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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • चारित्र पाहुड

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    सर्वज्ञ हैं निखिल दर्शक वीतरागी, हैं वीतमोह परमेष्ठि प्रमाद त्यागी।

    जो भव्य जीव स्तुत हैं त्रयलोक द्वारा, अर्हन्त को नमन मैं कर बार-बारा ॥१॥

     

    सर्वज्ञ दिव्य पद दायक पूर्ण साता, ज्ञानादि रत्नत्रय को शिर मैं नवाता।

    चारित्र-प्राभृत सुनो! अब मैं सुनाता, जो मोक्ष का परम कारण है कहाता ॥२॥

     

    जो जानता ‘समय में' वह ज्ञान होता, श्रद्धान होय वह दर्शन नाम देता।

    दोनों मिले जब सुनिश्चल शैल होते, चारित्र निश्चय वही मन मैल धोते ॥३॥

     

    ये जीव के त्रिविध भाव न आज के हैं, वैसे अनन्त ध्रुव सत्य अनादि के हैं।

    तीनों अशुद्ध पर शुद्ध उन्हें बनाने, चारित्र है द्विविध यों जिन-शास्त्र माने ॥४॥

     

    श्रद्धान जैन-मत में अति शुद्ध होना, सम्यक्त्व का चरण चारित धार लो ना।

    औ संयमाचरण चारित दूसरा है, सर्वज्ञ से कथित सेवित है खरा है ॥५॥

     

    मिथ्यात्व पंक तुमने निज पे लिपाया, शंकादि मैल दृग के दृग पे छिपाया।

    वाक् काय से मनस से उनको हटाओ, सम्यक्त्व आचरण में निज को बिठाओ ॥६॥

     

    ये अष्ट अंग दृग के, विनिशंकिता है, नि:कांक्षिता, विमल-निर्विचिकित्सिता है।

    चौथा अमूढ़पन है उपगूहना को, धारो स्थितीकरण, वत्सल-भावना को ॥७॥

     

    श्रद्धान होय जिनमें वह मोक्ष दाता, निःशंक आदि गुण युक्त सुदृष्टि साता।

    धारो सुबोध युत दर्शन को सुचारा, सम्यक्त्व आचरण चारित वो तुम्हारा ॥८॥

     

    सम्यक्त्व के चरण से द्युतिमान होता, औ संयमाचरण में रममान होता।

    ज्ञानी वही बस नितान्त अमूढदृष्टी, निर्वाण शीघ्र गहता तज मूढ़दृष्टी ॥९॥

     

    सम्यक्त्व के चरण से च्युत हो रहे हैं, पै संयमाचरण केवल ढो रहे हैं।

    अज्ञान-ज्ञान फल में अनजान होते, मोही न मोक्ष गहते, बिन ज्ञान रोते ॥१०॥

     

    वात्सल्य हो, विनय हो, गुरु में गुणी में, अन्नादि देकर दया करते दुखी में।

    निर्ग्रन्थ मोक्ष पथ की करना प्रशंसा, साधर्मि-दोष ढकना, नहिं आत्म शंसा ॥११॥

     

    पूर्वोक्त सर्व गुण लक्षित हो उन्हीं में, सारल्य भावयुत निष्कपटी सुधी में।

    मिथ्यात्व से रहित भाव सुधारते हैं, वे ही अवश्य जिन-दर्शन पालते हैं ॥१२॥

     

    रागाभिभूत मत की स्तुति शंस सेवा, उत्साह धार यदि जो करते सदैवा।

    अज्ञान मोह-पथ से मन जोड़ते हैं, श्रद्धान जैन-मत का तब छोड़ते हैं ॥१३॥

     

    निर्ग्रन्थ जैन-मत की स्तुति शंस-सेवा, उत्साह धार यदि जो करते सदैवा।

    श्रद्धान और जिनमें दृढ़ ही जमाते, सज्ज्ञान पा, न जिन दर्शन छोड़ पाते ॥१४॥

     

    सम्यक्त्व बोध गहते तुम हो इसी से, मिथ्यात्व मूढ़पन को तज दो रुची से।

    भाई मिला जब सुधर्म तुम्हें अहिंसा, सारंभ मोह तज दो अघकर्म हिंसा ॥१५॥

     

