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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • जीवाजीवाधिकार

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    मैं वन्दना कर उन्हें शिव को पधारे, जो सिद्ध हैं अतुल अव्यय सौख्य धारें।

    भाई। वही समयसार सुनो सुनाता, जो भद्रबाहु श्रुत-केवलि ने कहा था ॥१॥

     

    जो शुद्ध-बोध-व्रत दर्शन में समाता, होता निजी समय जीव वही सुहाता।

    रागादि का रसिक वो निज को भुलाया, माना गया समय में समया पराया ॥२॥

     

    प्यारा यही समय है निजधर्म कर्ता, एकत्व शाश्वत शुभाशुभ कर्म हर्ता।

    पै बन्ध की वह कथा दुखकारिणी है, अच्छी लगे न मुझको भव-वर्धिणी है ॥३॥

     

    हैं काम भोग विधिबन्धन की कथायें, भोगी सुनी बहुत की पर ये व्यथायें।

    एकत्व की निज कथा सुखदा अकेली, अत्यन्त दुर्लभ, करूँ उस-संग केली ॥४॥

     

    स्वात्मानुभूति बल से तुमको दिखाता, एकत्वरूप शुचि आतम जो सुहाता।

    भाई! दिखा यदि सका उर में सु-धारो, हो काश! भूल इसमें छल हा! न धारो ॥५॥

     

    ना अप्रमत्त मम आतम ना प्रमत्त, है शुद्ध, शुद्धनय ये मद-मान-मुक्त।

    ज्ञाता वही, सकल ज्ञायक यों बताते, वे साधु शुद्धनय आश्रय ले सुहाते ॥६॥

     

    विज्ञान औ चरित दर्शन विज्ञ के हैं, जाते कहे सकल ये व्यवहार से हैं।

    ज्ञानी परन्तु यह ज्ञायक शुद्ध प्यारा, ऐसा नितान्त नय निश्चय ने निहारा ॥७॥

     

    बोलो न आंग्ल नर से यदि आंग्ल भाषा, कैसे उसे सदुपदेश मिले प्रकाशा।

    सत्यार्थ को न व्यवहार बिना बताया, जाता सुबोध शिशु में गुरु से जगाया ॥८॥

     

    सिद्धान्त के मनन से जिसने निहारा, शुद्धात्म को सहज से, तज राग सारा।

    है पूर्ण भाव-श्रुतकेवलि वो निहाला, ऐसा कहें ऋषि, करें जग में उजाला ॥९॥

     

    जाना समस्त श्रुत को श्रुतकेवली हैं, ऐसे महेश कहते जिन केवली हैं।

    औचित्य ज्ञानमय आतम है सदी से, हैं वन्द्य द्रव्य-श्रुतकेवलि वो इसी से ॥१०॥

     

    सौभाग्य! बोध दृग की समुपासना हो, चारित्र की बस निरन्तर साधना हो।

    तीनों अभिन्न गुण आतम के इसी से, हो जा विलीन निज आतम में रुची से ॥११॥

     

    शुद्धात्म की विमल निर्मल भावना को, भाते सहर्ष ऋषि वे तज वासना को।

    पाते विमुक्ति भव से अघ को मिटाके, सद्यः निवास करते शिवधाम जाके ॥१२॥

     

    भूतार्थ शुद्धनय है निज को दिखाता, भूतार्थ है न व्यवहार हमें भुलाता।

    भूतार्थ की शरण लेकर जीव होता, सम्यक्त्व मण्डित, वही मन मैल धोता ॥१३॥

     

    शुद्धात्म में निरत हो जब सन्त त्यागी, जीवे विशुद्ध नय आश्रय ले विरागी।

    शुद्धात्म से च्युत सराग चरित्र वाले, भूले न 'लक्ष्य' व्यवहार अभी सम्हाले ॥१४॥

     

