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  • ज्ञान का सागर : क्रमांक - 11

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    (अभी) लगभग दो वर्ष पूर्व परमपूज्य शांतिसागरजी के समाधिमरण का समाचार ऐलकजी पं. भूरामल को मिला था, जिसे भूल ही न पाये थे कि वर्ष १९५७ में पुन: एक दुखद समाचार मिला-“परमपूज्य आचार्य वीरसागरजी महाराज समाधिस्थ हो गये।” (ऐलकजी के मन में एक तरफ वियोग की वेदना ने हलचल जारी की तो दूसरी ओर मुक्ति के मसीहा से प्राप्त मोह-विजय का पाठ प्रारंभ हो गया। आचार्य वीरसागरजी ने आसौज कृष्ण अमावस्या वि. सं. २०१४ (२३ सितम्बर १९५७) को खानियाँजी (जयपुर) राजस्थान की भूमि को अपना बिछौना बनाया था, फलत: उस स्थल की गरिमा युक्त चर्चा इतिहास के पन्नों में सदा के लिये प्रवेश कर गई।

     

    ऐ. ज्ञानभूषण को संत-परिवार से परे अकेलेपन की अनुभूति हुई भीतर ही भीतर। मगर वे अपने लेखनकार्य के कारण दो वर्ष तक देशाटन करते हुए भी श्रीसंघों की धर्मपूर्ण स्मृतियों की धरोहरें अपने मन में सँजाये रहे। दिगम्बर साधुओं के इतिहास में खानियाँजी का महत्व सदा अक्षुण्ण रहेगा। जिस महान भूमि पर सन् १९५५ में पू. वीरसागरजी ने आचार्यपद स्वीकार किया था, उसी भूमि पर वर्ष १९५७, (कार्तिक शुक्ल एकादशी वि.सं. २०१४) में पूज्य मुनिवर श्री शिवसागरजी महाराज ने भी जनता-जनार्दन और श्री संघ के सदस्यों की प्रार्थना स्वीकृत करते हुए संघ को चलाते रहने के उद्देश्य से आचार्यपद धारण कर लिया। वे खानियाँजी की पवित्र भूमि पर आचार्य बने इस घटना से समस्त खानियाँ क्षेत्र मुग्ध था।

     

    वर्ष १९५९ (वि. सं. २०१६) चल रहा था कि ऐ. ज्ञानभूषणजी जयपुर में आचार्य शिवसागरजी के दर्शनार्थ पहुँचे। आचार्यश्री से पुरानी आत्मीयता थी। कुछ ही दिन हुए थे कि आचार्यश्री ने उनसे कहा पंडित, ऐलक तू मुनिदीक्षा ले ले। तुझे उपाध्याय पद पर संघ में रखूँगा तो सारे त्यागी लाभान्वित होंगे। सो मेरी बात मान जा। गुरुवर के तारक शब्द समूह विद्वान ऐलकजी को भीतर तक आन्दोलित कर गये, अत: उन्होंने अपना ज्ञान-पुष्प रूपी शीश उनके चरणों पर धरते हुए कहा- गुरुवर आत्मा तैयार है। शरीर की कृशता तो अब लगी ही रहेगी, पर आत्मा की बलवत्ता विश्वास दिला रही है, आप आशीष प्रदान करें। गुरुवर शिवसागर ने अपने से अधिक विद्वान शिष्य को आशीष प्रदान किया और समय तिथि निश्चित करने की सोचने लगे।

     

    दूसरे दिन आचार्य शिवसागरजी ने नगर के समाज-प्रमुखों को निर्देश दिये कि बिन्देरी निकाली जावे, वे अपनी बातें और आगे तक बतलाते कि बीच में ही यथार्थ ज्ञान के साक्षात् अवतार ऐलक ज्ञानभूषण जी (पं. भूरामलजी) ने तुरन्त गुरुवर के समक्ष हाथ जोड़कर इन्कार कर दिया, कहने लगे “अब तक शोभायात्रा ही तो निकलती रही है मेरी, मगर उससे धर्म की कोई शोभा न बढ़ा सका, अत: यह सब रहने दीजिए, आप जो स्वरूप प्रदान करनेवाले हैं, शोभायात्रा उससे ही बन सकेगी। उसी में धर्म और धर्मात्माओं की शोभा निहित है। सो ये धार्मिक औपचारिकतायें मेरे साथ न चलने दें, मुझे तो यथार्थ के पथ पर ले चलें।”

