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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • कल्याणमन्दिर स्तोत्र (वसंततिलका छन्द)

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    (वसंततिलका छन्द)

     

    कल्याण-खाण-अघनाशक औ उदार, हैं जो जिनेश-पद-नीरज विश्वसार।

    संसारवार्धि वर पोत! स्ववक्षधार, उन्हें यहाँ नमन मैं कर बार-बार ॥१॥

     

    रे! रे! हुवा स्तवन ना जिनदेव जी का, धीमान से जब बृहस्पति से प्रभू का।

    तो मैं उसे हि करने हत जा रहा हूँ, क्यों धृष्टता अहमता दिखला रहा हूँ ॥२॥

     

    मेरे समान लघु-धी कवि लोग सारे, सामान्य से तव सुवर्णन भी विचारे।

    कैसे करे अहह! नाथ! नहीं करेंगे, उल्लू दिवान्ध रवि को न यथा लखेंगे ॥३॥

     

    है आपको विगतमोह मनुष्य जाना, भो! किन्तु जो तव गुणों उसने गिना ना।

    तूफान से जलविहीन समुद्र हो तो, वार्धिस्थ रत्नचय का अनुमान है क्या? ॥४॥

     

    मैं स्तोत्र को तव विभो! करने चला हूँ, हैं आप नैक-गुणधाम, व मन्द-धी हूँ।

    तो बाल भी जलधि की सुविशालता को, फैला स्वहस्त युग को कहता नहीं क्या? ॥५॥

     

    गाये गये तव न भो! गुण योगियों से, मेरा प्रवेश उनमें फिर हन्त कैसे?

    है हो गई इक यहाँ स्थिति जो अनोखी, गाते स्व वाणि बल से फिर भी विहंग ॥६॥

     

    जो स्तोत्र हे! जिन! सुदूर रहे महात्मा! तेरा हि नाम जग को दुख से बचाता।

    संतप्त भी पथिक जो रवि ताप से यों, होता सुशान्त जलमिश्रित वायु से है ॥७॥

     

    होते हि वास तव भव्य सुचित्त में त्यों, होते प्रभो शिथिल हैं घनकर्मबन्ध।

    आते हि चन्दन-सुवृक्ष-सुबीच मोर; हैं दौड़ते सकल ज्यों अहि एक ओर ॥८॥

     

    हो देखते झट जिनेन्द्र! तुझे मनुष्य, होते सुदूर सहसा दुख से अवश्य।

    गंभीर शूर वसुधापति को यहाँ जो, हैं चोर देख सहसा द्रुत भागते यों ॥९॥

     

    कैसे जिनेश तुम तारक हो जनों के, जो आपको हृदय से धर, पार होते।

    वा चर्मपात्र जल में तिरता परन्तु, पात्रस्थ वायु बल है उस कर्म में ही ॥१०॥

     

    ब्रह्मा महेश मद को नहिं जीत पाये, भो! आप किन्तु उसको क्षण में जलाये।

    है ठीक! अग्नि बुझती जल से यहाँ पे, पीया गया न जल क्या? बड़वाग्नि से पै ॥११॥

     

    स्वामी! महान गरिमायुत आपको वे, संसारि जीव गह, धार स्व-वक्ष में औ।

    कैसे सु आशु भवसागर पार होते, आश्चर्य! साधुजन की महिमा अचिन्त्य ॥१२॥

     

    भो! क्रोध नष्ट पहले जब की बता दो, कर्मोंघ नष्ट तुमसे फिर बाद कैसे?

    है ठीक ही हरित पूरित भूरुहों को, शीतातिशीत हिम क्या? न यहाँ जलाता ॥१३॥

     

    शुद्धात्मरूप! तुमको जिन! ढूँढ़ते हैं, योगी सदा हृदय नीरज कोश में वे।

    है ठीक ही, कमल बीज प्रसूतस्थान, अन्यत्र क्या मिलत है? तजकर्णिका को ॥१४॥

     

    छद्मस्थ जीव तव देव! सु ध्यान से ही, यों शीघ्र देह तज वे परमात्म होते।

    पाषाण जो कनक मिश्रित ईश! जैसा, संयोग पा अनल का द्रुत हेम होता ॥१५॥

     

    भो नित्य भव्य उर में जिन! शोभते हो, कैसे सुनाश करते? उस काय को क्यों?

