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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • समता.....!

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    भुक्ति की ही नहीं

    मुक्ति की भी

    चाह नहीं है

    इस घट में,

    वाह - वाह की

    परवाह नहीं है

    प्रशंसा के क्षण में

    दाह के प्रवाह में अवगाह करूँ

     

    पर! आह की तरंग भी

    कभी न उठे

    इस घट में ..... संकट में

    इसके अंग-अंग में

    रग - रग में

    विश्व का तामस आ

    भर जाय

    किन्तु विलोम - भाव से,

    यानी!

    ता....म....स....स....म....ता!

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