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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • जीवाजीवाधिकार

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    ज्ञानोदय- छन्द

     

    मणिमय, मनहर निज अनुभव से झग झग झग झग करती है।

    तमो रजो अरु सतोगुणों के गण को क्षण में हरती है।

    समय समय पर समयसारमय चिन्मय निज ध्रुव मणिका को,

    नमता मम निर्मम मस्तक, तज मृणमय जड़मय मणिका को ॥१॥


    गाती रहती गुरु की गरिमा अगणित धारे गुणगण हैं,

    मोह मान मद माया मद से रहित हुए हैं ये जिन हैं।

    अनेकान्तमय वाणी जिनकी जीवित जग में तब लौं हो,

    रवि शशि उडुगण लसते रहते विस्तृत नभ में जब लौं हो ॥२॥

     

    समयसार की व्याख्या करता, चाहूँ कुछ नहिं विरत रहूँ,

    चिदानन्द का अनुभव करता निशिदिन निज में निरत रहूँ।

    मोह भाव मम बिखर-बिखर कर क्षण-क्षण कण-कण मिट जावे,

    पर परिणति का मूल यही बस मोह मूल झट कट जावे ॥३॥

     

    स्यात् पद भूषित, दूषित नहिं है जिन वच मुझे सुहाते हैं,

    उभय-नयों के आग्रह कर्दम इकदम स्वच्छ धुलाते हैं।

    जिन वच रमता, सकल मोह का मुनि बन वन में वमन किया,

    समकित अमित 'समय' लख मुनि ने शत शत वन्दन नमन किया ॥४॥

     

    निर्विकल्पमय समाधि जब तक साधक मुनिगण नहिं पाते,

    तब तक उनको प्रभु का आश्रय समयोचित है मुनि गाते।

    निश्चय नयमय नभ में लखते चम चम चमके चेतन ज्योत,

    अन्तर्विलीन मुनिवर को पर,प्रभु आश्रय तो जुगनू ज्योत ॥५॥

     

    विशुद्ध नय का विषयभूत उस विरागता का पूरा-पन,

    पूर्ण ज्ञान का अवलोकन औ सकल संग से सूना-पन।

    निश्चय सम्यग्दर्शन है वह वही निजामृत है प्यारा,

    वही शरण है वहीं शरण लूँ तज नव-तत्त्वों का भारा ॥६॥

     

    निर्मल निश्चय-नय का तब-तब आश्रय ऋषि अवधारत हो,

    अन्तर्जगती-तल में जब तक जगमग जगमग जागृत हो।

    फलतः निश्चित लगता नहिं वो मुनि के मन में मैलापन,

    नव तत्त्वों में भला ढला हो चला न जाता उजला-पन ॥७॥

     

    नव तत्त्वों में ढलकर चेतन मृण्मय तन के खानन में,

    अनुमानित है चिर से जैसा कनक कनकपाषाणन में।

    वही दीखता समाधि रत को शोभित द्युतिमय शाश्वत है,

    एक अकेला तन से न्यारा ललाम आतम भास्वत है॥८॥

     

    निजानुभव का उद्भव उर में विराग मुनि में हुआ जभी,

    भेदभाव का खेदभाव का प्रलय नियम से हुआ तभी।

    प्रमाण नय निक्षेपादिक सब पता नहीं कब मिट जाते,

    उदयाचल पर अरुण उदित हो उडुगण गुप लुप छुप जाते ॥९॥

     

    आदि रहित हैं मध्य रहित हैं अन्त रहित हैं अरहन्ता,

    विकल्प जल्पों संकल्पों से रहित अवगुणों गुणवन्ता।

    इस विध गाता निश्चय नय है पूरण आतम प्रकटाता,

    समरस रसिया ऋषि उर में हो उदित उजाला उपजाता ॥१०॥

     

    क्षणिक भाव है तनिक काल लौं ऊपर ऊपर दिख जाते,

    तन मन वच विधि दृग चरणादिक जिसमें चिर नहिं टिक पाते।

    निजमें निज से निज को निज ही निरख निरख तू नित्यालोक,

    सकल मोह तज फिर झट करले अवलोकित सब लोकालोक ॥११॥

     

