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    सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार

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    होते अनन्य अपने-अपने गुणों से, उत्पद्यमान सब द्रव्य युगों-युगों से।

    ज्यों पीलिमा व मृदुता तजता न सोना, लो कुण्डलादिमय ही लसता सलोना ॥३३०॥

     

    वो जीव लक्षण अनन्य स्वचेतना है, है जीव जीवित तभी जिन देशना है।

    एवं अजीव अपने गुण-पर्ययों से, जीते त्रिकाल चिर से निज लक्षणों से ॥३३१॥

     

    उत्पन्न जो न परकीय पदार्थ से है, आत्मा अतः न परकार्य यथार्थ से है।

    उत्पन्न भी कर रहा पर को नहीं है, आत्मा अतः कि पर कारण भी नहीं है ॥३३२॥

     

    कर्त्ता हमें विदित हो लख कर्म को है, कर्त्ता लखो कि अनुमानित कर्म ही है,

    कर्त्ता व कर्म इनकी विधि बोलती है, ऐसी कहीं न मिलती दृग खोलती है ॥३३३॥

     

    आत्मा विमोहवश ही निज को विसारा, उत्पन्न हो विनशता अघभाव द्वारा।

    रागादिमान इस चेतन का सहारा-ले कर्म भी उपजता मिटता विचारा ॥३३४॥

     

    एवं परस्पर निमित्त बने सकाम, रागी व कर्म बँधते बनते गुलाम।

    संसार का तब प्रवाह अबाध भाता, रागादि भाव मिटता भवनाश पाता ॥३३५॥

     

    मोहादि से यदि प्रभावित हो रहा है, आत्मा अरे स्वयम के प्रति सो रहा है।

    मिथ्यात्व मंडित असंयत है कहाता, अज्ञान जन्य दुख की वह गंध पाता ॥३३६॥

     

    होता न लीन उदयागत कर्म में है, ज्ञानी वही निरत आतम धर्म में है।

    शीघ्रातिशीघ्र मुनि केवल ज्ञान-दर्शी, होता विमुक्त भव से शिव सौख्य-स्पर्शी ॥३३७॥

     

    मक्खी बना मुदित मानस हो मलों में, है मूर्ख मूढ़ रमता विधि के फलों में।

    साक्षी बना, न विधि के फल भोगता है, ज्ञानी वशी न तजता निज योगता है॥३३८॥

     

    निश्चिंत हो निडर हो निज को निहारे, निर्दोष वे निरपराधक साधु प्यारे।

    आराधना स्वयम की करते सुहाते, न तो स्वयं, न पर को, डरते डराते ॥३३९॥

     

    हे भव्य! पूर्ण पढ़ भी जिन-दिव्य वाणी, त्यागे अभव्यपन को न अभव्य प्राणी।  

    मिश्री मिला पय पिलाकर हा अही भी, क्या कालकूट तजता जग में कभी भी? ॥३४०॥

     

    निर्वेग भाव मुनि होकर धारता है, जो मात्र कर्मफल मौन निहारता है।

    साता रहो सुखद, दुःखद हो असाता, ज्ञानी उन्हें न चखता यह साधु-गाथा ॥३४१॥

     

    संभोगते न करते विधि को कदापि, ज्ञानी समाधिरत हो मुनि वे अपापी।

    पै पाप-पुण्य विधि बंधन के फलों को, हैं जानते नमन हो उनके पदों को ॥३४२॥

     

    द्रष्टा बने युगल लोचन देखते हैं, ना दृश्य-स्पर्श करते न हि हर्षते हैं।

    ज्ञानी अकारक अवेदक जानता है, त्यों बंध मोक्ष विधि को तज मानता है॥३४३॥

     

    विख्यात लोकमत है सुर-मानवों का, निर्माण विष्णु करता पशु-नारकों का।

    स्वीकारते श्रमण चूंकि चराचरों को, आत्मा जगाय जगजंगम जन्तुओं को ॥३४४॥

     

    माना कि एक मत में वह विष्णु कर्त्ता, आत्मा रहा इतर में जग जीव कर्त्ता।

    दोनों समा श्रमण-लौकिकवादियों में, पाया न भेद फिर भी इन दो मतों में ॥३४५॥

     

