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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • भक्ति पाठ

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    भक्ति पाठ

     

    आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने चतुर्विध संघ पर कृपा कर प्रातः स्मरणीय, फलतः नितान्त उपादेय नौ भक्तियों का अनुवाद हिन्दी भाषा में कर दिया है। इससे संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ उपासक जन भी अर्थावबोधपूर्वक अपनी चेतना को सुस्नात और सिक्त कर सकेंगे। उपासक इन्हीं के पाठारम्भ से अपनी दिनचर्या आरम्भ करते हैं और इसी से सम्पन्न भी। इससे इनकी महत्ता स्पष्ट है। ये नौ भक्तियाँ हैं-सिद्धभक्ति, चारित्रभक्ति, योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति, नन्दीश्वरभक्ति, चैत्यभक्ति, शान्तिभक्ति तथा पञ्चमहागुरुभक्ति।

     

    पहली भक्ति है-‘सिद्धभक्ति' । पंच परमेष्ठियों (परमे तिष्ठति इति परमेष्ठी) में चार कक्षाओं के अधिकारी मनुष्य हैं और एक कक्षा के अधिकारी हैं मुक्त आत्माएँ। ये ही मुक्त आत्मायें ‘सिद्ध' कही जाती हैं। आठों प्रकार के कर्मों के क्षय से जब शरीर भी नहीं रहता तो उसे (विदेह/मुक्त) सिद्ध कहते हैं। ये ऊर्ध्वलोक के लोकाग्र में पुरुषाकार छायारूप में स्थित रहते हैं। इनका पुनः संसार में आगमन नहीं होता। ये सच्चे परम देव हैं। संसारी भव्यजीव वीतराग भाव की साधना से इस अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। वे ज्ञान शरीरी हैं। सिद्धभक्ति में इन्हीं के गुण-गण का वर्णन किया गया है। इसमें पूर्व में की गई उनकी साधना और उससे उपलब्ध ऊँचाइयों का विवरण है।

     

    दूसरी है-चारित्रभक्ति। इसमें रत्नत्रय में परिगणित चारित्ररूप रत्न की महिमा गाई गई है और उसकी सुगन्ध आचार में प्रस्फुटित हो, यह कामना व्यक्त की गई है। दर्शन, ज्ञान और चारित्र की सम्मिलित कारणता है-मोक्ष के प्रति । जैन शास्त्रों में इसके अन्तर्गत अत्यन्त सूक्ष्म और वर्गीकृत विवेचन मिलता है। आचार्यश्री ने भी बहुत से पारिभाषिक शब्दों का सांकेतिक प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए कायोत्सर्ग, गुप्तियाँ, महाव्रत, ईर्या आदि समितियाँ, तेरहविध चारित्र, कर्म-निर्जरा 311 I

     

    तीसरी भक्ति है-योगिभक्ति । सनातनी विद्या की अभिव्यक्ति की दो धाराएँ हैं-शब्द और प्रातिभ। अभिव्यक्ति की दूसरी धारा श्रमणमार्ग की धारा है। तप एवं खेद के अर्थ वाली दिवादि गण में पठित ' श्रमु' धातु में ‘ल्युट्' प्रत्यय होने पर ‘श्रमण' शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है-तपन या तप करना । पर धारा विशेष में यह योगरूढ़' है-यों यौगिक तो है ही। तप ही इस धारा की पहचान है। यह तत्त्व न तो उस मात्रा में ब्राह्मण धारा में है और न ही बौद्ध धारा में। योगिभक्ति में आचार्यश्री ने प्रबल तपोविधि का विवरण दिया है। कहा गया है

     

    ‘‘बाह्याभ्यन्तर द्वादशविध तप तपते हैं मद-मर्दक हैं।''

     

     

    चौथी भक्ति है-आचार्यभक्ति। पंच परमेष्ठी में तृतीय स्थान आचार्य का है। अध्यात्ममार्ग के पथिक को आचार्य की अँगुली, उनका हस्तावलम्ब अनिवार्य है और यह उनकी भक्ति से ही सम्भव है। कहा गया है

     

    उपास्या गुरवो नित्यमप्रमत्तैः शिवार्थिभिः।

    तत्पक्षतार्थ्य-पक्षान्तश्चरा विघ्नोरगोत्तराः॥

     