    ऐसा स्वभाव रहता समभावियों का, जो हैं महापुरुष विग्रह को नशाते ॥१६॥

     

    जो आपको जिन! अभेद विचार से है, आत्मा से ध्यान करता, तुम-सा हि होता।

    जो नीर को अमृत मान, उसे हि पीता, क्या नीर जो न उसके विष को नशाता ? ॥१७॥

     

    हे वीतराग! तुमको परवादि लोग, ब्रह्मा-महेश-हरि रूप वि जानते हैं।

    है ठीक काचकमलामय रोग वाले, क्या शंख को विविध वर्णमयी न जानें? ॥१८॥

     

    धर्मोपदेश जब हो जन दूर होवे, सान्निध्य से हि तब, वृक्ष अशोक होते।

    है भानु के उदय से जन मोद पाते, उत्फुल्ल क्या तरु-लता दल हो न पाते ॥१९॥

     

    वर्षा यहाँ सुमन की करते हि देव, आश्चर्य! वे कुसुम सर्व अधोमुखी क्यों?

    है ठीक ही, सुमन बंध सभी हि जाते, नीचे मुनीश! तुमको लख के सदैव ॥२०॥

     

    गंभीर वक्ष जलराशि विनिर्गता जो, हे भारती, तव उसे करते सुपान।

    हैं भव्य, जीव फलतः मुदमोद होते; औ शीघ्र ही जनन मृत्युविहीन होते? ॥२१॥

     

    स्वामी मनो! नम सुभक्ति सुभाव से ज्यों, स्वर्गीय चामर कलाप हि बोलता है।

    जो भी करें नमन साधु वराग्र को भो! होगा हि निर्मल तथा वह ऊर्ध्वगामी ॥२२॥

     

    गंभीर भारति-विधारक आपको त्यों, औ श्याम! हेममणिनिर्मित आसनस्थ!

    आमोद से निरखते सब भव्य मोर, स्वामी! सुमेरु पर मोर पयोद को ज्यों ॥२३॥

     

    भो! आपके हि शित मण्डल ज्योति से जो, देखो हुवा छबि विहीन अशोक वृक्ष।

    सान्निध्य से फिर विभो तब वीतराग! क्या भव्य चेतन न रागविहीन होते? ॥२४॥

     

    ये आपके अमर दुंदुभि हैं बताते, आके करो अलस छोड़ जिनेन्द्र सेवा।

    जो आप हैं वह शिवालय सार्थवाह, इत्थं विचार मम है अरु ठीक भी है॥२५॥

     

    जाज्वल्यमान तुमसे त्रय लोक देख, नष्टाधिकार वह चन्द्र हताश होके।

    यों तीन छत्र मिष से तुम पास आके, सेवा प्रभो शशि यहाँ करता हि तेरी ॥२६॥

     

    संपत्ति से भरितलोक समान आप, कान्ति प्रताप यश का अरु हैं सुधाम।

    हेमाद्रि दिव्य मणि निर्मित साल से ज्यों, शोभायमान भगवन् इह हो रहे हैं ॥२७॥

     

    देवेन्द्र की जिन! यहाँ नमते हुए की, माला, सुमोच मणिमण्डित मौलियों की।

    लेती सुआश्रय सदा तव पाद का है, अन्यत्र ना सुमन वासव, ठीक भी है॥२८॥

     

    हैं नाथ! आप भववारिधि से सुदूर, तो भी स्वसेवक जनाऽऽकर को तिराते।

    है आपको उचित पार्थिव भूप सा भी, आश्चर्य कर्मफल शून्य तथापि आपि ॥२९॥

     