     

    ज्ञानभूषणजी के विनम्र निवेदन से आचार्य शिवसागरजी के हृदय में भारी प्रसन्नता हुई, शिष्य की निस्पृहता और उदासीनता की पराकाष्ठा देखकर उनके हृदय में वात्सल्य का वेग दूना हो गया। ज्ञानमूर्ति श्री ज्ञानभूषण के ज्ञान की उन्होंने सराहना की और अन्य शिष्यों तथा श्रावकों के लिए उनका कथन श्लाघनीय निरूपित किया। कि बिंदोरी, हाथी, बाजे, सजावट, राजकुमार आदि के रूप मूलरूप से मिथ्यात्व की झाँकी का ही प्रदर्शन करते हैं, अत: श्री ज्ञानभूषण के कथन के अनुसार उनसे बचा जावे तो उचित ही होगा। गुरुवर ने पुन: ऐलक ज्ञानभूषण के क्रांतिकारी और उदात्त विचारों की सराहना की। उन्हें आशीष दिया। धन्यवाद भी दिया।

     

    सभी ने आचार्यश्री के साथ-साथ वृद्ध ऐलक ज्ञानभूषण का भारी जयघोष किया। आचार्य शिवसागरजी ने पं. भूरामल शास्त्री जैसे निष्णात विद्वान, जो कि उस समय ऐलक ज्ञानभूषण के रूप में थे, को दीक्षा देने का मनोदय तो बना लिया, पर दीक्षा के पूर्व उनकी पात्रता की पड़ताल से नहीं चूके। यद्यपि ६८ वर्षीय ज्ञानभूषणजी ज्ञान की साक्षात् मूर्ति थे, फिर भी जैनागम, जैन सिद्धान्त और जैन विधियों की छाया में एक उपक्रम रचाया गया वहाँ। खुले मंच पर जब ऐ. ज्ञानभूषणजी प्रवचन कर रहे थे, तब वहीं उच्चासन पर विराजित आचार्य शिवसागरजी ने प्रश्न उठा दिया- ‘ऐलकजी मुनि दीक्षा के लिये क्या पात्रता होती है, इस पर प्रकाश डालिये।

     

    ज्ञानापन्न ऐ. ज्ञानभूषणजी गुरु आज्ञा पाकर प्रसन्न हुए, फिर उन्होंने अपने प्रवचन को तदनुसार मोड़ प्रदान करते हुए उत्तर दिया- हे गुरुवर ! “भावना भव नाशिनी के आधार पर पृथ्वी का कोई भी पुरुष दीक्षा लेने का भाव कर सकता है, पर हर किसी में भाव तो हो सकता है, पर पात्रता नहीं। पात्रता का परिचय इन पंक्तियों में है - विशुद्ध कुलगोत्रस्य, सद्वृत्तस्य वपुष्मत:। जैन आगम-प्रस्थानानुसार प्रस्तावनानुसार जिस व्यक्ति का कुल और गोत्र शुद्ध हो, जो सदाचारी हो, जिसका व्यक्तित्व सुदर्शन हो, वह दीक्षा के योग्य होता है। 

     

    १. ‘प्रवचनसार’ के चारित्राधिकार में इस विषय को प्रकाश देते हुए कहा गया है। जो वैश्य, क्षत्रिय या ब्राह्मण वर्ण में से किसी एक की संतान हो

