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  1. संयम स्वर्ण महोत्सव

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  2. Vidyasagar.Guru

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Showing content with the highest reputation on 01/10/2019 in all areas

  1. 1 point
  2. 1 point
    अमूल्य का अर्थ स्पष्ट है, जिसका कोई मूल्य नहीं आंका जा सकता उसे अमूल्य कहते हैं। अमूल्य वस्तु को पाना बहुत दुर्लभ होता है उसका समीचीन उपयोग कर पाना और ही दुर्लभ हुआ करता है। संसार में प्रत्येक वस्तु का मूल्य हो सकता है लेकिन जिनके माध्यम से संसार सागर से पार उतरने की कला सीखी जाती हो वह तो अमूल्य ही होता है देव-शास्त्र-गुरु हमारे आराध्य हैं और पूज्यनीय हैं। इसलिए वे हमारे लिए हमेशा अमूल्य ही हैं। जहाँ पर श्रद्धा जुड़ जाती है, अपनत्व होता है, वहाँ कीमत कोई वस्तु नहीं रह जाती है, वह अमूल्य हो जाता है। उनके सामने तो संसार की सारी संपत्ति तृण के समान प्रतीत होती है। आज शास्त्र (ग्रंथ) पर मूल्य/कीमत डाली जाती है जो कि शास्त्र का मूल्य कम कर देती है, अमूल्य जिनवाणी पर कभी भी मूल्य नहीं डालना चाहिए। परम पूज्य आचार्य गुरुदेव ने एक दिन जिनवाणी की विनय कैसे करना चाहिए विषय को समझाते हुए कहा - कि जिसको हम पूज्य मानते हैं उसका व्यवसाय नहीं करना चाहिए। "जिनवाणी पर मूल्य नहीं लिखा जाना चाहिए"। जैसा माँ के प्रति बहुमान होता है, उससे भी ज्यादा बड़कर जिनवाणी माँ के प्रति आदर/बहुमान होना चाहिए। पूज्य गुरुदेव की इस बात से हमें यह शिक्षा लेना चाहिए कि, कभी-भी कोई भी पुस्तक हो, धार्मिक ग्रंथ हो उस पर मूल्य नहीं डालना चाहिए। कभी भी इन शास्त्र आदि उपकरणों का व्यवसाय नहीं करना चाहिए। श्रद्धा के साथ इनकी विनय करना चाहिए तभी हम इनसे समीचीन फल प्राप्त कर सकते हैं एवं अपनी श्रद्धा को सुरक्षित रख सकते है। क्योंकि अमूल्य पर मूल्य डालना अमूल्य का मूल्य नहीं समझना है। (10.01.2001, छपारा)
  3. 1 point
    गति का स्वरूप - गति नाम कर्म के उदय से संसारी जीव जिस अवस्था विशेष को प्राप्त करते हैं उसे गति कहते हैं। मैं मनुष्य हूँ मैं देव हूँ आदि इस प्रकार की अनुभूति जिस कर्म का फल है वह गतिनाम कर्म है। गति के भेद - गतियाँ चार होती है - नरक गति, तिर्यञ्च गति, मनुष्य गति और देवगति। नरक गति – हिंसादि पाप कर्मों के फलस्वरूप दु:ख भोगने हेतु जीव की प्राप्त अवस्था विशेष नरक गति है। इस गति में रहने वाले नारकी एक क्षण के लिए भी सुख प्राप्त नहीं करते, निरन्तर क्षेत्र जनित, शारीरिक, मानसिक और असुरकृत दु:खों को यथावसर अपनी पर्याय के अन्तसमय पर्यन्त भोगते रहते हैं। नरक गति को प्राप्त जीव रत्नप्रभा आदि सात पृथ्वियों में बनें ८४ लाख बिलों में रहते हैं। जिसमें ८२,२५,००० बिल अत्यधिक उष्ण (गरम) एवं १,७५,००० बिल अत्यधिक शीत (ठंड) प्रकृति वाले होते हैं। तिर्यञ्च गति – मायाचार रूप परिणामों से उपार्जित पाप तथा हिंसादि पाप के फलों को भोगने हेतु प्राप्त जीव की अवस्था विशेष तिर्यञ्च गति कहलाती है। तिर्यञ्च गति में एकेन्द्रिय से लेकर पञ्चेन्द्रिय तक के जीव होते हैं अर्थात पत्थर, पानी, हवा, अग्नि तथा पेड़- पौधे इत्यादि सभी एकेन्द्रिय जीव तिर्यञ्च गति के हैं। इस गति में जीवों के पास प्रतिकार करने की क्षमता का अभाव होने पर उन्हे अनेक प्रकार के सर्दी, गर्मी, भूख - प्यास आदि के कष्टों को सहन करना पड़ता है तिर्यच्चों के दु:खों को करोड़ों जिहवा के द्वारा भी कहना शक्य नहीं है। मनुष्य गति - व्रत रहित जीव के सरल परिणाम, कम आरंभ परिग्रह से उत्पन्न शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त जीव की अवस्था विशेष मनुष्य गति कहलाती है। इस गति में पुरुषार्थ की मुख्यता रहती है यह गति जंक्शन के समान है, जीव यहाँ से सभी गतियों में जा सकता है तथा कर्म काट कर मोक्ष भी जा सकता हैं। मनुष्य गति मिलना अन्य गतियों की अपेक्षा दुर्लभ है। देव भी मनुष्य बनने के लिए तरसते हैं। देवगति - मोक्ष प्राप्ति के योग्य पुरुषार्थ की कमी होने पर देव - पूजा, दान व्रतादि से उत्पन्न विशेष पुण्य फलों को भोगने हेतु प्राप्त जीव की अवस्था विशेष देव गति है। आणिमादि आठ गुणों से नित्य क्रीड़ा करते रहते हैं, और जिनका प्रकाशमान, अत्यन्त सुंदर, धातु - उपधातु से रहित दिव्य शरीर है वे देव कहे जाते हैं। इस गति में सुख की बहुलता रहती है, भूख प्यास आदि की बाधा अत्यल्प होती है। सबकुछ भोगोपभोग सामग्री पूर्व पुण्य के उदय से स्वयमेव मिल जाती है किसी प्रकार की मेहनत/परिश्रम नहीं करनी पड़ती। पाँच इन्द्रियों के विषयों के योग्य भोग सामग्री पर्यात होती है किन्तु आयु पूर्ण होने पर यह सब वैभव छूट जाता है। जीवों की गति अगति - नरक गति के जीव मरणकर मनुष्य व तिर्यञ्च गति में ही जन्म लेते हैं देव गति व नरकगति में नहीं। इसी प्रकार देवगति के जीव भी मरणकर मनुष्य व तिर्यच्च गति में ही जन्म लेते हैं अन्य गतियों में नहीं। विशेषता इतनी है कि देव मरणकर पृथ्वी कायिक, जल कायिक और वनस्पति कायिक एकेन्द्रिय पर्याय में भी जन्म ले सकते हैं। किन्तु नारकी नहीं। नारकी नियम से संज्ञी पऊचेन्द्रिय पर्याय में ही जन्म लेता है। तिर्यञ्च व मनुष्य गति के जीव चारों गतियों में जन्म ले सकते है विशेषता इतनी है एकेन्द्रिय से लेकर चार इन्द्रिय तक के जीव मरणकर मनुष्य व तिर्यञ्च इन दो गतियों में ही जन्म ले सकते हैं देवगति व नरकगति में नहीं जा सकते। एकेन्द्रिय वायुकायिक एवं अग्निकायिक जीव मरणकर तिर्यञ्च गति में ही जन्म ले सकते हैं अन्य गतियों में नहीं। मनुष्य गति का जीव ही कर्मों का पूरी तरह क्षय कर मुक्ति प्राप्त कर सकता है अन्य गति के जीव नहीं। गृहस्थ के योग्य '' षट्-कर्म" असिकर्म - तलवार, तीर, कमान, बंदूक, तोप, भाला आदि के द्वारा प्रजा की रक्षा करने का कार्य असि कर्म कहलाता है। असिकर्म करने वाले के मन में जीवों की रक्षा का उद्देश्य होने से यह कर्म निन्द्य नहीं माना जाता है। श्री ऋषभदेव, श्री शान्तिनाथ, श्री रामचन्द्र आदि असिकर्म करते थे। सैनिक, सुरक्षा बल, पुलिस आदि का कार्य भी असिकर्म कहा जा सकता है। मसि कर्म - द्रव्य अर्थात् रुपये-पैसे की आमदनी खर्च आदि के लेखन का कार्य अर्थात् मुनीमी करना, मसि कर्म कहलाता है। सी.ए., सेल्स टेक्स, इन्कमटेक्स के वकील मसि कर्म वाले माने जा सकते है। कृषि कर्म - हल, कुलिश, दन्ताल आदि कृषि उपकरणों के उपयोग की विधी को जानकर, कृषि कार्य करना कृषि कर्म कहलाता है। यद्यपि कृषि कार्य में त्रस जीवों की हिंसा होती है तदपि कृषक के मन में सभी जीवों के पेट भरे रहे, सभी सुखी रहें ऐसी सद्भावना होने से कृषि कार्य को निन्द्य नहीं माना। अपितु कृषि को उत्तम कार्य कहा गया है। आचार्य श्री शान्तिसागर जी, विद्यासागर जी के गृहस्थाश्रम में कृषि कार्य ही मुख्यता से किया जाता था। शिल्प कर्म - धोवी, नाई, लुहार, कुल्हार, सुनार आदि अनेक प्रकार के वस्त्राभूषण, हथियार आदि बनाते हैं उनके इस कर्म को शिल्प कर्म कहते हैं। मकान बनाना, महल बनाना, पुल बनाना, मशीन, यंत्र आदि बनाना भी शिल्प कर्म है। सेवा अथवा विद्या कर्म - लेखन, गणित, चित्रादि पुरुष की बहत्तर कलाओं को विद्याकर्म कहते हैं। लेखक, कवि पत्रकार, टाइप राइटर आदि का कार्य विद्या कर्म है इसी प्रकार से शिक्षक, प्रशासनिक सेवा आदि का कार्य भी सेवा कर्म माना जाता है। वाणिज्य कर्म - चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थ, घी, तेल, धान्यादि, कपास, वस्त्र, हीरे, मोती, सोना चांदी इत्यादि अनेक प्रकार के द्रव्यों का संग्रह कर उन्हें बेचना 'वाणिज्य कर्म' कहलाता है। इसमें सभी प्रकार का लेन-देन रूप व्यापार सम्मिलित होता है। कुछ क्रूर व्यापार (खर कर्म) ग्रन्थों में कहे गये है ये कर्म प्राणियों को दु:ख देने वाले होने से त्यागने योग्य है। अर्थात दयाभाव रखने वाले जैन श्रावकों को यह कार्य नहीं करना चाहिए। जैसे - ईट के, चूने के भट्टे लगवाना गोबर गैस प्लान्ट लगवाना, सेप्टिक टैंक बनवाना, हीटर आदि अग्नि उत्पादक यंत्रो का निर्माण करना, पटाखे बम बारुद की चीजें बनाना एवं बेचना, कीट नाशक दवांए जहर आदि बेचना, वन में पते आदि जलाने का ठेका लेना, बारुद द्वारा पहाड़ों को तुड़वाना, दास दासियों का व्यापार, गर्भपात की दवाई तथा खून मांस से उत्पन्न दवाईयां बेचना, लाख, शहद, शराब, हाथीदांत, नशीले पदार्थ, मक्खन आदि का व्यापार, बैल आदि पशुओं के नाक कान आदि छेदने का व्यापार, चमड़े की वस्तुओं का व्यापार। इसके अलावा कुछ छुद्र कर्म भी माने है जिन्हें श्रावक न करे जैसे, जूते-चप्पल का व्यापार, बालों के कटिंग की दुकान, हिसंक प्राणियों (कुत्ते बिल्ली आदि) का पालन पोषण करना, इनको बेचना।
  4. 1 point
    तत्वों पर यथार्थ श्रद्धान नही होना ही मिथ्यात्व है अथवा सच्चे देव, शास्त्र, गुरू पर श्रद्धान न करना या झूठे देव, शास्त्र गुरु का श्रद्धान करना मिथ्यात्व है। विपरीत या गलत धारणा का नाम मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के उदय से जीव को सच्चा धर्म नही रुचता है। जैसे-पित्त के रोगी को दूध भी कड़वा लगता है। मिथ्यात्व के दो भेद होते हैं- गृहीत एवं अगृहीत। गृहीत मिथ्यात्व - पर के उपदेश आदि से कुदेवादि में जो श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है, उसे गृहीत मिथ्यात्व कहते हैं। अगृहीत मिथ्यात्व - अनादिकाल से किसी के उपदेश के बिना शरीर को ही आत्मा मानना व पुत्र, धन आदि में अपनत्व करना, अगृहीत मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के पाँच भेद भी होते हैं। विपरीत - जीवादि पदार्थों में विपरीत मान्यता एवं अधर्म को धर्म मानना ही विपरीत मिथ्यात्व है। जैसे - शरीर को ही आत्मा मानना। एकान्त - जीवादि पदार्थों में पाये जाने वाले अनेक धर्मों में से एक धर्म को ही स्वीकार करना एकान्त मिथ्यात्व है। जैसे पदार्थको नित्य मानना । विनय - सच्चे देव, शास्त्र, गुरु, एवं अन्य मिथ्या देव, शास्त्र, गुरु, को समान मानना विनय मिथ्यात्व है। जैसे अरिहंत देव तथा अन्य देवों की समान विनय करना। संशय - सद्-असद् धर्म में सच्चे धर्म का निश्चय नही होना संशय मिथ्यात्व है। जैसे स्वर्ग-नरक होते भी हैं या नहीं। अज्ञान - जीवादि पदार्थों के समझने का प्रयास न करना अज्ञान मिथ्यात्व है। अथवा पुण्य पाप का ज्ञान ही नहीं होना । जैसे रात्रि में भोजन करने से पाप का बंध होता है अथवा नहीं। सच्चे देव-शास्त्र-गुरु को छोड़कर अन्य कुदेव में देव बुद्धि, कुशास्त्र में शास्त्र बुद्धि, कुगुरु में गुरु बुद्धि एवं अधर्म में धर्म बुद्धि का होना 'मूढ़ता' मानी जाती है। इन मूढ़ताओं से युक्त व्यक्ति मिथ्यादृष्टि माना जाता है। इन कुदेव आदि का सहारा पत्थर की नाव के समान संसार समुद्र में डुबाने वाला, घोर दु:खों का कारण है। अत: मूढ़ताओं का संक्षित स्वरूप भी कहा जाता है। देव-मूढ़ता- जो राग-द्वेष रूपी मल से मलीन (रागी-द्वेषी) है और स्त्री, आभूषण, गदा, तीर-कमान आदि अस्त्र शस्त्र रूप चिह्नों से जिनकी पहचान होती है, वे कुदेव हैं। वीतराग सर्वज्ञ देव के स्वरूप को न जानते हुए ख्याति, लाभ, पूजा की इच्छा से अथवा भय से कुदेवताओं की आराधना करना देव-मूढ़ता है। लोक मूढ़ता - धर्म समझकर गंगा-जमुना आदि नदियों में स्नान करना, बालू पत्थर आदि का ढेर लगाना, पर्वत से गिरकर मरना, अग्नि में जल जाना, पृथ्वी, अग्नि, वट वृक्ष, पीपल, तुलसी आदि की पूजा करना लोक मूढ़ता है। धर्म मूढ़ता - जो राग-द्वेष रूप भाव हिंसा सहित तथा त्रस स्थावर जीवों के घात स्वरूप द्रव्य हिंसा से सहित संसार वर्धक क्रियाएं हैं, उन्हें कुधर्म कहते हैं। ऐसे कुधर्म में धर्म बुद्धि, आस्था होना धर्म मूढ़ता है। शास्त्र मूढ़ता - हिंसक यज्ञ, बलि आदि के प्ररूपक शास्त्र, महान पुरुषों को दोष लगाने वाले एवं उनके विकृत रूप को प्रदर्शित करने वाले शास्त्र कुशास्त्र हैं। कुशास्त्र में सत् शास्त्र की बुद्धि होना शास्त्र मूढ़ता है। गुरु मूढ़ता - जो भीतर से राग-द्वेषादि परिणाम रखते हैं, बाहर धन, अम्बर (वस्त्र) आभूषण धारण करते हैं तथा स्वयं को महात्मा कहते हुए अनेक प्रकार के मिथ्या भेष को धारण करते हैं कुगुरु कहलाते हैं। अज्ञानी लोगों के चित्त में चमत्कार अर्थात् आश्चर्य उत्पन्न करने वाले ज्योतिष, मन्त्रवाद आदि को देखकर वीतराग, सर्वज्ञ द्वारा कहा हुआ जो धर्म है उसको छोड़कर ख्याति लाभ-पूजा के लिए खोटा तप करने वाले, परिग्रह आरंभ और हिंसा सहित, संसार चक्र में भ्रमण करने वाले, पाखण्डी साधु, तपस्वियों का आदर, सत्कार, भक्ति पूजा आदि करना गुरु मूढ़ता है।शरीर धारी प्राणियों का मिथ्यात्व के समान अन्य कुछ अकल्याणकारी नहीं है।
  5. 1 point
