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  • ज्ञान का सागर : क्रमांक - 19

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    ढाई दिन की रेलयात्रा पूर्ण कर युवक अजमेर पहुँचा था- वह ढाई दिन से ही निर्जला थे। केशरगंज के मंदिर में अपने ‘भावी आराध्य का पता लगाने जा पहुँचे। मंदिर के भीतर नहीं गये, बाहर ही एक सज्जन से पूछताछ की। कई बार ऐसा होता है कि पिता से मिलने जाओ तो पुत्र मिलता है। भगवान से मिलने जाओ तो भक्त मिल जाता है। जिनके साथ ऐसा हुआ है वे अधिक लाभ में रहे हैं। उस दिन भी ऐसा ही हुआ, विद्याधर को भगवान के बदले भक्त पहले मिल गये।

     

    जिस सज्जन से उन्होंने अपने भगवान (गुरुवर) का पता पूछा था, उन्होंने पहले भक्त का पता बतलाया, बोले- वो समीप ही आदरणीय श्री कजौड़ीमलजी अजमेरा रहते हैं, उनसे मिलो, वे सब कुछ बतला देंगे। | युवक विद्याधर श्री कजोड़ीमल के निवास पर जा पहुँचे। कजौड़ीमल ने ध्यान से उनकी बातें सुनीं, फिर उनके चेहरे पर उपवासों के जो पावन चिह्न हो आये थे, वे देखे और बोले- बेटे, पहले स्नान कर ले, फिर उनसे मिला देंगे। वे यहाँ नहीं हैं, थोड़ी दूरी पर स्थित नगर मदनगंज-किशनगढ़ में हैं।

     

    विद्याधर यह सुनकर अधीर हो गये, पूछ बैठे- कितनी दूर ? - यही कोई २८-३० किलोमीटर। विद्याधर सोचने लगे कुछ। उन्हें लगा कि अभी पैदल ही चल दें। तब तक कजौड़ीमलजी ने पुन: कहा- सोच-विचार न कर, चल पहले स्नान कर। कजोड़ीमलजी ने विद्याधर को स्नान, मंदिर, भोजन की व्यवस्था करा दी, फिर उन्हें साथ लेकर मदनगंज-किशनगढ़ को प्रस्थान किया। रास्ते में कजोड़ीमलविचार करने लगे- अभी तक दक्षिण से जो लोग यहाँ आते रहे हैं, वे अक्सर इस इलाके के प्रसिद्ध पत्थर खरीदकर ट्रक भर-भर ले जाते रहे हैं, यह पहला युवक है जो मदनगंज-किशनगढ़ के पत्थरों से नहीं, भगवान से मिलने आया है। जरूर कोई भाग्यशाली है।

     

    विद्याधर सोच रहे थे - इधर, उत्तर भारत के आदमी कितने अच्छे हैं। भोजन और भगवान का लाभ दिलाते हैं। मदनगंज पहुँचकर कजोड़ीमलजी ने उचित समय पर विद्याधर को पू. ज्ञानसागरजी के समक्ष खड़ा कर दिया। फिर पूरा हाल बतलाया। विद्याधर मुनिवर के चरणों से लग गये, जैसे चरणों पर गिर पड़े हों, फिर नमोऽस्तु किया। ज्ञानसागरजी को युवक की एक क्रिया सबसे पृथक् लगी। उसकी क्रिया में समर्पण भाव का सच्चा संकेत था, उसकी नमोऽस्तु में अनेक पूजाओं की ध्वनियाँ समाहित मिलीं।

     

    गुरुवर ने आशीष दिया - वात्सल्य से हाथ उठा कर। आशीष पाकर विद्याधर को लगा कि अभी-अभी सावन के घने बादल उन पर बरस गये हैं, उनका तन-मन भिगो गये हैं, वे हाथ जोड़ कर गुरुवर के समीप खड़े हो गये। कजोड़ीमल चुपचाप दर्शक की तरह दृश्य देख रहे थे। तब तक गुरुवर ने विद्यमा से पूछा- क्या नाम है तुम्हारा? प्रश्न जिस मध्यम आवाज और मीठे स्वर में किया गया था, वे मुश्किल से ही उपलब्ध होते हैं। क्षण भर को विद्याधर के कानों में अमृत-सा घुल गया। विद्याधर ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया- जी, विद्याधर।

     

    उनके उत्तर देने में जो ध्वनि गुरुवर के कानों में व्यापी थी, वह भी अद्वितीय थी। उन्हें लगा किसी ने धीरे से कान में रजत-घंटियाँ बजा दी हैं। विद्याधर की आवाज उनके हिये तक को जैसे स्पर्श कर गई हो। उत्तर सुनकर गुरुवर मुस्कुराये, फिर बोले- हूँ, आम विद्या सीखने आये हैं। ठीक है, सीख लेना। सीख कर विद्याधरों की तरह उड़ जाना। मुझे श्रम ही हाथ लगेगा।

    - नहीं गुरुवर ! नहीं। मैं उड़कर वापिस होने नहीं आया हूँ। आपकी चरण रज में रमने आया हूँ। विश्वास कीजिए, ज्ञानार्जन कर भागूंगा नहीं, उसका अनुवाद चारित्र में कर दूंगा। उसे आपके आशीष से चारित्र में उतारूंगा।