    सागारधर्मामृत २/४५ आचार्य रूप श्री सद्गुरु स्वयं दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप और वीर्य-इन पाँच प्रकार के आचारों का पालन करते हैं और अन्य साधुओं से भी उसका पालन कराते हैं, दीक्षा देते हैं, व्रतभंग या सदोष होने पर प्रायश्चित्त कराते हैं। आस्रव के लिए कारणीभूत सभी सम्भावनाओं से अपने को बचाते हैं। इसमें आचार्य के छत्तीस गुण बताये गये हैं। 

     

    पाँचवी भक्ति है- निर्वाणभक्ति । आचार्यश्री का संकल्प है

     

    निर्वाणों की भक्ति का करके कायोत्सर्ग।

    आलोचन उसका करूँ ले प्रभु तव संसर्ग ॥

     

    ‘महावीर' पदवी से विभूषित तीर्थंकर वर्धमान का निर्वाणान्त पंचकल्याणक अत्यन्त शोभन शब्दों से वर्णित है। इन तीर्थंकर के साथ कतिपय अन्य पूर्ववर्ती तीर्थंकरों की निर्वाणभूमियाँ उनके चिह्नों के साथ वर्णित हैं।

     

    छठी भक्ति है-नन्दीश्वरभक्ति। यह १६ जून, १९९१ को सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि, बैतूल (म० प्र०) में अनूदित हुई थी जबकि शेष भक्तियाँ गुजरात प्रान्तवर्ती श्री विघ्नहर पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र महुआ, सूरत गुजरात में २२ सितम्बर, १९९६ को अनूदित हुई थीं। नन्दीश्वर-यह अष्टम द्वीप है। जो नन्दीश्वर सागर से घिरा हुआ है। यह स्थान इतना रमणीय और प्रभावी है कि उसका वर्णन पढ़कर स्वयं आचार्यश्री तो प्रभावित हुए ही हैं और भी कितने मुनियों तथा साधकों को भी यहाँ से दिशा मिली है। ऐसे ही परम पुनीत स्थानों में सम्मेदाचल, पावापुर का भी उल्लेखनीय स्थान है। ऐसे अनेक जिन भवन हैं जो मोक्षसाध्य के हेतुभूत हैं। चतुर्विध देव तक सपरिवार यहाँ इन जिनालयों में आते हैं। आचार्यश्री इन और ऐसे अन्य जिनालयों के प्रति सश्रद्ध नतशिर हैं।

     

    सातवीं भक्ति है-चैत्यभक्ति। आचार्यश्री ने बताया है कि जिनवर के चैत्य प्रणम्य हैं। ये किसी द्वारा निर्मित नहीं हैं अपितु स्वयं बने हैं। इनकी संख्या अनगिनत है। औरों के साथ आचार्यश्री की भी कामना है कि वे भी उन सब चैत्यों का भरतखण्ड में रहकर भी अर्चन-वन्दन-पूजन करते रहें ताकि वीर-मरण हो जिनपद की प्राप्ति हो और सामने सन्मति लाभ हो।

     

    आठवीं भक्ति है-शान्तिभक्ति। इस भक्ति में दु:ख-दग्ध धरती पर जहाँ कषाय का भानु निरन्तर आग उगल रहा हो, किसे शान्ति अभीष्ट न होगी ? तीर्थंकर शान्तिनाथ शीतल-छायायुक्त वह वट वृक्ष हैं, जहाँ अविश्रान्त संसारी को विश्रान्ति मिलती है। इसीलिए आचार्यश्री कहते हैं सोलहवें तीर्थंकर शान्तिनाथ को दृष्टिगत कर

     

    शान्तिनाथ हो विश्वशान्ति हो भाँति-भाँति की भ्रान्ति हरो।

    प्रणाम ये स्वीकार करो लो किसी भाँति मुझ कान्ति भरो ॥

     

    इस संकलन की अन्तिम भक्ति है-पंच महागुरुभक्ति। इसमें अन्ततः पंच परमेष्ठियों के प्रति उनके गुणगणों और अप्रतिम वैभव का स्मरण करते हुए आचार्यश्री कामना करते हैं

     

    कष्ट दूर हो कर्मचूर हो बोधिलाभ हो सद्गति हो।

    वीरमरण हो जिनपद मुझको मिले सामने सन्मति हो ॥

     

    इन विविध विध भक्तियों में जिनदर्शन सम्मत सर्वविध चिन्तन का सार आ गया है- विशेष कर आत्मचिन्तन का। इस प्रकार आचार्यश्री की निर्झरिणी लोकहितार्थ निरन्तर सक्रिय है।

    Edited by संयम स्वर्ण महोत्सव

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