    संसार में अनके प्रकार के सुख दु:ख में कारण भूत कर्म कहे गये हैं। वे कर्म आठ होते हैं- १. ज्ञानावरण, २. दर्शनावरण, ३. वेदनीय, ४. मोहनीय, ५. आयु, ६. नाम, ७. गोत्र और ८. अन्तराय। इन कर्मों का स्वभाव, फल, कर्म बंध के कारण इत्यादि का सामान्य कथन पूर्व में किया जा चुका है अब इन कर्मों के भेद-प्रभेद का कथन करते हैं। ज्ञानावरणादि आठ कर्मों को घातिया एवं अघातिया की अपेक्षा दो भागों में विभक्त किया गया है। जो आत्मा के ज्ञानदर्शनादि गुणों का घात करते हैं ऐसे ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय एवं अन्तराय कर्मों की घातिया कर्म संज्ञा है। तथा जो आत्मा के गुणों का घात तो नहीं करते किन्तु आत्मा के रूप को अन्य रूप (शरीरादि आकार) कर देते हैं ऐसे वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र कर्म की अघातिया कर्म संज्ञा है। ज्ञानावरणीय कर्म के पाँच, दर्शनावरणीय कर्म के नौ, मोहनीय कर्म के अट्ठाइस, वेदनीय कर्म के दो, आयु कर्म के चार, नाम कर्म के ब्यालीस, गोत्र कर्म के दो एवं अंतराय कर्म के पाँच भेद हैं। अत: आठ कर्मों के कुल प्रभेद5+9+28+2+4+42+2+5 = 97 हो जाते हैं। 1.ज्ञानावरण कर्म के पाँच भेद - मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधि ज्ञानावरण, मनः पर्यय ज्ञानावरण और केवल ज्ञानावरण हैं। ये कर्म क्रमश: मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय एवं केवल ज्ञान को आवृत करते हैं, ढाक देते हैं अर्थात ज्ञान होने नहीं देते। प्रथम चार कर्म ज्ञान को पूरा नहीं ढकते जबकि केवलज्ञानावरण, केवलज्ञान को पूर्ण रूप से ढक लेता है। अभव्य जीव के भी मन: पर्यय ज्ञान एवं केवलज्ञान शक्ति रूप में रहता है अत: उसके भी इनका आवरण पाया जाता है। 2.दर्शनावरण कर्म के नौ भेद - चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधि दर्शनावरण, केवलदर्शनावरण, निद्रा, निद्रा-निद्रा, प्रचला, प्रचला-प्रचला, स्त्यान्गृद्धि है। यद्यपि आवरण कर्म प्रथम चार हैं। फिर भी निद्रा आदि पाँच दर्शनोपयोग में बाधक बनते है अत: इनकी भी दर्शनावरण में गणना करने से नौ भेद कहे। नेत्र इन्द्रिय को चक्षु कहते हैं इसके अलावा शेष चार इन्द्रिय व मन को अचक्षु कहते हैं जो चक्षु ज्ञान, अचक्षुज्ञान तथा अवधिज्ञान के पूर्व होने वाले सामान्य अवलोकन को न होने दे ऐसे कर्म को क्रमश: चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण एवं अवधि दर्शनावरण कर्म कहते हैं। जो केवलज्ञान के साथ होने वाले सामान्य अवलोकन को न होने दे उसे केवल दर्शनावरण कहते हैं। मद, खेद और परिश्रम जन्य थकावट को दूर करने के लिए नींद लेना निद्रा है, निद्रावान पुरुष सुख पूर्वक जागृत हो जाता है। निद्रा पर पुन: पुन: निद्रा लेना अथवा गहरी नींद लेना, बार बार उठाने पर बहुत कठिनता से जाग पाना निद्रा-निद्रा कर्म है। बैठे-बैठे सो जाना, कुछ जागृत रहना, नेत्र और शरीर में विकार लाने वाली ऐसी क्रिया जो आत्मा को चलायमान कर दे प्रचला है। प्रचला की पुन: पुन: आवृत्ति प्रचला-प्रचला है मुंह से लार बहने लगना, हाथ पैर चलने लगना इस प्रचला-प्रचला के लक्षण है। जिसके निमित्त से जीव सोते समय भयंकर कार्य कर ले, शक्ति विशेष प्रगट हो जाये और जागने पर कुछ स्मरण न रहे स्त्यान्गृद्धि कर्म है। 3. वेदनीय कर्म के दो भेद - सातावेदनीय और असातावेदनीय हैं। जिस कर्म के उदय से देवादि गतियों में शरीर और मन सम्बन्धी सुख की प्राप्ति होती है उसे सातवेदनीय कर्म कहते है। जिस कर्म के उदय से शारीरिक-मानसिक अनेक प्रकार के दु:ख प्राप्त होते हैं वह असातावेदनीय कर्म है। 4.मोहनीयके अट्ठाईस भेद - अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध-मान-माया-लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध-मान-माया-लोभ, संज्वलन क्रोध-मान-माया-लोभ ये सोलह कषाय, हास्य-रति-अरति-शोक-भय-जुगुप्सा पुरुष वेदस्त्री वेद - नपुंसक वेद ये नौ नोकषाय एवं मिथ्यात्व-सम्यक्र मिथ्यात्व और सम्यक्त्व ये तीन - कुल अट्ठाईस है। जो कषाय सम्यक्त्व को घातती है अथवा अनन्त मिथ्यात्व के साथ जिसका अनुबन्ध-सम्बन्ध हो उसे अनन्तानुबन्धी कहते है। जो अप्रत्याख्यान - एक देश चारित्र को प्रकट न होने दे उसे अप्रत्याख्यानावरण कहते हैं। जासे प्रत्याख्यान - सकल चारित्र का घात करे उसे प्रत्याख्यानावरण कहते हैं एवं जो यथाख्यात चारित्र को प्रकट न होने दे तथा संयम के साथ प्रकाश मान रहे उसे संज्वलन कहते हैं। प्रत्येक के क्रोध-मान-माया-लोभ ये चार-चार भेद हैं कुल ये सोलह कषाय आत्मा को निरन्तर कषती रहती हैं- दु:खी करती रहती है इसलिए इन्हे कषाय वेदनीय भी कहते हैं। जिसके उदय से हँसी आवे, उसे हास्य कहते हैं। जिसके उदय से स्त्री-पुत्र आदि में प्रीति रूप परिणाम होता है उसे रति कहते हैं। जिसके उदय से शत्रु आदि अनिष्ट पदार्थों में अप्रीति रूप परिणाम होते हैं उसे अरति कहते हैं। जिसके उदय से इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोग में खेद रूप परिणाम होते हैं उसे शोक कहते हैं। जिसके उदय से भय रूप परिणाम होते हैं उसे भय कहते हैं। जिसके उदय से ग्लानि रूप परिणाम होता है उसे जुगुप्सा कहते हैं। जिसके उदय से स्त्री से रमने के भाव होते हैं उसे पुरुषवेद कहते हैं। जिसके उदय से पुरुष से रमने के भाव होते हैं उसे स्त्रीवेद कहते हैं। जिसके उदय से स्त्री तथा पुरुष दोनों से रमने के भाव हो उसे नपुंसक वेद कहते हैं। जिसके उदय से जीव की अक्तत्व श्रद्धान रूप परिणति होती है उसे मिथ्यात्व कहते हैं। जिसके उदय से मिथ्यात्व और सम्यक्त्व के मिश्रित परिणाम होते हैं उसे सम्यक मिथ्यात्व कहते हैं। जिसके उदय से क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन में चल, मलिन और अवगाढ़ दोष लगते हैं उसे सम्यक्त्व प्रकृति कहते हैं। सब तीर्थकरों की समान शक्ति होने पर भी शान्तिनाथ शान्ति के कर्ता हैं पाश्र्वनाथ रक्षा करने वाले है ऐसा भाव होना चल दोष कहलाता है। सम्यग्दर्शन में शंका-कांक्षा आदि अथवा तीन मूढ़ता आदि पच्चीस दोष लगने को मलिन दोष कहते हैं। एवं अपने द्वारा निर्मापित या प्रतिष्ठापित प्रतिमा आदि में यह मन्दिर मेरा है, यह प्रतिमा मेरी है इत्यादि प्रकार का भाव होना अवगाढ़ दोष कहलाता है। 5. आयु कर्म के चार भेद - नरकायु, तिर्यञ्च आयु, मनुष्यायु एवं देव आयु है। जिस कर्म के उदय से यह जीव निश्चित समय तक नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य और देव की पर्याय में (शरीर में) रुका रहे उसे उस पर्याय सम्बन्धी आयुकर्म कहते हैं। 6. नाम कर्म के तिरानवे भेद - नाम कर्म के पिण्ड प्रकृति की अपेक्षा ब्यालीस भेद एवं सामान्य अपेक्षा से तिरानवे भेद होते हैं। गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, आनुपूण्र्य, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छवास और विहायोगति तथा प्रतिपक्ष प्रकृतियों के साथ साधारण शरीर और प्रत्येक शरीर, स्थावर और त्रस, दुर्भग-सुभग, दुस्वर–सुस्वर, अशुभ-शुभ, बादर–सूक्ष्म, अपर्याप्त-पर्याप्त, अस्थिर-स्थिर, अनादेय-आदेय, अयशः कीर्ति, यश: कीर्ति एवं तीर्थकर ये ब्यालीस भेद हैं। गति आदि के उत्तर भेदों को मिलाने पर तिरानवे भेद हो जाते हैं। जिस कर्म के उदय से जीव भवान्तर को जाता है वह गति नाम कर्म है। यह चार प्रकार का - नरकगति, तिर्यच्च गति, मनुष्य गति एवं देव गति है। जिस कर्म के उदय से आत्मा एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय व पञ्चेन्द्रिय जाति में जन्म लेता है वह पाँच प्रकार का एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय व पञ्चेन्द्रिय जाति नाम कर्म है। जिस कर्म के उदय से जीव के शरीर की रचना होती है वह शरीर नाम कर्म है। वह पाँच प्रकार का है - औदारिक शरीर नाम कर्म, वैक्रियक शरीर नाम कर्म, आहारक शरीर नाम कर्म, तैजस शरीर और कार्माण शरीर नाम कर्म है। इन शरीरों का वर्णन आगे के अध्याय में किया जावेगा। जिस कर्म के उदय से अंग-उपांगो की रचना होती है उसे अंगोपांग नाम कर्म कहते हैं। इसके तीन भेद हैं :- औदारिक शरीर अंगोपांग, वैक्रियक शरीर अंगोपांग एवं आहारक शरीर अंगोपांग। जिस कर्म के उदय शरीर में अंग उपांगों की यथा स्थान, यथा आकार रचना होती है उसे निर्माण नाम कर्म कहते हैं। शरीर नाम कर्म के उदय से प्राप्त हुए पुद्गलों का अन्योन्य प्रदेश संश्लेष (बन्धन रूप अवस्था) जिसके निमित्त से होती है, वह बन्धन नाम कर्म हैं। औदारिक शरीरादि की अपेक्षा इसके भी पाँच भेद हो जाते हैं। जिस कर्म के उदय से शरीर के परमाणु परस्पर छिद्र रहित होकर मिले उसे संघात नाम कर्म कहते हैं। इसके भी औदारिक शरीर संघात आदि पाँच भेद हैं। जिसके उदय से शरीर की आकृति बनती है उसे संस्थान नाम कर्म कहते हैं। इसके 6 भेद हैं - 1. समचतुरस्र संस्थान, 2. न्यग्रोध परिमण्डल संस्थान, 3. स्वाति संस्थान, 4. कुब्जक संस्थान, 5. वामन संस्थान, 6. हुण्डक संस्थान। जिसके उदय से शरीर सुन्दर और सुडौल होता है उसे समचतुरस्र संस्थान कहते हैं। जिसके उदय से शरीर वट वृक्ष की तरह नीचे से पतला और ऊपर से मोटा हो उसे न्यग्रोध परिमण्डल संस्थान कहते हैं। जिसके उदय से शरीर सर्पकी वाँमी की तरह नीचे मोटा (नाभि के नीचे) तथा ऊपर पतला हो उसे स्वाति संस्थान कहते हैं। जिसके उदय से जीव का शरीरा कुबड़ा हो उसे कुब्जक संस्थान कहते हैं। जिसके उदय से शरीर बौना हो उसे वामन संस्थान कहते हैं। जिसके उदय से शरीर किसी खास आकृति का न होकर विरूप (टेढ़ा-मेढ़ा) हो उसे हुण्डक संस्थान कहते हैं। जिस कर्म के उदय से शरीर के अन्दर संहनन – हड्डी की रचना तथा अस्थियों का बन्धन विशेष होता है वह संहनन नाम कर्म है। इसके 6 भेद हैं - 1. वज़वृषभनाराच संहनन, 2. वज़नाराच संहनन, 3. नाराच संहनन, 4. अर्द्धनाराच संहनन, 5.कीलिक संहन, 6. असंप्रातासूपाटिका संहनन। जिस कर्म के उदय से वृषभ (वेष्टन) नाराच (कील) और संहनन (हड्डियाँ) वज़ की हो उसे वज़वृषभनाराच संहनन कहते हैं। जिस कर्म के उदय से वज़ के हाड़, वज़ की कीलियाँ हो परन्तु वेष्टन वज़ का न हो वह वज़ नाराच संहनन है। जिस कर्म के उदय से सामान्य वेष्टन और कीली सहित हाड़ हो उसे नाराच संहनन कहते हैं। जिसके उदय से हड्डियों की संधियाँ अर्द्धकीलित हों उसे अर्द्धनाराच संहनन कहते हैं। जिसके उदय से हड्डियाँ परस्पर कीलित हों उसे कीलक संहनन कहते हैं। और जिसके उदय से जुदी-जुदी हड्डियाँ नसों से बंधी हुई हों, परस्पर कीलित नहीं हो उसे असंप्राप्ता सृपाटिका संहनन कहते हैं। जिसके उदय से शरीर में स्निग्ध-रूक्ष आदि स्पर्श हो, उसे स्पर्श नाम कर्म कहते हैं। इसके आठ भेद हैं - 1. स्निग्ध, 2. रुक्ष, 3. कोमल, 4. कठोर, 5. हल्का, 6. भारी, 7. शीत और 8. उष्ण। जिसके उदय से शरीर में खट्टा मीठा आदि रस हो उसे रस नाम कर्म कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं - 1. खट्टा 2. मीठा, 3. कडुआ, 4. कषायला और 5. चरपरा। जिसके उदय से शरीर में सुगन्ध या दुर्गन्ध उत्पन्न हो उसे गन्ध नाम कर्म कहते हैं। इसके दो भेद हैं- 1. सुगन्ध, 2. दुर्गन्ध। जिसके उदय से शरीर में काला-पीला आदि वर्ण उत्पन्न हो उसे वर्ण नाम कर्म कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं - 1. काला, 2. पीला, 3. नीला, 4. लाल और 5. सफेद। जिसके उदय से विग्रह गति में आत्म प्रदेशों का आकार पिछले (छोड़े हुए) शरीर के आकार का हो, वह आनुपूव्र्य नाम कर्म हैं। इसके चार भेद हैं - नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य एवं देवगत्यानुपूव्र्य। जैसे कोई मनुष्य मरकर देवगति में जा रहा है तो देवगत्युनपूव्र्य कर्म के उदय से विग्रह गति में मनुष्य का आकार बना रहेगा। इसका उदय विग्रह गति में ही होता है। जिस कर्म के उदय से ऐसा शरीर प्राप्त हो जो लोहे के गोले के समान भारी और अर्क के तूल के समान हल्का न हो उसे अगुरुलघु नाम कर्म कहते हैं। जिससे उदय से अपना ही घात करने वाले अंगोपांग हो उसे उपघात नाम कर्म कहते है। जिसके उदय से दूसरों का घात करने वाले अंगोपांग हों उसे परघात नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से ऐसा भास्वर शरीर प्राप्त हो जिसका मूल ठण्डा और प्रभा उष्ण हो उसे आतप नाम कर्म कहते हैं। इसका उदय सूर्य के विमान में रहने वाले बादर पृथ्वीकायिक जीवों के होता है। जिसके उदय से ऐसा भास्वर शरीर प्राप्त हो जिसका मूल और प्रभा दोनों शीतल हों उद्योत नाम कर्म कहलाता है। इसका उदय चन्द्र विमान में रहने वाले बादर पृथ्वीकायिक तथा जुगनू आदि के होता है। जिसके उदय से श्वासोच्छवास चलता है उसे उच्छवास नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से आकाश में गमन ही उसे विहायोगति नाम कर्म कहते हैं। इसके दो भेद प्रशस्त विहायोगति और अप्रशस्त विहायोगति। इसका उदय मात्र पक्षियों के ही नहीं होता अन्य जीवों के भी होता है। जिसके उदय से ऐसा शरीर प्राप्त हो जिसका एक जीव ही स्वामी हो उसे प्रत्येक शरीर नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से ऐसा शरीर प्राप्त हो जिसके अनेक स्वामी हो। इसका उदय वनस्पति कायिक जीव के ही होता है उसे साधारण शरीर कहते हैं। जिसके उदय से द्वीन्द्रियादि जाति में जन्म हो उसे त्रस नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से एकेन्द्रिय जाति