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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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धन्य तेरस पर्व


संयम स्वर्ण महोत्सव

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धन्य तेरस पर्व पर पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि आज जो त्यौहार है वो दान की प्रेरणा देने वाला है। दान श्रावक का प्रमुख धर्म कहा गया है, दान देने और दान की अनुमोदना से ही कर्मों की निर्जरा होती है परंतु दान वो ही सार्थक होता है जो बोलने के बाद समय से पहले दे दिया जाय। दान के मामले में ग्रामीण अंचल के श्रावक हमेशा आगे रहते हैं और कालान्तर में शहर में रहने के बाद भी उनमें ये प्रवत्ति बनी रहती है।

 

उन्होंने कहा कि मैं जब भोपाल में पंचकल्याणक के लिए आया था तो सबने मिलकर खूब धर्म प्रभाबना की थी और दान भी बढ़ चढ़कर किया था। दान तो दान होता है जो जीवन को सार्थक बनाता है पुण्योदय में कारण बनता है। धर्म कर्म सब करने के बाद भी यदि मोह नहीं छूटता है तो सब व्यर्थ है। मोह को त्यागकर ही दान के भाव निर्मित हो सकते हैं।

 

उन्होंने कहा कि बड़े बड़े तालाब और नेहर आपकी प्यास नहीं बुझा पाते परंतु कुँए की छोटी सी झिर आपको पर्याप्त जल उपलब्ध करा देती है इसी प्रकार धर्म के प्रति छोटी सी भावना भी आपको भव्यता प्रदान करने में कारगर सिद्ध होती है। राजधानी बालों की झिर भी छोटी है परंतु भावनाएं प्रबल हैं। आपकी परीक्षा शुरू हो चुकी है अब तो संकल्प के साथ निर्माण में जुट जाएँ एक दिन निर्वाण की प्राप्ति का पुण्य भी जाग्रत होगा। अज्ञान दशा से बाहर निकलना चाहते हो तो ज्ञान का आवरण पहनलो।

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