    - क्यों कजोड़ीमलजी, मैं विश्वास कर लें इस युवक पर? गुरुवर ने कजोड़ीमल से व्यंग्य में पूछा था। कजौड़ीमल कुछ बोल पाते, उसके पूर्व ही विद्याधर ने श्रद्धा सहित हाथ जोड़कर उत्तर दिया - गुरुवर यदि आपको विश्वास न हो रहा हो तो उसके लिये में अभी आपके चरणों के समक्ष ‘आजीवन सवारी' का त्याग करता हूँ।

     

    विद्याधर का संकल्प सुनकर गुरुवर चकित हो गये। जरा-सी बात पर जीवन भर का महान त्याग । एक प्रश्न पर इतना त्याग। भविष्य में मेरे संकेतों पर जाने क्या-क्या त्याग सकता है? ज्ञानसागरजी को विद्याधर पर विश्वास हो आया सो बोले - अच्छा रुको । बाद में चर्चा करेंगे। गुरुवर के  श्वासन ने विद्याधर के कानों में मिश्री घोल दी। उनकी आत्मा को भारी प्रसन्नता हुई, हो गया मानस संतुष्ट । पुन: कुछ आगे बढ़े, पकड़ लिये मुनिवर के चरण अधरों से बोले - नमोऽस्तु । धर दिया शीश चरणों पर पुष्प की तरह। आत्मा से एक पुकार उठीगुरुवर मुझे शरण में ले लो। जैसे आत्मा की मौन विनय गुरुवर ने सुन ली हो, अत: उनके मनीषा रंजित हाथ आशीष के लिये उठ गये। नव शिष्य अद्भुत नमोऽस्तु कर रहा था। वरिष्ठ मुनि अपने आशीष से सर्वांग शीतलता प्रदान कर रहे थे।

     

    तब तक विद्याधर के मानस की गंगा उमड़कर आँखों के रास्ते बह निकली। जैसे प्रथम मिलन में ही नयन-नीर से अभिषेक कर रहे हों चरणों का। अश्रु बिन्दु चरणों पर खेल रहे थे, उधर गुरुवर का हाथ विद्याधर के घने काले बालों में से शीश पर आशीष का संचार कर रहे थे। गुरु के वात्सल्य भरे किंचित् स्पर्श से विद्याधर निहाल हो गये, जैसे सबकी नजरों से बचकर उनकी पदरज आँखों मे आँज लेने में सफल हो गये हों। उसी क्षण से विद्या रूक गये गुरु चरणों के समीप । हो गई चरणों में स्थापना। कक्ष में शांति हो गई थी। तब तक गुरुवर अपनी धीमी, किन्तु गम्भीर वाणी में बुदबुदाये ‘मेरे कहे अनुसार चलते रहोगे तो कुछ पा जाओगे। बस तन-मन दोनों अभ्यासरत रहें।

     

    दूसरे दिन से गुरुवम् ज्ञानसागर ने अध्यापन का गुरुतर कार्य प्रारंभ कर दिया। वे पढ़ाते., विद्या पढ़ते। संघानुकूल कार्यक्रमों और नित्य क्रियाओं में दृष्टि देकर चलते । इन सबसे समय निकाल कर विद्या वृद्ध गुरु की सेवा करते करते हर टहल कुछ ही समय में उनका आगम ज्ञान बढ़ता चला गया। गुरुवर वहाँ के भक्तों की पुकार से मंत्रमुग्ध हो गये थे, अतः नियत समय पर वहीं मदनगंज-किशनगढ़ के ऐतिहासिक मंदिर परिसर में चातुर्मास की स्थापना कर दी। स्थापना-क्रियाओं के समय विद्याधर को साथ-साथ रखा गुरुवर ने। समय थोड़ा और खिसका तो तब तक दशलक्षण पर्व के दिन आ गये। श्रावकगण मंदिर में अधिक समय देने लगे, उससे भी अधिक समय पू. ज्ञानसागरजी की वार्ताओं और प्रवचनों में देते। पर्व के दूसरे दिन की बात है, मंच पर प्रवचनार्थ बैठे गुरुवर ने अचानक विद्याधर को आदेश दिया- ब्रह्मचारीजी, आप तत्त्वार्थ सूत्र का पाठ कीजिये।


    आदेश सुनकर विद्याधर सम्भल कर आसंदी पर बैठे, तब तक व्यवस्था कर रहे सज्जन ने उनके समक्ष माइक लाकर रख दिया। विद्याधर ने हाथ जोड़े, नेत्र बन्द किये और पाठ प्रारंभ कर दिया - पहले गुरुवंदना में चार पंक्तियाँ, फिर मंगलाचरण और फिर सूत्रजी। आँख बंद करे हुए सूत्रजी का पाठ करने लगे। संस्कृत शब्दों का निर्दोष उच्चारण अत्यन्त ललित वाणी में प्रारंभ था। गुरुवर ने ध्यान दिया कि विद्याधर ने पुस्तक तो ली ही नहीं है, कहीं कुछ भूल गया तो बीच में ही पुस्तक लेने रुकना पड़ेगा। गुरुवर सोचकर चुप ही रहे। विद्याधर पर ध्यान दे रहे थे। वे देखते हैं कि विद्या तो लगातार मौखिक ही बोलते चले जा रहे हैं। लगभग पौन घंटे बाद उनका प्रवचन पूर्ण हो गया। उनके मौखिक ज्ञान और निर्दोष उच्चारण से गुरुवर को प्रसन्नता हुई, वहीं उपस्थित श्रोतागणों को भी विद्याधर की शैली और याददाश्त की सराहना करनी पड़ी।

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