में जन्म हो उसे स्थावर नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से विशेष रूपादि गुणों से रहित होते हुए भी जीव अन्य जनों के प्रीति स्नेह का पात्र बनता है वह सुभग नाम कर्म हैं। जिसके उदय से रूपादि गुणों से सहित होते हुए भी अन्य जनों के प्रीति, स्नेह का पात्र न बन सके, लोग द्वेष ग्लानि करे वह दुर्भग नाम कर्म है। जिसके उदय से जीव को अच्छा स्वर प्राप्त होता है उसे सुस्वर नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से अच्छा स्वर न हो उसे दु:स्वर नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से शरीर के अवयव सुन्दर हो उसे शुभ नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से शरीर के अवयव सुन्दर न हो उसे अशुभ नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से ऐसा शरीर प्राप्त हो जो न किसी से रुके और न किसी को रोक सके उसे सूक्ष्म नाम कर्म कहते हैं। यह शरीर एकेन्द्रिय जीवों के ही होता है। जिसके उदय से ऐसा शरीर हो जो स्वयं किसी से रुके तथा किसी को रोक सके उस बादर नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से आहार, शरीर, इंद्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन इन छह पर्याप्तियों की यथायोग्य (पर्याय योग्य) पूर्णता हो उसे पर्याप्ति नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से एक भी पर्याप्ति पूर्ण न हो अर्थात् लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था हो उसे अपर्याप्ति नाम कर्म कहते हैं। इसका उदय सम्मूच्र्छन जन्म वाले मनुष्य और तिर्यञ्च में होता है। जिसके उदय से शरीर के धातु-उपधातु स्थिर रहें अर्थात् विशेष तप आदि करने पर शरीर कृश न हो उसे स्थिर नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से शरीर के धातु उपधातु स्थिर न रहे अर्थात् चलायमान होते रहे वह अस्थिर नाम कर्म हैं। जिसके उदय से शरीर विशिष्ट कांति से सहित होता है उसे आदेय नाम कर्म कहते है। जिसके उदय से शरीर विशिष्ट कान्ति रहित हो उसे अनादेय नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से जीव की संसार में कीर्ति विस्तृत हो उसे यशस्कीर्ति नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से जीव का संसार में अपयश विस्तृत हो उसे अयशस्कीर्ति नाम कर्म कहते हैं। जिसके उदय से जीव तीर्थकर पद को प्राप्त होता है उसे तीर्थकर नाम कर्म कहते हैं। यह प्रकृति सातिशय पुण्य-प्रकृति है। 7. गोत्र कर्म के दो भेद हैं - 1. उच्च गोत्र 2. नीच गोत्र।जिसके उदय से लोक प्रसिद्ध उच्चकुलों में जन्म होता है उच्च आचरण होता है उसे उच्चगोत्र कर्म कहते हैं। जिसके उदय से लोक निन्द्य नीच कुलों में जन्म होता है नीच आचरण होता है उसे नीच-गोत्र कर्म कहते हैं। 8. अन्तराय कर्म के पाँच भेद हैं - 1. दानान्तराय, 2.लाभान्तराय, 3. भोगान्तराय, 4. उपभोगान्तराय और 5.वीर्यान्तराय। जिस कर्म के उदय से देने की इच्छा करता हुआ भी नहीं दे पाता वह दानान्तराय कर्म है। जिस कर्म के उदय से प्राप्त करने की इच्छा रखता हुआ भी नहीं प्राप्त करता वह लाभन्तराय कर्म है। जिसके उदय से भोगने की इच्छा करता हुआ भी नहीं भोग सकता वह भोगान्तराय कर्म है। जिसके उदय से उपभोग की इच्छा करता हुआ भी उपभोग नहीं कर सकता वह उपभोगान्तराय कर्म है। जिस कर्म के उदय से उत्साहित होने की इच्छा रखता हुआ भी उत्साहित नहीं होता है वह वीर्यान्तराय कर्म है।
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    जीव का किसी विवक्षित शरीर में टिके रहने की अवधि का नाम आयु है। इस आयु का निमितभूत कर्म आयुकर्म कहलाता है। आयु कर्म से अस्तित्व से प्राणी जीवित रहता है और क्षय होने प मृत्यु के मुख में चला जाता है। मृत्यु का कोई देवता (यमराज) अथवा उस जैसी कोई अन्य शक्ति नहीं है अपितु आयु कर्म के सद्भाव और क्षय पर जन्म-मृत्यु अबलंबित है। आयु दो प्रकार की होती है - अपवर्तनीय और अनपवर्तनीय। अपवर्तनीय आयु - विष, वेदना, रक्त क्षय, शस्त्रघात, पर्वतारोहण आदि निमित्तों के मिलने पर जिस आयु की अवधि, काल की मर्यादा में कमी हो सके, उसे अपर्वनीय आयु कहते है। इसे अकाल मरण अथवा कदलीघात मरण भी कहा जाता है। अकाल मरण को प्राप्त जीव की आत्मा अपनी आयु के शेष काल तक भटकती रहती है अथवा दूसरी पर्याय में उस आयु को पूर्ण करती है ऐसा मानना सर्वथा गलत है। क्योंकि पूर्ण आयु के क्षय होने पर ही मरण होता है। विशेषता इतनी है कि अकाल मरण को प्राप्त जीव अपनी आयु को अन्तर्मुहूर्त (कुछ समय) में ही पूर्ण कर लेता है किन्तु नवीन आयु कर्म के बंधे बिना मरण संभव नही। जेसे छिद्र सहित मटके में भरा हुआ पानी बूंद-बूंद कर टपकता हुआ पानी दो घंटे में मटके को खाली कर देता है वही मटका यदि किन्ही कारणों से फूट जाये तो एक सेकंड में ही पूरा पानी बह जाता है, उसी प्रकार आत्मा में बंधे हुए आयु कर्म के निषेक क्रमक्रम से उदय में आते है किन्तु अकालमरण की अवस्था में वे एक साथ नष्ट हो/ झड़ जाते है। अत: यह भी संभव है कि एक करोड़ वर्ष की आयु को अन्तर्मुहूर्त में ही भोग कर नष्ट कर दिया जावें। अनपवर्तनीय आयु - आयु क्षय के अनेक बड़े-बड़े कारण मिलने पर भी निर्धारित आयु की मर्यादा एक क्षण को भी कम न हो उसे अनपवर्तनीय आयु कहते हैं। देव-नारकी, भोग भूमि के जीव, चरम देहधारी, तीर्थकर अनपवर्तनीय आयु वाले होते हैं। आयु कर्म का बंध सदा नहीं होता/इसके बंध का विशेष नियम है अपने जीवन की दो-तिहाई आयु व्यतीत होने पर ही आयु कर्म बंध है, वह भी अन्तर्मुहूर्त तक, इसे अपकर्ष काल कहते हैं। एक मनुष्य व तिर्यञ्च के जीवन ऐसे आठ अपकर्ष काल आते हैं जिसमें वह आयु बाँधने के योग्य होता है। इन कालों में जीव आयु का बंध कर ही लेता है अन्यथा आयु कर्म की समाप्ति के अन्तर्मुहूर्त पूर्व नियम से आगामी आयु का बंध कर लेता है। जैसे मान लिजिये किसी व्यक्ति की ८१ वर्ष की आयु हो तो वह 51 वर्ष की अवस्था तक आयु कर्म के बंध के योग्य नहीं होता। वह आयु कर्म का बंध पहली बार 51 वर्ष की अवस्था में कर सकता है यदि उस काल में न हो, तो शेष 27 वर्ष के दो तिहाई (18 वर्ष बीतने पर) यानि 72 वर्ष में आयु बंध द्वितीय बार हो सकता है। यदि इसमें भी बंध न हो पाये तो शेष बची आयु के त्रिभाग में पुन बंध काल आवेगा इसी प्रकार आठवें अपकर्ष काल में वह जीव आयु बंध कर लेता है अंतिम अपकर्ष काल 80 वर्ष 11 माह 25 दिन 13 घंटे 21 मिनट की आयु बीतने पर पड़ेगा। यदि इसमें भी आयु बंध न हो पावे तो मरण के अन्तर्मुहूर्त पूर्व आगामी आयु का बंध नियम से कर लेता है। देव, नारकी तथा भोगभूमि मनुष्य व तिर्यञ्च अपने जीवन के छह माह शेष रहने पर आयु बंध के योग्य होते हैं। इन छह माह में उनके भी आठ अपकर्ष काल होते है।
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    जीव का कभी मरण नहीं होता है, मात्र पर्याय बदलती रहती है। ऐसे जीव के भेद-प्रभेद एवं तीन प्रकार की आत्माओं का वर्णन इस अध्याय में हैं। 1. जीव किसे कहते हैं ? जिसमें चेतना पाई जाती है, जो सुख-दुख का संवेदन करता है, वह जीव है अथवा जो व्यवहार से इन्द्रिय आदि दस प्राणों के द्वारा जीता था, जी रहा है एवं जिएगा, उसे जीव कहते हैं। 2. शुद्ध जीव किसे कहते हैं ? आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने समयसार ग्रन्थ की 54 वीं गाथा में शुद्ध जीव का लक्षण इस प्रकार कहा है अरसमरूवमगंध अव्वत्तं चेदणागुण मसद्दं। जाण अलिंगग्गहण जीव मणिद्विट्ट संठाण। अर्थ - शुद्ध जीव तो ऐसा है कि जिसमें न रस है, न रूप है, न गन्ध है और न इन्द्रियों के गोचर ही है। केवल चेतना गुण वाला है। शब्द रूप भी नहीं है। जिसका किसी भी चिह्न द्वारा ग्रहण नहीं हो सकता और जिसका कोई निश्चित आकार भी नहीं है। 3. जीव के पर्यायवाची नाम कौन-कौन से हैं ? जीव के पर्यायवाची नाम निम्न हैं प्राणी - इन्द्रिय, बल, श्वासोच्छवास और आयु प्राण विद्यमान रहने से यह प्राणी कहलाता है। आत्मा - नर - नारकादि पर्यायों में 'अतति' अर्थात् निरन्तर गमन करते रहने से आत्मा कहा जाता है। जन्तु - बार-बार जन्म धारण करने से जन्तु कहलाता है। पुरुष - पुरु अर्थात् अच्छे-अच्छे भोगों में शयन करने से अर्थात् प्रवृत्ति करने से पुरुष कहा जाता है। पुमान् - अपनी आत्मा को पवित्र करने से पुमान् कहा जाता है। अन्तरात्मा - ज्ञानावरणादि आठ कमाँ के अन्तर्वर्ती होने से अन्तरात्मा कहा जाता है। ज्ञानी - ज्ञान गुण सहित होने से ज्ञानी कहा जाता है। सत्व - अच्छे - बुरे कर्मों के फल से जो नाना योनियों में जन्मते और मरते हैं, वे सत्व हैं। संकुट - अति सूक्ष्म देह मिलने से संकुचित होता है, इसलिए संकुट है। असंकुट - सम्पूर्ण लोकाकाश को व्याप्त करता है, इसलिए असंकुट है। क्षेत्रज्ञ - अपने स्वरूप को क्षेत्र कहते हैं, उस क्षेत्र को जानने से यह क्षेत्रज्ञ है। विष्णु - प्राप्त हुए शरीर को व्याप्त करने से विष्णु है। स्वयंभू - स्वतः ही उत्पन्न होने से स्वयंभू है। शरीरी - संसार अवस्था में शरीर सहित होने से शरीरी है। 4. जीव के कितने भेद हैं ? जीव के दो भेद हैं संसारी जीव - जो चार गति रूप संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं, वे संसारी जीव हैं। मुक्त जीव - आठ कर्मों से रहित जीवों को मुक्त जीव कहते हैं। 5. संसारी जीव के कितने भेद हैं ? संसारी जीव के दो भेद होते हैं त्रस - जिनके त्रस नाम कर्म का उदय है, वे त्रस जीव कहलाते हैं। स्थावर - जो अपनी रक्षा के लिए भाग-दौड़ न कर सकें। अथवा जिनका स्थावर नाम कर्म का उदय होता है, वे स्थावर कहलाते हैं। 6. त्रस जीव के कितने भेद हैं ? त्रस जीव के चार भेद हैं - दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय एवं पाँच इन्द्रिय। 7. दो इन्द्रिय जीव किसे कहते हैं ? जिसके स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियाँ होती हैं, उसे दो इन्द्रिय जीव कहते हैं। जैसे - लट, केंचुआ, जोंक, सीप, कौडी, शंख आदि। 8. तीन इन्द्रिय जीव किसे कहते हैं ? जिसके स्पर्शन, रसना और घ्राण ये तीन इन्द्रियाँ होती हैं, उसे तीन इन्द्रिय जीव कहते हैं। जैसे - चींटी,खटमल, बिच्छु, घुन, गिंजाई आदि। 9. चार इन्द्रिय जीव किसे कहते हैं ? जिसके स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु, ये चार इन्द्रियाँ होती हैं, उसे चार इन्द्रिय जीव कहते हैं। जैसे - भौंरा, मच्छर, टिड़ी, मधुमक्खी, मक्खी, बर्र्, ततैया आदि। 10. पाँच इन्द्रिय जीव किसे कहते हैं ? जिसके स्पर्शन, रसना, घ्राण,चक्षु और कर्ण, ये पाँच इन्द्रियाँ होती हैं, उसे पाँच इन्द्रिय जीव कहते हैं। जैसे - मनुष्य, सर्प, हाथी, घोड़ा, तोता आदि। 11. पञ्चेन्द्रिय के कितने भेद हैं ? पञ्चेन्द्रिय के दो भेद हैं संज्ञी पञ्चेन्द्रिय - जो जीव शिक्षा, उपदेश और आलाप को ग्रहण करता है। असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय - जो जीव शिक्षा, उपदेश और आलाप को ग्रहण नहीं करता है। 12. संज्ञी जीव कितनी गति में होते हैं ? संज्ञी जीव चारों गतियों में होते हैं। 13. असंज्ञी जीव कौन-सी गति में होते हैं ? असंज्ञी जीव मात्र तिर्यच्चगति में होते हैं। एकेन्द्रिय, दोइन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय तो असंज्ञी ही होते हैं एवं पञ्चेन्द्रिय में कुछ तोता एवं कुछ सरीसृप आदि असंज्ञी होते हैं। 14. स्थावर जीव के कितने भेद हैं ? स्थावर जीव के 5 भेद हैं पृथ्वीकायिक - पृथ्वी ही जिन जीवों का शरीर है, वे पृथ्वीकायिक हैं। जैसे - मिट्टी, रेत, कोयला, सोना, चाँदी, पत्थर, अभ्रक आदि। जलकायिक - जल ही जिन जीवों का शरीर है, उन्हें जलकायिक जीव कहते हैं। जैसे - जल, ओला, कुहरा, ओस आदि। अग्निकायिक - अग्नि ही जिन जीवों का शरीर है, उन्हें अग्निकायिक जीव कहते हैं। जैसे - ज्वाला, अंगार, दीपक की लो, कंडे की आग, वज़ाग्नि आदि। वायुकायिक - वायु ही जिन जीवों का शरीर है, उन्हें वायुकायिक जीव कहते हैं। जैसे - सामान्य पवन, घनवातवलय, तनुवातवलय आदि। वनस्पतिकायिक - वनस्पति ही जिन जीवों का शरीर है, वे वनस्पतिकायिक हैं। जैसे - पेड़ आदि। 15. वनस्पतिकायिक के कितने भेद हैं ? वनस्पतिकायिक के दो भेद हैं। प्रत्येक वनस्पति - जिन वनस्पतिकायिक जीवों का शरीर प्रत्येक है अर्थात् एक शरीर का स्वामी एक ही जीव है , उन्हें प्रत्येक वनस्पति कायिक कहते हैं। साधारण वनस्पति - जिन वनस्पतिकायिक जीवों का शरीर साधारण है अर्थात् एक शरीर के स्वामी अनेक जीव हैं, उन्हें साधारण वनस्पति कायिक कहते हैं। इनको निगोदिया जीव भी कहते हैं। 16. प्रत्येक वनस्पतिकायिक के कितने भेद हैं ? प्रत्येक वनस्पतिकायिक के दो भेद हैं - सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति - जिस एक शरीर में जीव के मुख्य रहने पर भी उसके आश्रय से अनेक निगोदिया जीव रहें, वह सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति है। अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति - जिसके आश्रय से कोई भी निगोदिया जीव न हों, वह अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति है। 17. सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति और साधारण वनस्पति में क्या अंतर है ? जिनके आश्रय से बादर निगोदिया जीव रहते हैं, वे सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति हैं और जहाँ एक शरीर में अनन्तानन्त जीव रहते हैं, उन्हें साधारण वनस्पति कहते हैं। 18. साधारण वनस्पति के कितने भेद हैं ? साधारण वनस्पति के 2 भेद हैं नित्य निगोद - जिन्होंने अनादिकाल से आज तक निगोद के अलावा कोई पर्याय प्राप्त नहीं की है,वे नित्य निगोद हैं। इतरनिगोद - जो नित्य निगोद से निकल कर, अन्य पर्याय प्राप्त कर पुन: निगोद में आ गए हैं, वे इतर (अनित्य) निगोद हैं। 19. दूध जीव है कि अजीव ? दूध अजीव है। 20. भव्य जीव किसे कहते हैं ? जिसके सम्यग्दर्शन आदि भाव प्रकट होने की योग्यता है, वह भव्य है। 21. भव्य जीव कितने प्रकार के होते हैं ? भव्य जीव तीन प्रकार के होते हैं- 1. आसन्न भव्य 2. दूर भव्य 3. अभव्य सम भव्य। 22. आसन्न भव्य किसे कहते हैं ? जो जीव "केवली भगवान् का सुख सर्वसुखों में उत्कृष्ट है।" इस वचन का इसी समय विश्वास करते हैं, वे शिवश्री के भाजन आसन्न भव्य हैं। 23. दूर भव्य किसे कहते हैं ? जो जीव "केवली भगवान् का सुख सर्वसुखों में उत्कृष्ट है।" इस वचन पर आगे जाकर विश्वास करेंगे, वे दूर भव्य हैं। 24. अभव्यसमभव्य (दूरानुदूर भव्य) किसे कहते हैं ? दूरानुदूर भव्य को सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं होती है, उनको भव्य इसलिए कहा गया है कि उनमें शक्ति रूप से तो संसार विनाश की संभावना है किन्तु उसकी व्यक्ति नहीं होती है। ये अनादिकाल से अनन्तकाल तक नित्य निगोद पर्याय में ही रहते हैं। 25. अभव्य किसे कहते हैं ? जिसके सम्यकदर्शन आदि भाव प्रकट होने की योग्यता नहीं है, उसे अभव्य कहते हैं। जो भविष्यत काल में स्वभाव - अनन्त चतुष्टयात्मक सहज ज्ञानादि गुणों रूप से परिणमन के योग्य नहीं हैं, वे अभव्य हैं। नोट - जीवों के भेद के लिए तालिका देखिए। 26. पृथ्वीकायिकादि पाँच स्थावरों के कितने-कितने भेद हैं ? पृथ्वीकायिकादि पाँच स्थावरों के चार-चार भेद हैं - सामान्यपृथ्वी, पृथ्वीजीव, पृथ्वीकायिक और पृथ्वीकाय। सामान्यजल, जलजीव, जलकायिक और जलकाय। सामान्यवायु, वायुजीव, वायुकायिक और वायुकाय। सामान्यअग्नि, अग्निजीव, अग्निकायिक और अग्निकाय। सामान्य वनस्पति, वनस्पति जीव, वनस्पतिकायिक और वनस्पतिकाय। (मूचा.टी., 5/8) 27. पृथ्वीकायिक में चार भेद कैसे बनेंगे ? पृथ्वीकायिक में चार भेद इस प्रकार बनते हैं सामान्यपृथ्वी - यह सामान्य है, इसमें जीव नहीं है, जैसे - देवों की उपपाद शय्या। पृथ्वीजीव - विग्रहगति (कार्मण काययोग)में स्थित जीव है, जो पृथ्वी को अपनी काया बनाने जा रहा है। पृथ्वीकायिक - जिसने पृथ्वी में आकर जन्म धारण कर लिया है। पृथ्वीकाय - यह भी जीव रहित है। जिसमें से जीव चला गया, मात्र काया पड़ी है, वह पृथ्वीकाय है। जैसे - ईट, स्वर्ण के आभूषण आदि। (जीवकाण्ड मुख्तारी टीका, गाथा 182) नोट - इसमें सामान्यपृथ्वी और पृथ्वीकाय तो अचेतन हैं एवं पृथ्वीजीव तथा पृथ्वीकायिक चेतन हैं। 28. जलकायिक के चार भेद कैसे बनेंगे ? जलकायिक के 4 भेद इस प्रकार बनते हैं सामान्यजल - वर्षा का जल सामान्य जल है। जिसमें अन्तर्मुहूर्त तक जीव नहीं आता है। जिस प्रकार हाइड्रोजन, आक्सीजन के मेल से उत्पन्न H.O जलसामान्य है। इसमें भी अन्तर्मुहूर्त तक जीव नहीं आता है। जलजीव - जो जीव विग्रह गति (कार्मण काय योग) में है, जो जल को अपनी काया बनाने जा रहा है। जलकायिक - जिसने जल में आकर जन्म धारण कर लिया है। जलकाय - जिसमें से जीव चला गया, मात्र काया पड़ी है - जैसे प्रासुक उबला हुआ जल। इसी प्रकार अग्निकायिक, वायुकायिक एवं वनस्पतिकायिक में भी 4-4 भेद बनाना चाहिए। 29. निगोदिया जीव कहाँ-कहाँ नहीं होते हैं ? पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, देव तथा नारकी के शरीर में, आहारक शरीर में, और केवली भगवान् (सयोग, अयोग केवली) के शरीर, इन आठ स्थानों में बादर निगोदिया जीव नहीं होते हैं। सूक्ष्म निगोदिया जीव पूरे लोक में भरे हुए हैं। 30. तीन प्रकार के जीव कौन-कौन से होते हैं, उदाहरण सहित बताइए ? बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा की अपेक्षा जीव तीन प्रकार के होते हैं। 1.बहिरात्मा - जिसकी आत्मा मिथ्यात्व रूप परिणत हो, तीव्र कषाय से अच्छी तरह आविष्ट हो और जीव एवं शरीर को एक मानता हो, वह बहिरात्मा है। विशेष - प्रथम गुणस्थान में स्थित जीव उत्कृष्ट बहिरात्मा है, दूसरे गुणस्थान वाले मध्यम बहिरात्मा हैं और तीसरे गुणस्थान वाले जघन्य बहिरात्मा हैं। (का.अ.टी., 193) 2.अन्तरात्म - जो जीव जिन वचन में कुशल है, जीव और शरीर के भेद को जानता है तथा जिसने अष्ट दुष्ट मदों को जीत लिया है, वह अन्तरात्मा है। विशेष - सातवें गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक के जीव उत्तम अन्तरात्मा हैं, पाँचवें और छठवें गुणस्थान वाले जीव मध्यम अन्तरात्मा हैं तथा चतुर्थ गुणस्थान वाले जीव जघन्य अन्तरात्मा हैं। (का.अ., 195-197) 3.परमात्मा - केवलज्ञान के द्वारा सब पदार्थों को जान लेने वाले शरीर सहित अरिहंत और सर्वोत्तम सुख को प्राप्त कर लेने वाले ज्ञानमय शरीर वाले सिद्ध परमात्मा हैं। उदाहरण निम्न प्रकार से है:- बहिरात्मा अन्तरात्म परमात्मा 1. वृक्ष के शरीर की आत्मा लौकान्तिक देव सीमधर स्वामी 2. द्वीन्द्रिय के शरीर की आत्मा सौधर्मेन्द्र महावीर स्वामी 3. चींटी सर्वार्थसिद्धि के देव हनुमान (कैवल्य अवस्था में) 4. मिथ्यादृष्टि नारकी की आत्मा शची रामचन्द्रजी (कैवल्य अवस्था में) 31. बहिरात्मा अन्तरात्मा के उदाहरण बताइए ? बहिरात्मा अन्तरात्मा 1. म्यान में तलवार है इसीलिए म्यान को ही तलवार मानता है इसी प्रकार बहिरात्मा मनुष्य शरीर में आत्मा है अत: शरीर को ही आत्मा मानता है। 1. म्यान में तलवार है यह सत्य है पर म्यान, म्यान है।तलवार, तलवार है। मनुष्य शरीर में आत्मा है, पर आत्मा, आत्मा है। शरीर, शरीर है ऐसा मानता है। 2. छिलका के अंदर मूंगफली है लेकिन छिलके को ही मूंगफली मान लेना। 2 छिलके में मूंगफली दाना है। ये सत्य है। पर दाना, दाना है। छिलका, छिलका है। 3. वायर अलग है, करेन्ट अलग है पर वायर को ही करेन्ट मानना। 3 वायर को वायर और करेन्ट को करेन्ट मानना। 4. टोंटी के माध्यम से पानी आता है। टोंटी से नहीं। टोंटी से पानी आता। ऐसा मानना 4 पानी तो टंकी में है। टोंटी के माध्यम से आता है। टोंटी अलग है। पानी अलग है। साभार- आगम की छाँव में : पं. रतनलालजी शास्त्री,इंदौर 5. ऐसा मानना नरेटी के अन्दर भेला (नारियल) है, किन्तु नरेटी को ही भेला मान लेना 5 नरेटी में भेला है ये सत्य है,पर भेला, भेला है। नरेटी नरेटी है। 6.पेन के अन्दर स्याही है, किन्तु पेन को ही स्याही मान लेना। 6 पेन में स्याही है ये सत्य है, पर पेन, पेन है, स्याही स्याही है। 32. अध्यात्म में उपयोग कितने प्रकार के होते हैं ? अध्यात्म में उपयोग तीन प्रकार के होते हैं। 1. अशुभोपयोग 2. शुभोपयोग 3. शुद्धोपयोग अशुभोपयोग - जिसका उपयोग विषय-कषाय में मग्न है, कुश्रुति, कुविचार और कुसंगति में लगा हुआ है, उग्र है तथा उन्मार्ग में लगा हुआ है, उसके अशुभोपयोग है। (प्रसा,2/66) शुभोपयोग - देव-शास्त्र-गुरु की पूजा में तथा दान में एवं सुशीलों में और उपवासादिक में लीन आत्मा शुभोपयोगात्मक है। (प्रसा,69) जो अरिहंतों को जानता है, सिद्धों तथा अनगारों की श्रद्धा करता है अर्थात् पञ्च परमेठियों में अनुरत है और जीवों के प्रति अनुकम्पा युक्त है, उसके शुभोपयोग है। (प्रसा, 157) शुद्धोपयोग - जीवन-मरण आदि में समता भाव रखना ही है लक्षण जिसका ऐसा परम उपेक्षा संयत शुद्धोपयोग है अथवा शुभ-अशुभ से ऊपर उठकर केवल अन्तरात्मा का आश्रय लेना शुद्धोपयोग है। 33. शुद्धोपयोगी कौन हैं ? सुविदिदपदत्थसुतो संजमतवसंजदो विगदरागो। समणो समसुहदुक्खो भणिदो सुद्धोवओगो ति॥ 14 ॥ अर्थ - जिन्होंने पदार्थों को और सूत्रों को भली-भाँति जान लिया है, जो संयम और तपयुक्त हैं, जो वीतराग अर्थात् राग रहित हैं और जिन्हें सुख-दुख समान हैं, ऐसे श्रमण को शुद्धोपयोगी कहा गया है। (प्रसा, 14) 34. शुद्धोपयोग के अपर नाम कौन-कौन से हैं ? उत्सर्गमार्ग, निश्चय मार्ग, सर्वपरित्याग, परमोपेक्षा संयम, वीतराग चारित्र और शुद्धोपयोग ये सब पर्यायवाची नाम हैं। 35. कौन से उपयोग का क्या फल है ? अशुभोपयोग से पाप का सञ्चय होता है, शुभोपयोग से पुण्य का सञ्चय होता है और शुद्धोपयोग से उन दोनों का सञ्चय नहीं होता है। (प्र.सा. 156) 36. कौन-सा उपयोग किन-किन गुणस्थानों में होता है ? प्रथम गुणस्थान से तृतीय गुणस्थान तक घटता हुआ अशुभोपयोग रहता है, चतुर्थ गुणस्थान से छठवें गुणस्थान तक बढ़ता हुआ शुभोपयोग रहता है तथा सप्तम गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान तक बढ़ता शुद्धोपयोग रहता है। तेरहवें एवं चौदहवें गुणस्थान में शुद्धोपयोग का फल रहता है। (प्रसा.टी., 9)
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    दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज इन दिनों (Japanese Haiku, 俳句 ) जापानी हायकू (कविता) की रचना करते हैं | हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। महाकवी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने लगभग 500 हायकू लिखे हैं, जो अप्रकाशित हैं। वह इस प्रकार हैं :- १‍ - जुड़ो ना जोड़ो, जोड़ा छोड़ो जोड़ो तो, बेजोड़ जोड़ो। २ - संदेह होगा, देह है तो, देहाती ! विदेह हो जा | ३ - ज्ञान प्राण है, संयत हो त्राण है, अन्यथा श्वान| ४ - छोटी दुनिया, काया में सुख दुःख, मोक्ष नरक | ५ - द्वेष से बचो, लवण दूर् रहे, दूध न फटे | ६ - किसी वेग में, अपढ़ हो या पढ़े, सब एक हैं | ७ - तेरी दो आँखें, तेरी ओर हज़ार, सतर्क हो जा | ८ - चाँद को देखूँ, परिवार से घिरा, सूर्य सन्त है | ९ - मैं निर्दोषी हूँ, प्रभु ने देखा वैसा, किया करता। १‍० - आज्ञा का देना, आज्ञा पालन से है, कठिनतम। १‍१‍ - तीर्थंकर क्यों, आदेश नहीं देते, सो ज्ञात हुआ। १‍२ - साधु वृक्ष है, छाया फल प्रदाता, जो धूप खाता। १‍३ - गुणालय में, एकाध दोष कभी, तिल सा लगे। १‍४ - पक्ष व्यामोह, लौह पुरुष के भी, लहू चूसता। १‍५ - पूर्ण पथ लो, पाप को पीठ दे दो, वृत्ति सुखी हो। १‍६ - भूख मिटी है, बहुत भूख लगी, पर्याप्त रहें। १‍७ - टिमटिमाते, दीपक को भी देख, रात भा जाती। १‍८ - परिचित भी, अपरिचित लगे, स्वस्थ्य ध्यान में (बस हो गया)। १‍९ - प्रभु ने मुझे, जाना माना परन्तु, अपनाया ना। २० - कलि न खिली, अंगुली से समझो, योग्यता क्या है ? २१‍ - आँखें लाल है, मन अन्दर कौन, दोनों में दोषी ? २२ - इष्ट-सिध्दि में, अनिष्ट से बचना, दुष्टता नहीं। २३ - सामायिक में, कुछ न करने की, स्थिति होती है। २४ - मद का तेल, जल चुका सो बुझा, विस्मय दीप। २५ - ध्वजा वायु से, लहराता पै वायु, आगे न आती। २६ - ज्ञेय चिपके, ज्ञान चिपकाता सो, स्मृति हो आती। २७ - तैराक बना, बनूँ गोताखोर सो, अपूर्व दिखे। २८ - वर्षा के बाद, कड़ी मिट्टी सी माँ हो, दोषी पुत्र पे। २९ - कछुवे सम, इन्द्रिय संयम से, आत्म रक्षा हो। ३० - डूबना ध्यान, तैरना स्वाध्याय है, अब तो डूबो। ३१‍ - गुरु मार्ग में, पीछे की वायु सम, हमें चलाते। ३२ - संघर्ष में भी, चंदन सम सदा, सुगन्धि बाटूँ। ३३ - प्रदर्शन तो, उथला है दर्शन, गहराता है। ३४ - योग साधन, है उपयोग शुद्धि, साध्य सिद्ध हो। ३५ - योग प्रयोग, साधन है साध्य तो, सदुपयोग। ३६- धर्म का फल, बाद में न अभी है, पाप का क्षय। ३७ - पर पीड़ा से, अपनी करुणा सो, सक्रिय होती। ३८ - सीना तो तानो, पसीना तो बहा दो, सही दिशा में। ३९ - प्रश्नों से परे, अनुत्तर है उन्हें , मेरा नमन। ४० - फूल खिला पै, गंध न आ रही सो, काग़ज़ का है | ४१‍ - सरोवर का, अन्तरंग छुपा है ? तरंग वश। ४२ - मान शत्रु है, कछुवाबनूँ बचूँ, खरगोश से। ४३ - हायकू कृति, तिपाई सी अर्थ को, ऊँचा उठाती। ४४ - अधूरा पूरा, सत्य हो सकता है, बहुत नहीं। ४५ - भूख लगी है, स्वाद लेना छोड़ दें, भर लें पेट। ४६ - ज्ञानी कहता, जब बोलूँ अपना, स्वाद छूटता। ४७ - गुरु ने मुझे, प्रकट कर दिया, दीया दे दिया। ४८ - नीर नहीं तो, समीर सही प्यास, कुछ तो बुझे। ४९ - निजी प्रकाश, किसी प्रकाशन में, कभी दिखा है ? ५० - जितना चाहो, जो चाहो जब चाहो, क्यों कभी मिला। ५१‍ - वैधानिक तो, पहले बनो फिर, धनिक बनो। ५२ - टिमटिमाते, दीप को भी पीठ दे, भागती रात । ५३ - रोगी की नहीं, रोग की चिकित्सा हो, अन्यथा भोगो। ५४ - देखा ध्यान में, कोलाहल मन का, नींद ले रहा। ५५ - मिट्टी तो खोदो, पानी को खोजो नहीं, पानी फूटेगा। ५६ - सुनना हो तो, नगाड़े के साथ में, बाँसुरी सुनो। ५७ - मलाई कहाँ, अशान्त दूध में सो, प्रशान्त बनो। ५८ - कब पता न, मरण निश्चित है, फिर डर क्यों ? ५९ - भरा घट भी, खाली सा जल में सो, हवा से बचो। ६० - नौ मास उल्टा, लटका आज तप (रहा पेट में) कष्टकर