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गुरुदेव ने मुनि विद्यासागर जी को उदाहरण के स्वरूप प्रस्तुत किया - 103 वां स्वर्णिम संस्मरण

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संयम स्वर्ण महोत्सव

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जीवन में स्वयंभू, सत्यधर्मो का प्रकाश प्रकट करने वाले गुरूवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के प्रकाशवान् चरणो में वंदना करता हूँ.... हे गुरुवर! मेरे गुरु की साधना और वैराग्य को देखते हुए आप इतने प्रभावित हुए थे, कि आपने, उनको उदाहरण के रूप में उपस्थित किया था। वह वाकया पण्डित विद्याकुमार सेठी जी ने १९९४ अजमेर चातुर्मास में मुझे सुनाया। जिसे सुनकर हम शिष्यों को गौरव की अनुभूति होती है। वह संस्मरण हमने लिख लिया था, जो आपको प्रेषित कर रहा हूँ........

 

गुरुदेव ने मुनि विद्यासागर जी को उदाहरण के स्वरूप प्रस्तुत किया
" ज्ञानसागर जी महाराज बड़े ही शान्त प्रकृति के थे, वो कहते थे- सिद्धान्त तो निश्चयरूप है और व्यवहार प्रैक्टीकल रूप है। उत्सर्ग और अपवाद में विरोध नही है। उत्सर्ग मार्ग अपवाद सापेक्ष है। इस तरह वो जब भी किसी को समझाते थे तो पिता-पुत्र के समान समझाते थे या कोई ज्ञानी आता तो उसे मित्र के समान बोला करते थे। विद्याधर जी की मुनि दीक्षा होने के बाद एक दिन मुझको देख कर गुरूदेव ज्ञानसागर जी बोले- अरे पण्डित जी संयम के बिना जीवन अपूर्ण है। विद्यासागरजी जी को देखो ! कुछ तो शिक्षा लो। भारी जवानी में संयम की साधना कर रहे है और ज्ञान को अंदर उतार रहे है। जो उनके आचरण में प्रकट हो रहा है। उनसे कुछ शिक्षा ले लो, खाली पंडित बने रहने से कुछ नही होगा।
आपको स्वस्थ शरीर मिला है तो इसको बाह्य उपकरण बनाओ। इसको स्वर्ण की पेटी बनाकर सम्यकदर्शनादि रत्न उसमें रखो। तभी वह सुरक्षित रह सकेगा। इतना सुनकर मेरा ह्रदय परिवर्तित हो गया और हमने तत्काल चार प्रतिमा के व्रत गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज से ले लिए।" इस तरह आपकी और आपके शिष्य, मेरे गुरुवर के कई विशेषताएं हम शिष्यों को प्रेरणा प्रदान करती है। ऐसे प्रेरक गुरुओं के उपकारों को कोटी-कोटी प्रणाम करता हुआ.....

 

अन्तर्यात्री महापुरुष पुस्तक से साभार

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