    हाँ मोक्ष की महक ही इनमें न आती, कर्तृत्व की विषम गंध सही न जाती।

    कोई विशेष इनमें न हि भेद भाता, ऐसा सुनों समयसार सदैव गाता ॥३४६॥

     

    मेरे खरे धन मकाँ परिवार आदि, पी मोह मद्य बकता व्यवहारवादी।

    लेते विराम मुनि निश्चय का सहारा, गाते सदा, न पर का अणु भी हमारा ॥३४७॥

     

    कोई यहाँ पुरुष हैं कहते हमारे,ये देश खेट पुर गोपुर प्रान्त प्यारे।

    ये वस्तुतः न उनके बनते कदापि, व्यामोह से जड़ प्रलाप करें तथापि ॥३४८॥

     

    है काय भिन्न पर जानत भी अमानी, शुद्धोपयोग तज के यदि काश! ज्ञानी।

    मानो मदीय तन है इस भाँति बोले, मिथ्यात्व पा नियम से भव बीच डोले ॥३४९॥

     

    ऐसा विचार, पर को अपना न मानो, औ राग त्याग पर को पर रूप जानो।

    कर्त्तरत्ववाद धरते इन दो मतों को, मिथ्यात्व मण्डित लखों उन पामरों को ॥३५०॥

     

    आत्मा सदा मिट रहा निज पर्ययों से, शोभे वही ध्रुव किन्हीं ध्रुव सद्गुणों से।

    एकान्त है यह नहीं ध्रुव दृष्टि द्वारा-कर्ता वही इतर पर्यय दृष्टि द्वारा ॥३५१॥

     

    पर्याय से मिट रहा गुण से नहीं है, आत्मा त्रिकाल ध्रुव भी रहता वही है।

    एकान्त है नहिं, वही ध्रुव भाव द्वारा, भोक्ता, निरा क्षणिक पर्यय भाव द्वारा ॥३५२॥

     

    भोक्ता वही न बनता बन कर्म कर्त्ता, यों बौद्ध लोक कहते निज धर्म हर्त्ता।

    सिद्धान्त जो कि क्षण-भंगुर वादियों का, उद्भ्रान्त है वितथ मात्र कुदृष्टियों का ॥३५३॥

     

    भोक्ता निरा बस निरा बन जाय कर्त्ता, सिद्धान्त बौद्ध यह है अघकार्य कर्त्ता।

    जो भी सहर्ष इसका गुण गीत गाते, सद्धर्म से सरकते विपरीत जाते ॥३५४॥

     

    मिथ्यात्व की प्रकृति पापिन जो कहाती, मिथ्यात्व मण्डित हमें यदि है कराती।

    तो कारिका वह बनी कि अचेतना हो, स्वीकार किन्तु नहिं वो जिन देशना को ॥३५५॥

     

    सम्यक्त्व की प्रकृति पुद्गल को सुहाती, सम्यक्त्व मंडित हमें यदि है कराती।

    तो कारिका वह बनी कि अचेतना हो, स्वीकार पै न यह है जिन देशना को ॥३५६॥

     

    किं वा कहो यदि निजातम ही जड़ों को, मिथ्यात्व रूप करता इन पुद्गलों को,

    मिथ्यात्व पात्र फिर पुद्गल ही बनेगा, आत्मा त्रिकाल फिर शुद्ध बना तनेगा ॥३५७॥

     

    आत्मा तथा प्रकृति ये मिल के जड़ों को, मिथ्यात्वरूप करते इन पुद्गलों को,

    ऐसा कहो यदि तदा जड़के-दलों का, दोनों हिस्वाद चखले विधि के फलों का ॥३५८॥

     

    आत्मा तथा प्रकृति भी न कभी जड़ों को, मिथ्यात्वरूप कहते इन पुद्गलों को।

    ऐसा कहो तदपि पुद्गल ही हुआ है, मिथ्यात्व क्या मत त्वदीय नहीं हुआ है॥३५९॥

     

    अज्ञान का सदन पुद्गल कर्म द्वारा, होता विबोध घर आतम पूर्ण प्यारा।

    है कर्म से विवश होकर गाढ़ सोता, है कर्म के वश सुजागृत पूर्ण होता ॥३६०॥

     

    पा कर्म के फल अतीव सदीव रोते, मिथ्यात्व मंडित असंयत जीव होते।

    हैं डूबते भव पयोनिधि में दुखी हैं, होते कभी क्षणिक पा सुख को सुखी हैं॥३६१॥

     