    ये पुण्य, पाप अरु जीव, अजीव आदि, होते पदार्थ नव मानत साम्यवादी।

    भूतार्थ से विदित हों, जब ये पदार्थ, सम्यक्त्व के विषय हैं ‘दृग' है यथार्थ ॥१५॥

     

    आत्मा अबद्ध नित शून्य उपाधियों से, अत्यन्त भिन्न पर से विधि-बन्धनों से।

    ऐसा मुनीश्वर निजातम को निहारें, वे ही विशुद्धनय हैं, जिन यों पुकारें ॥१६॥

     

    आत्मा अबद्ध स्थिर शून्य उपाधियों से, अत्यन्त भिन्न पर से विधि-बन्धनों से।

    ऐसा निजात्म लखते मुनि अक्षजेता, सूत्रार्थ का कथक आगम पूर्ण वेत्ता ॥१७॥

     

    विज्ञान में चरण में दृग संवरों में, औ प्रत्यख्यान गुण में लसता गुरो! मैं।

    शुद्धात्म की परम पावन भावना का, है पाक मात्र सुख है, दुख वासना का ॥१८॥

     

    साधू चरित्र-दूग-बोध-समेत पाले, आत्मा उन्हें समझ आतम गीत गा ले।

    ज्ञानी नितान्त निज में निज को निहारे, तो अन्त में गुण अनन्त अवश्य धारे॥१९॥

     

    ज्यों निर्धनी धनिक की कर खोज पाता, आस्था धनार्थ उसमें फिर है जमाता।

    ले मात्र एक धुन वो धन की सदैवा, पश्चात् सहर्ष उसकी करता सुसेवा ॥२०॥

     

    भाई! इसी तरह आत्म-गवेषणा हो, श्रद्धा-समेत उसको फिर देखना हो।

    चारित्र भी तदनुसार सुधारना हो, ध्यातव्य! मात्र मन में शिव-कामना हो ॥२१॥

     

    हूँ कर्म देहमय ये मुझसे न न्यारे, किं वा शरीर मम है, वसु कर्म सारे।

    भाई सदैव रटता जड़ मूढ ऐसा, दीखे उसे परम आतम गूढ़ कैसा? ॥२२॥

     

    साम्याभिभूत बन आतम लीन होना, पा मोक्ष ईश बनना, बनना सलौना।

    स्वच्छन्द हो विषय में मन को लगाना, है कर्मबन्ध गहना, प्रभु का बताना ॥२३॥

     

    आत्मा अशुद्धनय से हि विभाव कर्ता, होता विशुद्धनय से शुचि भाव कर्ता।

    मोहाभिभूत विविधों विधि-बन्धनों का, कर्ता अवश्य व्यवहारतया जड़ों का ॥२४॥

     

    जो भी सचेतन अचेतन द्रव्य सारा, संसार में लस रहा निज भाव द्वारा।

    मैं हूँ रहा यह, रहा यह ही यहाँ मैं, मेरा रहा यह, रहा इसका अहा मैं ॥२५॥

     

    मैं भी रहा विगत में, इसका यथा था, मेरा रहा नियम से यह भी तथा था।

    मैं भी नितान्त इसका, यह भी बनेगा, मेरा भविष्य भर में क्रम यों चलेगा ॥२६॥

     

    ऐसा सदैव पर को निज मान लेता, होता तभी दुखित हो वह मूढ़ नेता।

    मूढ़ता न करते मन अक्ष जेता, वे धन्य-धन्य मुनि हैं निज तत्त्व-वेत्ता ॥२७॥

     

    कर्मों जड़ात्मक तनों वचनों कुलों को, रागादिकों सुत सुतादि जनों धनों को।

    अज्ञान से भ्रमित हो 'अपने' बताता, संसार को अबुध और अरे ! बढ़ाता ॥२८॥

     

    हे मित्र ! जीव उपयोगमयी रहा है, सर्वज्ञ का सदुपदेश यही रहा है।

    तू ही बता जड़ बना वह जीव कैसा ? मेरा जिसे कह रहा बन अंध जैसा ॥२९॥

     