क्यों? ६१‍ - मोक्षमार्ग तो, भीतर अधिक है, बाहर कम। ६२ - गूँगा गुड़ का, स्वाद क्या नहीं लेता ? वक्ता क्यों बनो? ६३ - कमल खिले, दिन के ग्रहण में, करबद्ध हों। ६४ - पैर उठते, सीधे मोही के भी पै, उल्टे पडते । ६५ - भूत सपना, वर्तमान अपना, भावी कल्पना। ६६ - काले मेघ भी, नीचे तपी धरा को, देख रो पड़े। ६७ - घी दूध पुन:, बने तो मुक्त पुन:, हम से रागी। ६८ - उससे डरो, जो तुम्हारे क्रोध को, पीते ही जाते। ६९ - शून्य को देखूँ, वैराग्य बढ़े-बढ़े, नेत्र की ज्योति। ७० - पौधे न रोपे, छाया और चाहते, निकम्मे से हो। (पौरुष्य नहीं) ७१‍ - उनसे मत, डरो जिन्हें देख के, पारा न चढ़े। ७२ - क्या सोच रहे, क्या सोचूँ जो कुछ है, कर्म के धर्म। ७३ - तुम्बी तैरती, औरों को भी तारती, छेद वाली क्या ? ७४ - आलोचन से, लोचन खुलते हैं, सो स्वागत है। ७५ - दुग्ध पात्र में, नीलम सा जीव है, तनु प्रमाण । ७६ - स्वानुभव की, समीक्षा पर करें, तो आँखें सुने। ७७ - स्वानुभव की, प्रतिक्षा स्व करे तो, कान देखता। ७८ - मूल बोध में, बड़ की जटायें सी, व्याख्यायें न हो। ७९ - मन अपना, अपने विषय में, क्यों न सोचता ? ८० - स्थान समय, दिशा आसन इन्हें , भूलते ध्यानी। ८१‍ - चिन्तन न हो, तो चिन्ता मत करो, चित्त्स्वरुपी हो। ८२ - एक आँख भी, काम में आती पर, एक पंख क्या ? ८३ - नय-नय है, विनय पुरोधा (प्रमुख) है, मोक्षमार्ग में। ८४ - सम्मुख जा के, दर्पण देखता तो (दर्पण में देखा पै) मैं नहीं दिखा। ८५ - पाषाण भीगे, वर्षा में हमारी भी, यही दशा है। ८६ - आपे में न हो (नहीं), तभी तो अस्वस्थ हो, अब तो आओ। ८७ - दीप अनेक, प्रकाश में प्रकाश, एक मेक सा। ८८ - होगा चाँद में, दाग चाँदनी में ना, ताप मिटा लो । ८९ - प्रतिशोध में, ज्ञानी भी अन्धा होता, शोध तो दूर। ९० - निद्रा वासना, दो बहनें हैं जिन्हें, लज्जा न छूती। ९१‍ - जिस बोध में, लोकालोक तैरते,उसे नमन। ९२ - उजाले में हैं, उजाला करते हैं, गुरु को वंदू । ९३ - उन्हें जिनके, तन-मन नग्न हैं, मेंरे नमन। ९४ - शिव पथ के, कथक वचन भी, शिरोधार्य हो। ९५ - व्यंग का संग, सकलांग से नहीं, विकलांग से। ९६ - कुछ न चाहूँ, आप से आप करें, बस ! सद्ध्यान। ९७ - बड़ तूफाँ में, शीर्षासन लगाता, बेंत झुकता। ९८ - आशा जीतना, श्रेष्ठ निराशा से तो, सदाशा भली। ९९ - समानान्तर, दो रेखाओं में मैत्री, पल सकती। १‍०० - प्राय: अपढ़, दीन हो,पढ़े मानी, ज्ञानी विरले। १‍०१‍ - कच्चा घड़ा है, काम में न लो, बिना, अग्नि परीक्षा। १‍०२ - पक्षी कभी भी, दूसरों के नीड़ों में, घुसते नहीं। १‍०३ - तरंग देखूँ, भंगुरता दिखती, ज्यों का त्यों ‘तोय’। १‍०४ - बिना प्रमाद, श्वसन क्रिया सम, पथ पे चलूँ। १‍०५ - दृढ़-ध्यान में, ज्ञेय का स्पन्दन भी, बाधक नहीं। १‍०६ - शब्द पंगु हैं, जवाब न देना भी, लाजवाब है। १‍०७ - पराश्रय से, मान बोना हो कभी, दैन्द्य-लाभ भी। १‍०८ - वक़्ता व श्रोता, बने बिना, गूँगा सा, निजी-स्वाद ले। १‍०९ - नियन्त्रण हो, निज पे, दीप बुझे, निजी श्वांस से। १‍१‍० - अपना ज्ञान, शुध्द-ज्ञान न, जैसे, वाष्प, पानी न। १‍१‍१‍ - औरों को नहीं, प्रभु को देखूँ तभी, मुस्कान बाटूँ। १‍१‍२ - अपमान को, सहता आ रहा है, मान के लिए। १‍१‍३ - मान चाहूँ ना, पै अपमान अभी, सहा न जाता। १‍१‍४ - यशोगन्ध की, प्यासी नासा स्वयं तू, निर्गन्धा है री ! १‍१‍५ - दमन, चर्म-, चक्षु का हो, नमन, ज्ञान चक्षु को। १‍१‍६ - गाय बताती, तप्त-लोह पिण्ड को, मुख में ले ‘सत्’। १‍१‍७ - कुछ स्मृतियाँ, आग उगलती, तो, कुछ सुधा सी। १‍१‍८ - मरघट में, घूँघट का क्या काम?, घट कहाँ है ? १‍१‍९ - पुण्य-फूला है, पापों का पतझड़, फल अनंत । (अमाप) १‍२० - गन्ध सुहाती, निम्ब -पुष्पों की, स्वाद।, उल्टी कराता। १‍२१‍ - युवा कपोल, कपोल-कल्पित है, वृध्द-बोध में। १‍२२ – लोहा सोना हो, पारस से परन्तु, जंग लगा क्या ? १‍२३ - गुणी का पक्ष,लेना ही विपक्ष पे, वज्रपात है। १‍२४ - बिना डाँट के, शिष्य और शीशी का, भविष्य ही क्या ? १‍२५ - प्रकाश में ना…, प्रकाश को पढ़ो तो, भूल ज्ञात हो। १‍२६ - देख सामने, प्रभु के दर्शन हैं, भूत को भूल… १‍२७ - दीन बना है, व्यर्थ में बाहर जा, अर्थ है स्वयं। १‍२८ - काल की दूरी, क्षेत्र दूरी से और, अनिवार्य है। १‍२९ - दर्प को छोड़, दर्पण देखता तो, अच्छा लगता। १‍३० - घनी निशा में, माथा भयभीत हो, आस्था, आस्था है। १‍३१‍ – बिन्दु जा मिला, सभी मित्रों से, जहाँ, सिन्धु वही है। १‍३२ - आगे बनूँगा, अभी प्रभु-पदों में, बैठ तो जाऊँ। १‍३३ - रस-रक्षक-, छिलका, सन्तरे का, अस्तित्व ही क्या ? १‍३४ - छोटा भले हो, दर्पण मिले साफ़, खुद को देखूँ। १‍३५ - पराग-पीता-, भ्रमर, फूला फूल, आतिथ्य- प्रेमी। १‍३६ - बोधा-काश में, आकाश तारा सम, प्रकाशित हो। १‍३७ - पराकर्षण, स्वभाव सा लगता, अज्ञानवश। १‍३८ - भ्रमर से हो,फूल सुखी, हो दाता, पात्र-योग से। १‍३९ - तारा दिखती, उस आभा में कभी, कुछ दिखी क्या ? १‍४० - सुधाकर की, लवणाकर से क्यों ?, मैत्री, क्या राज ? १‍४१‍ - बाहर नहीं, वसन्त बहार तो, सन्त ! अन्दर… १‍४२ - तार न टूटी, लगातार चिर से, चैतन्य-धारा। १‍४३ - सुई निश्चय, कैंची व्यवहार है, दर्ज़ी-प्रमाण। १‍४४ - चलो बढ़ोऔ, कूदो, उछलो यही, धुआँधार है। १‍४५ - बिना चर्वण, रस का रसना का, मूल्य ही क्या है ? १‍४६ - ख़ाली बन जा, घट डूबता भरा…, ख़ाली तैरता। १‍४७ - साष्टांग सम्यक्, शान चढ़ा हीरा सा।, कहाँ दिखता ? १‍४८ - निजी पराये, वत्सों को, दुग्ध-पान, कराती गौ-माँ। १‍४९ – छोटा सा हूँ मैं, छोर छूती सी तृष्णा, छेड़ती मुझे। १‍५० - रसों का भान, जहाँ न, रहे वहाँ, शान्त-रस है। १‍५१‍ - जिससे तुम्हें, घृणा न हो उससे, अनुराग क्यों ? १‍५२ - मोक्षमार्ग में, समिति समतल।, गुप्ति सीढ़ियाँ। १‍५३ - धूप-छाँव सी, वस्तुत: वस्तुओं की, क्या पकड़ है ? १‍५४ - धूम्र से बोध, अग्नि का हो गुरु से, सो आत्म बोध। १‍५५ - कब लौं सोचो।, कब करो, ना सोचे, करो क्या पाओ ? १‍५६ - कस न, ढील, अनति हो, सो वीणा, स्वर लहरी। १‍५७ - पुण्य-पथ लौ, पाप मिटे पुण्य से, पुण्य पथ है। १‍५८ - पथ को कभी, मिटाना नहीं होता, पथ पे चलो। १‍५९ - नाविक तीर, ले जाता हमें, तभी, नाव की पूजा। १‍६० - हद कर दी, बेहद छूने उठें, क़द तो देखो। १‍६१‍ - भारी वर्षा हो, दल-दल धुलता, अन्यथा मचे। १‍६२ - माँगते हो तो, कुछ दो, उसी में से, कुछ देऊँगा। १‍६३ - अनेक यानी, बहुत नहीं किन्तु, एक नहीं है। १‍६४ - मन की कृति, लिखूँ पढ़ूँ सुनूँ पै, कैसे सुनाऊँ ? १‍६५ - कैसे, देखते, संत्रस्त संसार को ?, दया मूर्ति हो। १‍६६ - मोह टपरी, ज्ञान की आँधी में यूँ, उड़ी जा रही १‍६७ - पाँच भूतों के, पार, अपार पूत, अध्यात्म बसा। १‍६८ - क़ैदी हूँ देह-, जेल में, जेलर ना…, तो भी भागा ना १‍६९ - तेरा सो एक, सो सुख, अनेक में, दु:ख ही दु:ख। १‍७० - सहजता में, प्रतिकार का भाव, दिखता नहीं। १‍७१‍ - साधना छोड़, काय-रत होना ही, कायरता है। १‍७२ - भेद-वती है, कला, स्वानुभूति तो, अद्वैत की माँ… १‍७३ - विज्ञान नहीं, सत्य की कसौटी है, ‘दर्शन’ यहाँ। १‍७४ - आम बना लो, ना कहो, काट खाओ, क्रूरता तजो। १‍७५ - नौका पार में, सेतु-हेतु मार्ग में, गुरु-साथ दें। १‍७६ - मुनि स्व में तो, सीधे प्रवेश करें, सर्प बिल में। १‍७७ - चिन्तन कभी, समयानुबन्ध को, क्या स्वीकारता ? १‍७८ - बिना रस भी, पेट भरता, छोड़ो, मन के लड्डू। १‍७९ - भोक्ता के पीछे, वासना, भोक्ता ढूँढे, उपासना को। १‍८० - दो जीभ न हो, जीवन में सत्य ही, सब कुछ है। १‍८१‍ - सिर में चाँद, अच्छा निकल आया, सूर्य न उगा। १‍८२ - जैसे दूध में, बूरा पूरा पूरता, वैसा घी क्यों ना…? १‍८३ - स्वोन्नति से भी, पर का पराभव, उसे सुहाता… ! १‍८४ - शिरोधार्य हो, गुरु-पद-रज, सो, नीरज बनूँ। १‍८५ - परवश ना, भीड़ में होकर भी, मौनी बने हो। १‍८६ - दुर्भाव टले, प्रशम-भाव से सो, स्वभाव मिले। १‍८७ - खाओ पीयो भी, थाली में छेद करो, कहाँ जाओगे ? १‍८८ - समझ न थी, अनर्थ किया आज, समझ, रोता। १‍८९ - गुब्बारा फूटा, क्यों, मत पूछो, पूछो, फुलाया क्यों था? १‍९० - बदलाव है, पै स्वरुप में न, सो, ‘था’ है ‘रहेगा’। १‍९१‍ - अर्ध शोधित-, पारा औषध नहीं, पूरा विष है। १‍९२ - तटस्थ व्यक्ति, नहीं डूबता हो, तो, पार भी न हो। १‍९३ - दृष्टि पल्टा दो, तामस समता हो, और कुछ ना… १‍९४ - देवों की छाया, ना सही पै हवा तो, लग सकती। १‍९५ - तेरा सत्य है, भविष्य के गर्भ में, असत्य धो ले। १‍९६ - परिचित को, पीठ दिखा दे फिर !, सब ठीक है। १‍९७ - मधुर बनो, दाँत तोड़ गन्ना भी, लोकप्रिय है। १‍९८ - किस ओर तू…!, दिशा मोड़ दे, युग-, लौट रहा है। १‍९९ - दृश्य से दृष्टा, ज्ञेय से ज्ञाता महा, सो अध्यात्म है। २०० - बिना ज्ञान के, आस्था को भीति कभी, छू न सकती। २०१‍ - उर सिर से, महा वैसा ज्ञान से, दर्शन होता। २०२ - व्याकुल व्यक्ति, सम्मुख हो कैसे दूँ, उसे मुस्कान…! २०३ - अधम-पत्ते, तोड़े, कोंपलें बढ़े, पौधा प्रसन्न ! २०४ - पूर्णा-पूर्ण तो, सत्य हो सकता पै, बहुत नहीं। २०५ - गर्व गला लो, गले लगा लो जो हैं, अहिंसा प्रेमी २०६ - काश न देता, आकाश, अवकाश, तू कहाँ होता ? २०७ - सहयोगिनी, परस्पर में आँखें, मंगल झरी। २०८ - हमारे दोष, जिनसे गले धुले, वे शत्रु कैसे ? २०९ - हमारे दोष, जिनसे फले फूले, वे बन्धु कैसे ? २१‍० - भरोसा ही क्या ?, काले बाल वालों का, बिना संयम। २१‍१‍ - वैराग्य, न हो, बाढ़ तूफ़ान सम, हो ऊर्ध्व-गामी। २१‍२ - छाया का भार, नहीं सही परन्तु, प्रभाव तो है। २१‍३ - फूलों की रक्षा, काँटों से हो शील की, सादगी से हो। २१‍४ - बहुत मीठे, बोल रहे हो अब !, मात्रा सुधारो। २१‍५ - तुमसे मेरे, कर्म कटे, मुझसे, तुम्हें क्या मिला ? २१‍६ - राजा प्रजा का, वैसा पोषण करे, मूल वृक्ष का। २१‍७ - कोई देखे तो, लज्जा आती, मर्यादा।, टूटने से ना…! २१‍८ - आती छाती पे, जाती कमर पे सो, दौलत होती। २१‍९ - सिध्द घृत से, महके, बिना गन्ध, दुग्ध से हम। २२० - कपूर सम, बिना राख बिखरा, सिध्दों का तन। २२१ - खुली सीप में, स्वाति की बूँद मुक्ता, बने, और न…! २२२ - दिन में शशि, विदुर सा लगता, सुधा-विहीन। २२३ - कब, पता न, मृत्यु एक सत्य है, फिर डर क्यों ? २२४ - काल घूमता, काल पै आरोप सो, क्रिया शून्य है। २२५ - बिना नयन, उप नयन किस, काम में आता ? २२६ - अन जान था, तभी मजबूरी में, मज़दूर था। २२७ - बिन देवियाँ, देव रहे, देवियाँ, बिन-देव ना…! २२८ - काला या धोला, दाग, दाग है फिर, काला तिल भी… २२९ - हीरा, हीरा है, काँच, काँच है किन्तु, ज्ञानी के लिए… २३० - पापों से बचे, आपस में भिड़े क्या, धर्म यही है ? २३१ - डाल पे पका, गिरा आम मीठा हो, गिराया खट्टा… २३२ - भार हीन हो, चारु-भाल की माँग, क्या मान करो ? २३३ - पक्षाघात तो, आधे में हो, पूरे में, सो पक्षपात… २३४ - प्रति-निधि हूँ, सन्निधि पा के तेरी, निधि माँगू क्या ? २३५ - आस्था व बोध, संयम की कृपा से, मंज़िल पाते। २३६ - स्मृति मिटाती, अब को, अब की हो, स्वाद शून्य है। २३७ - शब्द की यात्रा, प्रत्यक्ष से अन्यत्र, हमें ले जाती। २३८ - चिन्तन में तो, परालम्बन होता, योग में नहीं। २३९ - सत्य, सत्य है, असत्य, असत्य तो, किसे क्यों ढाँकू…? २४० - किसको तजूँ, किसे भजूँ सबका, साक्षी हो जाऊँ। २४१ - न पुंसक हो, मन ने पुरुष को, पछाड़ दिया… २४२ - साधना क्या है ?, पीड़ा तो पी के देखो, हल्ला न करो। २४३ - खाल मिली थी, यहीं मिट्टी में मिली, ख़ाली जाता हूँ। २४४ - जिस भाषा में, पूछा उसी में तुम, उत्तर दे दो। २४५ - कभी न हँसो, किसी पे, स्वार्थवश, कभी न रोओ। २४६ - दर्पण कभी, न रोया न हँसा, हो, ऐसा सन्यास। २४७ - ब्रह्म रन्ध्र से-, बाद, पहले श्वास, नाक से तो लो। २४८ - सामायिक में, तन कब हिलता, और क्यों देखो…? २४९ - कम से कम, स्वाध्याय (श्रवण) का वर्ग हो प्रयोग-काल। २५० - एक हूँ ठीक, गोता-खोर तुम्बी क्या, कभी चाहेगा ? २५१ - बिना विवाह, प्रवाहित हुआ क्या, धर्म-प्रवाह। २५२ - दूध पे घी है, घी से दूध न दबा, घी लघु बना। २५३ - ऊपर जाता, किसी को न दबाता, घी गुरु बना। २५४ - नाड़ हिलती, लार गिरती किन्तु, तृष्णा युवती। २५५ - तीर न छोड़ो, मत चूको अर्जुन !, तीर पाओगे। २५६ - बाँध भले ही, बाँधो, नदी बहेगी, अधो या ऊर्ध्व। २५७ - अनागत का, अर्थ, भविष्य न, पै, आगत नहीं। २५८ - तुलनीय भी, सन्तुलित तुला में, तुलता मिला। २५९ - अर्पित यानी, मुख्य, समर्पित सो, अहंका त्याग। २६० - गन्ध जिह्वा का, खाद्य न, फिर क्यों तू, सौगंध खाता ? २६१ - स्व-स्व कार्यों में, सब लग गये पै, मन न लगा । २६२ - तपस्वी बना, पर्वत सूखे पेड़, हड्डी से लगे। २६३ - अन्धकार में, अन्धा न, आँख वाला, डर सकता। २६४ - जल कण भी, अर्क तूल को, देखा !, धूल खिलाता। २६५ - जल में तैरे, स्थूल-काष्ठ भी, लघु-, कंकर डूबे। २६६ - छाया सी लक्ष्मी, अनुचरा हो, यदि, उसे न देखो। २६७ - गुरु औ शिष्य, आगे-पीछे, दोनों में, अन्तर कहाँ ? २६८ - सत्य न पिटे, कोई न मिटे ऐसा, न्याय कहाँ है ? २६९ - ऊहापोह के, चक्रव्यूह में-धर्म, दुरुह हुआ। २७० - नेता की दृष्टि, निजी दोषों पे हो, या, पर गुणों