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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • श्री पार्श्व जिन-स्तवन

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    जल वर्षाते घने बादले, काले-काले डोल रहे।

    झंझा चलती बिजली तड़की घुमड़-घुमड़ कर बोल रहे ॥

    पूर्व वैर-वश कमठ देव हो इस विध तुमको कष्ट दिया।

    किन्तु ध्यान में अविचल प्रभु हो घाति कर्म को नष्ट किया ॥१॥

     

    द्युति-मय बिजली-सम पीला निज फण का मण्डप बना लिया।

    नाग इन्द्र तव कष्ट मिटाने तुम पर समुचित तना दिया।

    दृश्य मनोहर तब वह ऐसा विस्मय-कारी एक बना।

    संध्या में पर्वत को ढकता समेत-बिजली मेघ घना ॥२॥

     

    आत्म ध्यान-मय कर में खरतर खड्ग आपने धार लिया।

    मोहरूप निज दुर्जय रिपु को पल-भर में बस मार दिया।

    अचिन्त्य-अद्भुत आर्हत् पद को फलतः पाया अघहारी।

    तीन लोक में पूजनीय जो अतिशयकारी अतिभारी ॥३॥

     

    मनमाने कुछ तापस ऐसे तप करते थे वनवासी।

    पाप-रहित तुम को लख, इच्छुक तुम-सम बनने अविनाशी ॥

    हम सब का श्रम विफल रहा यो समझ सभी वे विकल हुए।

    शम-यम-दममय सदुपदेश सुन तव चरणन में सफल हुए ॥४॥

     

    समीचीन विद्या-तप के प्रभु रहे प्रणेता वरदानी।

    उग्र-वंशमय विशाल नभ के दिव्य सूर्य, पूरण ज्ञानी ॥

    कुपथ निराकृत कर भ्रमितों को पथिक सुपथ के बना दिये।

    पार्श्वनाथ मम पास वास बस, करो, देर अब बिना किये ॥५॥

     

    (दोहा)

     

    खास दास की आस बस श्वाँस-श्वाँस पर वास।

    पाश्र्व करो मत दास को उदासता का दास ॥१॥

    ना तो सुर-सुख चाहता शिव-सुख की ना चाह।

    तव थुति-सरवर में सदा होवे मम अवगाह ॥२॥


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