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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • लिंगपाहुड

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    मैं वन्दना कर उन्हें परमेष्ठियों को, सिद्धों तथा जिनवरों जिन आर्हतों को।

    सत् प्राभृती श्रमण लिंग सुखी बनाता, संक्षेप से तुम सुनो! तुमको सुनाता ॥१॥

     

    सद्धर्म से सहित हो वह लिंग सारा, पावे न धर्म-धन, केवल-लिंग द्वारा।

    तू जान भावमय धर्म अरे ! रुची से, है मात्र लिंग वह व्यर्थ रहा इसी से ॥२॥

     

    निर्ग्रन्थ लिंग जिसने मुनि हो सुधारा, पै पाप पंक मल से मन को बिगारा।

    वो “भाव लिंग' जिसकी करता हँसी है, सो अन्य साधु-मुख में लगती मषी है ॥३॥

     

    निर्ग्रन्थ-रूप धर वाद्य मनो बजाता, है नित्य नृत्य करता रति गीत गाता।

    है पाप पंक मल से मन पे लिपाता, होता नहीं श्रमण वो पशु ही कहाता ॥४॥

     

    जो संग का ग्रहण रक्षण में लगे हैं, हैं आर्त ध्यान करते मुनि हो डिगे हैं।

    हैं पाप पंक मल से मन को लिपाते, होते नहीं श्रमण वे पशु ही कहाते ॥५॥

     

    खेलो जुवा कलहवाद वृथा करे हैं, मानी प्रमत्त बन के मद से भरे हैं।

    निर्ग्रन्थ बाह्य मुनि यद्यपि हैं तथापि, पाताल में उतरते कर पाप पापी ॥६॥

     

    निर्ग्रन्थ हो सहित मैथुन कार्य से हैं, पापी बने उदय पूर्ण अनार्य से हैं।

    हैं पापरूप मल से मन औ लिपाते, संसार के विपिन में भ्रम दुःख पाते ॥७॥

     

    सम्यक्त्व ज्ञान व्रत ये शिव हेतु प्यारे, मोही बने मुनि परन्तु इन्हें न धारें।

    हैं आर्त ध्यान भर में मन को लगाते, संसार को अमित और अतः बनाते ॥८॥

     

    मोही, विवाह अविवाहित का कराते, वाणिज्य जीव वध औ कृषि भी कराते।

    निर्ग्रन्थ नग्न मुनि यद्यपि हैं तथापि, पाताल में उतरते कर पाप पापी ॥९॥

     

    चोरों नृपों यदि परस्पर में लड़ाता, है पाप कार्य करता पर से कराता।

    तासादि खेल मुनि होकर खेलता है, सो आत्म को नरक में हि ढकेलता है ॥१०॥

     

    सम्यक्त्व ज्ञान चरणों व्रत पालनों में, आवश्यक नियम संयम सत् तपों में।

    निर्ग्रन्थ हो यदि मनो दुख मानता है, जाता अतः नरक सो अनजानता है॥११॥

     

    हो लोलुपी सरस भोजन का बना है, कामादि पाप भर में फलतः सना है।

    होता नहीं श्रमण वो व्यभिचारकर्ता, मायाभिभूत पशु है मद-मार-धर्ता ॥१२॥

     

    लो भोजनार्थ सहसा बस भाग जाते, साधर्मि से कलह भी कर भात खाते।

    विद्वेषपूर्ण रखते मुनि सन्त से हैं, वे दूर ही श्रमण हो शिवपंथ से हैं ॥१३॥

     

    निन्दा परोक्ष पर की करता बनाता, दोषी, प्रदत्त बिन दान स्वयं गहाता।

    निर्ग्रन्थ लिंग जिसने बस बाह्य धारा, सो चोर सा श्रमण है नहिं साम्य धारा ॥१४॥

     

    हैं खोदते अवनि को चलते दिखाते, हैं दौड़ते उछलते गिर भाग जाते।

    ईर्यामयी समिति धारक, ना कहाते, होते नहीं श्रमण वे पशु ही कहाते ॥१५॥

     

    हिंसादि जन्य विधि बंध, नहीं गिनाता, खोदे धरा तरु लता दल को गिराता।

    है छेदता श्रमण हो तरु के गणों को, हा! साम्य हीन, धरता पशु के गुणों को ॥१६॥

     

    दोषावरोप करता मुनि सज्जनों में, आसक्त रात-दिन है महिला जनों में।

    सम्यक्त्व ज्ञान गुण से अति दूर होता, होता नहीं श्रमण वो पशु मूढ़ होता ॥१७॥

     

    है धारते परम स्नेह असंयतों में, किंवा विमुग्ध निज शिष्य सुसंयतों में।

    आचार से विनय से च्युत हो रहे हैं, होते नहीं श्रमण वे पशु तो रहे हैं ॥१८॥

     

    पूर्वोक्त दुर्गुण लिये मुनि संयतों में, सत् संघ में रह रहा गुणधारियों में।

    होता विशारद जिनागम में तथापि, होता नहीं श्रमण भावविहीन पापी ॥१९॥

     

    विश्वास नारिजन में रखता, दिलाता, सम्यक्त्व ज्ञान व्रत भी उनको सिखाता।

    पार्श्वस्थ से अधिक निंद्य रहा तथापि, होता नहीं श्रमण वंद्य रहा कुपापी ॥२०॥

     

    आहार लेत व्यभिचारिणि के यहाँ हैं, शंसा करें स्तुति करें उसकी अहा है।

    वे बाल अज्ञ निज भाव-विहीन पापी, होते नहीं श्रमण, लिंग धरें तथापि ॥२१॥

     

    यों लिंग प्राभृत रहा मुनिलिंग प्यारा, सर्वज्ञ ने यह कहा हमको सुचारा।

    जो भी इसे यतन से यदि पाल पाता, औचित्य ! स्वीय परमोत्तम धाम जाता ॥२२॥

     

    (दोहा)

     

    नग्न मात्र बाहर बना, भीतर भरी कषाय।

    शिव सुख पाता वह नहीं, बसता नहीं अकाय ॥१॥

    बाहर भीतर एक-सा, यथाजात जिन लिंग।

    दर्पण सम शुचि यदि बना, वह नर बने अलिंग ॥२॥


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