    २. जो तपस्या करने की शारीरिक-सामर्थ्य रखता हो

    ३. जो न तो अत्यधिक वृद्ध हो, न अति सुकुमार बालक हो। उक्त तीन बिन्दुओं में से तृतीय बिन्दु के समर्थन में मुझसे पूछा जा सकता है कि आप तो ६८ वर्षीय वृद्ध हैं, फिर दीक्षा क्यों? तब मेरा उत्तर उसी प्रवचनसार में वर्णित कथन से ही बनता है कि सल्लेखना पूर्वक शरीरान्त की अभिलाषा रखने वाला वृद्ध भी, जो बीमार या अस्वस्थ भी यदि जागृत-विवेक का है, तो आचार्यों के समक्ष वह दीक्षा का पात्र माना जाता है। उसके बाद बिन्दु क्रमांक -  

    ४ में बतलाया गया है कि जिसका चेहरा और शरीर की बनावट सुंदर हो।

     

    तभी बीच में आचार्य शिवसागरजी बोल पड़े - आप वृद्ध हैं, पर सर्व रूप से सुन्दर आपकी छवि है, ज्ञान प्रकाश से प्रदीप्त हैं। शिवसागरजी का वाक्य सुनकर ज्ञानभूषणजी ने हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया, जैसे साधुवाद दे रहे हों मन ही मन, फिर प्रवचन आगे किया - दीक्षा की अंतिम शर्त है कि दीक्षार्थी का चरित्र निष्कलंक रहा हो और आगे भी रहे। अयोग्य व्यक्ति को दीक्षा प्रदान करने के विरुद्ध रहा है आगम। प्रवचन चल ही रहा था ऐलकजी का, कि शिवसागरजी ने बीच में ही विनम्रता से आज्ञा दी- ऐलकजी, जैनेश्वरी दीक्षा के क्रम पर भी प्रकाश डालिये। आज्ञा सुनते ही ऐ. ज्ञानभूषणजी ने स्वीकृति में सिर हिलाया।

     

    और पुन: हाथ जोड़कर अभिवादन किया गुरु को, फिर आगे बोले दीक्षाओं का क्रम निरंतर वृद्धि पा रहा है, परन्तु घर से भागे हुए या समाज से भगाये गये व्यक्ति अन्य दूरस्थ नगर में जाकर दीक्षा लेने का प्रपंच रचें, यह उचित नहीं है। दीक्षा लेने का भाव आत्मजनित हो, स्वस्फुरित हो। इसी तरह संघों में संतों की संख्या वृद्धि का लक्ष्य न हो, संघस्थ साधुओं में गुणवृद्धि का लक्ष्य हो। संख्या तो भेड़ और बकरियों के झुण्डों तक में भी बढ़ जाती है, किन्तु गुण.........गुण तो सिर्फ गुणाध्यायी/गुणोपासक ही बढ़ा सकते हैं।

     

    दीक्षा चाहनेवाला दीक्षा लेने में और देनेवाला दीक्षा देने में उतावली न करें, क्योंकि उतावलेपन के कारण पात्र की परिपक्वता और चारित्रिक दृढ़ता की परख नहीं हो पाती। “भगवती-आराधना में स्पष्ट लिखा गया है- शील से सज्जित एक मुनि, एक लाख अपरिपक्व मुनियों से श्रेष्ठतर होता है। अत: पहले दीक्षार्थी को व्रतों के स्वरूप से अवगत कराना चाहिये। आज की तरह भविष्य में भी शीलवान मुनियों की उपस्थिति से पृथ्वी खिले और धर्म सधे, यह ध्यान रखना चाहिये। कठोर परीक्षायें लेना चाहिए तथा पात्र के स्वभाव के साथ-साथ कुल गोत्र और चरित्र परख लेना चाहिए। मुनि दीक्षा देने के पूर्व पात्र पाँच से सात वर्ष तक ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, वर्णा और ऐलक अवस्था में रह कर गुरु आज्ञा के अनुसार अध्ययन करें और संघ चर्या का निर्वाह करें।

     

    दीक्षा के समय उसके माता-पिता या पालक या कुटुम्बीजन का सम्मत होना अनिवार्य है, बिना उनकी सम्मति के दीक्षा-टालना उचित है। इन सब विचारों के बाद, दीक्षा चाह रहे पात्र में तत्त्वज्ञान का होना आवश्यक है, उसके उदासीन परिणाम हों और उसमें परीषह सहने की शक्ति हो- यह भी देखना जरूरी है।

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