पे। २७१ - गिनती नहीं, आम में मोर आयी, फल कितने ? २७२ - दु:खी जग को, तज, कैसे तो जाऊँ, मोक्ष ? सोचता। २७३ - दीप काजल, जल काई उगले, प्रसंग वश। २७४ - बोलो ! माटी के, दीप-तले अंधेरा, या रतनों के ? २७५ - बिना राग भी, जी सकते हो जैसे, निर्धूम अग्नि। २७६ - दायित्व भार, कन्धों पे आते, शक्ति, सो न सकती। २७७ - सुलझे भी हो, और औरों को क्यों तो ?, उलझा देते ? २७८ - कब बोलते ?, क्यों बोलते ? क्या बिना, बोले न रहो ? २७९ - तपो वर्धिनी, मही में ही मही है, स्वर्ग में नहीं। २८० - और तो और, गीले दुपट्टे को भी, न फटकारो। २८१ - ख़ूब बिगड़ा, तेरा उपयोग है, योगा कर ले ! २८२ - ज्ञान ज्ञेय से, बड़ा, आकाश आया, छोटी आँखों में। २८३ - पचपन में, बचपन क्यों ? पढ़ो, अपनापन। २८४ - भोगों की याद, सड़ी-गली धूप सी, जान खा जाती २८५ - सहगामी हो, सहभागी बने सो, नियम नहीं। २८६ - पद चिह्नों पै, प्रश्न चिह्न लगा सो, उत्तर क्या दूँ ( किधर जाना ?) २८७ - निश्चिन्तता में, भोगी सो जाता, वहीं, योगी खो जाता। २८८ - शत्रु मित्र में, समता रखें, न कि, भक्ष्या भक्ष्य में। २८९ - आस्था झेलती, जब आपत्ति आती, ज्ञान चिल्लाता? २९० - आत्मा ग़लती, रागाग्नि से, लोनी सी, कटती नहीं। २९१ - नदी कभी भी, लौटती नहीं फिर !, तू क्यों लौटता ? २९२ - समर्पण पे, कर्त्तव्य की कमी से, सन्देह न हो। २९३ - कुण्डली मार, कंकर पत्थर पे, क्या मान बैठे ? २९४ - खुद बँधता, जो औरों को बाँधता, निस्संग हो जा। २९५ - सदुपयोग-, ज्ञान का दुर्लभ है, मद-सुलभ। २९६ - ज्ञानी हो क्यों कि, अज्ञान की पीड़ा में, प्रसन्न-जीते। २९७ - ज्ञान की प्यास, सो कहीं अज्ञान से, घृणा तो नहीं। २९८ - प्रभु-पद में, वाणी, काया के साथ मन ही भक्ति। २९९ - मूर्च्छा को कहा, परिग्रह, दाता भी, मूर्च्छित न हो। ३०० - जीवनोद्देश, जिना देश-पालन, अनुपदेश। ३०१ - द्वेष से राग, विषैला होता जैसा, शूल से फूल। ३०२ - विषय छूटे, ग्लानि मिटे, सेवा से, वात्सल्य बढ़े। ३०३ - अग्नि पिटती, लोह की संगति से, अब तो चेतो। ३०४ - सर्प ने छोड़ी, काँचली, वस्त्र छोड़े !, विष तो छोड़ो…! ३०५ - असमर्थन, विरोध सा लगता, विरोध नहीं। ३०६ - हम वस्तुत:, दो हैं, तो एक कैसे, हो सकते हैं ? ३०७ - मैं के स्थान में, हम का प्रयोग क्यों, किया जाता है ? ३०८ - मैं हट जाऊँ, किन्तु हवा मत दो, और न जले…! ३०९ - बड़ी बूँदों की, वर्षा सी बड़ी राशि, कम पचती। ३१० - जिज्ञासा यानी, प्राप्त में असन्तुष्टि, धैर्य की हार…! ३११ - बिना अति के, प्रशस्त नति करो, सो विनती है। ३१२ - सुनो तो सही, पहले सोचो नहीं, पछताओगे। ३१३ - केन्द्र को छूती, नपी, सीधी रेखाएँ, वृत्त बनाती। ३१४ - शक्ति की व्यक्ति, और व्यक्ति की मुक्ति होती रहती। ३१५ - जो है ‘सो’ थामें, बदलता, होगा ‘सो’ है में ढलता। ३१६ - चिन्तन-मुद्रा, प्रभु की नहीं क्यों कि वह दोष है। ३१७ - पथ में क्यों तो, रुको, नदी को देखो चलते चलो। ३१८ - ज्ञानी ज्ञान को, कब जानता जब, आपे में होता। ३१९ - बँटा समाज, पंथ-जाति-वाद में, धर्म बाद में ३२० - घर की बात, घर तक ही रहे।, बे-घर न हो। ३२१ - अकेला न हूँ, गुरुदेव साथ हैं, हैं आत्मसात् वे। ३२२ - निर्भय बनो, पै निर्भीक होने का, गर्व न पालो। ३२३ - अति मात्रा में, पथ्य भी कुपथ्य हो, मात्रा माँ सी हो। ३२४ - संकट से भी, धर्म-संकट और, विकट होता। ३२५ - अँधेरे में हो, किंकर्त्तव्य मूढ़ सो, कर्त्तव्य जीवी। ३२६ - धन आता दो, कूप साफ़ कर दो, नया पानी लो। ३२७ - हम से कोई, दु:खी नहीं हो, बस !, यही सेवा है। ३२८ - चालक नहीं, गाड़ी दिखती, मैं न, साड़ी दिखती। ३२९ - एक दिशा में, सूर्य उगे कि दशों-, दिशाएँ ख़ुश। ३३० - जीत सको तो, किसी का दिल जीतो, सो, वैर न हो। ३३१ - सिंह से वन, सिंह, वन से बचा, पूरक बनो। ३३२ - तैरना हो तो, तैरो हवा में, छोड़ो !, पहले मोह। ३३३ - गुरु कृपा से, बाँसुरी बना, मैं तो, ठेठ बाँस था। ३३४ - पर्याय क्या है ?, तरंग जल की सो !, नयी-नयी है। ३३५ - पुण्य का त्याग, अभी न, बुझे आग, पानी का त्याग। ३३६ - प्रेरणा तो दूँ, निर्दोष होने, रुचि, आप की होगी। ३३७ - वे चल बसे, यानी यहाँ से वहाँ, जा कर बसे। ३३८ - कहो न, सहो, सही परीक्षा यही, आपे में रहो। ३३९ - पाँचों की रक्षा, मुठ्ठी में, मुठ्ठी बँधी, लाखों की मानी। ३४० - केन्द्र की ओर, तरंगें लौटती सी, ज्ञान की यात्रा। ३४१ - बँधो न बाँधो, काल से व काल को, कालजयी हो। ३४२ - गुरु नम्र हो, झंझा में बड़ गिरे, बेंत ज्यों की त्यों। ३४३ - तैरो नहीं तो, डूबो कैसे, ऐसे में, निधि पाओगे ? ३४४ - मध्य रात्रि में, विभीषण आ मिला, राम, राम थे। ३४५ - व्यापक कौन ?, गुरु या गुरु वाणी, किस से पूछें ?. ३४६ - योग का क्षेत्र, अंतर्राष्ट्रीय, नहीं, अंतर्जगत् है। ३४७ - मत दिलाओ, विश्वास लौट आता, व्यवहार से।(आचरण से) ३४८ - सार्थक बोलो, व्यर्थ नहीं साधना, सो छोटी नहीं। ३४९ - मैं खड़ा नहीं, देह को खड़ा कर, देख रहा हूँ। ३५० - आँखें ना मूँदों, नाही आँख दिखाओ, सही क्या देखो? ३५१ - हाथ ना मलो, ना ही हाथ दिखाओ, हाथ मिलाओ। ३५२ - जाने केवली, इतना जानता हूँ, जानन हारा। ३५३ - ठण्डे बस्ते में, मन को रखना ही, मोक्षमार्ग है। ३५४ - आँखें देखती, हैं मन सोचता है, इसमें मैं हूँ। ३५५ - उड़ना भूली, चिड़िया सोने की तू, उठ उड़ जा। ३५६ - झूठ भी यदि, सफ़ेद हो तो सत्य, कटु क्यों न हो ? ३५७ - परिधि में ना, परिधि में हूँ हाँ हूँ, परिधि सृष्टा। ३५८ - बचो-बचाओ, पाप से पापी से ना, पुण्य कमाओ। ३५९ - हँसो-हँसाओ, हँसी किसी की नहीं, इतिहास हो। ३६० - अति संधान, अनुसंधान नहीं, संधान साधो। ३६१ - है का होना ही, द्र्व्य का स्वभाव है, सो सनातन। ३६२ - सुना था सुनो, ”अर्थ की ओर न जा” डूबो आपे में। ३६३ - अपनी नहीं, आहुति अहं की दो, झाँको आपे में। ३६४ - पीछे भी देखो, पिछलग्गू न बनो, पीछे रहोगे। ३६५ - द्वेष पचाओ, इतिहास रचाओ, नेता बने हो। ३६६ - काम चलाऊ, नहीं काम का बनूँ, काम हंता भी। ३६७ - आँखों से आँखें, न मिले तो भीतरी, आँखें खुलेगी। ३६८ - ऊधमी तो है, उद्यमी आदमी सो, मिलते कहाँ ? ३६९ - तुम तो करो, हड़ताल मैं सुनूँ हर ताल को। ३७० - संग्रह कहाँ, वस्तु विनिमय में, मूर्च्छा मिटती। ३७१ - सगा हो दगा, अर्थ विनिमय में, मूर्च्छा बढ़ती। ३७२ - धुन के पक्के, सिद्धांत के पक्के हो, न हो उचक्के ।(बनो मुनक्के) ३७३ - नये सिरे से, सिर से उर से हो, वर्षादया की। ३७४ - ज़रा ना चाहूँ, अजरामर बनूँ, नज़र चाहूँ। ३७५ ‍- बिना खिलौना, कैसे किससे खेलूँ, बनूँ खिलौना। ३७६ - चिराग़ नहीं, आग जलाऊँ, ताकि, कर्म दग्ध हों। ३७७ - खेती-बाड़ी है, भारत की मर्यादा, शिक्षा साड़ी है। ३७८ - शरण लेना, शरण देना दोनों, पथ में होते। ३७९ - दादा हो रहो, दादागिरी न करो, दायित्व पालो। ३८० - हाथ तो डालो, वामी में विष को भी, सुधा दो हो तो। ३८१ - श्वेत पत्र पे, श्वेत स्याही से कुछ, लिखा सो पढ़ो। ३८२ - राज़ी ना होना, नाराज़ सा लगता, नाराज़ नहीं। ३८३ - भार तो उठा, चल न सकता तो, पैर उठेंगे। ३८४ - मन का काम, मत करो मन से, काम लो मोक्ष। ३८५ ‍- छात्र तो न हो, शोधार्थी शिक्षक व, प्रयोगधर्मी। ३८६ - दिन में शशि, शर्मिंदा हैं तारायें, घूँघट में है। ३८७ - दीक्षा ली जाती, पद दिया जाता है, सो यथायोग्य । ३८८ - उन्हें न भूलो, जिनसे बचना है, वक़्त-वक्त पे। ३८९ - सूत्र कभी भी, वासा नहीं होता सो, भाव बदलो।(भाव सु-धारो) ३९० - ध्यान काल में, ज्ञान का श्रम कहाँ, पूरा विश्राम। ३९१ - खान-पान हो, संस्कारित शिक्षा से, खान-दान हो। ३९२ - ऐसा संकेत, शब्दों से भी अधिक, हो तलस्पर्शी। ३९३ - हम अधिक, पढ़े-लिखे हैं कम, समझदार ३९४ - मेरी दो आँखें मेरी ओर हजार सतर्क होऊँ। ३९५ - मुक़द्दर है, उतनी ही चद्दर, पैर फैलाओ। ३९६ - घुटने टेक, और घुटने दो न, घोंटते जाओ। ३९७ - अशुद्धि मिटे, बुध्दि की वृध्दि न हो। विशुध्दि बढ़े। ३९८ - गोबर डालो, मिट्टी में सोना पालो, यूरिया राख। ३९९ - हमसे उन्हें, पाप बंध नहीं हो, यही सेवा है। ४०० - प्राणायाम से, श्वास का मात्र न हो, प्राण दस है। ४०१ - देख रहा हूँ, देख न पा रही है, वे आँखें मुझे। ४०२ - दुस्संगति से बचो, सत् संगति में, रहो न रहो। ४०३ - दुर्ध्यान से तो, दूर रहो सध्यान, करो न करो। ४०४ - कर्रा न भले, टर्रा न हो तो पक्का, पक सकोगे। ४०५ - अंधाधुँध यूँ, महाबंध न करो, अंधों में अंधों। ४०६ - कमी निकालो, हम भी हम होंगे, कहाँ न कमी। ४०७ - लज्जा आती है, पलकों को बना ले, घूँघट में जा। ४०८ - कड़वी दवा, उसे रुचति जिसे, आरोग्य पाना। ४०९ - स्व आश्रित हूँ , शासन प्रशासन, स्वशासित हैं। ४१० - सागर शांत, मछली अशांत क्यों ? स्वाश्रित हो जा। ४११ - कोठिया नहीं, छप्पर फाड़ देती, पक्की आस्था हो। ४१२ - धनी से नहीं, निर्धनी निर्धनी से, मिले सुखी हो। ४१३ - दण्डशास्त्र क्यों ? जैसा प्रभू ने देखा, जो होना हुआ। ४१४ - ईर्ष्या क्यों करो. ईर्ष्या तो बड़ों से हो, छोटे क्यों बनो ? ४१५ - टूट चुका है, बिखरा भर नहीं, कभी जुड़ा था। ४१६ - तपस्या नहीं, पैरों की पूजा देख, आँखें रो रही। ४१७ - भिन्न क्या जुड़ा ? अभिन्न कभी टूटा, कभी सोचा भी ? ४१८ - कौन किससे ? कम है मत कहो, मैं क्या कम हूँ ? ४१९ - त्याग का त्याग, अभी न बुझे आग, पानी का त्याग। ४२० - प्रेरणा तो दूँ , निर्दोष होने बचो, दोष से आप। ४२१ - यात्रा वृत्तांत, ‘‍’लिख रहा हूँ वो भी”, बिन लेखनी। ४२२ - मन की बात ”सुनना नहीं होता” मोक्षमार्ग में। ४२३ - ठंडे बस्ते में ”मन को रखो फिर” आत्मा में डूबो।(आत्मा से बोलो) ४२४ - खाली हाथ ले ”आया था जाना भी है” खाली हाथ ले। ४२५ - आँखें देखती ”मन याद करता” दोनों में मैं हूँ। ४२६ - दिख रहा जो ‘दृष्टा नहीं दृष्टा सो” दिखता नहीं। ४२७ - आग से बचा ‘धूंवा से जला (व्रती) सा, तू” मद से घिरा। ४२८ - चूल को देखूँ ‘मूलको बंदू भूल” आमूल चूल। ४२९ - अंधी दौड़ में ”आँख वाले हो क्यों तो” भाग लो सोचो। ४३० - महाकाव्य भी ”स्वर्णाभरण सम” निर्दोष न हो। ४३१ - पैरों में काँटे ”गड़े आँखों में फूल” आँखें क्यों चली। ४३२ - चक्री भी लौटा ”समवशरण से ” कारण मोह। ४३३ - दर्शन से ना ”ज्ञान से आज आस्था” भय भीत है। ४३४ - एकता में ही ”अनेकांत फले सो” एकांत टले। ४३५ - पीठ से मैत्री ”पेट ने की तब से” जीभ दुखी है। ४३६ - सूर्य उगा सो ”सब को दिखता क्यों” आँखे तो खोलो। ४३७ - अंधे बहरे ”मूक क्या बिना शब्द” शिक्षा ना पाते। ४३८ - पद यात्री हो ”पद की इच्छा बिन” पथ पे चलूँ। ४३९ - सही चिंतक ”अशोक जड़ सम” सखोल जाता। ४४० - बिन्दु की रक्षा, सिन्धु में नहीं बिन्दु, बिन्दु से मिले। ४४१ - भोग के पीछे, भोग चल रहा है, योगी है मौन। ४४२ - श्वेत पे काला, या काले पे श्वेत हो, मंगल कौन? ४४३ - थोपी योजना, पूर्ण होने से पूर्व, खण्डहर सी। ४४४ - हिन्दुस्थान में, सफल फिसल के, फसल होते। ४४५ - शब्दों में अर्थ, यदि भरा किससे, कब क्यों बोलो। ४४६ - व्यंजन छोडूँ, गूंग है पढूँ है सो, स्वर में सनूँ। ४४७ - कटु प्रयोग, उसे रूचता जिसे, आरोग्य पाना। ४४८ - एक से नहीं, एकता से काम लो, काम कम हो। ४४९ - बड़ों छोटो पे, वात्सल्य विनय से, एकता पाये। ४५० - शब्दों में अर्थ, है या आत्मा में इसे, कौन जानता। ४५१ - असत्य बचे, बाधा न सत्य कभी, पिटे न बस। ४५२ - किसे मैं कहूँ, मुझे मैं नहीं मिला, तुम्हें क्या (मैं) मिला। ४५३ - मण्डूक बनो, कूप मण्डूक नहीं, नहीं डूबोगे। ४५४ - किस मूढ़ में, मोड़ पे खड़ा सही, मोड़ा मुड़ जा। ४५५ - बहुत सोचो, कब करो ना सोचे, करो लुटोगे। ४५६ - मरघट पे जमघट है शव, कहता लौटूँ। ४५७ - ज्ञानी बने हो, जब बोलो अपना, स्वाद छूटता। ४५८ - कोहरा को ना, को रहा कोहरे में, ढली मोह है। ४५९ - जल में नाव, कोई चलाता किंतु, रेत में मित्रों। ४६० - रोते को देख, रोते तो कभी और, रोना होता है। ४६१ - तुम्बी तैरती, तारती औरों को भी, गीली क्या सूखी? ४६२ - भली नासिका, तू क्यों कर फूलती, मान हानि में। ४६३ - कैदी हूँ, देह, जेल में जेलर ना, तो भी वहीं हूँ। ४६४ - हाथ कंगन, बिना बोले रहे, दो, बर्तन क्यों ना? ४६५ - बंदर कूंदे, अचूक और उसे, अस्थिर कहो। ४६६ - सहजता औ, प्रतिकार का भाव, बेमेल रहे। ४६७ - पर की पीड़ा, अपनी करुणा की, परीक्षा लेती। ४६८ - परिचित भी, अपरिचित लगे, स्वस्थ ज्ञान को। ४६९ - पक्की नींव है, घर कच्चा है छांव, घनी है बस। ४७० - कर्त्तव्य मान, ऋण रणांगन को, पीठ नहीं दो। ४७१ - पगडंडी में, डंडे पड़ते तो क्या, राजमार्ग में? ४७२ - प्रतिशोध में, बोध अंधा हो जाता, शोध तो दूर। ४७३ - मैं क्या जानता, क्या क्या न जानता सो, गुरु जी जानें। ४७४ - धनिक बनो, अधिक वैधानिक, पहले बनो। ४७५ - दर्पण कभी, न रोया श्रद्धा कम, क्यों रोओ हँसो। ४७६ - है का होना ही, द्रव्य का प्रवास है, सो सनातन। ४७७ - सन्निधिता क्यों, प्रतिनिधि हूँ फिर, क्या निधि माँगू। ४७८ - सब अपने, कार्यों में लग गये, मन न लगा। ४७९ - बाहर आते, टेड़ी चाल सर्प की, बिल में सीधी | ४८० - मनोनुकूल , आज्ञा दे दूँ कैसे दूँ, बंधा विधि से | ४८१ - उत्साह बढ़े, उत्सुकता भगे तो, अगाध धैर्य |(गाम्भीर्य बढ़े) ४८२ - दोनों ना चाहो, एक दूसरे को या, दोनों में एक |(कोई भी एक) ४८३ - पुरुष भोक्ता, नारी भोक्त्र ना मुक्ति, दोनों से परे | ४८४ - कचरा डालो, अधकचरा नहीं, खाद तो डालो | ४८५ - कचरा बनूँ, अधकचरा नहीं, खाद तो बनूँ | ४८६ - बाहर टेड़ा, बिल में सीधा होता, भीतर जाओ | ४८७ - वैधानिक तो, तनिक बनो फिर, अधिक धनी | ४८८ - ऊधम नहीं, उद्द्यम करो बनो, दमी आदमी | ४८९ - आज सहारा, हाय को है हायकू कवि के लिये | ४९० - ध्वनि न देओ, गति / मति धीमी हो, निजी, और औरों की | ४९१ - तिल की ओट ,पहाड़ छुपा ज्ञान , ज्ञेय से बड़ा | ४९२ - एकजुट हो, एक से नहीं जुड़ो, बेजोड़ जोड़ो | ४९३ - डूबना ध्यान, तैरना सामायिक, डूबो तो जानो | ४९४ - सामायिक में, करना कुछ नहीं, शांत बैठना | ४९५ - दायित्व भार, कंधो पर आते ही, शक्ति आ जाती | ४९६ - दवा तो दवा, कटु या मीठी जब, आरोग्य पान | ४९७ - ज्ञान के सदृश, आस्था भी भीती से सो, कंपती नहीं | ४९८ - कब और क्यों, जहाँ से निकला सो, स्मृति में लाओ |
