्राण कहा है। अन्न धन से प्राप्त होता है, अत: धन को बारहवाँ प्राण कहा है। अत: किसी के धन की चोरी करने का अर्थ है, उसके प्राण ही ले लेना। 13. चोरी करने के क्या कारण हैं ? गरीबी के कारण, धनवान बनने के लिए एवं कोई धनवान न रहे गरीब हो जाए, इन तीन कारणों से जीव चोरी करता है। 14. चोरी करने का क्या फल है ? जब पकड़े जाते हैं तो अनेक प्रकार के दण्ड भोगने पड़ते हैं और कभी किसी को फाँसी भी हो जाती हैं एवं परलोक में नरक आदि के दु:खों को सहन करना पड़ता है। 15. कुशील पाप किसे कहते हैं ? जिनका परस्पर में विवाह हुआ है, ऐसे स्त्री-पुरुष का एक दूसरे को छोड़कर अन्य स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध रखना कुशील कहलाता है एवं गालियाँ देना भी कुशील पाप कहलाता है। 16. कुशील पाप क्यों होता है ? एक तो चारित्रमोहनीय का तीव्र उदय, दूसरा इन्द्रिय सुख मिले, इस कारण यह कुशील पाप होता है। 17. कुशील पाप का क्या फल है ? परस्त्री सेवन करने वालों को नरकों में लोहे की गर्म - गर्म पुतलियों से आलिंगन करवाया जाता है एवं यहाँ एड्स जैसी बीमारी भी इसी कारण से होती है। 18. परिग्रह पाप किसे कहते हैं ? क्षेत्र - वास्तु, हिरण्य - सुवर्ण, धन - धान्य, दासी - दास, और कुष्य - भाण्ड इन पदार्थों में मूच्छ (तीव्र लालसा) रखना परिग्रह पाप है। 19. परिग्रह क्यों इकट्ठा करते हैं ? दुनिया में सबसे बड़ा व्यक्ति बनूँ इस भावना को लोग परिग्रह को इकट्ठा करते हैं। 20. परिग्रह के बिना श्रावक का कैसे जीवनयापन होगा ? जितना आवश्यक है, उतना रखना तो ठीक है। कुछ ज्यादा भी रखते हैं तो समय पर राष्ट्र, धर्म, साधर्मी के लिए दान देना, यह तो संचय कहलाएगा, किन्तु आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करना परिग्रह है। 21. परिग्रह पाप का क्या फल है ? बहुत परिग्रह जब नष्ट होता है तब मानव आकुल - व्याकुल हो जाता है एवं जब सरकार की ओर से छापे पड़ते हैं तब धन भी चला जाता है और बदनामी भी होती है एवं बहुत परिग्रह वाला नरक आयु का भी बंध करता है। 22. पाँच पापों में प्रसिद्ध होने वालों के नाम बताइए ? हिंसा पाप में धनश्री नाम की सेठानी, झूठ पाप में सत्यघोष नाम का पुरोहित, चोरी पाप में एक तापसी, कुशील पाप में यमदण्ड नाम का कोतवाल और परिग्रह पाप में श्मश्रुनवनीत नामक वणिक प्रसिद्ध हुए। (रक.श्रा., 65)
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