    हो जाय जीव यदि पुद्गल द्रव्य भाई, हो जाय पुद्गल सचेतन जीव थाई।

    नि:शंक हो कह सको जड़ है हमारा, ऐसा परन्तु कब हो! प्रभु ने पुकारा ॥३०॥

     

    मानो कि जीव यदि देहमयी नहीं है, तो देव की, सुगुरु की, स्तुति ना सही है।

    भाई अतः समझ लो तन आतमा है, ऐसा सदैव कहता बहिरातमा है ॥३१॥

     

    है ‘भिन्न' निश्चयतया तन जीव मानो, है एकमेक व्यवहारतया सुजानो।

    हो दृष्टि में यदि विराग अमूर्त-मा की, होती शरीर स्तुति से स्तुति आतमा की ॥३२॥

     

    जीवात्म से पृथक् भूत शरीर को ही, वे वंदनादि करके मुनि वीतमोही।

    हैं मानते नमित वंदित केवली हैं, बाह्योपचारवश ही हमसे बली हैं ॥३३॥

     

    होती शरीर स्तुति केवलि की नहीं है, औचित्य देह गुण केवलि में नहीं है।

    वीर्यादि अव्यय अनन्त अपूर्व धी की, जो भी करेस्तुति वही स्तुति, केवली की ॥३४॥

     

    होता नहीं नगर वर्णन से कदापि, भूपाल का स्तवन जो बुध है प्रतापी।

    तो देह का विशद वर्णन तू करेगा, कैसा भला स्तवन केवलि का बनेगा ? ॥३५॥

     

    पूरा किया दमन इन्द्रिय काय का है, देखा चखा स्वयं का रस बोध का है।

    होता वही मुनि सही निज अक्षजेता, ऐसा कहें जिन निजामृत के समेता ॥३६॥

     

    संमोह को शमित भी जिनने किया है, आधार ज्ञान गुण का मुनि हो लिया है।

    वे वीतराग जित-मोह सुधी कहाते, विज्ञान के रसिक यों हमको बताते ॥३७॥

     

    जीता विमोह मुनि ने, जिससे अभागा, कोई पता नहिं कहाँ, कब मोह भागा।

    वो ही नितान्त मुनिपुंगव क्षीणमोही, ऐसा जिनेश कहते, तज मोह मोही ॥३८॥

     

    मिथ्यात्व रागमय भाव विभाव सारे, यों जान, ज्ञान इनको जड़ से निकारे।

    हो प्रत्यख्यान फलतः निज ‘ज्ञान' प्यारा, मेरा उसे नमन हो शत-कोटि बारा ॥३९॥

     

    मेरी न वस्तु यह है जब जान लेता, जैसा कि सज्जन उसे झट त्याग देता।

    रागादि भाव पर हैं, पर से न नाता, ऐसा पिछान मुनि भी उनको हटाता ॥४०॥

     

    मेरा न मोह पर से उपयोग मेरा, ऐसा सदा समझता बस मैं अकेला।

    साधू उसे परम निर्मम हैं बताते, शास्त्रानुसार निज जीवन हैं बिताते ॥४१॥

     

    धर्मादि द्रव्य मम ना, उपयोग मेरा, जो जानता स्वयं को नित मैं अकेला।

    वो धर्म आदि सब ज्ञेयन-का सुत्यागी, ऐसा कहें समयविज्ञ सुधी विरागी ॥४२॥

     

    हूँ शुद्ध पूर्ण दृग-बोधमयी सुधा से, मैं एक हूँ पृथक् हूँ सबसे सदा से।

    मेरा न और कुछ है नित मैं अरूपी, मेरा नहीं जड़मयी यह देह रूपी ॥४३॥

     

    सम्मोह से भ्रमित हैं जड़ मूर्ख नामी, कर्त्तव्य-मूढ़ कुछ हैं कुमतानुगामी।

    वे राग-रोषमय भाव विभाव को ही, स्वीकार जीव तजते निज भाव को ही ॥४४॥

     