    विशुद्ध नय आश्रय ले होती स्वानुभूति है कहलाती,

    वही परम ज्ञानानुभूति है। वाणी जिनकी बतलाती।

    जान मान कर इस विध तुमको निज में रमना वांछित है,

    निर्मल बोध निरंतर प्यारा परितः पूर्ण प्रकाशित है ॥१२॥

     

    आत्मध्यान में विलीन होकर मोह भाव का करे हनन,

    विगत अनागत आगत विधि के बन्धन तोड़े झट मुनिजन।

    शाश्वत शिव बन शिव सुख पाते लोक अग्र पर बसते हैं,

    निज अनुभव से जाने जाते कर्म-मुक्त, ध्रुव लसते हैं ॥१३॥

     

    चिन्मय गुण से परिपूरित है परम निराकुल छविवाली,

    बाहर भीतर सदा एकसी लवण डली सी अति प्यारी।

    सहज स्वयं बस लस लस लसती ललित-चेतना उजयाली,

    पीने मुझको सतत मिले बस समता-रस की वह प्याली ॥१४॥

     

    ज्ञान सुधा रस पूर्ण भरा है आतम नित्य निरंजन है,

    यदपि साध्य साधक वश द्विविधा तदपि एक मुनि रंजन हैं।

    ऋद्धि सिद्धि को पूर्ण वृद्धि को यदि पाने मन मचल रहा,

    स्वातम साधन करलो करलो चंचल मन को अचल अहा ॥१५॥

     

    द्रव्य दृष्टि से निरखो । आतम एक एक आकार बना,

    पर्यय दृष्टी बनती दिखता अनेक नैकाकारतना।

    चंचल मन में वही उतरता विद्या-दृग-व्रत धरा हुआ,

    दिखता समाधिरत मुनियों को सचमुच चिति से भरा हुआ ॥१६॥

     

    दृग-व्रत-बोधादिक में साधक नियम रूप से ढलता है,

    पल-पल पग-पग आगे बढ़ता अविरल शिवपथ चलता है।

    एक यदपि वह तदपि इसी से बहुविध स्वभाव धारक है,

    इस विध यह व्यवहार कथन है कहते मुनि व्रत पालक हैं ॥१७॥

     

    पूर्ण रूप से सदा काल से व्यक्त पूर्ण है उचित रहा,

    ज्ञान-ज्योति से विलस रहा है एक आप से रचित रहा।

    वैकारिक-वैभाविक भावों का निज आतम नाशक है,

    इसीलिये वह माना जाता एक भाव का शासक है ॥१८॥

     

    एक स्वभावी नैक स्वभावी द्रव्य गुणों से खिलता है,

    ऐसा आतम चिन्तन से वह मोक्षधाम नहिं मिलता है।

    समकित-विद्या-व्रत से मिलती मुक्ति हमें अविनश्वर है,

    सच्चा साधन साध्य दिलाता इस विध कहते ईश्वर हैं ॥१९॥

     

    रत्नत्रय में ढली घुली पर मिली खिली इक सारा है,

    धारा प्रवाह बहती रहती जीवित चेतन धारा है।

    कुछ भी हो पर स्वयं इसी में अवगाहित निज करता हूँ,

    नहिं-नहिं इस बिन शांति, तृप्ति हो आत्म-ताप सब हरता हूँ ॥२०॥

     

    स्वपर बोध का मूल स्वानुभव जहाँ जगत प्रतिबिम्बित हो,

    जिन-मुनिवर को मिला स्वतः या सुन गुरु वचन अशंकित हो।

    पर न विभावों से वे अपना कलुषित करते निजपन है,

    कई वस्तुयें झलक रही हैं तथापि निर्मल दर्पण है ॥२१॥

     

    मोह मद्य का पान किया चिर अब तो तज जड़मति! भाई,

    ज्ञान सुधारस एक घूट लें मुनिजन को जो अति भाई।

    किसी समय भी किसी तरह भी चेतन तन में ऐक्य नहीं,

    ऐसा निश्चय मन में धारो, धारो मन में दैन्य नहीं ॥२२॥

     

    खेल खेलता कौतुक से भी रुचि ले अपने चिन्तन में,

    मर जा ‘पर कर निजानुभव कर' घड़ी घड़ी-मत रच तन में।

    फलतः पल में परम पूत को द्युतिमय निज को पायेगा,

    देह-नेह तज, सज-धज निजको निज से निज घर जायेगा ॥२३॥

     