    त्यागो परिग्रह पुनः धर लो प्रव्रज्या, पालो सुसंयम तपो तप त्याग लज्या।

    निर्मोह भाव लसता उर में विरागी, पाता निजी विमल ध्यान सुनो सरागी ॥१६॥

     

    मिथ्यात्व मोह मल दूषित पंथ में ही, आश्चर्य क्या यदि चले मति मन्द मोही।

    मिथ्या कुबोध वश ही विधि बंध पाते, अच्छी दिशा पकड़ के कब अन्ध जाते ॥१७॥

     

    विज्ञान-दर्शन-तया समदृष्टि जाने, जो द्रव्य, द्रव्यगत पर्यय को पिछाने।

    सम्यक्त्व से स्वयम पे कर पूर्ण श्रद्धा, चारित्र-दोष हरते, करते विशुद्धा ॥१८॥

     

    सम्मोह से रहित हैं उन ही शमी में, पूर्वोक्त तीन शुचि-भाव बसे यमी से।

    श्रद्धाभिभूत निज के गुण गीत गाते, काटे कुकर्म झट से भव जीत पाते ॥१९॥

     

    प्रारंभ में गुण असंख्य पुनश्च संख्या, है कर्म नष्ट करते बनते अशंका।

    सम्यक्त्व आचरण पा दुख को मिटाते, संसार को लघु परीत सुधी बनाते ॥२०॥

     

    सागार और अनगार-तया द्विधा है, वो संयमाचरण मोक्षद है सुधा है।

    सागार-संग-युत-श्रावक का कहाता, निर्ग्रन्थ रूप ‘अनगार' मुझे सुहाता ॥२१॥

     

    सद्दर्शना सुव्रत सामयिकी स्वशक्ति, औं प्रोषधी सचित त्याग दिवाभिभुक्ति।

    है ब्रह्मचर्य व्रत सप्तम नाम पाता, आरंभ संग अनुमोदन त्याग साता।

    उद्दिष्ट त्याग व्रत ग्यारह ये कहाते, है एक देश व्रत श्रावक के सुहाते ॥२२॥

     

    सानन्द-श्रावक, अणुव्रत पाँच पाले, आरम्भ नाशक, गुण-व्रत तीन धारे।

    शिक्षाव्रतों चहुँ धरें वह है कहाता, सागार संयम सुचारित सौख्य दाता ॥२३॥

     

    हो त्याग स्थूल त्रसकायिक के वधों का, औ स्थूल झूठ बिन दत्त परों धनों का।

    भाई कभी न पर की वनिता लुभाना, आरम्भ संग परिमाण तथा लुभाना।

    ये पंच देशव्रत श्रावक तू निभाना ॥२४॥

     

    सीमा विधान करना कि दशों दिशा में, औ व्यर्थ कार्य करना न किसी दशा में।

    भोगोपभोग परिमाण तथा बनाना, ये तीन श्रावक गुणव्रत तू निभाना ॥२५॥

     

    सामायिका प्रथम प्रोषध है द्वितीया, सिद्धान्त में अतिथि पूजन है तृतीया।

    सल्लेखना चरम ये व्रत चार शिक्षा, शिक्षा मिले तुम बनो मुनि, धार दीक्षा ॥२६॥

     

    होता कला सहित है टुकड़ा सुनो रे! सागार धर्म इस भाँति कहा, गुणों रे!

    पै संयमाचरण शुद्ध तुम्हें सुनाता, आराध्य धर्म यति का परिपूर्ण भाता ॥२७॥

     

    पच्चीस हो शुचि क्रिया व्रत पाँच धारे, पंचाक्ष के दमन से सब पाप टारे।

    औ गुप्ति तीन समिती मुनि पाँच पाले, वो संयमाचरण साधक नग्न प्यारे ॥२८॥

     

    जो चेतनों जडतनों अवचेतनों में, अच्छी बुरी जगत की इन वस्तुओं में।

    ना राग-रोष मुनि हो करता कराता, पंचाक्ष-निग्रह वही यह छन्द गाता ॥२९॥

     

    हिंसा यथार्थ तजना भजना अहिंसा, हो झूठ स्तेय तज सत्य अचौर्य शंसा।

    अब्रह्म-संग तज, ब्रह्म निसंग होना, ये पाँच हैं तुम महाव्रत, धार लो ना ॥३०॥

     