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    संसारी जीव शरीर के माध्यम से ही सुख - दु:ख का अनुभव करता है | ये शरीर कितने प्रकार के होते हैं, शरीर किसके लिए उपकारी है.आदि का वर्णन इस अध्याय में है। 1. शरीर किसे कहते हैं ? जो विशेष नाम कर्म के उदय से प्राप्त होकर शीर्यन्ते अर्थात् गलते हैं, वे शरीर हैं। अथवा अनन्तानन्त पुद्गलों के समवाय का नाम शरीर है। 2. शरीर कितने प्रकार के होते हैं ? शरीर पाँच प्रकार के होते हैं औदारिक शरीर - मनुष्य और तिर्यच्चों का जो शरीर सड़ता, गलता है, वह औदारिक शरीर है। यह उराल अर्थात् स्थूल होता है। इसलिए औदारिक कहलाता है। उराल, स्थूल एकार्थवाची हैं। (ध.पु.14/322) वैक्रियिक शरीर - छोटा, बड़ा, हल्का, भारी, अनेक प्रकार का शरीर बना लेना विक्रिया कहलाती है। विक्रिया ही जिस शरीर का प्रयोजन है, वह वैक्रियिक शरीर कहलाता है। आहारक शरीर - छठवें गुणस्थानवर्ती मुनि को सूक्ष्म तत्व के विषय में जिज्ञासा होने पर उनके मस्तक से एक हाथ ऊँचा पुतला निकलता है, जहाँ कहीं भी केवली, श्रुतकेवली होते हैं, वहाँ जाकर अपनी जिज्ञासा का समाधान करके वापस आ जाता है। इसे आहारक शरीर कहते हैं। आहारक शरीर छठवें (प्रमतविरत गुणस्थान) गुणस्थानवर्ती मुनि के होता है एवं भाव पुरुषवेद वाले मुनि को होता है। इसके साथ उपशम सम्यकदर्शन, मन:पर्ययज्ञान एवं परिहार विशुद्धि संयम का निषेध है। तैजस शरीर - औदारिक वैक्रियिक और आहारक इन तीनों शरीरों को कान्ति देने वाला तैजस शरीर कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है। अनिस्सरणात्मक तैजस - जो संसारी जीवों के साथ हमेशा रहता है। निस्सरणात्मक तैजस - जो मात्र ऋद्धिधारी मुनियों के होता है, यह दो प्रकार का होता है। अ. शुभ तैजस - जगत् को रोग, दुर्भिक्ष आदि से दुखित देखकर जिसको दया उत्पन्न हुई है, ऐसे महामुनि के शरीर के दाहिने कंधे से सफेद रंग का सौम्य आकार वाला एक पुतला निकलता है, जो 12 योजन में फैले दुर्भिक्ष, रोग आदि को दूर करके वापस आ जाता है। ब. अशुभ तैजस - मुनि को तीव्र क्रोध उत्पन्न होने पर 12 योजन तक विचार की हुई विरुद्ध वस्तु को भस्म करके और फिर उस संयमी मुनि को भस्म कर देता है। यह मुनि के बाएँ कंधे से निकलता है यह सिंदूर की तरह लाल रंग का बिलाव के आकार का 12 योजन लंबा सूच्यंगुल के संख्यात भाग प्रमाण मूल विस्तार और नौ योजन चौड़ा रहता है। अथवा लाऊडस्पीकर के आकार का। 5. कार्मण शरीर - ज्ञानावरणादि 8 कर्मों के समूह को कार्मण शरीर कहते हैं। 3. औदारिक शरीर तो स्थूल होता है फिर और शरीर कैसे होते हैं ? आगे-आगे के शरीर सूक्ष्म होते हैं। औदारिक शरीर से वैक्रियिक शरीर सूक्ष्म होता है। वैक्रियिक शरीर से आहारक शरीर सूक्ष्म होता है। आहारक शरीर से तैजस शरीर सूक्ष्म होता है। तैजस शरीर से कार्मण शरीर सूक्ष्म होता है। (तसू,2/37) 4. आगे-आगे के शरीर सूक्ष्म होते हैं, तो उनके प्रदेश (परमाणु) भी कम-कम होते होंगे ? नहीं। औदारिक शरीर से असंख्यात गुणे परमाणु वैक्रियिक शरीर में होते हैं। वैक्रियिक शरीर से असंख्यात गुणे परमाणु आहारक शरीर में होते हैं। आहारक शरीर से अनन्त गुणे परमाणु तैजस शरीर में होते हैं और तैजस शरीर से अनन्त गुणे परमाणु कार्मण शरीर में होते हैं। (तसू,2/38-39) मान लीजिए पाँच प्रकार के मोदक हैं, जो आकार में क्रमशः सूक्ष्म हैं, किन्तु उन में प्रदेश (दाने) ज्यादा-ज्यादा हैं। जैसे-मक्का की लाई (दाने)से बना लड्डू, ज्वार की लाई से बना लड्डू, नुकती (बूदी) का लड्डू, राजगिर का लड्डू एवं मगद (वेसन) का लड्डू। मक्का के लड्डू से आगे-आगे के लड्डू सूक्ष्म होते हैं किन्तु उनमें प्रदेश (दाने) ज्यादा हैं। इसी प्रकार क्रमश: शरीर सूक्ष्म, किन्तु प्रदेश ज्यादा हैं। 5. एक साथ एक जीव में अधिक-से-अधिक कितने शरीर हो सकते हैं ? एक जीव में दो को आदि लेकर चार शरीर तक हो सकते हैं। किसी के दो शरीर हों तो तैजस और कार्मण। तीन हों तो तैजस, कार्मण और औदारिक अथवा तैजस, कार्मण और वैक्रियिक। चार हों तो तैजस, कार्मण, औदारिक और वैक्रियिक शरीर (ध.पु., 14/237–238) अथवा तैजस, कार्मण, औदारिक और आहारक। एक साथ पाँच शरीर नहीं हो सकते क्योंकि वैक्रियिक तथा आहारक ऋद्धि एक साथ नहीं होती है। 6. कौन से शरीर के स्वामी कौन-सी गति के जीव हैं ? तैजस और कार्मण सभी संसारी जीव। औदारिक मनुष्य एवं तिर्यञ्च। वैक्रियिक नारकी एवं देव। वैक्रियिक मनुष्य (लब्धि वाल')एवं तिर्यञ्च । (रा.वा.,2/47/4) आहारक मनुष्य (प्रमत गुणस्थान वाले मुनि) तैजस (लब्धि वाला) मनुष्य (प्रमत्त गुणस्थान वाले मुनि) 7. कौन-कौन से शरीर अनादिकाल से जीव के साथ लगे हैं ? जैसे-चन्द्र, सूर्य के नीचे राहु, केतु लगे हुए हैं, वैसे ही प्रत्येक जीव के साथ तैजस और कार्मण शरीर अनादिकाल से लगे हुए हैं। 8. कौन-कौन से शरीर को हम चक्षु इन्द्रिय से देख सकते हैं ? चक्षु इन्द्रिय से हम मात्र औदारिक शरीर को देख सकते हैं। वैक्रियिक शरीर को हम नहीं देख सकते,किन्तु देव विक्रिया के माध्यम से दिखाना चाहें तो दिखा सकते हैं। आहारक शरीर को भी हम नहीं देख सकते हैं। तैजस और कार्मण तो और भी सूक्ष्म हैं। 9. कौन-कौन से शरीर किसी से प्रतिघात को प्राप्त नहीं होते हैं ? तैजस और कार्मण शरीर किसी से प्रतिघात को प्राप्त नहीं होते हैं। प्रतिघात- मूर्तिक पदार्थों के द्वारा दूसरे मूर्तिक पदार्थ को जो बाधा आती है, उसे प्रतिघात कहते हैं। 10. कौन-कौन से शरीर भोगने में आते हैं ? जिनमें इन्द्रियाँ होती हैं। जिनके द्वारा जीव विषयों को भोगता है। ऐसे तीन शरीर भोगने योग्य हैं। औदारिक, वैक्रियिक एवं आहारक। शेष दो शरीर (तैजस तथा कार्मण) भोगने योग्य नहीं है। 11. क्या शरीर दु:ख का कारण है ? हाँ। हे आत्मन् ! इस जगत् में संसार से उत्पन्न जो-जो दुख जीवों को सहने पड़ते हैं, वे सब इस शरीर के ग्रहण से ही सहने पड़ते हैं। इस शरीर से निवृत्त होने पर कोई दुख नहीं है। 12. शरीर किसके लिए उपकारी है ? जिसने संसार से विरत होकर इस शरीर को धर्म पालन करने में लगा दिया है। उसके लिए यह मानव का शरीर उपकारी है।
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    सात कर्मो का बन्ध प्रति समय होता रहता है किन्तु आयु कर्म का बन्ध कब होता है, उसकी आबाधा कितनी है, अकाल मरण क्या है आदि का वर्णन इस अध्याय में है। 1. आयु कर्म किसे कहते हैं ? (अ) जिसके द्वारा जीव नारकादि भवों को जाता है, वह आयु कर्म है। (ब) जो भव धारण के लिए ले जाता है, वह आयु कर्म है। (स) जो जीव को गति विशेष में रोके रखता है, वह आयु कर्म है। 2. आयु कर्म का बन्ध कितने अपकर्ष काल में होता है एवं अपकर्ष काल किसे कहते हैं ? आयु कर्म का बन्ध आठ अपकर्ष काल में होता है। आयु बन्ध के योग्य काल को अपकर्ष काल कहते हैं। 3. कर्मभूमि के मनुष्यों एवं तिर्यञ्चों में आयु बन्ध कब होता है ? आयु के त्रिभाग में आठ अपकर्ष पड़ते हैं। जैसे - किसी मनुष्य की आयु 729 वर्ष की है, तो 486 वर्ष तक आयुबन्ध होगा ही नहीं, शेष 243 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक आयुबन्ध होगा। यहाँ न हुआ तो इसी प्रकार आगे-आगे क्रमशः त्रिभाग करेंगे। 243 वर्ष - 162 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 81 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक। 81 वर्ष - 54 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 27 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक। 27 वर्ष - 18 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 9 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक। 9 वर्ष - 6 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 3 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक। 3 वर्ष - 2 वर्ष तक नहीं होगा। शेष 1 वर्ष के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक। 1 वर्ष – 8 माह तक नहीं होगा। शेष 4 माह के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक। 120 दिन - 80 दिन तक नहीं होगा । शेष 40 दिन के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक। इन आठ अपकर्ष काल में आयु बन्ध नहीं हुआ तो 'असंक्षेपाद्धाकाल' (आँवली का संख्यातवाँ भाग) प्रमाण आयु शेष रहने पर नियम से आयुबन्ध होगा। जैसे - रेल्वे स्टेशन के टिकट घर में लिखा रहता है, गाड़ी छूटने के पाँच मिनट पहले टिकट घर बन्द हो जाएगा। अर्थात् पहले टिकट लो, फिर गाड़ी में बैठो। उसी प्रकार पहले आयु बन्ध कीजिए बाद में दूसरी गति के लिए गाड़ी छूटेगी अर्थात् मरण होगा। आयु कर्म का बन्ध प्रथम अपकर्षकाल से लेकर आठों अपकर्ष कालों में भी हो सकता है। 4. देव एवं नारकियों में आयु बन्ध कब होता है ? भुज्यमान (वर्तमान) आयु के अंतिम छ: माह के आठ अपकर्ष काल में ही आयु बन्ध होता है। 5. भोगभूमि के मनुष्यों एवं तिर्यञ्चों में आयु बन्ध कब होता है ? इनका भी आयु बन्ध आयु के अंतिम 6 माह के 8 अपकर्ष कालों में होता है एवं किन्हीं के मत से अंतिम नौ माह के आठ अपकर्ष कालों में होता है। 6. अकाल मरण क्या है ? भुज्यमान आयु (जो आयु वर्तमान में भोग रहे हैं) जितनी थी, उससे पहले मरण हो जाना अकाल मरण है। 7. अकाल मरण किन-किन कारणों से होता है ? आचार्य श्री कुन्दकुन्द स्वामी ने भावपाहुड, गाथा 25 में अकाल मरण के निम्न कारण कहे हैं विसवेयण रक्तक्खय भय सत्थगहण संकिलेसाण। आहारुस्सासाणं णिरोहणा खिजए आउ॥ अर्थ - विष की वेदना, रक्तक्षय, भय, शस्त्र की चोष्ट, संक्लेश तथा आहार एवं श्वासोच्छास के निरोध से आयु क्षीण हो जाती है, उसे अकाल मरण या कदलीघात मरण कहते हैं। 8. अकाल मरण क्या चारों गतियों में होता है ? नहीं। देव, नारकी एवं भोगभूमि के मनुष्य - तिर्यज्चों का अकाल मरण नहीं होता है। मात्र कर्मभूमि के मनुष्यों एवं तिर्यच्चों का होता है। 9. क्या सभी मनुष्यों एवं तिर्यञ्चों का अकाल मरण होता है ? नहीं। जिस जीव ने आगामी आयु का बन्ध (बद्धायुष्क) कर लिया है, उसका अकाल मरण नहीं होता है एवं चरमोत्तम देह वालों का भी नहीं होता, किन्तु चरम देह वालों का अकाल मरण हो सकता है, जैसे पाण्डव आदि। उत्तम देह वालों का भी अकाल मरण हो सकता है, जैसे-सुभौम चक्रवर्ती, कृष्ण, ब्रह्मदत चक्रवर्ती का हुआ था। जो चरम देह एवं उत्तम देह वाले भी हैं, ऐसे चरमोत्तम देहधारी मात्र तीर्थंकर को छोड़कर सभी का अकालमरण संभव है। (त.वृ, 2/53/110) किन्तु आचार्य अकलंकदेव ने राजवार्तिक ग्रन्थ (2/53/6-9) में चरम शब्द उत्तम का विशेषण लिया है। अत: चरमदेह वालों की अकाल मृत्यु नहीं होती है। 10. अकाल मरण कैसे होता है, उदाहरण द्वारा बताइए ? एक मिट्टी का घड़ा है, उसमें पानी भरा हुआ है। उस घड़े में एक छिद्र है, जिसमें से एक-एक बूंद पानी गिर रहा है, वह घड़ा मान लीजिए 24 घंटे में खाली होता है। उस घड़े को किसी ने पत्थर मार दिया तो पूरा पानी एक साथ बाहर आ गया । उसी प्रकार आयु कर्म के निषेक (एक समय में जितने कर्म परमाणु उदय में आते हैं उनका समूह) हैं, प्रतिसमय खिर (निकल) रहे हैं। इसी प्रकार किसी ने शरीर का घात आदि कर दिया तो एक साथ सारे निषेक खिर जाते हैं। यही अकाल मरण है। 11. भुज्यमान आयु किसे कहते हैं एवं क्या हम भुज्यमान आयु का अपकर्षण-उत्कर्षण कर सकते हैं ? जो आयु वर्तमान में भोग रहे वह भुज्यमान आयु है। भुज्यमान आयु का उत्कर्षण तो नहीं हो सकता है किन्तु अपकर्षण हो सकता है। 12. क्या बध्यमान आयु का अपकर्षण-उत्कर्षण होता है ? बध्यमान आयु का उत्कर्षण एवं अपकर्षण भी होता है। उत्कर्षण तो अपकर्ष काल में ही होता है किन्तु अपकर्षण कभी भी हो सकता है। जैसे-रेत से भरा एक ट्रक जा रहा है, उसमें से थोड़ी-थोड़ी रेत गिर रही है, अर्थात् अपकर्षण हो रहा है, किन्तु उत्कर्षण करना है अर्थात् उस ट्रक में और रेत डालना है, तो ट्रक को खड़ा करना पड़ेगा तब उसमें और रेत डाल सकते हैं। अर्थात् उत्कर्षण अपकर्ष काल में ही होता है एवं अपकर्षण कभी भी हो सकता है। 