    दशों दिशाओं को हैं करते स्नपित सौम्य शुचि शोभा से,

    शत शत सहस्र रवि शशियों को कुन्दित करते आभा से।

    हित मित वच से कर्ण तृप्त हैं करते दश-शत-अठ गुण-धर,

    रूप सलोना धरते, हरते जन मन जिनवर हैं मुनिवर ॥२४॥

     

    गोपुर नभ का चुम्बन लेता ढलती वन-छवि वसुधातल,

    गहरी खाई मानो पीती निरी तलातल रासातल।

    पुर वर्णन तो पुर वर्णन है पर नहिं पुर-पति की महिमा,

    मानी जाती इसीलिये वह केवल जड़मय पुर महिमा ॥२५॥

     

    अनुपम अद्भुत जिनवर मुख है रग-रग में है रूप भरा,

    जय हो सागर सम गंभीरा शम यम दम का कूप निरा।

    रूपी तन का रूप रूप' भर तन से जिनवर हैं न्यारे,

    इसीलिए यह तन की स्तुति है मुनिवर कहते हैं प्यारे ॥२६॥

     

    तन की स्तुति से चेतन-स्तुति की औपचारिकी कथनी है,

    यथार्थ नहिं तन चेतन नाता यह जिन-श्रुति, अघ-मथनी है।

    चेतन स्तुति पर चेतन गुण से निर्विवाद यह निश्चित है,

    अतः ऐक्य तन चेतन में वो नहीं सर्वथा किंचित है ॥२७॥

     

    स्वपर तत्त्व का परिचय पाया निश्चय नय का ले आश्रय,

    जड़ काया से निज चेतन का ऐक्य मिटाया बन निर्भय।

    स्वरस रसिक वर बोध विकासित क्या नहिं उस मुनिवर में हो,

    भागा बाधक! साधा साधक! साध्य सिद्ध बस पल में हो ॥२८॥

     

    संयम बाधक सकल संग को मन-वच-तन से त्याग दिया,

    बना सुसंयत, अभी नहीं पर प्रमत्त पर में राग किया।

    तभी सुधी में निजानुभव का उद्भव होना संभव है,

    पर भावों से रहित परिणती अविरत में ना संभव है॥२९॥

     

    सरस स्वरस परिपूरित परितः सहज स्वयं शुचि चेतन का,

    अनुभव करता मन हर्षाता अनुपम शिवसुख केतन का।

    अतः नहीं है कभी नहीं है मान मोह-मद कुछ मेरा,

    चिदानन्द का अमिट धाम हूँ द्वैत नहीं अद्वैत अकेला ॥३०॥

     

    राग द्वेष से दोष कोष से सुदूर शुचि उपयोग रहा,

    शुद्धातम को सतत अकेला बिना थके बस भोग रहा।

    निश्चय रत्नत्रय का बाना, धरता नित अभिराम रहा,

    विराम-आतम उपवन में ही करता आठों याम रहा ॥३१॥

     

    परम शान्त रस से पूरित वह बोध सिन्धु बस है जिनमें,

    उज्ज्वल-उज्ज्वल उछल रहा है पूर्ण रूप से त्रिभुवन में।

    भ्रम विभ्रम नाशक है प्यारा इसमें अवगाहन करलो,

    मोह ताप संतप्त हुए तो हृदय ताप को तुम हरलो ॥३२॥

     

    भव बन्धन के हेतुभूत सब कर्म मिटाकर हर्षाता,

    जीव देहगत भेद-भिन्नता भविजन को है दर्शाता।

    चपल पराश्रित आकुल नहिं पर उदार धृतिधर गत आकुल,

    हरा-भरा निज उपवन में नित ज्ञान खेलता सुख संकुल ॥३३॥

     

    राग रंग से अंग संग से शीघ्र दूर कर वच तन रे!

    सार हीन उन जग कार्यों से विराम ले अब अयि! मन रे!

