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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

तभी झुकने का उपक्रम


संयम स्वर्ण महोत्सव

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पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा की जब लचक होती है तभी झुकने का उपक्रम होता है । तूफ़ान में भी वही टिक पाते हैं जिनकी जड़ें मजबूत होती हैं ,शीर्षासन से रक्त का संचार सही होता है इसलिए झुकने के परिणाम आने चाहिए । भारत को यदी बड़ा बनना है तो विनय शीलता को कायम रखना होगा । विनय से ही हम दूसरे के लिए पाठ्यक्रम बन सकते हैं । आजकल हाय तौबा का वातावरण बना हुआ है सभी लोग बहुत जल्दी शिखर को छूना चाहते हैं परंतु जब तक लोभ और तृष्णा को अपने ऊपर हावी रखेंगे तो ऊपर उठने की जगह गर्त में ही जाएंगे ।

 

उन्होंने कहा की परिग्रह ही दुःख का मूल कारण है ,जब हम याचक की भूमिका में रहते हैं तभी हमें प्राप्ति होती है । भगवान् महावीर ने तो अपने आपको दिवालिया बना लिया परंतु आप भीतर से दिवालिया नहीं हो पा रहे हैं मतलब खाली नहीं हो पा रहे हैं ,अपनी दीवाली को सार्थक बनाना है तो विनय को जीवन का प्रमुख अंग बनाओ ।लोभ और तृष्णा की गहरी खाई आपको कभी ऊपर नहीं उठने देगी ।

 

उन्होंने कहा की जो झुकने की कला सीख लेते हैं उन्हें फिर जीवन में किसी के सामने झुकने की जरूरत नहीं पड़ती है ।

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