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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • श्री वृषभनाथ जिन-स्तवन

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    पर से बोधित नहीं हुए पर, स्वयं स्वयं ही बोधित हो।

    समकित-संपति ज्ञान नेत्र पा जग में जग-हित शोभित हो ॥

    विमोह-तम को हरते तुम प्रभु निज-गुण-गण से विलसित हो।

    जिस विध शशि तम हरता शुचितम किरणावलिले विकसित हो ॥१॥

     

    जीवन इच्छुक प्रजाजनों को जीवन जीना सिखा दिया।

    असि, मषि, कृषि आदिक कर्मों को प्रजापाल हो दिखा दिया ॥

    तत्त्व-ज्ञान से भरित हुए फिर बुध-जन में तुम प्रमुख हुए।

    सुर-पति को भी अलभ्य सुख पा विषय-सौख्य से विमुख हुए ॥२॥

     

    सागर तक फैली धरती को मन-वच-तन से त्याग दिया।

    सुनन्द-नन्दा वनिता तजकर आतम में अनुराग किया।

    आतम-जेता मुमुक्षु बनकर परीषहों को सहन किया।

    इक्ष्वाकू-कुल-आदिम प्रभुवर अविचल मुनिपन वहन किया ॥३॥

     

    समाधि-मय अति प्रखर अनल को निज उर में जब जनम दिया।

    दोष-मूल अघ-घाति कर्म को निर्दय बनकर भसम किया ॥

    शिव-सुख-वांछक भविजन को फिर परम तत्त्व का बोध दिया।

    परम-ब्रह्म-मय अमृत पान कर तुमने निज घर शोध लिया ॥४॥

     

    विश्व-विज्ञ हो विश्व-सुलोचन बुध-जन से नित वंदित हो।

    पूरण-विद्या-मय तन धारक बने निरंजन नंदित हो ॥

    जीते छुट-पुट वादी-शासन अनेकान्त के शासक हो।

    नाभि-नन्द हे! वृषभ जिनेश्वर मम-मन-मल के नाशक हो ॥५॥

     

    आदिम तीर्थंकर प्रभो आदिनाथ मुनिनाथ!

    आधि व्याधि अघ मद मिटे तुम पद में मम माथ ॥१॥

    शरण, चरण हैं आपके तारण तरण जहाज।

    भव-दधि-तट तक ले चलो! करुणाकर जिनराज ॥२॥


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