13. आठ अपकर्ष कालों में बंधी आयु का समीकरण क्या है ? पहले अपकर्ष काल में 100 वर्ष की आयु का बन्ध किया, दूसरे अपकर्ष काल में 120 वर्ष की आयु का बन्ध किया तो मुख्यता 120 वर्ष की रहेगी। इसी प्रकार प्रथम अपकर्ष काल में 100 वर्ष की आयु का बन्ध किया, दूसरे अपकर्ष काल में 80 वर्ष की आयु का बंध किया तो मुख्यता 100 वर्ष की रहेगी। (गो.क.जी., 643) 14. आयु कर्म की आबाधा कितनी है ? आयु कर्म की उत्कृष्ट आबाधा एक पूर्व कोटि का त्रिभाग है एवं जघन्य आबाधा असंक्षेपाद्धा काल प्रमाण (ऑवली का संख्यातवां भाग) होती है। (गोक,917) 15. आबाधा किसे कहते हैं ? कर्मबन्ध होने के बाद जब तक वह उदय में नहीं आता है, तब तक उसे आबाधा काल कहते हैं। जैसे खीर बनकर तैयार हो गयी किन्तु तुरन्त (उसी समय) नहीं खा सकते हैं, जब थोड़ी ठंडी हो जाती है, तब खाते हैं। जो ठंडी होने का समय है, उसे आबाधाकाल कहते हैं। 16. क्या संक्लेश परिणामों से अकालमरण होता है ? हाँ। अधिक तनाव, अत्यधिक परिश्रम एवं पारिवारिक कलह से बढ़ता हुआ संक्लेश भी अकालमरण का कारण बनता है। 17. बध्यायुष्क किसे कहते हैं एवं क्या बध्यायुष्क सम्यकदर्शन प्राप्त कर सकता है ? जिसने आगामी आयु का बन्ध कर लिया, वह बध्यायुष्क कहलाता है। चारों आयु में से किसी भी आयुबन्ध के बाद जीव सम्यकदर्शन प्राप्त कर सकता है। (गोक, 334) 18. क्या बध्यायुष्क संयम प्राप्त कर सकता है ? किसी भी आयु का बन्ध नहीं किया है तो जीव देशसंयम और सकल संयम प्राप्त कर सकता है। देवायु का बन्ध करने के बाद भी जीव देशसंयम और सकल संयम प्राप्त कर सकता है, किन्तु नरकायु, तिर्यच्चायु एवं मनुष्यायु का बन्ध कर लिया है तो जीव देशसंयम या सकल संयम प्राप्त नहीं कर सकता है। (गोक, 334) 19. मरण के बाद जीव को पुन: नवीन शरीर प्रारम्भ करने में कितना समय लगता है ? अधिक-से-अधिक तीन समय। पश्चात् चौथे समय में शरीर की रचना प्रारम्भ कर ही लेता है। मरण के बाद जीव का गमन श्रेणी के अनुसार होता है। लोक के मध्य से लेकर ऊपर नीचे और तिरछे क्रम से स्थित आकाश प्रदेशों की पंक्ति को श्रेणी कहते हैं। जैसे - ग्राफ पेपर या वस्त्र में ताने-बाने होते हैं। 20. जीव मरण के बाद सीधा ही गमन करता है या मुड़ता भी है ? दोनों प्रकार से। जिसमें जीव को मुड़ना पड़ता है, उसे विग्रहगति कहते हैं या विग्रह अर्थात् शरीर के लिए जो गति होती है, उसे विग्रहगति कहते हैं। जिसमें जीव को मुड़ना नहीं पड़ता, उसे ऋजुगति कहते हैं। (स.सि., 2/25/310) 21. विग्रह गतियाँ कितने प्रकार की हैं ? विग्रहगतियाँ चार प्रकार की हैं - इषुगति - धनुष से छूटे हुए वाण के समान मोडे से रहित गति को इषुगति कहते हैं। इसमें एक समय लगता है। पाणिमुक्ता गति - जैसे - हाथ से छोड़े गए द्रव्य की एक मोडे वाली गति को पाणिमुक्ता गति कहते हैं। इसमें दो समय लगते हैं। लांगलिका गति - जैसे - हल में दो मोड़े होते हैं। उसी प्रकार दो मोड़े वाली गति को लांगलिका गति कहते हैं। इसमें तीन समय लगते हैं। गोमूत्रिका गति - जैसे-गाय चलते समय मूत्र (पेशाब) करती है, तब अनेक अर्थात् तीन मोड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार तीन मोडे वाली गति को गोमूत्रिका गति कहते हैं। इसमें चार समय लगते हैं। 22. विग्रह और अविग्रह गति के स्वामी कौन हैं ? मुक्त जीव की गति विग्रह रहित ही होती है और संसारी जीवों की गति विग्रह रहित व विग्रह सहित दोनों प्रकार की होती है।
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    संसार में सबसे ज्यादा ईमानदार है तो वह है कर्म। मुनि हो, श्रावक हो, राजा हो या रंक, युवा हो या वृद्ध, कर्म किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। जीव जैसा कर्म करता है वैसा ही उसे फल मिलता है। कर्म किसे कहते हैं, कितने होते हैं, उनका बन्ध किन कारणों से होता है, आदि का वर्णन इस अध्याय में है। 1. कर्म किसे कहते हैं ? जिसके द्वारा आत्मा पर तंत्र किया जाता है, उसे कर्म कहते हैं। 2. कर्म के अस्तित्व को कैसे जान सकते हैं ? जीव और कर्म का अनादिकाल से सम्बन्ध चला आ रहा है। मैं हूँ इस अनुभव से जीव जाना जाता है। संसार में कोई गरीब है, कोई अमीर है, कोई बुद्धिमान है, कोई बुद्धिहीन है, कोई रोगी है, कोई स्वस्थ है, इस विचित्रता से कर्म के अस्तित्व को जान सकते हैं। 3. कर्म किस प्रकार आते हैं ? जैसे अग्नि से गर्म किया हुआ लोहे का गोला पानी में डालते ही सब तरफ से पानी को ग्रहण करता है, वैसे ही संसारी आत्मा मन - वचन - काय की क्रियाओं से प्रति समय आत्म प्रदेशों से कर्म ग्रहण करता है, हमारे ही रागद्वेष परिणाम से कर्म आते हैं। 4. कर्म कितने प्रकार के होते हैं ? कर्म आठ प्रकार के होते हैं ज्ञानावरण कर्म - जो आत्मा के ज्ञान गुण को ढकता है, वह ज्ञानावरण कर्म है। दर्शनावरण कर्म - जो आत्मा के दर्शन गुण को ढकता है, वह दर्शनावरण कर्म है। वेदनीय कर्म - जो सुख-दुख का वेदन (अनुभूति) कराता है, वह वेदनीय कर्म है। मोहनीय कर्म - जो आत्मा के सम्यक्त्व और चारित्र गुण को घातता है, वह मोहनीय कर्म है। आयु कर्म - जो प्राणी को मनुष्य आदि के शरीर में रोके रखता है, वह आयु कर्म है। नाम कर्म - जो अच्छे - बुरे शरीर की संरचना करता है, वह नाम कर्म है। गोत्र कर्म - जिस कर्म के उदय से जीव को नीच व उच्च गोत्र की प्राप्ति होती है, वह गोत्र कर्म है। अंतराय कर्म - जो दान, लाभ, भोग, उपभोग एवं वीर्य में विध्न डालता है, वह अंतराय कर्म है। 5. आठ कर्मों के कार्यों को दर्शाने के लिए कौन-कौन से उदाहरण दिए गए हैं ? आठ कर्मों के कार्यों को दर्शाने के लिए निम्न उदाहरण दिए गए हैं ज्ञानावरण कर्म - देवता के मुख पर ढके वस्त्र के समान। दर्शनावरण कर्म - द्वारपाल के समान। वेदनीय कर्म - शक्कर की चाशनी से लपेटी तलवार के समान । मोहनीय कर्म - मदिरा के समान। आयु कर्म - बेडी के समान। नाम कर्म - चित्रकार (पेंटर) के समान। गोत्र कर्म - कुम्भकार के समान। अन्तराय कर्म - भण्डारी के समान। 6. इन आठ कर्मों में कितने घातिया और कितने अघातिया हैं ? घातिया कर्म भी चार हैं एवं अघातिया कर्म भी चार हैं - घातिया कर्म - जो जीव के गुणों को घातते हैं, वे घातिया कर्म हैं। वे चार हैं:- ज्ञानावरण कर्म, दर्शनावरण कर्म, मोहनीय कर्म और अन्तराय कर्म। (गी.क.,9) अघातिया कर्म - जो उस प्रकार से जीव के गुणों का घात नहीं करते हैं, वे अघातिया कर्म हैं। वे चार हैं :- वेदनीय कर्म, आयु कर्म, नाम कर्म और गोत्र कर्म। (गोक,9) 7. ज्ञानावरण कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? ज्ञानावरण कर्म का बंध निम्न कारणों से होता है - शिक्षा गुरु का नाम छिपाना। किसी के अध्ययन में बाधा डालना । जैसे - बिजली बंद कर देना, पुस्तक फाड़ देना, पुस्तक की चोरी कर लेना आदि। किसी के ज्ञान की महिमा को सुनने के बाद मुख से कुछ न कहकर अंतरंग में ईष्या भाव रखना। ज्ञान के साधनों का दुरुपयोग करना। किसी कारण से मैं नहीं जानता ऐसा कहकर ज्ञान का न देना। ज्ञान होने पर भी ईष्य के कारण ज्ञान न देना। दूसरे के द्वारा प्रकाशित ज्ञान को रोकना। (तसू, 6/10) शास्त्र विक्रय करना आदि कारणों से ज्ञानावरण कर्म का बंध होता है। (रावा, 6/10/20) 8. दर्शनावरण कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? दर्शनावरण कर्म का बंध निम्न कारणों से होता है - दर्शन मात्सर्य, दर्शन अन्तराय, आँखें फोड़ना, इन्द्रियों के विपरीत प्रवृत्ति, दृष्टि का गर्व, दीर्घ निद्रा, दिन में सोना, आलस्य, नास्तिकता, सम्यग्दृष्टि में दूषण लगाना, कुतीर्थ की प्रशंसा, हिंसा करना और यतिजनों के प्रति ग्लानि का भाव आदि दर्शनावरण कर्म के बंध के कारण हैं। (रावा, 6/10/20) 9. वेदनीय कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? वेदनीय कर्म का बंध निम्न कारणों से होता है - अपने में, दूसरे में, या दोनों में विद्यमान दु:ख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन आदि असाता वेदनीय कर्म के बंध के कारण हैं तथा सभी प्राणियों पर अनुकम्पा रखने से, व्रतियों पर अनुकम्पा रखने से, दान देने से, सराग संयम, देशसंयम, बालतप, हृदय में शान्ति रखने से और लोभ का त्याग करने से, साता वेदनीय का बंध होता है। (तसू, 6/11-12) 10. मोहनीय कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? मोहनीय कर्म का बंध निम्न कारणों से होता है - केवली भगवान्, श्रुत, संघ,धर्म एवं देवों में झूठे दोष लगाने से दर्शनमोहनीय अर्थात् मिथ्यात्व का बंध होता है तथा कषायों की तीव्रता से, किसी को चारित्र लेने से रोकने में, चारित्र से भ्रष्ट करने आदि से चारित्र मोहनीय का बंध होता है। (तसू, 6/13-14) 11. आयु कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? आयु कर्म का बंध निम्न कारणों से होता है - नरकायु - बहुत आरम्भ एवं बहुत परिग्रह से। (तसू,6/15) तिर्यञ्चायु - मायाचारी, अतिसंधान, विश्वासघात, विपरीत मार्ग का उपदेश देने से, (ससि,6/1660) किसी का कर्ज न चुकाने आदि से। मनुष्यायु - स्वभाव से मृदुस्वभावी हो, पात्रदान में प्रीति युक्त हो, अल्प आरम्भ, अल्प परिग्रह वाला हो आदि से। (रावा, 6/17) 4. देवायु - संयम पालन करने से, कषाय की मंदता से, दान देने से, तीर्थों की सेवा से, अकामनिर्जरा, बालतप आदि से। (त.सू, 6/20) 12. नाम कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? नाम कर्म के बंध के निम्न कारण हैं - मन, वचन, काय की कुटिलता अर्थात् सोचना कुछ, बोलना कुछ और करना कुछ, चुगलखोरी, चित्त की अस्थिरता, झूठे मापतौल का प्रयोग करने से, किसी को धोखा देने से, अशुभ नाम कर्म का बंध होता है। (रावा, 6/22/1-4) इसके विपरीत मन, वचन, काय की सरलता, चुगलखोरी का त्याग, चित्त की स्थिरता आदि से शुभ नाम कर्म का बंध होता है तथा सोलहकारण भावना से तीर्थंकर शुभ नाम कर्म का बन्ध होता है। (तसू, 6/23) 13. गोत्र कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? गोत्र कर्म के बंध के निम्न कारण हैं - परनिंदा, आत्म प्रशंसा, दूसरे के विद्यमान गुणों को ढकना तथा अपने अविद्यमान गुणों को प्रकट करना, अरिहंत आदि में भक्ति का न होना आदि से नीच गोत्र का बंध होता है तथा इससे विपरीत अपनी निंदा, दूसरे की प्रशंसा, अपने गुणों का आच्छादन (ढकना) तथा पर के गुणों का उद्भावन (प्रकट) करना, अरिहंत आदि में भक्ति युक्त होना, आदि से उच्च गोत्र का बंध होता है। (त.सू., 6/25-26) 14. अन्तराय कर्म का बंध किन-किन कारणों से होता है ? अन्तराय कर्म के बंध के निम्न कारण हैं - दान आदि में बाधा उपस्थित करने से, जिन पूजा का निषेध करने से, निर्माल्य द्रव्य का सेवन करने से तथा अपनी शक्ति को छिपाने से अंतराय कर्म का बंध होता है। (त.सू, 6/27) 15. द्रव्य कर्म, भावकर्म एवं नोकर्म किसे कहते हैं ? द्रव्य कर्म - पुद्गल पिण्ड को द्रव्य कर्म कहते हैं। (गोक,6) या सब शरीरों की उत्पत्ति के मूल कारण कार्मण शरीर को कर्म (द्रव्य कर्म) कहते हैं। (रा.वा,2/25/3) भाव कर्म - पुद्गल पिण्ड में जो फल देने की शक्ति है वह भाव कर्म है (गोका,6)अथवा राग-द्वेष आदि परिणामों को भाव कर्म कहते हैं। नोकर्म - औदारिक, वैक्रियिक, आहारक और तैजस नाम कर्म के उदय से चार प्रकार के शरीर होते हैं। वे नोकर्म शरीर हैं। पाँचवाँ जो कामणि शरीर है, वह तो कर्म रूप ही है। (गो.जी.244) 16. ज्ञानावरणादि कर्म क्या कहते हैं ? ज्ञानावरण कर्म - ज्ञानावरण कर्म कहता है, मैंने बाहुबली जैसे महापराक्रमी को एक वर्ष तक खड़ा रखा केवल ज्ञान नहीं होने दिया। दर्शनावरण कर्म - दर्शनावरण कर्म कहता है मैंने यथाख्यात चारित्र वाले को भी आत्मा का दर्शन नहीं होने दिया और उसे नरक निगोद की यात्रा पुन: करा दी। वेदनीय कर्म - वेदनीय कर्म कहता है मैंने सनतकुमार मुनिराज के शरीर में सात सौ वर्ष तक कुष्ठ रोग कराया। मुनि वादिराज के शरीर में सौ वर्ष तक कुष्ठ रोग कराया। श्रीपाल जैसे कोटिभट्ट को कोढ़ी बनाकर निकलवाया। मोहनीय कर्म - मोहनीय कर्म कहता है मैंने राम जैसे महान् पुरुष को लक्ष्मण के मृतक शरीर को लेकर 6माह तक कंधे पर रखकर घुमवाया। सीता की जंगलो-जंगलो में खोज कराई। उपशम श्रेणी तक के मुनिराज को भी प्रथम गुणस्थान में भिजवाया। आयुकर्म - आयु कर्म कहता है मैंने राजाश्रेणिक जैसे क्षायिक सम्यकद्रष्टि को एवं रावण, सुभौमचक्रवर्ती आदि जीवों को भी नरक में रोक रखा है। नाम कर्म - नाम कर्म कहता है, मैंने अनेक को गूँगा, कुबड़ा, काला, अष्टावक्र (आठ अंग टेडे) बनाया । गोत्र कर्म - गोत्र कर्म कहता है, मैंने बहुतों को ऊँच - नीच कुल में डाला। अंतराय कर्म - अंतराय कर्म कहता है, मैंने आदिनाथ मुनि को 7 माह 9 दिन तक आहार नहीं मिलने दिया। 17. एक जीव के कितने कर्मों का उदय होता है ? प्रथम गुणस्थान से दसवें गुणस्थान तक आठों कर्मों का तथा ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थान में मोहनीय कर्म के अलावा सात कर्मों का एवं तेरहवें और चौदहवें गुणस्थान में चार कर्मों का उदय रहता है।
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