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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • भटकन तब तक भव में जारी

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    भटकन तब तक भव में जारी.jpg

     

    विषय - विषम विष को तुम त्यागो,

    पी निज सम रस को भवि! जागो।

    निज से निज का नाता जोड़ो,

    परसे निज का नाता तोड़ो ।।

    मिले न तब तक वह शिवनारी,

    निज - स्तुति जब तक लगे न प्यारी ।।१।।

     

    जो रति रखता कभी न परमें,

    सुखका बनता घर वह पलमें ।

    वितथ परिणमन के कारण जिय!,

    न मिले तुझको शिव-ललना-प्रिय ।।

    जप, तप तब तक ना सुखकारी,

    निज स्तुति जब तक लगे न प्यारी ।।२।।

     

    सज, धज निजको दश धर्मों से

    छूटेगा झट अठ कर्मों से,

    मैं तो चेतन अचेतन हीतन,

    मिले शिव ललन, कर यों चिंतन । ।

    भटकन तब तक भव में जारी,

    निज - स्तुति जब तक लगे न प्यारी ।।३।।

     

    अजर अमर तू निरंजन देव,

    कर्ता धर्ता निजका सदैव ।।

    अचल अमल अरु अरूप, अखंड,

    चिन्मय जब है फिर क्यों घमंड?

    ‘विद्या' तब तक भव दुख भारी,

    निज - स्तुति जब तक लगे न प्यारी ।।४।।

     

    - महाकवि आचार्य विद्यासागर

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