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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • मोक्षाधिकार

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    मैं पाश से कस कसा करके कसा हूँ? बंधानुभूति करता चिर से लसा हूँ।

    यों बंध बंधफल बंधित गीत गाता, कोई मनो पुरुष है तुमको दिखाता ॥३०८॥

     

    पै बंध को यदि नहीं वह छोड़ता है, हा! जान बूझकर भी नहिं तोड़ता है।

    पाता न मुक्ति उस बंधन से कदापि, दुस्सह्य दुःख सहता चिर काल पापी ॥३०९॥

     

    त्यों कर्म कर्म-स्थिति, कर्म प्रदेश जाने, औ कर्म की प्रकृति औ अनुभाग माने।

    छोड़े न बंध यदि जान सराग होते, होते न मुक्त, मुनि मुक्त विराग होते ॥३१०॥

     

    जो पाश बद्ध, बस बंधन चिंतता है, होता न मुक्त उससे वह अंधता है।

    तू कर्म बंध भर को यदि चिंतता है, होगा न मुक्त विधि से, मति मंदता है ॥३११॥

     

    जो पाश से कस बँधे यदि पाश तोड़े, तो पाश से झट विमुक्त नितान्त हो ले।

    तू कर्म बंध झट से यदि काटता है, पाता विमुक्त बन शीघ्र विराटता है ॥३१२॥

     

    जो बंधबद्ध यदि बंधन भेद डाले, वो बंध से झट विमुक्ति सदैव पाले।

    तू कर्म बंध झट से यदि काटता है, पाता विमुक्त बन शीघ्र विराटता है ॥३१३॥

     

    जो पाश से कस बँधा यदि पाश छोड़े, तो पाश से झट मुक्ति नितान्त पा ले।

    तू कर्म बंध झट से यदि काटता है, पाता विमुक्त बन शीघ्र विराटता है ॥३१४॥

     

    शुद्धात्म का परम निर्मल धर्म क्या है, क्या बंध लक्षण विलक्षण कर्म क्या है।

    यों जान, मान मतिमान प्रमाण द्वारा, छोड़े कुबंध गहते शिवधाम द्वारा ॥३१५॥

     

    ये जीव, बंध अपने-अपने गुणों से, है भिन्न भिन्न मोहवश एक हुए युगों से।

    भिन्न-भिन्न कहती इनको, सुपैनी, तो एकमात्र वर बोधमयी सुछैनी ॥३१६॥

     

    यों स्वीय-स्वीय गुण लक्षण भेद द्वारा, तू भिन्न-भिन्न कर बंध निजात्म सारा।

    शुद्धात्म है समयसार-मयी सुधा पी, हे भव्य! बंध विष पै मत पी कदापि ॥३१७॥

     

    कैसा निजातम मिले यदि भावना हो, विज्ञान की सतत सादर साधना हो।

    जाता किया पृथक बंधन से निजात्मा, विज्ञान से हि मिलता बनता महात्मा ॥३१८॥

     

    संवेदनामय निजी वह चेतना ‘मैं', यों जान, लीन रहना निज चेतना में।

    जो भी अचेतन-निकेतन शेष सारे, हैं हेय ज्ञेय मुझसे चिर से निराले ॥३१९॥

     

    विज्ञान से विदित निश्चित शर्म द्रष्टा, मैं ही रहा वह स्वयं निजधर्म स्रष्टा।

    जो भी अचेतननिकेतन शेष सारे, हैं हेय ज्ञेय मुझसे चिर से निराले ॥३२०॥

     

    विज्ञान से विदित चेतन राम ज्ञाता, मैं ही रहा वह निजी गुणधाम धाता।

    जो भी अचेतननिकेतन शेष सारे, हैं हेय ज्ञेय मुझसे चिर से निराले ॥३२१॥

     

    विज्ञान से विदित चेतन धर्मवाला, मैं ही रहा वह मिला सुख-धर्मशाला।

    जो भी अचेतननिकेतन दोष सारे, हैं हेय ज्ञेय चिर से मुझसे निराले ॥३२२॥

     

    साधू जिसे स्वपर बोध भला मिला है, सौभाग्य से दृग सरोज खुला खिला है।

    वो क्या कदापि पर को अपना कहेगा, ज्ञानी न मूढ़सम भूल कभी करेगा ॥३२३॥

     

    ऐसा न हो कि मुझको कहिं मार देवे, तू चोर है कह मुझे जन बाँध देवे।

    ऐसा विचार करता नहिं ठीक सोता, चौर्यादि पापकर चोर सभीत होता ॥३२४॥

     

    चौर्यादि कार्य करता नहिं है कदापि, निर्भीक हो विचरता जग में अपापी।

    होता जिसे कि भय भी अघगैल से है, चिंता उसे न फिर बंधन जेल से है ॥३२५॥

     

    त्यों संग संकलन लीन असंयमी है, हो बंध भीति उसको कहते यमी है।

    साधू जिसे भय भला किस बात का है, है राग भी न जिसको निज गात का है ॥३२६॥

     

    संसिद्धि राध अरु साधित सिद्ध सारे, आराधिता वचन आशय एक धारे।

    आराधिता रहित आतम ही कहाता, है दोष-धाम अपराधक पाप पाता ॥३२७॥

     

    निश्चिंत हो निडर हो निज को निहारे, निर्दोष वे निरपराधक साधु प्यारे।

    आराधना स्वयम की करते सुहाते, ना तो स्वयं न पर को डरते डराते ॥१॥

     

    निंदा निवृत्ति परिहार-सुधारणाएँ, गर्दा प्रतिक्रमण शुद्धि प्रसारणाएँ।

    पीयूष कुम्भ तब ही मुनि मत्त होते, शुद्धोपयोग जब हो विषकुंभ होते ॥३२८॥

     

    आठों अनिंदन अशुद्धि-अधारणादि-पीयूष कुम्भ जब साधु सधे समाधि।

    ऐसा सुजान समयोचित कार्य साधो, एकान्तवाद तजदो अयि आर्य साधो ॥३२९॥

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