    आत्मा शुभाशुभ कभी पशु योनियों में, पाता निवास कुछ काल सुरालयों में।

    है कर्म ही नरक में इसको गिराता, संसार के विपिन में सबको भ्रमाता ॥३६२॥

     

    जो भी करे करम ही करता कराता, संसार का रचयिता बस कर्म भाता।

    ऐसा हि सांख्य मत'सा' यदि तू कहेगा, आत्मा अकारक रहा, भव क्या रहेगा ॥३६३॥

     

    स्त्रीवेद को पुरुष वेद सदैव चाहे, पुंवेद को नियम से तियवेद चाहे।

    आचार्य की परम पूत परंपरा है, जो जैन से जबकि स्वीकृत सुन्दर है॥३६४॥

     

    लो बार-बार हम तो कहते इसी से, है ब्रह्मलीन सब जीव सदा रुची से।

    है कर्म-कर्म भर को बस चाहता है, आत्मा जिसे सतत मात्र निहारता है॥३६५॥

     

    होती विनष्ट पर से पर को मिटाती,एकान्त से प्रकृति ही नव जन्म पाती।

    भाई अतः प्रकृति भी परघातवाली, है सर्व सम्मत रही जड़-गात-वाली ॥३६६॥

     

    आत्मा रहा अमर वो मरता नहीं है, औ मारता न पर को कहना सही है।

    तो कर्म-कर्म भर को बस मारता है, यों मात्र सांख्यमत आशय धारता है॥३६७॥

     

    ऐसा हि सांख्यमत से यदि बोलते हो, साधू हुए अमृत में विष घोलते हो।

    रागादि का करन ही बन जाय कर्ता, तो सर्वथा सकल जीव बने अकर्ता ॥३६८॥

     

    आत्मा मदीय करता निज को निजी से, ऐसा त्वदीय मत स्वीकृत हो सदी से।

    तो भी रहा मत नितान्त असत्य तेरा, कूटस्थ नित्य निज में न हि हेर फेरा ॥३६९॥

     

    है एक हेतु इसमें सुन ए हितैषी, आत्मा रहा अमर नित्य असंख्य देशी।

    वो एकसा, न घटता बढ़ता नहीं है, ऐसा रहा कथन आगम का सही है ॥३७०॥

     

    हो केवली समुद्धात त्रिलोक व्यापी, आत्मा प्रमाण तन के, तन में तथापि।

    ऐसी दशा फिर भली उसको बढ़ाता, वो कौन सक्षम उसे क्रमशः घटाता ॥३७१॥

     

    आत्मा त्रिकाल यदि ज्ञायक ही रहा हो, वैराग्य राग किसको कब हो कहाँ हो?

    आत्मा कथंचित अत: विधि से सरागी, हो बोध-धाम तज राग बने विरागी ॥३७२॥

     

    पंचेन्द्रि के विषय चेतन से परे हैं, सम्यक्त्व-बोध-व्रत से नहिं वे भरे हैं।

    हे साधु चेतन, अचेतन का तथापि, कैसा विघात करता ? नहिं वो कदापि ॥३७३॥

     

    दुष्टाष्ट कर्म शुचि चेतन से परे हैं, सम्यक्त्व-बोध-व्रत से नहिं वे भरे हैं।

    हे साधु चेतन, अचेतन कर्म का भी, कैसा विघात करता, नहिं वो कदापि ॥३७४॥

     

    काया अचेतन निकेतन हो तभी है, सम्यक्त्व-बोध-व्रत से न हि वो बनी है।

    हे! साधु चेतन, अचेतन काय का भी, कैसा विघात करता नहिं हा कदापि ॥३७५॥

     

    विज्ञान-चारित-सुदर्शन ये भले ही, संमोह के वश मिटे क्षण में टले ही।

    होता न घात पर पुद्गल का इसी से, गाता यही समयसार सुनो रुची से ॥३७६॥

     

    ज्ञानादि दिव्य गुण आतम में अनेकों, दीखे परन्तु पर पुद्गल में न देखो।

    सम्यक्त्व की मुनि विराग, पराग पीते, पीते न राग विष, सो चिरकाल जीते ॥३७७॥

     