    लो तीव्र-मन्द अनुभाग निबन्धनों को, है ‘जीवरूप' कहते कुछ हैं तनों को।

    सम्मोह का यह विपाक यथार्थ में है, जो हो रहा भ्रम निजीय पदार्थ में है ॥४५॥

     

    कोई कहे कि उदयागत कर्म को ही, विज्ञान धारक सचेतन जीव सो ही।

    तो तीव्र-मन्द विधि के फल को ‘निजात्मा', हैं अन्य लोग कहते बनते दुरात्मा ॥४६॥

     

    रे! आठ काठ मिल खाट बनी यथा है, पा कर्म योग यह जीव बना तथा है,

    या कर्म और उदयागत कर्म दो वे, है जीव मूढ़ इस भाँति सदैव रोवे ॥४७॥

     

    मन्दातिमन्द मति-बाल अनात्म को ही, माने निजातम सदा तज तत्त्व बोधि।

    ये सर्व मात्र भव-कानन पंथ-पंथी, ऐसा कहें मुनि सुधी, तज ग्रन्थ-ग्रन्थी ॥४८॥

     

    ये पूर्व के कथित भाव विभाव सारे, हैं मूर्त से उदित हैं जड़ के पिटारे।

    आश्चर्य 'जीव' फिर रे बन जाये कैसे ? हैं केवली वचन ये गज-मोति जैसे ॥४९॥

     

    सर्वज्ञ ये कह रहे जिन चित् स्वरूपी, है कर्म अष्टविध पुद्गल रूप रूपी।

    आता यदा उदय में बस कर्म वैरी, दे दु:ख मात्र फल हो, भव बीच फेरी ॥५०॥

     

    जो राग रोषमय भाव तुझे दिखाते, वे 'जीव' मात्र व्यवहारतया कहाते।

    ऐसा सदा कह रही यह जैनवाणी, पी ले तृषा झट बुझा अति शीत पानी ॥५१॥

     

    है जा रही रभस से चतुरंग सेना, भूपाल है चल रहा पर मान लेना।

    ऐसा सहर्ष व्यवहार स्वगीत गाता, राजा यथार्थ वह यद्यपि एक जाता ॥५२॥

     

    संयोगजन्य रति-राग विभाव भावों, को जीव मान चलती व्यवहारता वो।

    पूछो यथार्थ जिन आगम से अकेला, है जीव, बाह्य सब खेल झमेल मेला ॥५३॥

     

    आत्मा सचेतन अरूप अगन्ध प्यारा, अव्यक्त है अरस और अशब्द न्यारा।

    आता नहीं पकड़ में अनुमान द्वारा, आकार से रहित है सुख का पिटारा ॥५४॥

     

    लो जीव के सरस गन्ध नहीं नहीं हैं, ये स्पर्श वर्ण गुण रूप सभी नहीं हैं।

    संस्थान, संहनन सुन्दर है न काया, आलोकधाम जिसमें तम है न छाया ॥५५॥

     

    ये जीव के न रति राग यथार्थ में हैं, ना मोह विभ्रम विभाव पदार्थ में हैं।

    नोकर्म, कर्म अघ प्रत्यय भी नहीं हैं, वन्दूं इसे बस यही शिव की मही है ॥५६॥

     

    है जीव की न विधि वर्ग न वर्गणाएँ, ना तीव्र मन्द विधि स्पर्धक की कलाएँ।

    अध्यात्म और अनुभाग न थान हीन, वन्दूँ उसे रह सकें निज में विलीन ॥५७॥

     

    ये योग थान नहिं आतम में दिखाते, औ बन्ध थान तक थान जहाँ न पाते।

    होते नहीं उदय स्थान न मार्गणायें, शुद्धात्म को हम अतः शिर तो नवायें ॥५८॥

     