    साधे गये विगत में व्रत ये यहाँ हैं, साधे जिन्हें नित नितान्त महामना हैं।

    होते स्वयं सहज सत्य महान तातें, ये आप सार्थक महाव्रत नाम पाते ॥३१॥

     

    वाक् चित्त-गुप्ति धरना लख भोज पाना, ईर्या समेत चलना उठ बैठ जाना।

    आदान निक्षपण से सब भावनायें, ये पाँच आद्य व्रत की सुख-साधनायें ॥३२॥

     

    छोडो प्रलोभ, मन आगम ओर मोड़ो, गंभीर हो अभय हो भय हास्य छोडो,

    संमोह क्रोध तज दर्शन पालना, ये, हैं पाँच सत्यव्रत की शुभ भावनायें ॥३३॥

     

    छोड़े हुए सदन शून्य घरों वनों में, सत्ता जमा कर नहीं रहना द्रुमों में।

    साधर्मि से न लड़ना शुचि भोज पाना, ये भावना व्रत अचौर्यन की निभाना ॥३४॥

     

    देखो न अंग महिलाजन संग छोड़ो, स्त्री की कथा श्रवण से मन को न जोड़ो।

    संभोग की स्मृति तजो, न गरिष्ठ खाना, ये भावना परम ब्रह्मन की खजाना ॥३५॥

     

    ये शब्द स्पर्श रस रूप सुगंध सारे, पंचाक्ष के विषय हैं कुछ सार खारे।

    ना राग रोष इनमें करना कराना, हैं भावना चरम जो व्रत की निभाना ॥३६॥

     

    ईर्या सुभाषणवती पुनि एषणा है, आदान निक्षपण औ व्युतसर्गना है।

    पाँचों कही समितियाँ जिन ने इसी से, हो शुद्ध शुद्धतम संयम हो शशी से ॥३७॥

     

    संबोधनार्थ भवि को जिन ने बताया, जो ज्ञान ज्ञान गुण लक्षण को दिखाया।

    सो ज्ञान जैनमत में निज आतमा है, यो जान, मान, फलतः दुख खातमा हैं ॥३८॥

     

    होते अजीव अरु जीव निरे निरे हैं, ज्ञानी हुए कि इस भाँति लखे खरे हैं।

    औ राग रोष जिस जीवन में नहीं है, सो ‘मोक्षमार्ग' जिनशासन में वही है ॥३९॥

     

    सम्यक्त्व बोध व्रत को शिवराह राही, श्रद्धाभिभूत बन के समझो सदा ही।

    योगी इन्हें हि लखते दिन-रैन भाई, निर्वाण शीघ्र लहते सुख चैन स्थाई ॥४०॥

     

    विज्ञान का सलिल सादर साधु पीते, धारें अतः विमल भाव स्वतंत्र जीते।

    चूड़ामणी जगत के स्वपरावभासी, वे शुद्ध सिद्ध बनते शिवधाम वासी ॥४१॥

     

    जो ज्ञान शून्य नहिं इष्ट पदार्थ पाते, अज्ञान का फल अनिष्ट यथार्थ पाते।

    यों जान, ज्ञान गुण के प्रति ध्यान देना, क्या दोष क्या गुण रहा, कुछ जान लेना ॥४२॥

     

    ज्ञानी वशी चरित के रथ बैठ त्यागी, चाहें न आत्म तज के परको विरागी।

    निर्धान्त वे अतुल अव्यय सौख्य पाते, दिग्भ्रान्त ही समझ तू भवदुःख पाते ॥४३॥

     

    सम्यक्त्व संयम समाश्रय से सुहाता, चारित्र सार द्विविधा शिव को दिलाता।

    संक्षेप से भविक लोकन को दिखाया, श्री वीतराग जिन ने हमको जिलाया ॥४४॥

     

    चारित्र प्राभृत रचा रुचि से सुचारा, भावो इसे अनुभवो शुचि भाव द्वारा।

    तो शीघ्र चारगति में भ्रमना मिटेगा, लक्ष्मी मिले मुकति में रमना मिलेगा ॥४५॥

     

    (दोहा)

     

    चार चाँद चारित्र से जीवन में लग जाय।

    लगभग तम भग ज्ञान शशि उगत उगत उगजाय ॥

    समकित- संयम आचरण, इस विधि द्विविध बताय।

    वसुविध-विधिनाशक तथा सुरसुख शिवसुखदाय॥


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