    है जीव की यह अनन्य विभाववाली, संमोह रोष रति की दुखदा प्रणाली।

    रागादि ये इसलिए जड़ में नहीं है, हे साधु तेल, मिलता तिल में सही है ॥३७८॥

     

    भाई बना न सकता पर के गुणों को, कोई पदार्थ, कहते जिन सज्जनों को।

    प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने गुणों से, उत्पन्न हो लस रहे कि युगों-युगों से ॥३७९॥

     

    शिल्पी स्वयं मुकुट आदिक को बनाते, होते न तन्मय नहीं पररूप पाते।

    मोहादि कर्म करता रहता निराला, आत्मा कभी न तजता निज चित्त-शाला ॥३८०॥

     

    हस्तादि से मुकुट आदिक को बनाते, शिल्पी न शिल्पमय किन्तु हुए दिखाते।

    है जीव कर्म करता निज इन्द्रियों से, तादात्म्य पै न रखता उन पुद्गलों से ॥३८१॥

     

    शस्त्रास्त्र शिल्प करने गहता अनेकों, शिल्पी न तन्मय बना वह भिन्न देखो।

    स्वीकारता यदपि कर्म तथापि, पापी, आत्मा न कर्ममय आप बना कदापि ॥३८२॥

     

    है शिल्प कार्य करता धन-धान्य पाता, शिल्पी अनन्य बनता नहिं अन्य भाता।

    नाना प्रकार फल भोग शुभाशुभों के, आत्मा न पुद्गल बना निज बोध खो के ॥३८३॥

     

    आत्मा कुकर्म करता फल चाखता है, ऐसी अवश्य कहती व्यवहारता है।

    पै भोगता व करता परिणाम को ही, ऐसा सुनिश्चय कहे सुन ए विमोही ॥३८४॥

     

    मैं कुण्डलादिक करूँ मन भाव लाता, शिल्पी उसी समय तन्मय हो सुहाता।

    रागादिभाव करता जब जीव ऐसा, तद्रूप आप बन जाय तदीव ऐसा ॥३८५॥

     

    ऐसा विकल्प कर आकुल हो उठेगा, शिल्पी सुनिश्चित दुखी बन वो मिटेगा।

    रागाभिभूत बनना निज भूल जाता, जो जीव दुःखमय हो प्रतिकूल जाता ॥३८६॥

     

    दीवार के वश नहीं खटिका सफेदी, दीवार भिन्न वह भिन्न स्वयं सफेदी।

    है ज्ञेय, ज्ञेय वश ज्ञेय प्रकाशता है, वो ज्ञान, ज्ञान रह ज्ञायक भासता है ॥३८७॥

     

    दीवार के वश नहीं खटिका सफेदी, दीवार भिन्न वह भिन्न स्वयं सफेदी।

    है दृश्य, दृश्य वश दृश्य दिखा रहा है, आत्मा सुदर्शक सुदर्शक भा रहा है ॥३८८॥

     

    दीवार के वश नहीं खटिका सफेदी, दीवार भिन्न वह भिन्न स्वयं सफेदी।

    त्यों त्याज्य त्याज्य पर त्याग न तन्मयी है, साधू स्वयं सहज संयत संयमी है॥३८९॥

     

    दीवार के वश नहीं खटिका सफेदी, दीवार भिन्न वह भिन्न स्वयं सफेदी।

    श्रद्धेय के वश नहीं समदृष्टिवाला, साधू स्वदृष्टि वश ही समदृष्टिवाला ॥३९०॥

     

    ऐसे विबोध-व्रत-दर्शन तीन प्यारे, होते सुनिश्चय सदा अघ हीन सारे।

    संक्षेप में अब सुनो व्यवहार गाता, सन्मार्ग साधक सुनिश्चय का विधाता ॥३९१॥

     

    चूना निसर्ग धवला शशि-सी सुहाती, दीवार को उजल रंग यही दिलाती।

    विज्ञान से विशद विश्व सुजानता है, ज्ञाता बना सहज भाव सुधारता है॥३९२॥

     

    चूना निसर्ग धवला शशि-सी सुहाती, दीवार को उजल रूप यही दिलाती।

    आलोक से सकल लोक-अलोक देखा, द्रष्टा बना विमल दर्शन पा सुरेखा ॥३९३॥

     