    संक्लेश-थान स्थिति बन्धन थान दो वे, ना जीव के नहिं सुसंयम लब्धि हों वे।

    ये शुद्धि थान तक आतम के नहीं हैं, मैं भी इसे विनत हूँ नत वे गणी हैं ॥५९॥

     

    ये जीव थान गुणथान, न जीव के हैं, ये चूंकि सर्व जड़रूप अजीव के हैं।

    चैतन्यधाम, जड़ से अति भिन्न न्यारा, आराध्य जीव वह है मम है सहारा ॥६०॥

     

    वर्णादिभाव इस आतम में लसे हैं, माने गए सकल वे व्यवहार से हैं।

    आत्मा अमूर्त अजरामर निर्विकारा, ऐसा नितान्त नय निश्चय ने निहारा ॥६१॥

     

    वर्णादि संग रहता फिर भी निराला, आत्मा सुशोभित रहा उपयोग वाला।

    लो क्षीर में वह भले मिल जाय नीर, पै नीर, नीर रहता बस क्षीर, क्षीर ॥६२॥

     

    कोई लुटा पथिक को लख के बिचारा, मोही कहे पथ लुटा व्यवहार धारा।

    पै वस्तुतः पथ कभी लुटता नहीं है, देखा गया पथिक ही लुटता सही है ॥६३॥

     

    देहादि का सुभग वर्ण, निहार, मानो, लो ‘जीव' सुन्दर सुदृश्य सुधा सुजानो।

    ऐसा पुनीत जिनशासन शस्य बोले, भाई अवश्य व्यवहार रहस्य खोले ॥६४॥

     

    संस्थान आदिक शरीर विकार सारे, ये स्पर्श रूप रस गन्ध गुणादि न्यारे।

    हैं जीव के पर सुनो व्यवहार से हैं ? ऐसे कहें मुनि निजातम में बसे हैं ॥६५॥

     

    औपादिकी परिणती बदबू निराली, संसारि जीव भर में दुख शील वाली।

    संसार मुक्त शुचि आतम में अकेली, सच्चेतना महकती सुखदा चमेली ॥६६॥

     

    वर्णादि निश्चयतया यदि जीव में हों, कैसे प्रभेद फिर जीव अजीव में हो।

    थोड़ा विचार कर तू तज भोग भाई ! भिन्नातिभिन्न जड़ जीव पड़े दिखाई ॥६७॥

     

    संसार में स्थिति भले इस जीव की है, संयोगजन्य वह चूंकि अजीव की है।

    तादात्म्य जीव जड़ में यदि मानते हो, तो जीव मूर्त बनता नहिं जानते हो ? ॥६८॥

     

    हो जाय मूर्त जड़ जीव, अजीव होंगे, सिद्धत्व प्राप्त सब सिद्ध न जीव होंगे।

    साम्राज्य मात्र जड़ का जग में बनेगा, संसार दुःख फिर क्या, शिव क्या रहेगा ? ॥६९॥

     

    पर्याप्त सूक्ष्म त्रस थावर बादरादि, ये नामकर्म प्रकृती विकलेन्द्रियादि।

    संसारि-जीव बंधता इनसे यदा है, पूर्वोक्त नाम मिलते उसको तदा हैं ॥७०॥

     

    रूपाभिभूत जड़ पुद्गल कर्म द्वारा, ये जीव थान सब निर्मित हैं सुचारा।

    मानो इन्हें फिर सचेतन जीव कैसा ? जो है असम्भव, सुसंभव होय कैसा ? ॥७१॥

     

    पर्याप्त सूक्ष्म त्रस थावर बादरा ये, हैं वस्तुतः जड़मयी तन की दशायें।

    संसारिजीव इनमें तन पा बसे हैं, ये जीव हैं इसलिए उपचार से हैं ॥७२॥

     

    हों मोह के उदय में गुणथान सारे, माने गये परम आतप से निराले।

    जो हैं अचेतन निकेतन मूर्त भाई, तो जीव होय किस भाँति अमूर्त थाई ॥७३॥

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