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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • श्री शम्भव जिन-स्तवन

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    ऐहिक सुख-तृष्णामय रोगों से जो पीड़ित जग जन हैं।

    उन्हें निरोगी पूर्ण बनाने वैद्य रहे शंभव जिन हैं॥

    प्रति-फल की पर वाँछा कुछ नहिं बिना स्वार्थ परहित रत हैं।

    वैद्य लोग ज्यों रोग मिटाते दया-भाव से परिणत हैं ॥१॥

     

    अहंकार-मय विभाव भावों मिथ्या-मल से रंजित हैं।

    क्षणिक रहा है त्राण-हीन है जगत रहा सुख-वंचित है॥

    जनन-मरण से जरा रोग से पीड़ित दु:खित विकल अहा!

    उसे किया जिन निरंजना-मय, शान्ति पिला कर सबल महा ॥२॥

     

    बिजली-सम पलजीवी चंचल इन्द्रिय-सुख है तनिक रहा।

    तृष्णा-मय-मारी के पोषण का कारण है क्षणिक रहा ॥

    तृष्णा की वह वृद्धि, निरंतर उपजाती है ताप निरा।

    ताप जगत को पीड़ित करता जिन कहते, तज पाप जरा ॥३॥

     

    बंध-मोक्ष क्या उनका कारण सुफल मोक्ष का कौन रहा?

    बद्ध जीव औ मुक्त जीव सब जग में रहते कौन कहाँ?

    ये सब वर्णन देव! तुम्हारे स्याद-वाद मत में पाते।

    एकान्ती-मत में ना पाते, शिव-पथ-नेता तुम तातें ॥४॥

     

    पुण्यवर्धनी तुम स्तुति करने इन्द्र विज्ञ असमर्थ रहा।

    किन्तु अज्ञ मैं स्तोत्र कार्य में उद्यत हूँ ना अर्थ रहा ॥

    तदपि भक्तिवश तुम-पद-पंकज-स्तुति, अलि बन अनिवार्य किया।

    शिव-सुख की कुछ गंध हुँधा दो आर्य-देव! शुभ कार्य किया ॥५॥

     

    (दोहा)

    तुम-पद-पंकज से प्रभो झर-झर-झरी पराग।

    जब तक शिव-सुख ना मिले पीऊँ षट्पद जाग ॥१॥

    भव-भव, भव-वन भ्रमित हो भ्रमता-भ्रमता आज।

    शंभव-जिन भव शिव मिले पूर्ण हुआ मम काज ॥२॥


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