    चुना निसर्ग धवला शशि-सी सुहाती, दीवार को उजल रूप यही दिलाती।

    यों जान मान पर को पररूप ज्ञानी, है त्यागता व भजता निजरूप ध्यानी ॥३९४॥

     

    चूना निसर्ग धवला शशि-सी सुहाती, दीवार को उजल रूप यही बनाती।

    जीवादि तत्त्व भर में रख पूर्ण आस्था, सम्यक्त्व धारक चले अनुकूल रास्ता ॥३९५॥

     

    ज्ञानादि जो न निज की करते उपेक्षा, भाई तथापि पर की रखते अपेक्षा।

    सिद्धान्त में बस यही व्यवहार माना, सर्वत्र यों समझना भवपार जाना ॥३९६॥

     

    अज्ञान से विगत में निजभाव बाना, भूला किया अशुभ या शुभ भाव नाना।

    शुद्धात्म को सजग हो उनसे छुड़ाना, माना प्रतिक्रमण आज उसे निभाना ॥३९७॥

     

    भावी शुभाशुभ विभाव विकार देखो! होंगे प्रमादवश आतम में अनेकों।

    आत्मा स्वयं यदि उन्हें निज से हटाता, है प्रत्यख्यान वह है सुख का विधाता ॥३९८॥

     

    तत्काल जो कलुषराग तरंगमाला, है जन्मती हृदय में दुख पूर्ण हाला।

    विज्ञान से बस उसे झट से हटाना, आलोचना वह रही प्रभु का बताना ॥३९९॥

     

    जो प्रत्यख्यान करता रुचिसंग साता, साधू प्रतिक्रमण धार, सदा सुहाता।

    आलोचना सरसि में डुबकी लगाता, चारित्र निश्चय जिसे शिर मैं नवाता ॥४००॥

     

    निन्दामयी स्तुतिमयी वचनावली है, चैतन्य शून्य जड़ पुद्गल की कली है।

    हो रुष्ट तुष्ट उसको सुन मूढ़ ऐसा, मैं निंद्य पूज्य खुद हूँ कर भूल ऐसा ॥४०१॥

     

    जो शब्दरूप ढल पुद्गल द्रव्य भाता, बोला मुझे न कुछ भी मुझसे न नाता।

    हे! मूढ़ क्यों न इस भाँति विचारता है, क्यों रोष-तोष कर होश विसारता है॥४०२॥

     

    वो शब्द हो अशुभ हो शुभ हो ‘सुनो' रे, ऐसा कभी न कहता कि मुझे गुणों रे।

    जो कर्ण का विषय मात्र बना हुवा है, होता गृहीत न, स्वतन्त्र तना हुवा है॥४०३॥

     

    वो रूप! हो अशुभ हो, शुभ हो, लखो रे! ऐसा कहे न कि मुझे दुग से चखो रे!

    वो नेत्र का विषय मात्र बना हुवा है, होता गृहीत न स्वतंत्र तना हुवा है॥४०४॥

     

    वो गंध हो अशुभ या शुभ सूंघ लेना, ऐसा कहे न कि मुझे कुछ मूल्य देना।

    पै नासिका विषय केवल वो बनी है, आती नहीं पकड़ में यह तो सही है॥४०५॥

     

    ऐसा तुम्हें न कहता रस वो कदापि, चाखो मुझे अशुभ या शुभ हो तथापि।

    जिह्वेन्द्रि का विषय हो पर स्वाश्रयी है, आता नहीं पकड़ में न पराश्रयी है॥४०६॥

     

    बोले न स्पर्श कि शुभाशुभ यों किसी से, संस्पर्श तू कर मुझे कर से रुची से।

    पै स्पर्श-स्पर्श रहता वश में न आता, हो काय का विषय वो पर भिन्न भाता ॥४०७॥

     

    जानों हमें गुण शुभा-शुभ ये कदापि, ऐसा न बाध्य करते तुमको अपापी।

    वे बुद्धि के विषय मात्र बने हुए हैं, होते नहीं वश स्वतंत्र तने हुए हैं ॥४०८॥

     

    अच्छे बुरे सब पदार्थ हमें पिछानो, ऐसा कभी न कहते कि हमें सुजानो।

    वे बुद्धि के विषय मात्र बने हुए हैं, होते नहीं वश स्वतंत्र तने हुए हैं ॥४०९॥

     