    त्रैलोक्यनाथ जिन हैं। धनहीन भी हैं। हैं आप अक्षर विभो! लिपिहीन भी हैं।

    ना आप में करण बोध शतांश में भी, विज्ञान है विशद किन्तु जगत्प्रकाशी ॥३०॥

     

    धूली अहो कमठ ने नभ में उड़ा दी, तो भी ढकी तव विभो! उससे न छाया।

    देखो! जिनेश वह ही फलतः दुरात्मा, धिक् धिक् महान दुख को बहुकाल पाया ॥३१॥

     

    भो! दैत्य से कमठ से घनघोर वर्षा, अश्राव्य गर्जनमयी तुमपें हुई भी।

    पै आप पे असर तो उसका पड़ा ना, पै दैत्य को नरक में रु पड़ा हि जाना ॥३२॥

     

    धारे हुए सकल थे गलमुंड माला, जो त्यागते अनल को मुख से निराला।

    भेजा कुदैत्य तव पास पिशाच ऐसे, पै दैत्य के हि दुखकारण हो गए वे ॥३३॥

     

    वे जीव धन्य महि में त्रयलोकनाथ! प्रातः तथा च अपराह्नविभो! सु सन्ध्या।

    उत्साह से मुदित हो वर भक्ति साथ, शास्त्रानुकूल तव पाद से पूजते हैं॥३४॥

     

    ना आप आज तक भी श्रुतिगम्य मेरे, मानें मुनीश! भववारिधि में हि ऐसा।

    आ जाय मात्र सुनने तव नाम मन्त्र, आता समीप फिर भी विपदा फणी क्या? ॥३५॥

     

    तेरी न पादयुग पूजन पूर्व में की, जो हैं यहाँ सुखद ईप्सित-वस्तु-दाता।

    ऐसे विचार मम है फलतः मुनीश, देखो हुवा अब अनादर पात्र मैं हूँ ॥३६॥

     

    मोहान्धकार सु तिरोहित लोचनों से, देखा न पूर्व तुमको जिन! एक बार।

    ऐसा न हो यदि विभो! मुझको बतादो; क्यों पाप कर्म दिन-रैन मुझे सताते ॥३७॥

     

    देखे गये श्रवणगम्य हुये व पूजे; पै भक्ति से न चित में तुमको बिठाया।

    हूँ दुःख भाजन हुवा फलतः जिनेश! रे! भावहीन करणी सुख को न देती ॥३८॥

     

    संसार-त्रस्त-जन-वत्सल औ शरण्य, हे नाथ! ईश्वर दया-वर -पुण्य-धाम!

    हूँ भक्ति से नत, दया मुझमें दिखा के; उद्युक्त हो दुरित अंकुर को जलाने ॥३९॥

     

    हैं आप जीत वसुकर्म सुकीर्तिधारी, पा, पाद कंज युग को यदि आपके मैं।

    स्वामी! सुदूर निज चिंतन से रहूँ तो; हूँ भाग्यहीन, व मरा, अयि तात! वन्द्य ॥४०॥

     

    श्री पार्श्वनाथ! भवतारक! लोकनाथ! सर्वज्ञदेव! व विभो! सुरनाथ वन्द्य!

    रक्षा अहो! मम करो, करुणासमुद्र; संसारत्रस्त मुझको, उस छोर भेजो ॥४१॥

     

    पादारविन्द युग-भक्ति-सुपाक, कोई, है तो यहाँ तव विभो भववार्धिपोत!

    मेरे लिये इह तथा परजन्म में भी हैं आप ही व शरणागत पाल स्वामी ॥४२॥

     

    रोमांचितांगयुत जो तप भव्य जीव, एकाग्र हो तव मुखांबुज में अली से।

    हैं स्रोत की सुरचना करते यहाँ पे; ऐसे यथाविधि जिनेन्द्र! विभो! शरण्य ॥४३॥

     

    जननयन कुमुदचन्द्र!, परमस्वर्गीय भोग को भोग।

    वे वसुकर्म नाशकर, पाते शीघ्र मोक्ष को लोग ॥४४॥

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