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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • बिजली की कौंध

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    आलोक का अवलोकन

    आँखें करतीं

    अकुलातीं, विकलित होतीं

    एक पर टिकती नहीं

    उस की ऊर्जा बिकती है

    पल-पल परिवर्तित हो

    पर पर जा टिकती है

     

    यही कारण है

    हे! आलोक पुंज !

    आलोक तुम से

    नहीं चाहता यह

    विशुद्धतम तम-तम में

    आँखें पूरी खुलती हैं

    एक पर टिकतीं अनायास ।

    अपलक निश्चल होती है

    अवलोकन पूरा होता है

     

    मनन मन्थन अबाधित चलता है

    अनुभूति में मति ढलती है

    इसलिए

    आलोक बाधक है

     

    अलिगुण कालिख अन्धकार !

    साधक है इस साधक को

    अपना आलोक

    इन आँखों पर मत छोडो...!

    ओ! आलोक-धाम!

    बिजली कौंधती है तब !

    आँखें मुँदती हैं !

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