    यों तत्त्व की पकड़ से रह मूढ़ रीता, जीता पिपासु बन, साम्य सुधा न पीता।

    सम्भोग का रसिक मात्र परानुरागी, विज्ञान से विरत है विधि से सरागी ॥४१०॥

     

    आए हुए उदय में विधि के फलों को, आत्मीय मान, चखता जड़ के दलों को।

    मोही नवीन विधि के दुख बीज बोता, खोता विवेक चिर औ भव बीच रोता ॥४११॥

     

    आए हुए उदय में विधि के फलों को, है भोगता तज कुधी निज में गुणों को।

    मैंने किया यह सभी जब मान लेता, मोही नवीन दुख को पुनि माँग लेता ॥४१२॥

     

    आए हुए उदय में विधि के फलों को, जो भोगता तज कुधी निज के गुणों को।

    मोही दुखी यदि सुखी नित हो रहा है, हा! दुःख बीज विधि के पुनि बो रहा है ॥४१३॥

     

    है जानता स्वपर को न कभी निजी से, वो शास्त्र, ज्ञान नहिं हो सकता इसी से।

    पै शास्त्र शास्त्र जड़' केवल नाम पाता, पै ज्ञान, ज्ञान बस चेतनधाम भाता ॥४१४॥

     

    ये शब्द ज्ञान नहिं हो सकते इसी से, वे जानते न पर को निज को निजी से।

    पै शब्द शब्द पर पुद्गल है निराला, पै ज्ञान ज्ञान बस चेतन है निहाला ॥४१५॥

     

    रे! रूप, ज्ञान नहिं है जिन हैं बताते, वे क्योंकि आप-पर को नहिं जान पाते।

    तो रूप रूप जड़कूप निरा निरा है, औ ज्ञान ज्ञान जगभूप निरा खरा है॥४१६॥

     

    ना जानता वह कभी कुछ भी यतः है, रे वर्ण ज्ञान नहिं हो सकता अतः है।

    हो वर्ण वर्ण, यह वर्णन वर्ण का है, हो ज्ञान ज्ञान, मत दिव्य जिनेन्द्र का है॥४१७॥

     

    जो जानता न कुछ भी जड़ की निशानी, है ‘गंध' ज्ञान नहिं है यह वीर वाणी।

    हो ‘गंध' ‘गंध' भर ही यह गंध गाथा, हो ज्ञान ज्ञान ध्रुव जीवन संग-नाता ॥४१८॥

     

    ना जानता रस कभी रस को यतः है, होता न ज्ञान रस वो रस ही अतः है।

    है ज्ञान भिन्न रस भिन्न निरे निरे हैं, ऐसा कहें जिन हुए अघ से परे हैं ॥४१९॥

     

    वो स्पर्श ज्ञान नहिं है कहते यमी है, हो जानता स्वपर को न यही कमी है।

    हो स्पर्श स्पर्श भर हो जड़ मात्र न्यारा, हो ज्ञान ज्ञान गुण चेतन पात्र प्यारा ॥४२०॥

     

    ना कर्म जान सकता कुछ भी यतः है, वो कर्म, ज्ञान नहिं हो सकता अतः है।

    है कर्म कर्म पर पुद्गल धर्म-वाला, है ज्ञान ज्ञान शुचिचेतन-शर्मशाला ॥४२१॥

     

    धर्मास्तिकाय वह ज्ञान नहीं अतः है, वो जानता स्वपर को न कभी यतः है।

    धर्मास्तिकाय वह भिन्न सदा रहा है, है ज्ञान भिन्न मत यों जिनका रहा है॥४२२॥

     

    होता न ज्ञान यह द्रव्य अधर्म ज्ञाता-औचित्य है न कुछ भी वह जान पाता।

    अत्यन्त भिन्न चिर द्रव्य अधर्म भाता, है ज्ञान भिन्न पर से रखता न नाता ॥४२३॥

     

    वो काल ज्ञान नहिं हो सकता अतः है, वो काल जान सकता कुछ भी यतः है।

    पै काल काल जड़ ही चिरकाल भाता, लो ज्ञान ज्ञान मणिमाल निहाल साता ॥४२४॥

     

