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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • दीन नयन ना

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    निश्चल

    निश्छल

    संवेदनशील

    समता छलकती

    लोचनों में

     

    धवलिमा मिश्रित
    गुलाब फूल की

    हलकी लालिमा सी भी

    तरल रेखा

    नहीं नहीं

    कभी न खिचे

    निन्दोपजीवी

    मतिहीन / दीन

    विषयों, कषायों में

     

    सतत संल्लीन

    मानव मुख से

    आश्रव्य निन्द्य वचन

    सुनकर

    हे करुणाकर!

    गुणगण आकर!

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