    मानस-सर में एक स्वयं को मात्र मास छह देख जरा,

    जड़ से न्यारा सबसे प्यारा शिवपुर दिखता एक खरा ॥३४॥

     

    तन-मन-वच से पूर्ण यत्न से चेतन का आधार धरो,

    संवेदन से शून्य जड़ों का अदय बनो संहार करो।

    आप आप का अनुभव करलो अपने में ही आप जरा,

    अखिल विश्व में सर्वोपरि है अनुपम अव्यय आत्म खरा ॥३५॥

     

    विश्वसार है सर्वसार है समयसार का सार सुधा,

    चेतन रस आपूरित आतम शत शत वन्दन बार सदा।

    असार-मय संसार क्षेत्र में निज चेतन से रहे परे,

    पदार्थ जो भी जहाँ तहाँ है मुझसे पर हैं निरे निरे ॥३६॥

     

    वर्णादिक औ रागादिक ये पर हैं पर से हैं उपजे,

    समाधि-रत को केवल दिखते सदा पुरुष जो शुद्ध सजे,

    लहरें सर में उठती रहती झिलमिल झिलमिल करती हैं,

    अन्दर तल में मौन-छटा पर निश्चित मुनिमन हरती हैं ॥३७॥

     

    जग में जब जब जिसमें जो जो जन्मत हैं कुछ पर्यायें,

    वे वे उसकी निश्चित होती समझ छोड़ दो शंकायें।

    बना हुआ जो कांचन का है सुन्दरतम असि कोष रहा,

    विज्ञ उसे कांचनमय लखते, कभी न असि को, होश रहा ॥३८॥

     

    वर्णादिक हैं रागादिक हैं। गुणस्थान की है सरणी,

    वह सब रचना पुद्गल की है जिन-श्रुति कहती भवहरणी।

    इसीलिए ये रागादिक हैं मल हैं केवल पुद्गल हैं,

    शुद्धातम तो जड़ से न्यारा ज्ञानपुंज है निर्मल है ॥३९॥

     

    मृण्मय घटिका यदपि तदपि वह घृत की घटिका कहलाती,

    घृत संगम को पाकर भी पर घृतमय वह नहिं बन पाती।

    वर्णादिक को रागादिक को तन मन आदिक को ढोता,

    सत्य किन्तु यह, यह भी निश्चित तन्मय आत्मा नहिं होता ॥४०॥

     

    आदि हीन है अन्तहीन है अचल अडिग है अचल बना,

    आप आप से जाना जाता प्रकट रूप से अमल तना।

    स्वयं जीव ही सहज रूप से चम चम चमके चेतन है।

    समयसार का विश्व सार का शुचिमय शिव का केतन है॥४१॥

     

    वर्णादिक से रहित सहित हैं धर्मादिक हैं ये पुद्गल,

    प्रभु ने अजीव द्विधा बताया जिनका निर्मल अन्तस्तल।

    अमूर्तता की स्तुति करता पर जड़ आतम ना लख पाता,

    चिन्मय चितिपण अचल अत: है आतम लक्षण चख! साता ॥४२॥

     

    निरा जीव है अजीव न्यारा अपने-अपने लक्षण से,

    अनुभवता ऋषि जैसा हंसा जल-जल पय-पय तत् क्षण से।

    फिर भी जिसके जीवन में हा! सघन मोहतम फैला है,

    भाग्यहीन वह कुधी भटकता भव-वन में न उजेला है॥४३॥

     

    बोध-हीन उस रंग मंच पर सुचिर काल से त्रिभुवन में,

    रागी द्वेषी जड़ ही दिखता रस लेता नित नर्तन में।

    वीतराग है वीत-दोष है जड़ से सदा-विलक्षण है,

    शुद्धातम तो शुद्धातम है चेतन जिसका लक्षण है ॥४४॥

     

    चेतन तन से भिन्न भिन्न नहिं पूर्ण रूप से हो जब लौं,

    कर, कर, कर, कर रहो चलाते आरा ज्ञानमयी तब लौं।

    तीन लोक को विषय बनाता ज्ञाता द्रष्टा निज आतम,

    रण-विकसित चिन्मय बल से निर्मलतम हो परमातम ॥४५॥

     

    ॥ जीवाजीवाधिकारः समाप्तः ॥

     

    दोहा

    रग रग में चिति रस भरा खरा निरा यह जीव।

    तनधारी दुख सहत, सुख तन बिन सिद्ध सदीव ॥१॥

    प्रीति भीति सुख दुखन से धरे न चेतन-रीति।

    अजीव तन धन आदि ये तुम समझो भव-भीत ॥२॥

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