    आकाश जान सकता कुछ भी नहीं है, आकाश ज्ञान नहिं हो सकता सही है।

    आकाश भिन्न यह ज्ञान विभिन्न प्यारा, देते जिनेश जग को उपदेश सारा ॥४२५॥

     

    होता ना ज्ञान यह अध्यवसान सारा, वो जानता न कुछ भी जड़ का पिटारा।

    बोले जिनेश वह अध्यवसान न्यारा, चैतन्यधाम यह ज्ञान प्रमाण प्यारा ॥४२६॥

     

    है जानता सतत जीव अतः प्रमाणी, है शुद्ध ज्ञान घन ज्ञायक पूर्ण ज्ञानी।

    होता न ज्ञान उस ज्ञायक से निराला, जैसा अनन्य इस दीपक से उजाला ॥४२७॥

     

    विज्ञान-संयम-सुदर्शन है सुहाता, औ द्वादशांग श्रुत पूर्ण वही कहाता।

    विज्ञान साधुपन धर्म अधर्म भी है, ऐसा सदैव कहते बुध ये सभी है ॥४२८॥

     

    आत्मा अमूर्त वह मूर्त कभी नहीं है, आहार ग्राहक अतः बनता नहीं है।

    आहार मूर्त जड़ पुद्गल धर्मवाला, पीते मुनीश कहते शिव शर्म-प्याला ॥४२९॥

     

    होता सदोष गुण है पर द्रव्य ग्राही, ऐसा सदा समझते शिवराह राही।

    निर्दोष आत्म गुण निश्चय से किसी को, पै त्यागता न गहता, गहता निजी को ॥४३०॥

     

    ना तो चराचर सजाति विजातियों को, जो छोड़ती न गहती, पर वस्तुओं को।

    आदर्श-सी विमल निर्मल चेतना है, पूजूं उसे विनशती चिर वेदना है॥४३१॥

     

    ये दीखते जगत में मुनि-साधुवों के, हैं भेष, नैक विधि भी गृहवासियों के।

    वे अज्ञ मूढ़ इनको जब धारते है, है मोक्षमार्ग यह यों बस मानते हैं ॥४३२॥

     

    पर्याप्त केवल नहीं तन नग्नता है, तू मान पंथ शिव का निज मग्नता है।

    होते निरीह तन से अरिहन्त तातें, चारित्र-बोध-दृग लीन स्वगीत गाते ॥४३३॥

     

    पाखंडिलिंग गृहिलिंग धरो तथापि, वो मोक्षमार्ग नहिं हो सकता कदापि।

    तीनों मिले चरित-दर्शन-बोध सोही, है मोक्ष-मार्ग कहते जिन वीत-मोही ॥४३४॥

     

    सागार और अनगार पदानुराग, वाक्काय से मनस से झट त्याग जाग।

    सम्यक्त्व-बोध-व्रत में शिवपंथ में ही, भाई विहार कर तो सुख हाथ में ही ॥४३५॥

     

    ध्याओ निजात्म नित ही निज को निहारो, अन्यत्र छोड़ निज को न करो विहारो।

    संबंध मोक्ष पथ से अविलंब जोड़ो, तो आपको नमन हो मम ये करोड़ों ॥४३६॥

     

    गार्हस्थ्यलिंग भर में मुनिलिंग में ही, जो मुग्ध साधक रहा बहिरंग में ही।

    अज्ञात ही समयसार उसे रहेगा, संसार में भटकता दुख ही सहेगा ॥४३७॥

     

    दो द्रव्य-भावमय लिंग नितान्त पाये-जाते विमोक्ष पथ में ‘व्यवहार' गाये।

    पै लिंग का न शिव के पथ में सहारा, 'आत्मा' अलं सहज निश्चय ने पुकारा ॥४३८॥

     

    साधू स्वयं समयसार सुना सुनाता, सारांश सादर सदा गुणता गुणाता।

    पीता सदा समयसार-सुधा-सुधारा, सानन्द शीघ्र तिरता भवसिंधु-धारा ॥४३९॥

     

    गुरुस्मृति

    हे! कुन्दकुन्द गुरु कुन्दनरूपधारी,

    स्वीकार हो कृति तुम्हें कृति है तुम्हारी।

    दो ज्ञानसागर गुरो! मुझको सुविद्या,

    विद्यादिसागर बनू तज दूँ अविद्या ॥

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